हिंदी सिनेमा के 100 वर्षों के इतिहास का अध्ययन करने पर पता चलता है कि पौराणिक कथाएँ हिंदी फिल्मों के कथानक के मुख्य स्रोत रहे हैं। खासकर रामायण और महाभारत लंबे समय तक हिंदी फिल्मों की पटकथा के केंद्र में आते रहे हैं। ध्यातव्य है कि इन पौराणिक ग्रंथों का मूल उद्देश्य चतुर्वर्ण व्यवस्था को कायम रखने और इनका महिमा मंडन करना ही रहा है। चूँकि सिनेमा लोकप्रिय मनोरंजन का साधन है इसलिए उसका ध्यान इस बात पर रहता है कि उसकी लोकप्रियता में कहीं से कोई रुकावट न पहुँचने पाये, मसलन वह पूरी प्लानिग के साथ अपने इस व्यवसाय में आगे की तरफ बढ़ता है। जवरीमल्ल पारख कहते हैं –“हिंदी का व्यावसायिक सिनेमा लोकप्रिय मनोरंजन का साधन होने के कारण वह समाज के ऐसे अंतर्विरोधों को विषय नहीं बनाता जिसके कारण उसकी लोकप्रियता के अबाध प्रसार में बाधा पहुँचे। हिंदी सिनेमा का शुरू से प्रयास रहा है कि वह ऐसा मेलोड्रामा पेश करे जो भारत के प्रत्येक क्षेत्र, जाति, समुदाय और धर्म को मानने वाले लोगों की भावनाओं के अनुरूप हो अर्थात उनके विचारों संस्कारों और भावनाओं को आघात पहुंचाए बिना दर्शकों का मनोरंजन करे।“[1] यह स्थिति लगभग सिनेमा के शुरुआत से रही है, लेकिन यहाँ जो पारख जी की बात है, वह हाशिये के समाज के चित्रण के सम्बन्ध में पूरी तरह ठीक नहीं है। हाशिये के समाज से सम्बंधित विषय वस्तु को चित्रण करने में उसकी लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, क्योंकि मल्टीप्लैक्स कल्चर के पहले तक हिंदी सिनेमा का सबसे ज्यादा दर्शक हाशिये का समाज ही रहा है। इसलिए उस समाज से सम्बंधित फिल्म को भी मेलोड्रामा के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था। असल में बात यह है कि हिंदी सिनेमा में घरानों के जातिगत पूर्वाग्रह और हाशिये के समाज के लोगों का प्रतिनिधित्व न होने के कारण हिंदी सिनेमा की नजर इस विषयों पर नहीं पड़ी। लेकिन “इसका अर्थ यह भी नहीं कि फ़िल्में जाति प्रथा के प्रति कोई दृष्टिकोण पेश नहीं करतीं। सतही तौर पर हिंदी फ़िल्में ऊँच-नीच के भेद को अस्वीकारती नज़र आती हैं – ‘ठाकुर साहब हम गरीब हैं तो क्या हमारी भी इज्ज़त है।’, यह संवाद हम हर दूसरी-तीसरी फिल्म में सुन सकते हैं। परन्तु यह भी सच्चाई है कि उच्चवर्गीय अहंकार का जितना भोंडा प्रदर्शन हम फिल्मों में देखते हैं, यह उसी वास्तविकता का एक पहलू है, जिसे हम निम्न जातियों के विरुद्ध हमले के रूप में जानते हैं- ‘हम ठाकुर हैं जान दे देंगे लेकिन किसी के सामने सर नहीं झुकायेंगे, ब्राह्मण की संतान होकर तूने यह कुकर्म किया, एक सच्चा राजपूत ही ऐसा कर सकता है आदि। अगर हम थोड़ा ध्यान दें तो देखेंगे कि हिंदी फ़िल्में जातियों का उल्लेख किये बिना ही उच्च वर्ण की श्रेष्ठता और उसके दृष्टिकोण को स्वीकार करके चलती हैं। ‘अछूत कन्या’, ‘सुजाता’, ‘अंकुर’, ‘पार’, ‘सद्गति’, ‘दीक्षा’, और ‘समर’ जैसी कुछ अपवाद नामों को छोड़ दें तो हिंदी सिनेमा जाति प्रथा पर प्रहार करता कभी नज़र नहीं आया।”[2] इसतरह यह बात देखी जा सकती है कि दलित वर्ग के लिए हिंदी सिनेमा का इतिहास भी सामाजिक इतिहास की भांति ही रहा है।

सवर्ण मानसिकता की गुलामी से अभी हमारा हिंदी सिनेमा बाहर नहीं निकला है। इसके लिए फिल्मों के नाम से ही अंदाजा लगाया जा सकता है यथा – ‘मि.सिंह वर्सेस मिसेज मित्तल’, ‘मित्तल v/s मित्तल’, ‘राकेट सिंह : सेल्स मैन ऑफ दा इयर’, ‘सिंह इस किंग’, ‘मंगल पांडे’, ‘भाई ठाकुर’, ‘अर्जुन पंडित’, ‘क्षत्रिय’, ‘राजपूत’ इत्यादि। इन कुछ फिल्मों के नामों को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी फिल्मकारों के दिमाग में क्या चल रहा होता है। एक पल के लिए सृजनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर इन सारे नामों को स्वीकार भी कर लिया जाये तो भी यह प्रश्न यथावत रहता है कि दलित, दुसाध, मंडल, पासवान, चमार, महार जैसी दलित जातियों के नाम पर फ़िल्में फिर क्यों नहीं बनतीं ? क्या दलित हमारे समाज का हिस्सा नहीं हैं ? यदि हैं तो वे फिल्मों में दिखते क्यों नहीं ? और अगर दिखते भी हैं तो पीड़ित और सताए हुए बेचारे टाइप से क्यों दिखाया जाता है? आखिर इसके मायने क्या हैं ? क्या अर्थ निकला जाए ?

सच्चाई यह है कि सामजिक परिवर्तन और सुधार के नाम पर पूरे भारत में कुछ ठोस कार्य नहीं हुआ है। कहीं कुछ हुआ भी है तो उसे सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त भारतीय समाज, अपने आपको स्वीकार करने योग्य नहीं बना पाया है। तथ्य तो यह है कि आज के समय में जो थोड़ी-बहुत स्वीकार की स्थिति बनी है, वह मात्र राजनैतिक है। राजनैतिक इसलिए कि पिछले कुछ वर्षों से दलित, राजनितिक रूप से लामबंद होकर उभर रहे हैं। यह उभार राजनितिक पार्टियों के लिए एक बहुत बड़ा वोट बैंक है और इसी रूप में उन्हें देखा जा रहा है। देखा जा रहा है कि वे किसी भी सरकार की तकदीर बना और बिगाड़ सकते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी सिनेमा की तरफ से एक औडिएंस के रूप में उनकी इच्छाओं, अपेक्षाओं और जरूरतों को महत्व नहीं दिया गया, क्योंकि एक निर्देशक, अभिनेता और फोटोग्राफर के लिए सिनेमा भले ही कला का माध्यम हो लेकिन निर्माता के लिए वह एक उद्योग से ज्यादा कुछ नहीं है।

फ़िल्मकार डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी एक साक्षात्कार में फिल्मों के सामाजिक दायित्व के प्रश्न पर कहते हैं –“फिल्मों का सामाजिक दायित्व है, पर दुर्भाग्य से फिल्मों में व्यक्ति का सामाजिक दायित्व प्रासंगिक नहीं रह गया। फ़िल्में अब विशुद्ध व्यवसाय हैं और फिल्मों का व्याकरण बाजार के द्वारा संचालित होता है। फ़िल्में कहानी या निबंध लिखने जितनी सस्ती नहीं होती। जब फ़िल्में बनाना कहानी लेख या निबंध लिखने जितना कम खर्चीला माध्यम हो जायेगा तब फ़िल्मकार सही अर्थों में सामाजिक दायित्व के बारे में विचार करना शुरू करेगा।“[3] डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की बातें आज के हिंदी सिनेमा या किसी भी सिनेमा का यथार्थ है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि सिनेमा जब विशुद्ध उद्योग ही है तो इसे कला से क्यों जोड़ा जाता है ? इस प्रश्न पर फ़िल्मकार श्याम बेनेगल का वक्तव्य देखा जा सकता है- “मेरी नजर में फिल्म निर्माण, उनका प्रोडक्शन मूल रूप से एक सामाजिक कला है। जैसे गायन, नृत्य, रंगमंच, अभिनय, टी.वी. भी सोशल आर्ट हैं वैसे ही फिल्म प्रोडक्शन भी सोशल आर्ट है। सिर्फ कथानक, पात्रों के अभिनय, संवाद, मौके के अनुसार दुखद और सुखद पार्श्व संगीत, सीन के अनुरूप भावभीने गीतों की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि तकनीक और समय के साथ बेहतर रूप से बेहतर तकनीक की दृष्टि से भी फ़िल्में ऐसा कलात्मक माध्यम हैं जिसे निर्माता डायरेक्ट और इनडायरेक्ट ‘विज्युल्स’ के सांकेतिक प्रस्तुति से सारपूर्ण बातों को और अधिक खूबसूरती के साथ आम जनता तक पहुँचा सकते हैं।“[4] दोनों फिल्मकारों की बातों से यह स्पष्ट है कि सिनेमा कला तो है लेकिन व्यवसाय भी है। लिहाजा यह कहा जा सकता है कि सिनेमा कहीं न कहीं असमंजस की स्थिति में है, परन्तु एक बात तो बिल्कुल साफ़ है कि सिनेमा पर बाजार का भारी दबाव है। इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि हिंदी सिनेमा में वर्णवादी मानसिकता भी कम नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा न होता तो क्या कारण है कि इतनी राजनैतिक चेतना वाले दलित आंदोलन को किसी भी फिल्म का कथ्य नहीं बनाया गया। बाजार के दबाव के आधार पर यदि फिल्मों के न चलने की दलील को मान भी लें तो तर्क यह है कि ऐसे में तो कई फिल्मकार अपनी एक फिल्म के फ्लॉप हो जाने के बाद इस उद्योग को अलविदा कह गए होते, पर ऐसा नहीं हुआ। कई बार प्रयोग के तौर पर कई फ़िल्में बनाई गयीं और महज़ इस लिए कि फ़िल्मकार अपनी सोच को दुनिया के साथ बाँट सके। लेकिन दलितों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। न तो उनके कथ्य को फिल्मों का विषय बनाया गया और न ही फिल्म उद्योग में उन्हें पर्याप्त मौके मिले। “दलित होने के कारण हिंदी और भोजपुरी फिल्म से जुड़े गोपाल एक वाकया बताते हैं- जब उन्हें शूटिंग के लिए बुलाया गया, लेकिन जब उनकी जाति का पता वहाँ के इंचार्ज को लगा तो उन्हें आने जाने का किराया देकर विदा कर दिया गया।”[5]

भूमंडलीकरण के बाद काफी कुछ बदला और इस बदलाव का असर हिंदी सिनेमा पर भी पड़ा। इस असर को हम दो स्तरों पर देख सकते हैं- पहला यह कि सिनेमा में बेहतर तकनीक का प्रयोग होना शुरू हुआ और दूसरा यह कि कथानक के स्तर पर भी काफी अनूठे प्रयोग होने लगे। लेकिन देखना यह है कि ऐसे प्रयोग किसके लिए किये गए। दरअसल देश में उदारीकरण की नीति लागू होने से भारतीय समाज में एक व्यापक परिवर्तन आया और एक ऐसा मध्यवर्ग तैयार हुआ, जो युवा था और उसके सपने पाश्चत्य जीवन शैली पर आधारित थे। इसी का फायदा बाजारवादी शक्तियों ने उठाया और उसे उपभोक्तावादी बना दिया। हिंदी सिनेमा में जो अनूठे प्रयोग हुए वह प्रवासी भारतीय और इलीट वर्ग के साथ-साथ इस दर्शक वर्ग को भी ध्यान में रखकर किये जा रहे थे। विलासी जीवन जीने वालों की दिनचर्या को विषय बनाकर हिंदी सिनेमा ने एक ऐसे संसार की रचना की, जिससे यह नया मध्यवर्ग उसकी ओर आकर्षित हो सके। बाजारीकरण और सिनेमा के इस प्रयोग का प्रभाव यह पड़ा कि छोटे शहरों के पिक्चर हाल बंद होने लगे और उसकी जगह मल्टीप्लेक्स संस्कृति का जन्म हुआ। जिससे अब निर्माताओ का मुख्य ध्यान शहरी मध्य वर्ग पर ही रहता है। ऐसे में स्वभाविक है कि फिल्मों का कथानक विवाहेत्तर सम्बन्ध, लड़का-लड़की का प्यार या किसी मर्डर मिस्ट्री के आस-पास ही होगा। ये सब कुछ ऐसे विषय हैं, जिनकी ओर शहरी मध्य वर्ग का ज्यादा रुझान रहता है।

इन तमाम बातों के बावजूद यह देखा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा ने इक्कीसवी में कुछ ऐसी फिल्मों का निर्माण किया जो दलित सम्बंधित विषयों को मजबूती के साथ उठाती हैं। दीक्षा (1991), समर (1991), रुदाली (1993), बैंडिट क्वीन (1994), बवंडर (2000), लगान (2001), लज्जा (2001), एकलव्य (2007), मोहनदास (2009), राजनीति (2010), पिपली लाइव (2010), आक्रोश (2010), आरक्षण (2011), शुद्र (2012), तीसरी आजादी (2012), मसान (2015), माझी द माउंटेन मैन (2015), चौरंगा (2016) आदि ऐसी ही फ़िल्में हैं। लेकिन यहाँ सोचने वाली बात यह है कि जो हिंदी सिनेमा सलाना 500 से 1000 तक की संख्या में फिल्मों का निर्माण करता है वह दलित विषयों को लेकर इक्कीसवीं सदी के इन 25 वर्षों में 25 फ़िल्में भी नहीं बना सका। यहाँ हो सकता है कि कुछ और फ़िल्में हों जो मेरे संज्ञान में न आने के कारण छूट जा रही हों, इसलिए मोटे तौर पर यह मानकर चला जाये कि वह छूटी हुई फ़िल्में और 25 की संख्या में होंगी। इस तरह इन 25 सालों में कुल फिल्मों की संख्या 50 ठहरती है। जाहिर है कि निर्माण की दृष्टि से यह 50 की संख्या, हिंदी सिनेमा के लिए दलितों के प्रति संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।

          भारतीय इतिहास ही नहीं बल्कि विश्व के इतिहास में भी डॉ. अम्बेडकर के दलित आन्दोलन को समाजिक क्रांति का दर्जा प्राप्त है। जिसमें हिंदी सिनेमा के कई बड़े नाम अम्बेडकर के समकालीन रहे हैं, उनमे से कई ऐसे हैं जिन्होंने सामाजिक सरोकार की फ़िल्में भी बनाई हैं। आखिर क्या कारण कि वे आंबेडकर के इतने बड़े आन्दोलन को किसी फिल्म का कथ्य नहीं बना पाये ? बलराज साहनी, शाहिर लुधियानवी, राजेंद्र सुइंघ जैसे उस समय के बड़े नाम वामपंथी विचारधारा से भी जुड़े थे; ध्यान रहे कि वामपंथी इन वर्गों के संघर्ष का ढोल पीटते रहे हैं। यहाँ तक की सामाजिक असमानताओं को अपनी फिल्मों में बखूबी दर्ज करने वाले राजकपूर का भी दलित आन्दोलन पर ध्यान नहीं गया। इस तरह इनमे से कोई भी अम्बेडकर के दलित आन्दोलन पर केन्द्रित एक भी फ़िल्म नहीं बना सके।

अभी तक जो फ़िल्में बनी भी हैं उनमे दलित पात्र को दीन-हीन और सहानुभूति के पात्र के रूप में दिखाया गया है। उसे एक सशक्त सामाज के हिस्से के रूप में नहीं लिया गया है बल्कि यह दिखाने की कोशिश की गयी है कि एक दलित का कल्याण किसी न किसी सवर्ण के हाथों ही संभव है। वर्ष 2010 में आयी फिल्म ‘पीपली लाइव’ को ही ले लीजिये- इस फिल्म ने एक साथ कई सामजिक सवाल खड़े किये, पर जो सबसे अहम सवाल था उसे नज़रअंदाज कर दिया – वह था ‘नत्था की जाति’। क्या यह सत्य नहीं है कि गरीब किसानों की इस श्रेणी में अधिकतर दलित समुदाय के लोग ही आते हैं। इस फिल्म में गौर करें कि नत्था जब गाँव के नेता से आर्थिक मदद मांगने जाता है तो उस नेता का नाम ‘भाई ठाकुर’ होता है। सवाल उठता है – ठाकुर ही क्यों ? यह नाम कुछ और भी हो सकता था ! ऊपर जवरीमल्ल पारख के वक्तव्य का उद्धरण देते हुए इस बात का जिक्र हो चुका है कि हिंदी सिनेमा किस तरह जातीय वर्चस्वता के लिए शुरू से ही काम करता रहा है। इधर इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में भी पिपली लाइव के ‘नत्था’ और लगान के ‘कचरा’ जैसे पात्रों के चित्रण को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि फिल्मों से लेकर समाज तक जातीय वर्चस्व कितना गहरे बैठा हुआ है। इस तरह आज भी मीडिया की कल्टीवेशन थ्योरी के अनुरूप हिंदी सिनेमा जाति की वर्चस्वता का सन्देश बार-बार हमारे मस्तिष्क में ठूंसने का प्रयास लगातार कर रहा है।

दुनिया के पहले पहाड़तोड़वा, ‘दशरथ माझी’ के जीवन पर बनीं हिंदी फिल्म ‘माझी द माउन्टेनमैन’ एक ऐसी बायोपिक फिल्म है, जो प्रेम के उद्दात स्वरूप को प्रस्तुत करती है। प्रेम का यही उद्दात स्वरूप शानदार और जबरदस्त है इसलिए जिंदाबाद है। लेकिन इस प्रेम को जितना जिंदाबाद होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया। क्योंकि यह एक मूस खाने वाली मुसहर जाति अर्थात दलित जाति का प्रेम था। प्रसंग बस यहाँ एक प्रसिद्द गीत का जिक्र करना लाजमी होगा ‘तवायफ कहाँ किसी से कभी मुहब्बत करती है, मगर जब करती है..तो हाय, कयामत करती है’ ठीक इसी प्रकार का प्रेम दशरथ माझी का भी था। जो पहाड़ के लिए क़यामत बन गया और उसके कानों में एक ही बात गूंजती रही कि ‘जबतक तोड़ेगा नहीं, तबतक छोड़ेगा नहीं’।

हिन्दी सिनेमा के इतिहास में किसी दलित या आदिवासी के जीवन पर बनी संभवतः यह दूसरी फिल्म है। इससे पहले डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन पर बनी दलित बायोपिक फिल्म के अलावा नाम गिनाने जैसी ही कुछ फ़िल्में देखने को मिलती हैं। जबकि अनेको ऐसे नाम हैं जिनपर अच्छी फिल्म बनाई जा सकती थी लेकिन सिनेमा ‘समाज’ से ज्यादा ‘अर्थ’ पर केन्द्रित होकर रह गया। खैर, ‘परिवर्तन संसार का नियम है’ और यह भी कहा जाता है कि ‘जागो तभी सबेरा’, इस प्रकार निसंदेह कहा जा सकता है कि फिल्म ‘माझी- द माउन्टेनमैन’ एक शुरुआत है जो सदियों से सताये दलित और आदिवासियों के लिए उनके द्वारा किये जा रहे लम्बे संघर्ष में उत्साहवर्धक साबित होगी।

सौ वर्ष के लम्बे सिनेमा के इतिहास में लगभग सभी विषयों पर फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं। यहाँ तक कि किसी भी देश की तुलना में एक वर्ष में सबसे अधिक सिनेमा बनाने का रिकार्ड भी भारत के नाम है। किन्तु इतने लम्बे वर्षों के अन्तराल में दलित और आदिवासी सिनेमा हाशिये पर ही रहा है। जबकि भारतीय समाज में ‘जाति’ एक कड़वी सच्चाई है। और यही सच्चाई सिनेमाई इतिहास से लगभग गायब है। दलित विषयक सिनेमा पर बात की जाय तो सौ वर्षों के इतिहास में केवल चुनिन्दा फ़िल्में ही आई हैं। और बायोपिक फ़िल्में तो नदारद ही हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में दलितों का न होना। कुछ हैं भी, तो वह भी अन्यों की तरह पूँजी के चंगुल में हैं। क्योकि ‘सिनेमा एक ऐसी कलात्मक संभावना है जिसके मूल में उसकी व्यवसायिकता निहित है’। अनुपम ओझा इसी बात को बड़े सलीके से कहते है-“मुनाफाखोरों के लिए सिनेमा सिर्फ एक उत्पाद है। जिसपर वस्तु-व्यापार के नियम लागू होते हैं। दूसरी तरफ कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने वालों के लिए सिनेमा एक भाषा है, अभिव्यक्ति की एक कलात्मक शैली है। फिल्म कला है, परन्तु उद्योग भी है । फिल्म की समस्त कलात्मक सम्भावनाओं के मूल में प्रमुख रूप से उसकी व्यवसायिकता ही रही है।“[6]

इस फिल्म का निर्देशन केतन मेहता ने किया है, जो बायोपिक सिनेमा के लिए जाने जाते हैं। ‘दशरथ माझी’ के अलावा ये ‘बल्लभभाई पटेल’, ‘मंगल पांडे’ और ‘राजा रवि वर्मा’ पर बायोपिक फिल्म बना चुके हैं। ‘माझी द माउन्टेनमैन’ में मुख्य कलाकार के रूप में नवाजुद्दीन सिद्दकी और राधिका आप्टे हैं जो क्रमशः दशरथ माझी और फगुनिया की भूमिका में हैं। फगुनिया दशरथ माझी की पत्नी का नाम है। इन दोनों कलाकारों ने इस फिल्म में अपने चरित्र को न सिर्फ जीवंत किया है बल्कि जिया भी है। फिल्म का मुख्य कथानक माझी का प्रेम, प्रण और पहाड़ है, और साथ ही साथ दलितों के शोषण, अत्याचार और संघर्ष की उपकथा भी है। जिसको बहुत ही गहन अध्ययन के बाद सलीके से पिरोया गया है। वस्तुतः फिल्म शानदार, जबरदस्त और जिंदाबाद है।

फिल्म का कथानक इस प्रकार है- बिहार के गया जिले का क़स्बा है वजीरगंज जो एक पहाड़ी के पास बसा है और उसी पहाड़ी के पार है गहलौर गाँव, जहाँ दशरथ माझी का जन्म हुआ था।  गहलौर गांव की तरक्की में सबसे बड़ी रूकावट यही पहाड़ है। यहाँ के लोगों को अपनी किसी भी बुनियादी सुविधा के लिए वजीरगंज जाना पड़ता है। क्योंकि वजीरगंज में ही स्कूल, अस्पताल, बाजार और रेलवे स्टेशन है। गहलौर गाँव से वजीरगंज सीधे-सीधे तो बहुत नजदीक है लेकिन पहाड़ को घूमकर जाने में यहाँ के लोगों को लगभग चालीस मील की दूरी तय करनी पड़ती है। इसमें समय बरबाद होता है और इसी पहाड़ के कारण आजादी के सालों बाद भी सुविधाएं गहलौर गाँव तक नहीं पहुँच पाई हैं।

दशरथ मांझी का बाल विवाह फगुनिया के साथ होता है। दशरथ के पिता जमीदार के यहाँ बंधुआ मजदूर हैं। कर्ज न चुका पाने के कारण जमीदार दशरथ को बंधुआ मजदूर बनाने के लिए कहता है। लेकिन साहसी और विद्रोही दशरथ उनके चंगुल से बचकर भाग खड़ा होता है। और धनबाद के कोयला खादान में जाकर काम करता है। सात साल बाद जब वह गाँव वापस आता है तब भी उसका गाँव वैसा का वैसा ही है। रास्ते में समाचार पत्र और अन्य गाँव के लोगों से पता चलता की सरकार ने छुआछूत ख़तम कर दिया है। इसलिए गाँव आते ही बिना कुछ सोचे समझे वह जमीदार का पैर छूता है और उसके लड़के को गले लगता है। पर ज्यों ही जमीदार को पता चलता है कि यह मुसहर दशरथ है, उसकी खूब धुनाई होती है। घर जाकर अपने पिता और मित्रों से मिलता है। माँ के मरने के बाद घर में स्त्री की जरुरत होती है। वह पत्नी को विदा कराने के लिए पिता के साथ उसके घर जाता है। लेकिन फगुनिया का पिता विदा करने से मना कर देता है। अंततः उसे फगुनिया को भगाकर घर लाना पड़ता है। दशरथ अपनी पत्नी से इतना प्यार करता है कि वह उसके लिए कुछ भी कर सकता है।

एक दिन फगुनिया पहाड़ के पार खेत में काम कर रहे दशरथ के लिए खाना लेकर पहाड़ चढ़कर जाती है। जहाँ उसका पैर फिसलता है और वह पहाड़ से गिर जाती है। उसे इलाज के लिए वजीरगंज ले जाया जाता है। लेकिन अस्पताल समय से न पहुँच पाने कारण उसकी मृत्यु हो जाती है। दशरथ पत्नी के मौत का कारण उस पहाड़ को मानता है। वह विशाल पहाड़ के सामने खड़ा होकर बोलता है ‘बहुत बड़ा है तु, बहुत अकड़ है तोरा में, अरे भरम है, भरम’ और वह हथौड़ा लेकर अकेला ही सुबह से लेकर रात तक पहाड़ में से रास्ता बनाने में जुट जाता है। उसका यह जुनून कभी खत्म नहीं होता। वह कभी नहीं सोचता कि यह काम उसके बस की बात नहीं है। लोग उसे पागल समझते हैं, बच्चे पत्थर मारते हैं, उसके पिता नाराज होते हैं, लेकिन दशरथ इन बातों से बेखबर जुटा रहता है अपने मिशन में। 22 साल लग जाते हैं उसे पहाड़ में से रास्ता बनाने में। इस अन्तराल में उसे तमाम कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है।  अंततः वह पहाड़ को बौना साबित कर उस पर विजय हासिल कर लेता है।

फिल्म की स्क्रिप्ट केतन मेहता और महेंद्र झाकर ने मिलकर लिखी है। फिल्म में तीन ट्रैक समानांतर चलते हैं। एक तो दशरथ की पहाड़ तोड़ने की प्रेरणास्पद कहानी, जो बताती है कि भगवान भरोसे मत बैठो, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो। दूसरा ट्रैक दशरथ और उसकी पत्नी फगुनिया के प्रेम का अन्तरंग दृश्य। जो केतन मेहता की व्यवसायिक दृष्टि का नतीजा है। तीसरा ट्रैक उस दौर में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल को दर्शाता है। मसलन छुआछुत को सरकार खत्म करती है। जमींदार के अत्याचार से मजबूर होकर कुछ मुसहर नक्सली बन जाते हैं। आपातकाल लगता है। पहाड़ से रास्ता निकालने के लिए दशरथ के नाम पर सरकार से जो पैसा मिलता है उसे जमीदार और सरकारी अफसर मिलकर डकार जाते हैं। दशरथ इसकी शिकायत करने के लिए 1300 किलोमीटर दूर पैदल चल कर दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पास जाता है, लेकिन पुलिस उसे भगा देती है। वन विभाग वाले पहाड़ को अपनी संपदा बता कर दशरथ को जेल में डाल देते हैं। ये राजनीतिक हलचल बताती है कि तब भी आम आदमी की नहीं सुनी जाती थी और हालात अब भी सुधरे नहीं हैं। भ्रष्टाचार और गरीबी सिर्फ नारों तक ही सीमित है।

          ‘माझी : द मोउमेंटन मैन’ की कहानी में इतनी पकड़ है कि दर्शक पूरी फिल्म रोचकता से देख लेते हैं और दशरथ की हिम्मत, मेहनत और जुनून की दाद देते हैं। लेकिन कहानी को कहने के तरीके पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया जा सकता है। निर्देशक केतन मेहता ने कहानी को आगे-पीछे ले जाकर प्रस्तुतिकरण को रोचक बनाना चाहा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। ये कट्स चुभते हैं। साथ ही दशरथ की प्रेम कहानी के कुछ दृश्य गैर-जरूरी लगते हैं, जो फिल्म की गंभीरता से भटकाता है। केतन मेहता प्रतिभाशाली निर्देशक हैं इसमें संदेह नहीं, लेकिन इस फिल्म में उनका काम उनके बनाए गए ऊंचे स्तर से थोड़ा नीचे रहा है, बावजूद इसके उन्होंने बेहतरीन फिल्म बनाई है। अभिनय के क्षेत्र में यह फिल्म मील का पत्थर साबित होगी। एक से बढ़कर एक कलाकार हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी अब हर रोल को यादगार बनाने लगे हैं। चाहे वो बदलापुर का विलेन हो या बजरंगी भाईजान का पत्रकार। मांझी के किरदार में तो वे घुस ही गए हैं। चूंकि नवाजुद्दीन खुद एक छोटे गांव से हैं, इसलिए उन्होंने एक ग्रामीण किरदार की बारीकियों को खूब पकड़ा है। एक सूखे कुएं वाले दृश्य में और पहाड़ के अन्दर पानी मिलने पर पानी पीना और झाड़ की पत्तियां चबाने के समय उन्होंने कमाल का अभिनय किया है। मांझी के रूप में उनका अभिनय लंबे समय तक याद किया जाएगा। फगुनिया के चरित्र में राधिका आप्टे को भी भुलाया नहीं जा सकता, और तिन्गमांशु धुलिया के जमीदार का अभिनय देखने के बाद अधिकतर लोग भूल ही जायेंगे की वो एक निर्देशक भी हैं। दशरथ माझी के पिता के रूप में अशरफ-उल-हक का अभिनय भी शानदार बन पड़ा है जो दलित चरित्र का जीवन दर्शन समझाने के लिए काफी है।

माझी द माउन्टेन मैन का, अभिनय से परे जाकर दलित बायोपिक फिल्म के रूप में विश्लेषण किया जाये तो वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी से सहमत हुआ जा सकता है जो कहते हैं- “केतन मेहता से मुझे ऊँची उम्मीद थी। पता नहीं क्यों यथार्थ पर टिकी चीज देखते-देखते मेलोड्रामा में फिसल गई।“[7] दयानंद पांडेय तो इस सन्दर्भ में यहाँ तक कह देते हैं कि “माझी फिल्म एक निहायत ही औसत फिल्म है।“[8] अपनी बात को और आगे बढ़ाते हुए वे लिखते हैं कि-“’मिल्खा सिंह’, ‘पान सिंह तोमर’ या ‘मेरीकाम’ से भी ज़्यादा बड़े आदमी थे दशरथ माझी। उनका काम भी इन व्यक्तियों की तुलना में इन सबसे बड़ा था। विराट संघर्ष है दशरथ माझी का। माझी का संघर्ष भी व्यक्तिगत कैरियर या झगड़े का नहीं है। उनका संघर्ष सामाजिक है। और ख़ास सरोकार का है। माझी का यह संघर्ष ज़बरदस्त, शानदार, जिंदाबाद का ज़रुर है पर यह फ़िल्म इस संवाद के पूरी तरह विपरीत है।“[9] यह सच है फिल्म मेलोड्रामा में फिसल गई है, और यह भी सच है कि मिल्खा सिंह, पान सिंह तोमर या मेरी काम से भी बड़ा चरित्र है दशरथ माझी का, लेकिन यह मात्र संवेदनात्मक बातें हैं, हमें इस सच को भी स्वीकारना होगा कि मिल्खा सिंह, पानसिंह तोमर और मेरी काम की तरह कितने लोग जानते थे दशरथ माझी को, ऐसे में केतन मेहता के सामने व्यवसायिकता और बाजार की मज़बूरी का खड़ा होना स्वाभाविक सा जान पड़ता है। इसके अलावा हिंदी सिनेमा में दलितों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए बात करें तो यह फिल्म इस भूमंडलीय दौर में मुख्य धारा के सिनेमा की तरह दलित नायक-नायिकाओं के प्रेम प्रसंग के दृश्यों को दिखाकर उनके लिए खुलकर जीवन जीने का मार्ग दिखाता है। इस फिल्म की सफलता कई ऐतिहासिक दलित चरित्रों का जीवन, सिनेमा के लिए भविष्य का द्वार खोलेगी। इस रूप में फिल्म समीक्षक नवल किशोर व्यास का वक्तव्य देखने लायक है “युवा फिल्मकारों ने साहस दिखाते हुए इस धारणाओं की तोड़ते हुए विषय को उसके किताबी व्याकरण से मुक्त कर उसे ठेठ सिनेमा की भाषा दी। विषय को उसी संजीदगी, संवेदनशीलता और तीखेपन से प्रस्तुत किया पर मेकिंग और बनावट को सम्प्रेषण में बाधा नही बनने दिया। इसी मुहीम का कमाल है कि पान सिंह तोमर, गैंग ऑफ वासेपुर, हैदर और मांझी का भी खुला दर्शक वर्ग है। इन फिल्मो का कोई कैटेगराइजेशन नही हुआ और ना कोई नया विशेषण इन्हें दिया गया। सुखद अहसास है कि इरफ़ान, नवाज और मनोज वाजपेयी के लिए भी आम दर्शक में दीवानो जैसा प्यार है। इस लिहाज से भारतीय सिनेमा का ये स्वर्णिम समय है और मांझी इसी स्वर्णिम समय का एक और नया अध्याय है।“[10]

दशरथ माझी की पत्नी फगुनिया उनके लिए मात्र प्रेमिका नहीं थी, बल्कि दुनिया छोड़ जाने के बाद वह माझी के लिए श्रद्धेय बन गयी थी, क्योंकि जबतक प्रेम था तबतक माझी में जज्बा कुछ कम था, पर ज्यों ही प्रेम, श्रद्धाभाव में परिवर्तित हुआ दशरथ माझी का जूनून सामुदायिक हो उठा और “श्रद्धा एक सामाजिक भाव है।”[11]  फगुनिया में दशरथ की श्रद्धा इतनी थी कि उसे अमर करने के लिए ही पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने का निर्णय लिया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं- “श्रद्धा का व्यापार स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकांत। प्रेम में घनत्व अधिक है और श्रद्धा में विस्तार।“[12]  फिल्म का यही विस्तार शानदार है, जिसको नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने दशरथ माझी के चरित्र में घुसकर जबरदस्त बनाया है। वैसे तो अमर करने का काम दशरथ माझी ने किया था लेकिन केतन मेहता ने उसे जिंदाबाद कर दिया। भारत में देखा जाये तो प्रेम के कई ऐतिहासिक मिशाल मिल जायेंगे लेकिन प्रसिद्धी के स्तर पर शाहजहाँ का नाम सबसे पहले लिया जायेगा, जिसने अपने प्रेम को अमर करने के लिए संगमरमर का विश्व प्रसिद्ध ताजमहल बनवाया। किन्तु आज अगर दशरथ माझी के सामने शाहजहाँ होता तो संभवतः सबसे पहले नतमस्तक होता। क्योंकि माझी द्वारा अकेले बनाये गये रास्ते का धूल, अरबों खर्च करके बनाए गए ताजमहल को ढँक देता है।

यह वही समय है जब देश में आकाल पड़ता है, नक्सलवाड़ी आन्दोलन होता है, और राष्ट्रराज्य की कल्पना भी की जाती है। अब इस समय में दलितों के साथ किस प्रकार का अत्याचार होता होगा फिल्म इसको बखूबी बयां करती है। एक दृश्य में सामंती दमन व शोषण की क्रूरता का अनुमान लगाया जा सकता है। गहलोर गाँव के मुखिया के ईंट भट्ठे पर काम कर रहे बंधुआ मजदूरों में से एक मजदूर जलती हुई भट्ठी में गिर जाता है, उसके साथी मजदूर, उसे निकालने के लिए दौड़ पड़ते हैं, लेकिन मुखिया का बेटा बंदूक तान के खड़ा हो जाता है, और कहता है ‘‘पानी डाल के भट्ठा बुझायेगा, ईंटा खराब हो गया न तो सबको यहीं मा झोंक देंगे।“[13] सामान्य मौसम में दलितों के साथ ऐसा होता है तो आकाल पड़ने उन्हें क्या नहीं झेलना पड़ा होगा ? इसको एक दूसरे दृश्य में देखा जा सकता है कि आकाल पड़ने पर पूरा का पूरा गाँव अपना घर-बार छोड़कर शहर की तरफ जाता है। यह फिल्म में मात्र सूचनात्मक रूप से दिखाया गया है। असल में हालात कुछ और ही थे। जिसको वरिष्ठ कवि-लेखक निलय उपाध्याय द्वारा दशरथ मांझी के जीवन पर लिखे अप्रकाशित उपन्यास में देखा जा सकता है- “एकाएक दोनों की नजर सामने गई और जैसे भक्क मार गया। वे कुछ समझ नहीं पायी कि कब जितिया माझी बिजली की तेजी से आंगन में समाया, एक पल के लिए नज़र घुमाकर उचक्के की तरह चारों ओर देखा। एकाएक उसकी नजर आंगन में सोयी पिंजरी की बच्ची पर टिक गई। मन ही मन उसने कुछ फ़ैसला लिया। बच्ची को एक हाथ से बिजली की गति से उठाया और आगे बढ़ता हुआ ढेके तक आ गया/ ढेके का मूसल ज्योंहि ऊपर उठा उसने बच्ची को ओखल में डाल दिया सबकुछ, इतना जल्दी और इस तरह पलक झपकते हुआ कि पिंजरी के मुंह से बस एक घूटी सी चीख निकली और दोनो अपनी जगह पर जैसे काठ हो गई।/ ओखल में पड़ी पिंजरी की नन्ही सी बच्ची जोर-जोर से रो रही थी और जितिया ओखल का चावल हाथ से निकालकर कभी गमछे मे डालता, कभी मुंह में और पागलों की तरह हंसता। पिंजरी और रमिया के पांव ढेंकी के लतमरुआ पर जोर से जमे थे, कहीं जरा सी चूक हुई तो इतने भारी ढेके का इतना बड़ा मूसल बच्ची के ऊपर जा गिरेगा। रमिया और पिंजरी दोनों के चेहरे उड़ गए थे और वे समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे।/ जितिया कभी चावल गमछे में उठाता, कभी फांकता और कभी कहकहे लगाता। बच्ची के रोने और उसके कहकहे की आवाज सुन कमरे में दूध बिलोती झिंगुरी सिंह की पत्नी बाहर निकलकर आयी और सामने का दृष्य देखकर उनके मुंह से चीख निकल गई।/ जितिया ने उन्हे चीखते देखा तो उसके चेहरे पर भय की लकीरे दौड़ गयी और उसी तरह कभी चावल फाकता, कभी हंसता जितिया तेजी के साथ घर से बाहर निकल गया। झिंगुरी सिंह की पत्नी शोर मचाते हुए जितिया के पीछे भागती चली गई । यह देख पिंजरी को जैसे काठ मार गया था। उसके पांव अब भी ढेके के लतमरूआ पर पूरे ताकत से जमे थे।/ रमिया ने उससे कहा- “जाओ पहले बच्ची को उठाओ।“[14]  ऐसी भयावह दृश्य न दिखाकर केतन मेहता से जरूर कुछ चूक हुई है। लेकिन एक बायोपिक फिल्म की अपनी भी कुछ सीमाएं हैं।

नक्सलवाड़ी आन्दोलन को भुनाने की कोशिश फिल्म जरुर करती है। जिसमे सामंती पितृसत्तात्मक दमन का वीभत्स दृश्य है। मुखिया के बेटे के द्वारा दशरथ की पत्नी को भरे बाजार में छेड़े जाने पर दशरथ व उसके दोस्त मिलकर मुखिया के बेटे रुआब की पिटाई कर देते हैं। इसका बदला लेने के लिए रुआब, दशरथ के दोस्त झुमरू की पत्नी को उठा लेता है, उसकी लाश सुबह गाँव के तालाब के किनारे मिलती है। इस घटना से दुःखी होकर झुमरू गाँव छोड़कर चला जाता है और तत्कालीन चल रहे नक्सली आन्दोलन में शामिल हो जाता है। एक दूसरे दृश्य में जब वह अपने नक्सली साथियों के साथ वापस आकर जमीदार मुखिया पर हमला करता है, और जमीदार को सरेआम फांसी पर लटकाता है तब दशरथ आकर मना करता है। उसे बंदूक की क्रांति से परहेज है। किन्तु वे नहीं मानते इसी बीच में पुलिस आती है और गोलीबारी में नक्सली मारे जाते हैं। इसमें गोली दशरथ पर भी चलती है लेकिन उसके पिता बीच में आ जाते हैं। इस तरह हिंसा किसी भी समस्या का समस्या का समाधान नहीं है। इससे पता चलता है कि दशरथ गाँधी और राष्ट्रराज्य में विश्वास रखते थे। इसी दृष्टीकोण के चलते वे तब इंदिरा गाँधी के पास दिल्ली चलकर जाते हैं, जब रास्ता बनाने के लिए उनके नाम पर आये 22 लाख रूपये को मुखिया और बीडीओ मिलकर हड़प लेते हैं।

आज भारत कहाँ से कहाँ पहुँच गया, विश्व में इसकी पहचान एक तेजी से उभरते हुए महाशक्ति के रूप में हो रही है। लेकिन आजादी के बाद से लेकर अबतक के सामाजिक उत्थान की बात करें तो एक ऐसी तस्वीर उभरकर सामने आती है जिसे देख कर महाशक्ति का दावा खोखला नजर आता है। केवल चंद लोगों के विकास को गिनाकर अपने आपको तीसमारखां कह देना किसी भी राष्ट्र की अस्मिता के लिए भविष्य का सबसे बड़ा खतरा है। आज भी ऐसे कई गाँव हैं जहाँ बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं। सही मायने में तो कुछ गाँवों का विकास सिर्फ कागजों पर होता है। इसमें भी यदि गाँव दलित का है तो और। माझी फिल्म भी इस आभासी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का कच्चा चिठ्ठा खोलने का काम करती है।

इस फिल्म को बनाने में निश्चित तौर पर केतन मेहता की टीम को काफी मेहनत और अध्ययन करना पड़ा है। पटकथा तैयार करने से लेकर संवाद लिखने तक काफी सावधानी बरती गयी है। अभिनय के लिए भी बहुत कुछ समझा गया है। क्योंकि माझी के किरदार को उभारना काफी चुनौती भरा काम था। इसके वाबजूद भी कुछ कमियां रह गयीं हैं। क्योंकि दशरथ माझी को पहाड़ में रास्ता बनाने के अलावा किसी और काम के लिए नहीं जाना जाता है। फिल्म रोचक बनाने के लिए कुछ कथानक अलग से गढ़ा गया सा लगता है। इस बात की पुष्टी के लिए दशरथ माझी को देखने और जानने वालों में से एक डॉ. मोहसिन खान के वक्तव्य को देखा जा सकता है।- “आपने मूल दशरथ मांझी को देखा और सुना है ? मैंने देखा और सुना है। एक बेहद दरिद्र और टाट के कपड़े पहनने वाला एक तथाकथित असभ्य पुरुष है। दाढ़ी बढ़ी हुई, नंगे पैर और पैदल सब दूर घूमना। लंबा सफ़र हो तो साधारण डिब्बे का ट्रेन का टिकिट। उन्होंने अपना हुलिया ही यह बना लिया है। गुरु हथौड़ा हाथ में है, जिसे काँधे पे टाँगे रहते हैं, गाँव में जाकर मिलोगे तो आश्चर्य होगा। दशरथ जी संकलिप्त और जुझारू व्यक्तित्त्व लिए हैं। उनकी पत्नी बीमार हो गई तो उसे अस्पताल पहुँचा न पाए और संकल्प लिया कि मुझे और गाँव के सभी लोगों को इस पहाड़ के कारण समस्या है, उसी को 22 साल तक काटते रहे और रास्ता बनाया। जिससे अब वर्त्तमान में गाँव के लोगों को बहुत अधिक घूमकर नहीं जाना पड़ रहा है। गरीब आदमी प्रेम क्या करेगा और उसकी लव स्टोरी क्या होगी ? उसे तो समस्याओं से जूझना है, वो ख़त्म हो जाएगा लेकिन समस्याएँ ख़त्म न होंगी।“[15] इनकी बातों से तो यही प्रतीत होता है कि माझी की पत्नी की मृत्यु बीमार होने से हुई न कि पहाड़ से फिसल कर गिरने से, जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है। खैर, यह जबतक प्रमाणित नहीं हो जाता तबतक विवाद का विषय है। इसके अलावा इस फिल्म में मेले का एक दृश्य है जिसमे स्टेज पर आर्केस्ट्रा का गाना बजता है ‘सैयां अरब गईलें ना’ जो केतन मेहता जैसे निर्देशक की लापरवाही को दिखाता है क्योंकि यह गाना सन 2005 के बाद का है। इस तरह इन कुछ छोटी-छोटी गलतियों को किनारे कर दिया जाये तो यह कहा जा सकता है कि फिल्म अपने उद्देश्य में सफल हुई है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि फ़िल्में अपने समय का आइना जरुर होती हैं लेकिन यह बात कुछ हद तक मानी जा सकती है। क्योंकि समाज और साहित्य में जो भेद-भाव दलितों के साथ किया गया और किया जा रहा है, वह सिलसिला फिल्मों में भी जारी है। समस्या से भागने और यथास्थिति को सहज स्वीकार कर लेने की हमारी प्रवृति ने फिल्मों में भी दलितों के साथ अन्याय ही किया है। इसको कुछ यूँ समझा जा सकता है- ‘वर्ग पर आधारित समाज में अधिकार प्राप्त वर्ग स्वयं के लिए कला का उपयोग मनोरंजण के रूप में करता है तथा सामान्य जनता को फुसलाने के रूप में, ताकि आम जनता वर्तमान वस्तु स्थिति से अपरिचित रहे और भविष्य की आशा से काल्पनिक संसार में भटकती रहे।’

संदर्भ ग्रंथ – 

[1] लोकप्रिय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ, जवरीमल्ल पारख, अनामिका पब्लिशर्स नई दिल्ली पृष्ठ-113

[2] लोकप्रिय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ, जवरीमल्ल पारख, अनामिका पब्लिशर्स नई दिल्ली पृष्ठ-114

[3] ‘लमही’ का सिनेमा विशेषांक जुलाई-सितम्बर 2010, पृष्ठ 63

[4] ‘लमही’ का सिनेमा विशेषांक जुलाई-सितम्बर 2010, पृष्ठ 58

[5] http://timesofindia.indiatimes.com/india/Dalits-strive-tomake-it-in-Hindi-Bhojpuri-films/articleshow/2929497.cms

[6] अनुपम ओझा, भारतीय सिने सिद्धांत, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि.दिल्ली, देहरी(भूमिका से)।

[7] http://bhadas4media.com/news/dekhsunpadh/2613-manjhi-film-review

[8] http://bhadas4media.com/news/dekhsunpadh/2613-manjhi-film-review

[9] http://bhadas4media.com/news/dekhsunpadh/2613-manjhi-film-review

[10] http://www.humrang.com/%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%9C%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE/

[11] श्रद्धा-भक्ति, चिंतामणि से , आचार्य रामचंद्र शुक्ल

[12] श्रद्धा-भक्ति, चिंतामणि से , आचार्य रामचंद्र शुक्ल

[13] फिल्म: माझी द माउन्टमैन

[14] www.facebook.com/permalink.php?id=601241333259100&story_fbid=624096017640298

[15] www.facebook.com/permalink.php?id=601241333259100&story_fbid=624096017640298

 

महेश सिंह
शोधार्थी, हिंदी विभाग
पांडिच्चेरी यूनिवर्सिटी, पुद्दुचेरी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *