1. सिंधु किनारे, दूर क्षितिज को निहारते

सिंधु किनारे, दूर क्षितिज को निहारते,
अरुणिमा से परावर्तित जल को देखते,
प्रकृति की रचना को आत्मसात करते,
परंतु आँखें तो बस तुम्हारे नैनों को ढूँढ़े।

वही नैन जो सागर जैसे विशाल नहीं,
उतने विहंगम और विस्तृत भी नहीं,
परंतु वही गहराई और आत्मीयता,
नभ से क्षितिज को आत्मसात किये हुए।

पर उन नैनों पर क्या लिखूं मैं,
जब मैं उन नैनों में देखूं,
तुम छिपा लेते हो उसे मेरी नजर से,
कि मैं कहीं उसमें अपना अक्स न देख लूं।

जब तुम्हारे आँखों में अपनी छवि देखती हूं,
सिंधु सा विहंगम नहीं, तो उससे कम भी नहीं,
खो जाऊं मैं उसमें आदि और अंत से परे,
और यूं देखती रहूं उन आँखों से इस संसार को।

2. स्वप्न और यर्थाथ

सपनों का टूटना नियति का विधान,
टूट कर बिखर जाना सपनों की प्रकृति,
मानव उन टुकड़ों में भविष्य संजोता है,
जैसे तिनके के सहारे चल रही नाव।

बस सपने नहीं टूटते लेकिन,
टूटती है सच्चाई भी बिना आहट के,
जैसे पूर्णिमा को इंदु का अस्तित्व नहीं,
अमावस चांदनी रातों से भी ज्यादा प्रकाशित।

सच्चाई का टूटना जैसे स्वयं बिखर जाना,
आत्मा से देह का साथ छोड़ जाना,
जल का नदी से विभेद हो जाना,
दिवा का रात्रि हो जाना, देव से दानव हो जाना।

निरंतर उसकी स्मृति पाथेय सी,
कभी पास, कभी अत्यंत सुदूर,
कभी आलिंगन में तो कभी पालाल से परे,
कभी आत्मा में समाई तो कभी मन से परे।

वह शून्य जो पूर्ण भी था,
अब अपूर्ण है परंतु शून्य है,
प्रशांत है, निवार्ण की आहट कोई नहीं,
बस है तो स्वयं के अभिशप्त रह जाने की सच्चाई।

प्रतिभा कुमारी
शोधार्थी
विनोबा भावे विश्वविद्यालय
हजारीबाग, झारखंड

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