1. है कैक्टस सा व्यक्तित्व मेरा
अनभिज्ञ नहीं मैं,अज्ञात नहीं मैं,
जीवन की अब हर कठिनाई से,
अनजान बना रहता  हूँ  मैं,
अब मौत की भी सच्चाई से।
ज्ञान मेरे मन मे बहुत भरा,
कुछ लोगो में ये अहम भरा।
परिचित मैं ऐसे लोगो से भी,
 फिर भी मैं सर झुकाए खड़ा।
बिल में छुपे मुसक की सच्चाई
भी हर पल हर दम समक्ष मेरे।
हर पल हर दम छला जाने पर
भी हर समय मुस्कुराने का भी
मैं हो गया अब अभ्यस्थ बडा।
अपमानित हूँ हर पल हर दम,
ना बचा पाया हूँ सम्मान मेरा।
माना कि रंग बिरंगे महकते फूलों
में है कैक्टस सा व्यक्तित्व मेरा।
चुभना है तो चुभेगा ही,नहीं
है चमचागिरी व्यक्तित्व मेरा।
2. मौन

मौन  मचाये  शोर,
बता तेरा है कौन ।
झूठ जोर से बोला,
साथ खड़ा मैं तेरे ।
अपनापन   शरमाया,
उसका सर चकराया।
विश्वास ने दी बधाई,
फिर  उम्मीद  बनाई।
धोखे को हँसी आयी,
बार बार क्यों तू चोट
खाता     है     भाई ।
मन ने ढाँढस बँधाया,
सभी अपने है भाई ।
आँखे   क्यों   भर   आयी,
अपना दिल ऐसा है भाई।
सच्चे मन की सच्चाई,कभी
झूठ  को  समझ  ना  आयी।
3. स्वस्थ भारत
अब बढ़ते जा रहे रोज ही पेट्रोल डीजल के दाम।
ऐसा लगता है,करने पड़ेंगे साईकल से सारे काम।।
साईकल से जब काम करेंगे तंदरुस्त हो जाएंगे।
पैसे खर्च करके फ़िर कोई जिम में क्यों जाएगा।।
सही है अब जिम का पैसा सभी लोगो का बच जाएगा।
सही कहते मोदी जी कुछ ना कुछ सबकी जेबों में आएगा।।
चलो आओ अब सब पेट्रोल डीजल के वाहनों को त्यागे।
अपने अपने काम को करने के लिए अब पैदल ही भागे।।
सब जब फिर से ऐसी मेहनत में मिलकर कदम बढ़ाएंगे।
स्वस्थ होगा भारत,फिर लोगों के पैसे बच जाएंगे।।
4. पिंजरे की गुलामी 
लंबे समय पिंजरे में बैठा पंछी,
देखो तो अब उड़ना भूल गया।

आराम से खाने की पड़ी आदत,
अब दाना ही चुगना भूल गया।

अब दूसरे के कहने पर मुँह खोलता,
अपना गाना गुनगुनाना भूल गया।

पिंजरे में ऐसी आदत पड़ी आलस की,
मेहनत कर खाना भूल गया।

लोगों का पालतू अब ऐसा हो गया।
अपना आसमाँ ही भूल गया।

घर के एक कोने में पिंजरा बंधा है,
खुले आकाश के नीचे रहना ही भूल गया।

मालिक ने पिंजरा अगर खोल भी दिया।
तब भी इसको गुलामी की आदत ऐसी
पड़ी,कि पिंजरे दूर जाना ये भूल गया।

5. मन से हारा

रोशनी अंधेरा ओढ़े खड़ी है।
उम्मीदे जमीन पर पड़ी है।।
कदम पीछे की और पड़ रहे है।
भयानक साये आगे बढ़ रहे है।।
काल के पंजो में परिंदा फसा है।
उड़ने की आस पर पंख बंधे है।।
काल के हाथों ये दम तोड़ जाएगा।
मन से हारा हुआ जान कैसे बचाएगा।।
तन से हारा तो फिर भी उठ जाएगा।
मन से हारा खुद से ही मात खायेगा।।
नीरज त्यागी
गाजियाबाद

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