सुबह के दस बजते-बजते वह तीनों पार्क में पहुँच गए। कोहरा काफी छट चुका था, क्योंकि सूर्य अपनी पूरी प्रभा के साथ पूर्व दिशा से आगे बढ़ रहा था, किंतु पार्क में हरियाली के झुरमुट में कोहरे के अवशेष स्वयं को छिपाने का प्रयत्न करते दिखे।
कोर्ट के आदेश के अनुसार आज मालती अपने दोनों बच्चों रवि और बबली को उनके पिता से मिलवाने के लिए लेकर आई है। छोटे-से इस पार्क में लोग कम ही आते हैं, इसीलिए मिलने के लिए यही स्थान तय हुआ था। पार्क चाहे छोटा-सा है पर पेड़ और फूलों के बाहुल्य के कारण बहुत सुंदर लग रहा था। आते ही रवि और बबली दोनों खेलने में व्यस्त हो गए, कभी फूलों को छूकर देखते तो कभी एक दूसरे के साथ दौड़ लगाकर देखते कि कौन तेज भागता है। आठ वर्ष का रवि दौड़ में हमेशा आगे निकल जाता है। छः वर्षीय बबली रवि के पीछे दौड़ती हुई उसे रुकने के लिए कहती है, “भैया, रुको, मुझे तुम्हारी तरह तेज दौड़ना है; तुम मेरे साथ-साथ दौड़ो न।“, लेकिन रवि हँसता हुआ दौड़ता चला जाता है और अपने गंतव्य स्थान पर जाकर ही रुकता है और वहीं से चिल्लाता है; “बबली, और तेज दौड़ो……. और तेज…….।“ बबली भी आखिर गंतव्य स्थान पर पँहुच रुँआसी-सी उसे एक-आध धौल जमाती हुई कहती है; “अच्छे भैया नहीं हो तुम, मुझे पीछे छोड़ देते हो। आने दो पापा को, तुम्हारी शिकायत करूँगी।“ पापा के नाम से ही रवि बिदक जाता है, और आँखें तरेर कर कहता है, “खबरदार, मेरी शिकायत नहीं करना।“
“करूँगी…..करूँगी।“ बबली रवि को चिढ़ाने से बाज नहीं आतीं, रवि उसे मारने के लिए आगे बढ़ता है। बबली दौड़ कर मालती से जाकर चिपक जाती है, “मम्मी, देखो न, रवि मुझे मारेगा।“
“पापा से शिकायत करेगी तो मारुंगा।“ रवि आगे बढ़ कर उसे मम्मी से खींचने का प्रयास करता है।
“रवि, छोटी बहन को मारते हैं क्या?“ मालती ने अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए कहा।
“यह क्यांे शिकायत करेगी?“
तभी सामने से मनोज आता दिखाई देता है। बबली मम्मी को छोड़ मनोज की तरफ दौड़ पड़ती है और पापा….. पापा….. कह उससे लिपट जाती है।
मनोज बबली को अपने अंक में भर अपनी छाती से चिपका कर प्यार करता हुआ कहता है, “मेरी प्यारी मुनिया… मेरी सुरीली चिड़िया…।“
“पापा, हम आपको बहुत मिस करते हैं…।“
“मैं भी बेटे…।“ मनोज ने बबली के बिखरे बालों को अपने हाथों से संवारते हुए कहा।
रवि के पैर वहीं गढ़ जाते हैं, वह आगे बढ़ कर पापा से नहीं मिलता। मनोज आकर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता है… “रवि, मेरा बेटा… कैसे हो?“
“बिल्कुल ठीक हूँ।“ उसके कहने के स्वर से ही लगता है उसे अपने पापा की बिल्कुल भी परवाह नहीं, शायद कहीं अन्दर ही अन्दर वह उनसे नफरत करता है, क्योंकि पापा मम्मी के विरुद्ध कोर्ट में केस डाल कर लड़ रहे हैं और उन्हें तंग कर रहे हैं, उसकी बाल मानसिकता में यह बात घर कर चुकी है कि सारा कसूर पापा का ही है, उन्हीं की वजह से यह सब कोर्ट-कचहरी का चक्कर चल रहा है; मम्मी उसका और बबली का कितना ध्यान रखती है, कहें तो उन दोनों पर जान देती है और पापा? उनका भी कितना ध्यान रखती थीं; बाहर से घर लौटते ही उनके आगे-पीछे होती, उन्हें चाय दो, नाश्ता दो, उनके कपड़े धोकर प्रेस कर हमेशा तैयार रखना । अरे, पापा को टाई भी बांधती थी, उन्हें तो टाई बांधना भी नहीं आता, चाय तक बनानी नहीं आती, हर समय मम्मी को डांटते रहते, हर रात रोज मम्मी से झगड़ा करते, मम्मी को उसने अक्सर रोते देखा है, मम्मी कितनी भी नाराज क्यों न हो, पर हर सुबह पापा की देख-भाल में लग जाती। हम बच्चे भी उसको कितना तंग करते रहे हैं, मेरा बस्ता भी वही तैयार करती, वही मुझे जूते भी पहनाती थी, पर जब से पापा ने हमें घर से निकाला है, हम नानी के घर पर रह रहे हैं, अब मैें अपना काम खुद करना सीख रहा हूँ ; मम्मी को ट्यूशन में कई बच्चों को पढ़ाना पड़ता है, खूब थक जाती है, यह बबली… कुछ नहीं करती… इसे काम करना मैं सिखाऊँगा… हाँ…..।“
“रवि बेटे क्या सोच रहेे हो?“ पापा ने उसके पास आकर कहा। वह अभी तक बबली को गोद में उठाए उसे घुमा रहे थे। मालती पार्क में पड़े बैंच पर बैठी पता नहीं किन ख्यालों में खोई थी।
“पापा, हमें झूला झुलाओ“
“चलो रवि, तुम भी चलो“ मनोज ने रवि का हाथ पकड़ते हुए कहा।
“नहीं, मेरा मन नहीं, आप बबली को झुला दो।“ रवि ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा।
“हाँ, पापा, यह कभी नहीं झूलता, स्कूल में भी नहीं… बस बैठा रहता है, हम सब बच्चे खूब झूलते हैं…।“ बबली मनोज को खींच कर झूले की तरफ ले गई।
मनोज बबली को झूला झूलाता जा रहा है और कनखियों से मालती को भी देख रहा है जो अब भी बेंच पर गुमसुम -सी बैठी थी। उसने एक हल्के-से रंग की साड़ी के ऊपर ग्रे रंग का स्वेटर पहन रखा था, बालो का ढीला-सा जूड़ा और माथे पर हमेशा की तरह लाल बिंदिया। मनोज को लगा, एक अनोखा तेज मालती के चेहरे को एक अनोखी आभा प्रदान कर रहा था। वह तेज मनोज को बरबस उसकी ओर खींचता-सा लगा। मनोज अपने पैरों को जमीन पर टिकाने का प्रयास करने लगा। वह तो उसके खिलाफ तलाक का केस लड़ रहा है। वकील के कहने पर उसने मालती के विरुद्ध यह भी लिख कर दे दिया है कि उसका चरित्र सही नहीं है इसीलिए तो वह उससे प्रेम नहीं करती। हालांकि मनोज का मन ही नहीं, आत्मा भी जानती है कि मालती ऐसी नहीं है, पर वकील के कहने पर ही उसे ऐसा लिखना पड़ा। उसने उसे बताया भी था कि उसकी पत्नी में कितनी भी कमजोरियाँ हों पर उसके चरित्र में कोई खोट नहीं, परंतु वकील ने उसे झिड़कते हुए कहा था, “खोट नहीं तो यहाँ क्या लेने आए हो, जब तक तलाक के लिए कोई पुख़्ता आधार नहीं होगा, तलाक नहीं मिलेगा। अगर वह तुम्हारी जिस्मानी जरूरतें पूरी नहीं करती तो ऐसी औरत सच्चरित्र कैसे हो सकती है, जरूर उसमें खोट है, समझो उसका कहीं और टांका फिट है।“ उस समय उसे मालती केे लिए प्रयुक्त अभद्र भाषा के लिए वकील पर गुस्सा आया था जिसे वो जहर की तरह पी गया था।
वह आॅफिस जाने के तैयार हो रहा था, उसने प्रेस की हुई कमीज पहनी, बटन बंद करते समय पता चला, गले वाला बटन नहीं है। उसने वहीं से आवाज दी, “मालती, क्या करती हो, प्रेस करते समय देखती नहीं, कमीज के बटन पूरे हैं या नहीं, कोई भी काम ढंग से नहीं करती। आओ, देर हो रही है, फोरन बटन लगाओ।“
मालती किचन में उसके लिए खाना तैयार कर रही थी, उसने फोरन गेस बंद की और सूई-धागे वाली डिबिया से बटन निकालते हुए डरते-डरते कहा, “लाओ, अभी लगा देती हूँ।“
वह सूई-धागा ले उसका बटन टांकने लगी। “प्रेस करते समय देखना चाहिए न। मुझे देर हो रहीे है…।“ मनोज ने पुनः उसे डाँटते हुए कहा।
“बस लग गया बटन, लो बंद कर लीजिए।“ मालती ने सूई-धागा डिबिया में रखा।
मालती के सामीप्य पर मनोज के रेशे-रेशे में एक उबाल-सा उठा, उसने अचानक उत्साहित हो मालती को बांहों में जकड़ते हुए उसके अधरों पर अपने अधर रख दिए।
मालती ने तिलमिला कर स्वयं को उससे मुक्त करते हुए कहा, “क्या है, आप को कुछ और तो सूझता ही नहीं, छिः जब देखो…, उधर मम्मी पापा…..।“ उसने अपने दुपट्टे से अपने होंठ ऐसे साफ किए मानों कहीं वह गंदगी के सम्पर्क में आ गए हों…..।
मनोज के पूरे उत्साह पर तुषारापात हो गया… गुस्से से पांव पटकता वह उस दिन बिना कुछ खाये दफ्तर के लिये निकल गया था। इस घटना से उसे वकील की कही बात सही लगने लगी, “जो औरत तुम्हारी जरूरतें पूरी नहीं करती, समझो उसका टांका कहीं और फिट है।“
फिर यह कोई अकेली घटना नहीं थी। वह दफ्तर से थक-हार कर घर आता और उसके इंतजार के पल शुरू हो जाते, कब मालती घर का काम-काज निपटा कर खाली हो और सोने के लिए आए। जब भी वह आती, थकी हारी अपने जिस्म को हाथ नहीं लगाने देती, उसकी कभी कोई जरूरत पूरी नहीं करती, हार कर उसे ख़ुद को जबरदस्ती उस पर थोंपना पड़ता, वह चीखती रहती, रोती रहती पर उस समय वह जुनून में किसी बात की परवाह नहीं करता… फिर भी उसका मन और शरीर हमेशा प्यासा ही रह जाता… कभी भी दो शब्द प्यार के उससे बोले नहीं जाते। “जरूर उसका टांका कहीं और फिट है।“ जैसे-जैसे उसे इस प्रकार के कटु अनुभव याद आ रहे थे, वकील के शब्दों का स्वर और तेज होता जा रहा था “जरूर उसका टांका कहीं और फिट है।“
बबली को झूला झुलाते उसके हाथ रुक गए। उसे अपनी नस नस में अजीब-सा कसाव और तनाव महसूस होने लगा। “बस बबली“ कह वह पास पड़ी बैंच पर धम्म से बैठ गया। बबली भी झूले से उतर वहीं पापा के पास आकर बैठ गई, “क्या हुआ पापा?“
उस समय उसे बबली की कोई बात अच्छी नहीं लग रही थी। वह चाह रहा था बबली वहाँ से चली जाए और वह बैंच पर या पेड़ों पर अपने मुक्कों की बरसात कर दे या गुस्से से जलती अपनी नस-नस को अपने हाथों से नोच डाले या फिर अपना सिर किसी दीवार से टकरा लहू लुहान हो जाए। असंयत-सा हो उसने बबली से कहा “तुम जाओ।“ मैं अभी आता हूँ।“
वह बबली को वहीं छोड़ पार्क के दूसरे हिस्से की ओर मुड़ गया और वहीं कोने में पड़े एक बैंच पर बैठ गया। उसे लगा वह अधिक देर तक बैठ नहीं सकता। वह बैंच पर लेट गया और अपने हाथों से उसने अपना मुहं ढांप लिया। पिछले वर्ष उसकी और मालती की शादी की सालगिरह थी। वह दिन उन दोनों का बहुत ही अच्छा बीता था। उसने सुबह ही सोच लिया था कि वह आज मालती को किसी भी बात पर नहीं डांटेगा। मालती भी सुबह से खुशग्वार मानसिकता लिए उसे बार-बार स्माइल दे रही थी। दानों बच्चे भी चहक रहे थे। मां से दोनो ने ही मिल कर आशीष ली थी और पिताजी बीमार होते हुए भी कह रहे थे, “बेटा परिवार का ध्यान रखा कर।“
वह मालती को बाजार ले गया। पहले एक अच्छे रेस्टारेंट मे खाना खाया। खाने की मेज पर ही उसने मालती का धीरे से हाथ सहलाते हुए कहा “आज, कोई सुन्दर- सी साड़ी खरीद लो, उस रंग के साथ मिलती लिपस्टिक भी लेना आजकल सिवाय बिंदी के तुम कुछ भी नहीं लगाती; लिपस्टिक तुम्हारे इन कमल की पंखुरियों से होंठों पर खूब फबती है…।’
“साड़ी आप ही पसंद करना“ उसने थोड़ा शर्माते एवं हल्का सा मुस्कराते हुए कहा था। साड़ी के साथ-साथ मालती ने दोनों बच्चों के लिए सूट्स भी खरीदे थे। बबली के लिए रिब्बन और खिलौने भी। वह मां के लिए भी धोती लेना नहीं भूली थी, उसने भी लगे हाथ बाबूजी के लिए एक कुर्ता खरीद लिया था।
घर के लिए चलने से पहले दोनों ने गोल गप्पे खाए। मालती बार-बार गोल गप्पे का पानी लेकर पी रही थीं उसने कहा था कि जब उसे गोल गप्पे इतने पसंद हैं तो और क्यों नहीं खाती?
“नहीं नहीं और नहीं, खा तो लिए… आज तो आपको भी अच्छे लगे है, आप और खा लो न।“ उसने मुस्करा कर कहा था।
पूरा दिन कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। समय को मानों पंख लग गये थे। उसी ने जिद्द की थी कि मालती नई साड़ी पहने।
“फाॅल नहीं लगी, ब्लाउज नहीं सिला, कैसे पहनूँ।“
“बिना फॅाल के पहनो, किसी दूसरे ब्लाउज के साथ, कौन-सा अब बाहर जाना है।“
उसने साड़ी पहनी, कंट्रास्ट कलर के ब्लाउज के साथ, लिपस्टिक लगाई, जूड़े में फूल लगाए। मालती किसी परी से कम नहीं लग रही थी। उसे बार बार लग रहा था कि वह मालती को अपनी बाहों मे भर ले। ढेर सारा प्यार करे… पर मालती का काम ही नहीं खत्म हो रहा था। सब खाना खा चुके थे, पर मां-पिताजी को दूध देना था लेकिन उससे भी पहले उन्हे दवा लेनी थी। अभी मालती सुबह के लिए बच्चों के स्कूल के कपड़े रख रही थी।
मनोज ने उकता कर टी.वी. आॅन किया। गाइड फिल्म का गाना चल रहा था, “आज फिर जीने की तमन्ना है… आज फिर…।“ उसने मालती को आवाज दी।
“जी अभी आती हूँ।“ कह वह मां के कमरे में चली गई , शायद उन्हें दवाई के बारे में बताने के लिए। यह सारा काम मालती ही करती है, उसे तो पता ही नहीं, उन दोनों को किस समय कौन-सी दवा देनी होती है, उसे सब पता रहता है और वह सब मुस्तैदी से करती है… बस अपने पति देव को खुश नहीं कर पाती। हाँ, वैसे उसका पूरा ध्यान रखती है; एक आदर्श मां, एक आदर्श बहु, बच्चों की एक आदर्श टीचर, एक आदर्श आज्ञाकारी पत्नी… नहीं…नहीं… पत्नी बिल्कुल भी नहीं… मैं क्या हूँ.. न एक अच्छा बेटा, न एक अच्छा पति, पर कमाऊ पति हूँ, बेटा हूँ… कमाने के लिए कितना खटना पड़ता है….।’
मालती अब मां-बाबूजी के लिए दूध लेकर जा रही थी। बच्चे तो कब के सो चुके थे। उसने उठ कर अपने बदन पर थोड़ा सा सेंट छिड़का। संेट की गंध धीमे-धीमे कमरे में फैल उसे और मदहोश-सा करने लगी। जैसे ही मालती दूध देकर आई उसने उसे पीछे से भींच लिया। मालती तिलमिलाई पर उसने स्वयं को ढीला छोड़ दिया। वह उसे वैसे ही पकडे़-पकड़े पलंग तक ले आया और उसे अंधाधंुध चूमने लगा।
“अरे छोड़ो मुझे… मैंने… मैंने अभी दवा लेनी है, सिर मे थोड़ा दर्द हो रहा है…..“ मालती ने थोड़ा प्रतिवाद करते हुए कहा।
“दर्द-वर्द सब ठीक हो जाएगा। बस अब और इंतजार मत कराओ…।“
“बस एक सेकंड में आती हूँ।“
“बस बहाने रहने दो, अभी यहीं रहो….।“
“बहाने नहीं, सचमुच दर्द हो रहा है…।“
“कुछ नहीं, चुप रहो…।“
मालती को लगा हमेशा की तरह उस पर उसका वहशीपन हावी होने लगा है, इस विचार से ही उसका शरीर पथराने-सा लगा। उसे मनोज की हर हरकत घिनौनी लगने लगी…… “बस छोड़िए मुझे… बस बस… छोड़िए।“ वह स्वयं को उससे मुक्त करने लगी।
मनोज उस समय उसके विरोध पर तिलमिला गया, उसने उसे पूरी तरह दबोच लिया। मालती ने उससे मुक्त होने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। मनोज मालती की ऐसी प्रतिक्रिया से क्रोधित हो उठा और उसने मालती को दो तीन थप्पड़ जड़ते हुए उसे पुनः पकड़ लिया। मालती अब रो रही थी, पर मनोज पर अपनी धुन सवार थी। थोड़ी देर बाद उसने मालती को अपने बिस्तर से धक्का दे दिया। उसका सिर कमरे की दीवार से टकराता टकराता बचा।
वह रो रही थी और कहती जा रही थी “बहुत हुआ, अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी… सुबह ही चली जाऊँगी मां के यहाँ, यह रोज रोज का शोषण… बस और नहीं… बस…बस…।
पता नहीं वह और क्या-क्या बोल रहीं थी और रोती भी जा रही थी परंतु मनोज कहाँ सुन रहा था, वह तो सो गया था।
मनोज जब सुबह उठा तो मालती बच्चों को अपने साथ ले जाने के लिए तैयार कर रही थी। उसने रात की बातें भूलते हुए अपने कमरे से ही मालती को आवाज लगाई। मालती नहीं आई। उसने दो-तीन बार और आवाज दी। तीसरी बार तो जैसे उसने लगभग गुस्से में चिल्लाते हुए ही आवाज दी।
जब मालती नहीं आई तो उसने अपने दिमाग पर जोर डालते हुए रात की बातें याद करने की कोशिश की। रातों को तो प्रायः ऐसे ही झगड़ा होता था, पर मालती रो-धो कर सुबह उसकी सेवा में हाजिर हो जाती थी। इस बार क्या हुआ? उसने रात को उसे थप्पड़ तक जड़ दिए थे। “अरे… तभी तो…।“ वह एकाएक हड़बड़ा कर बिस्तर से उठा और बच्चों के कमरे की ओर भागा।
मालती अपनी नीली अटेची पर झुकी उसे बंद कर रही थी। बच्चे तैयार खड़े थे।
“क्या हो रहा है? इतनी आवजें दी। मालती, क्या बहरी हो रही हो?“
मालती बोली कुछ नहीं, जमीन पर बैठी अटेची में ताला लगाती रही।
“मालती… मालती… मैं तुमसे बात कर रहा हूँ।“
उसने मालती को बाहों से पकड़ उठा दिया। मालती वहीं पड़ी एक कुर्सी पर धम्म से जा गिरी। बोली कुछ नहीं। रवि ने ही कहा, “पापा, हम लोग नानी के घर जा रहे हैं।“
“क्यों?“
“मम्मी ने कहा है, अब हम यहाँ नहीं रहेंगे। नानी के घर रहेंगे। नानी के घर से स्कूल जाया करेंगे।“
“अच्छा! जिसको जाना है, वह जाए। तुम नहीं जाओगे, यहीं रहोगे अपने घर।“ वह गुस्से से बोला।
“मम्मी जाएगी तो हम भी जाएंगे।“ रवि ने धीमे-से स्वर में कहा।
“कोई कहीं नहीं जाएगा। ऐसा कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा है? चलो, तुम लोग स्कूल के लिए तैयार हो जाओ, मैं छोड़ कर आता हूँ।“ उसने अटेची उठाकर स्टोर में रखते हुए कहा।
“नहीं रहना मुझे यहाँ। मैंने फैसला कर लिया है…।“
“फैसला? तुम कब से फैसले लेने लगी…?“ उसने लगभग व्यंग्य करते हुए कहा।
“फैसला हो चुका। न तो मैं यहाँ रहूँगी और न हीं मेरे बच्चे। मैं इन्हें अपने दम पर पाल पोस लूंगी।“
“अच्छा! इतना घमंड? ठीक है… तुम जाना चाहती हो जाओ… मेरी कौन-सी सुख की सेज छिन जाएगी। बच्चों को नहीं ले जाने दूंगा…।“
“हाँ.. हाँ.. मैं जा रही हूँ। बच्चे भी जाएंगे।“ मालती ने निर्णायक स्वर में कहते हुए स्टोर से अटेची उठाई।
“बस निकल जाओ मेरे घर से। कभी अपना यह मनहूस चेहरा मत दिखाना…। बच्चे नहीं जाएंगे।“ उसने मालती के हाथ से अटेची छीन ली।
“रख लो अटेची भी, मैं जा रही हूँ.. बच्चो, मेरे पीछे पीछे आ जाओ।“ पैर पटकती हुई मालती घर से निकल गई। दोनों बच्चे भी धीरे-धीरे वहाँ से खिसक उसके पीछे पीछे आ गए। गली में उसने दोनो बच्चों को छाती से चिपका लिया। सामने खड़े आॅटो में बैठ वह मां के घर पहुँच गई।
मनोज हक्का-बक्का सा खड़ा का खड़ा रह गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। कुछ देर बाद वह उसी कुर्सी पर धम्म से बैठ गया, जहाँ थोड़ी देर पहले मालती बैठी थी।
मालती ने मां के घर आकर आस पडा़ेस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। मनोज उसे या बच्चों को मां के घर से लेने कभी नहीं आया। आया तो उसका कोर्ट से नोटिस जिसमें मालती से तलाक लेने की अर्जी दी थी।
तब से मालती तारीख पर तारीख मंे उलझ कर रह गई थी। पहले उसे बच्चोें के पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई के लिए कमाना था, अब उस पर कोर्ट आने-जाने और वकील के खर्चे अलग आन पड़े थे। वह हार मानने वालों मे से नहीं थी। उसने कोशिश कर कुछ और बच्चों को पढ़ाने का काम भी हाथ में ले लिया था।
कोर्ट का आदेश हो गया था कि उन दोनों को कोर्ट द्वारा बताये कांउसलर से मिलना है। मालती कोर्ट के चक्कर से मुक्त होना चाहती थी। वह सोचने लगी कि वह अब कोर्ट की किसी तारीख पर नहीं जाएगी। यही तो होगा कि मामले का एकतरफा फैसला हो जाएगा, हो जाने दो फैसला। तलाक की डिक्री हो जाएगी, हो जाने दो, उस जानवर केे साथ रहना कौन चाहता है। तलाक के बाद वह मुक्त हो जाएगा, दूसरा विवाह भी कर सकता है। इससे उसे कोई परेशानी नहीं वह मुक्त हो अपना पूरा ध्यान बच्चों पर दे पाएगी। अब उसके जीवन का एक ही लक्ष्य है, दोनों बच्चों को पढ़ा-लिखा कर उन्हें उनके पैरों पर खड़े करना… उन्हंे किसी चीज की कमी महसूस न होने देना… इतना प्यार देना कि वे अपने पापा की कमी भी महसूस न कर सके।
तभी काॅलबेल बजी। उसने उठ कर द्वार खोला, सामने एक सौम्य और संभ्रात-सी अधेड़ उम्र की महिला खड़ी थी। उसके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान खेल रही थी। इससे पहले कि मालती उससे कुछ पूछती, उसी महिला ने अपने स्वर में मिश्री-सी घोलते हुए अपना परिचय दिया, “बेटा मालती मैं हूँ सरला त्यागी, आपके कोर्ट केस के सिलसिले में कांउसलिंग के लिए आई हूँ।“
केस का जिक्र आते ही मालती की नसो मे एक अजीब-सा तनाव फैल गया। किंतु सामने खड़े उस सौम्य व्यक्तित्व को वह तीखी प्रतिक्रिया नहीं दे सकी। उसने उन्हें इतना ही कहा, “आइए न प्लीज, आइए अंदर आइए।“
सरला त्यागी ने मालती के कमरे मे पड़े सोफे पर बैठते हुए कहा, “बिटिया, तुम्हारे संघर्ष के निशान इस कमरे की हर चीज में झांक रहे हैं। आज हमारी बेटियाँ कही कभी ं हार नहीं मानती।“
मालती ने पानी का गिलास थमाते हुए उन्हें आश्चर्य से देखा।
“बच्चे स्कूल गए हैं। शाबाश बेटी, तुम उनकी बहुत अच्छी देखभाल कर रही हो। दोनों आज्ञाकारी बच्चे खूब मन लगा कर पढ़ाई कर रहे हैं। दोनों अपनी अपनी क्लास में अव्वल आते हैं। ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों के मां-बाप भी तुमसे बहुत प्रसन्न हैं।“
“आंटी, आप क्या अन्तर्यामी हैं। कैसे पता यह सब आपको?“ मालती की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।
“नहीं, मैं कोई अन्तर्यामी नहीं हूँ। यहाँ आने से पहले मैंने सब पता लगाया है। आपको पता होगा, आपको कांउसलिंग के लिए बुलाया गया था। केस के अध्ययन और अन्य जांच से मुझे लगा कि मुझे आपसे मिलना चाहिए। हमारी कांउसलिंग का उद्देश्य शादी तोड़ना नहीं, बल्कि पति पत्नी को जोड़ना होता है। छोटी-मोटी गलतफहमियों के जाल से पति पत्नी को मुक्त कर उनके विवाह बंधन को मजबूत करना।“
“आंटी, यहाँ आप कुछ नहीं कर पाएंगी, मुझे न तो कोई गलतफहमी हुई है और न ही मेरी कोई गलती है।“
“मुझे विश्वास है…।“ सरला त्यागी ने मालती की बात को बीच में ही काटते हुए कहा।
मालती ने पुनः उस व्यक्तित्व को आश्चर्य से देखा। वस्तुतः उनके चेहरे पर एक अनोखा तेज झलक रहा था। क्या वह उनके आत्मविश्वास का था या कि उनके ज्ञान का या फिर परहितकार का?
“आंटी, आप कुछ नहीं जानती; उसने मुझ पर बड़ा घिनौना आरोप लगाया है मेरे दुश्चरित्र होने का। वह मुझ से कहता, उसे मुझसे तलाक चाहिए, मैं उसे वैसे ही मुक्त कर देती; आप नहीं जानती, उसके उस आरोप से मैं अन्दर ही अन्दर कितना टूट गई हूँ; मुझे लगता है तब से मेरा आत्मसम्मान, मेरी अस्मिता, मेरी आत्मा सब मरणासन्न हो चुकी है। प्रायः आत्महत्या करने का मन होता है; इतना घिनौना लांछन लेकर जीना भी कोई जीना होता है, मैं इस लांछित किए गए जीवन में हर पल मृत्यु भोग रही हूँ; उसने मुझे जीवन में दिया क्या है? विवाहित जीवन में हर रोज बलात्कार का दंश? और ऊपर से दुश्चरित्र होने का घिनौना आरोप? इस लांछित हुए शरीर को जानती है जिंदा क्यों रख रही हूँ, अपने दोनों बच्चों के लिए।“ जिंदा रहने के अपने मकसद को महसूस करते हुये भी मालती को लग रहा था मानों वह किसी रेल पटरी पर लेटी है और उपर से धडाघड. तूफानमेल निकल रही है 1
सरला त्यागी मालती के अथाह दुःख से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकी। मालती फूट फूट कर रो रही थी, सरला त्यागी की भी आँखें भर आई थीं, परंतु उन्होंने अपने रूमाल से अपनी आँखों के कोरों से आँसू पौंछे और अपना हाथ मालती के कंधे पर रखा। हाथ का वह स्पर्श? मालती के भीतर तक एक ऐसी लहर उतर गई जिससे उसका समूचा तन और मन एक सुखद अहसास से भर उठा। उसे लगा उसके सामने जो औरत बैठी है, वही उसकी मां है, बहन है या फिर उसकी गुरु । ऐसा अनोखा अपनत्व एवं ममत्व? उसके भीतर दुःख और दर्द का जमाव पिघलने लगा मानों किसी ने जलते जख़्मो पर मलहम का लेप कर दिया हो। मालती झट से अपने आँसू पौंछते हुए रसोई मे चाय बनाने चली गई।
चाय पीते पीते दोनों मंे पता नहीं दुनियाँ जमाने की कितनी बात हुई, मानों दोनों एक दूसरे को वर्षों से जानती हों। मालती ने चाय के बाद झटपट सब समेट दिया। सरला त्यागी ने घड़ी देखी। शायद वह उठने का उपक्रम कर रही थी, किंतु मालती झट से बोली…
“आंटी, मैं अभी आपको नहीं जाने दूंगीं, बच्चे आ जाए तो हम सब इकट्ठे खाना खाएंगे। जानती हैं आज मैंने बच्चों के लिए खीर बनाई है। पूरी-भाजी का प्रबंध कर रखा है। रवि को खीर बहुत पसंद है अपने पापा की तरह।“ आखिरी बात अनायास ही उसके मुहं से निकल गई थी। उसने अपने आप को संभालते हुए कहा… “खाना हम सब मिलकर खाएंगे।“
“अरे हाँ, मैं भी जानना चाहती थी, मनोज को और क्या-क्या पसंद था?“ सरला त्यागी ने मालती की ही बात को आगे बढ़ाते हुए पूछा।
“आंटी, हम बहुत अच्छी बातें कर रहे थे क्यों माहौल को खराब करना… छोड़िए वह सब…। अब जिस रास्ते जाना नहीं, उसकी राह क्या पूछना। मेरे जीवन का वह अध्याय समाप्त हो गया, कुछ और बात कीजिए न। आप कितनी अच्छी हैं आंटी…।“
विवाह ऐसा बंधन नहीं, जिसे जब चाहे तोड़ दो। विवाह संस्था भारतीय संस्कृति की अनुपम देन है, यह दो शरीरों का ही नहीं, आत्माआंे का भी मिलन है। विवाह संस्था से परिवार को बहुत बल मिलता है। विवाह से नारी का मातृत्व खिलता है, मां के रूप में उसकी पहचान बनती है; आज हमे इस बात को समझना होगा।“
“मैं जानती हूँ, लेकिन विवाह संस्था को चलाने वाले पति पत्नी एक रथ के दो पहिये हैं, अगर रथ के दो पहियों में से एक पहिया खराब हो तो…।“
“हाँ, हो सकता है लेकिन खराब को सही भी तो किया जा सकता है। जानती हूँ तुम्हें अपने पति से बहुत दुःख मिला, वह दुःखकारक बना, क्या कुछ ऐसा भी घटा जिंदगी में जिससे उसे सुखकारक की संज्ञा भी दी जा सके।“
“हाँ, वह कमाता खूब था, मुझे उसने पैसे का कभी अभाव नहीं आने दिया, मुझसे कभी नहीं पूछा कि उसके दिए पैसे मैं कहाँ और क्यों खर्च करती हूँ…।“
“उसने आपको वित्त मंत्री बना रखा था।“ सरला त्यागी ने हल्का-सा मजाक के लहज़े में कहा। “और क्या क्या दिया उसने….।“
“और, बस कुछ नहीं…।“
“कुछ नहीं…,। याद करो कुछ ऐसा अनमोल दिया हो जो तुम्हें अपनी जान से भी प्यारा है; वह तुम उसी से ही ले सकती थी… वह तुमने उसी से लिया और तुम खुद को धन्य मानने लगी।“
“ऐसा तो कुछ नहीं…।“ मालती ने सोचते हुए कहा।
“अपने दिमाग पर जरा जोर देकर याद करो। कोशिश करो तुम्हें जरूर याद आ जाएगा, क्योंकि तुमने उससे बहुत कुछ लिया है।“
“मैंने उसे बहुत दिया। उसकी अक्खड़ आदतों के बावजू़द उसकी सेवा की, उसे पति नहीं, परमेश्वर माना। उसके माता पिता को अपना माता पिता समझा, उनकी भरसक सेवा की।“
“हाँ, सास-सुसर तुम्हारी बहुत तारीफ कर रहे थे 1“
क्या आाप उनसे भी मिल चुकी हैं? मालती ने फिर उन्हें आश्चर्य से देखा“
‘हा’
‘फिर तो आप मनोज से भी मिली होंगी।“
“नहीं। मैं उससे नहीं मिली। उससे तुम मुझे मिलवाओगी।“
“भूल जाइए आंटी। न तो मैं उससे मिलूंगी और न ही आपको मिलवाऊंगी। मैं उसकी शक्ल भी नहीं देखना चाहती।“ मालती के शरीर में एक अजीब-सी अकड़न आ गई थी। आक्रोश और क्रोध के भाव उसके चेहरे पर उभरने लगे।
“चलो ठीक है। मैंने आपसे एक प्रश्न पूछा था, मुझे अभी उसका उत्तर नहीं मिला। कुछ ऐसा अनमोल क्या दिया तुम्हें तुम्हारे पति ने?“
“कुछ नहीं, कह दिया कुछ नहीं, कुछ हो तो बताऊँ।“
“तुम्हें नहीं याद, मैं याद दिलाऊँ?“ सरला ने अत्यंत सरस ढंग से कहा।
“हाँ, आप अन्तर्यामी हैं न…।“
“मैं बताती हूँ उसने तुम्हें दो अनमोल रतन दिए… रवि और बबली… स्वस्थ, सुंदर एवं कुशाग्र… जिन्हें तुम उनके पिता को भी लौटाना नहीं चाहती हो।“
मालती उनकी बात सुन अवाक् रह गई। उसने इस बारे मे इस तरह से कभी सोचा ही नहीं… बच्चों के उल्लेख मात्र से उसका ममत्व उछाल मार उठा। उसका रोम रोम गद् गद् हो गया। मन के किसी भीतरी कोने से एक अनोखा अहसास पैदा हुआ कि मनोज सामने हो तो वह उसे छू ले… इस अनमोल अकूत दौलत के लिए उसका धन्यवाद करे… ऊपर से वह मूक बनी रही, उसे समझ नहीं आ रहा था, अपनी प्रतिक्रिया कैसे दे…।
“इनसान नहीं समझता, उसे जीवन में क्या क्या मिलता है… जीवन एक ऐसा ईश्वरीय वरदान है जिसे हर पल संभल कर जीना चाहिए।“ सरला त्यागी ने मानो पूरे जीवन का फलसफा खोल कर रख दिया।
“बच्चे मेरी जान हैं। बच्चे नहीं होते तो मैं कब की मर-खप गई होती। ईश्वर का धन्यवाद, उसने मुझे इतनी सुन्दर, स्वस्थ सन्तान दी।“ मालती की आँखें फिर भर आई, परंतु यह आँसू अपूर्व सुख और प्रसन्नता के थे।
“उन दिनों तुम्हारा जीवन स्वर्ग सा था। तुम दो जिस्म एक जान हुआ करते थे फिर ऐसा क्या हुआ जो तुम्हारी पति में रुचि कम होने लगी।“
“यह झूठ है… मेरी रुचि कभी कम नहीं हुई, मैंने हमेशा उसे प्यार किया…। वह वहशी खूंखार मुझे क्या दे सकता था… अच्छा है उस नारकीय जीवन से छुटकारा मिला।“
“वह खूंखार क्यों हो जाता था? क्या वह शराब पी कर वहशीपन करता था….।“
“नहीं.. नहीं, शराब तो कभी उसने छू ही नहीं। कभी सिगरेट, बीड़ी भी नहीं पी…।“
“ओह! दूसरी औरतों के साथ संबंध?“
“क्या कह रही हैं आंटी… यह सब कुछ नहीं… मैं उसे अच्छी तरह जानती हूँ।“
“किसी मर्द की तुम कैसे गारंटी ले सकती हो।“ सरला ने उसे आगे उकसाते हुए कहा।
“नहीं आंटी, उसने मुझ पर दुश्चरित्र होने का आरोप लगाया है, पर मैं उस पर कोई झूठा आरोप नहीं लगा सकती। वह ऐसा नहीं है, मन का एकदम पाक-साफ….।“
“क्या बात है; जिस पति ने तुम्हें घर से निकाला, कोर्ट में तलाक का केस डाल तुम्हे कोर्ट कचहरी की दलदल में फंसा दिया है, तुम पर दुश्चरित्र होेने का झूठा आरोप लगा कर तुमसे तलाक मांग रहा है… तुम उसके अच्छे होने, सच्चरित्र होने का प्रमाण पत्र दे रही हो…।“
“मैं कितना भी उसके विरूद्ध हो जाऊँ, मैं उसक बारे में कुछ झूठ नहीं कह सकती… इसे मेरी कमजोरी समझ लीजिए।“
“कमजोरी नहीं, यह तुम्हारी शक्ति है; इस पर तुम्हें गर्व होना चाहिए। क्या वह शुरू से खुंखार था…?“
“नहीं… पहले तो बहुत अच्छा था, एक आदर्श पति…।“
“उसमे बदलाव कब से आया…?“
“बबली के पैदा होने के बाद।“
“बबली का प्रसव क्या नाॅर्मल था?“
“नहीं, इसका सिर ऊपर की ओर था। मैंने बहुत कष्ट झेला। तभी मैंने तोबा कर ली थी…। बाद में आॅपरेशन से ही पैदा हुई थी…।“
“किस बात की तोबा…?“
“उस असहनीय दर्द के दौर में मैं बार-बार ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि अब कभी कोई गलती नहीं होगी…।“
“गलती…?, कौन-सी गलती…? पति से पुनः सामीप्य बनाने की? तुमने इतना बड़ा भय बिठा लिया मन में?“
“पता नहीं; प्रसव-वेदना के दौरान रो-रो कर मैं प्रभु से प्रार्थना कर रही थी…।“
“शायद वही भय तुमने अपने अवचेतन में बिठा लिया और स्वयं को अपने पति की ओर से बंद कर लिया। मानव मन भी कितना जटिल है, वह कब कौन-सा संदेश कैसे ग्रहण कर ले… कौन जानता है?“
मालती किंकर्तव्यविमूढ़-सी सरला त्यागी को बस देखती जा रही है, वह कुछ समझ नहीं पा रही थी और न कुछ कह पा रही थी। उसे सरला त्यागी एक अनबूझ पहेली-सी लगी…।
“आप कहना क्या चाहती हैं आंटी…। जरा समझा कर कहिए…।“
“मैं मनोज की शिकायत के उत्स को समझने की कोशिश कर रही थी…।“
“अरे, आप उसकी एजंेट बन कर आई हैं। मुझे लगा आप मुझे समझेंगी, मेरा पक्ष लेंगीं…। मैं आपको अपना हमदर्द मान बैठी थी…।“
“नो…नो प्लीज। डोंट मिसअंडरस्टैंड मी…। मुझे गलत मत समझो…।“ सरला त्यागी ने आगे बढ़ कर मालती की पीठ थपथपाते हुए कहा।
मालती ने उनका हाथ अपनी पीठ से हटा दिया….। “मैं सब समझ गई… आप मनोज से कह दीजिए मैं तलाक के लिए तैयार हूँ। आपको लिखकर दे सकती हूँ। कोर्ट में भी लिख कर दे सकती हूं1 मुझे न तो गुजारा भत्ता चाहिए, न बच्चों के लिए कुछ। उन्हें मैं स्वयं पाल-पोस सकती हूँ।“ वह हर शब्द पर पूरा बल दे कर कह रही थी, परंतु क्रोध- मिश्रित दर्द की भावना को वह छिपा नहीं पा रही थी…।
“मालती, तुम दोनों का केस कोर्ट-कचहरी का है ही नहीं, तुम दोनों को डाॅक्टर के पास जाना चाहिए था…।“ सरला त्यागी ने भी पूरे विश्वास के साथ अपने हर शब्द पर बल देते हुए कहा, मानों वह किसी न्यायाधीश की तरह फैसला सुना रही हो।
मालती मानों आसमान से गिरी हो। कुछ देर के लिए वह कुछ बोल ही नहीं सकी। उसे समझ नहीं आया कि सरला त्यागी ने यह सब क्यों कहा। उसे क्या हुआ है, वह तो भली चंगी है, कभी-कभार सिर-दर्द के अलावा उसे कभी कुछ नहीं हुआ। मनोज… उसको तो कभी जुकाम भी नहीं हुआ। डाॅक्टर के पास क्यों जाए वह?
उन दोनों के बीच पसर आई उस चुप्पी को सरला त्यागी ने ही तोड़ा….
“हम एम.ए., बी.ए. कर बहुत ज्ञान अर्जित कर लेते हैं पर ख़ुद अपने बारे में जानने की कोशिश ही नहीं करते। तुम्हारी मां समान हूँ, कैसे समझाऊँ? अगर मनोज तुम्हंे डाॅक्टर के पास ले जाता और तुम दोनों की वैवाहिक जीवन की समस्या बताता तो कोर्ट-कचहरी की नौबत ही नहीं आती। डाॅक्टर तुम्हारे खान-पान में थोड़ी तबदीली करते और थोड़ी-सी दवाई देते। तुम दोनों का जीवन पहले की तरह सुखी हो जाता। पुरुष की वैवाहिक जीवन की कुछ जरूरत होती हैं, उसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं है। पत्नी अगर किसी वजह से पति के समक्ष खुलती नहीं, खुद को छुई-मुई बना लेती है या कि पुरुष संवेदनशील नहीं रहता। कई बार हारमोन असंतुलन अथवा किसी भय अथवा अन्य कारण से पत्नी के साथ ऐसा हो सकता है, परंतु अपने शरीर के प्रति अज्ञानवश उसे हम लोग गलत व्यवहार की संज्ञा देकर समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचते। रोग शारीरिक या मनोवैज्ञानिक किसी भी स्तर पर हो सकता है, परन्तु लाईलाज नहीं….।“
“क्या?“ मालती बस इतना ही कह पायी।
वास्तव में उसने जीवन को कभी इस नज़रिये से देखा ही नहीं 1ं उसकी अपनी मां ने भी कई बार ईशारों-ईशारों में उसे कहा था…
“मालती, तू पति का ध्यान रखती है न।“
सास-ससुर भी प्रायः उसे यही कहते थे, कई बार उसे उनकी बात पर गुस्सा भी आता, पर वह उनकी बात के मर्म को कभी समझी ही नहीं।
मालती अपने विचारो में इतना खो गई थी कि उसे सरला त्यागी की उपस्थिति का ही भान नहीं रहा।
“गलती तुम्हारी नहीं, तुम्हारे पति की है, उसे तुम्हारी उलझन को समझना चाहिए था। मुझे लगता है बबली के कठिन प्रसव ने तुम्हारे अवचेतन में एक भय भर दिया। उसके बाद तुममें अपने पति की जरूरतों में कोई रुचि नहीं रही… प्रतिक्रिया में वह भी असहज हो गया। मूल समस्या की तरफ कभी तुम दोना का ें ध्यान ही नहीं गया…। चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे पति आज शाम को डाॅ. रचना से मिलने वाले हैं। यह हमीं लोगों ने तय किया है। मुझे विश्वास है वह तुम्हें जल्दी ही डाॅ. रचना के पास ले जाएंगें। डाॅ. रचना बहुत अच्छी हैं; वह जरूर तुम दोनों की समस्या को सही कर देंगी। हाँ, एक बात और तुमसे शेयर करना जरूरी समझती हूँ, मैंने सुना है मनोज ने अपने उस वकील से लड़ाई कर उससे अपना केस वापस ले लिया है जिसने उसे तुम्हारे चरित्र के बारे में लिखने को बाध्य किया था। उसने अभी नया वकील नहीं किया है, शायद उसकी जरूरत ही न रहे। तुम चिंता नहीं करना। मैं तुम्हारे सम्पर्क में रहूँगी। फिर आऊँगी….।“
सरला त्यागी को पुनः उसके घर आने की जरूरत ही नहीं हुई। तीन महीने बाद मालती और मनोज ही बच्चों के साथ उनसे मिलने उनके घर गए। सरला त्यागी उस समय मेडीटेशन कर के उठी ही थी। उनके चेहरे पर एक अपूर्व कांति उद्भासित हो रही थी। मालती अपने परिवार के साथ उनसे मिलने आई है इससे उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ, मानो वह जानती थी कि ऐसा ही होने वाला है। मालती उन्हें प्रणाम कर, उनके चरण छूने को हुई। सरला त्यागी ने बीच में ही उसे थामा और अपने वक्ष से लगा लिया। मनोज ने भी उनका सादर अभिवादन किया। रवि और बबली को उन्होंने ढेर-सा प्यार दिया।
“आंटी, हम सब आए हैं आपका आभार व्यक्त करने। आपने हमारे जीवन की दिशा ही बदल दी। हम गहरे समुंद्री तूफान में डूब रहे थे, आपने मझधार में फंसी हमारी नैया किनारे लगा दी। हमारे जीवन को आशा की नई किरणों से आलोकित कर दिया। मेरे पास शब्द नहीं है आपका धन्यवाद करने के लिए। ’
“तुम लोगों को खुश देख आज हम बहुत प्रसन्न हैं। बस अपना हमेशा ध्यान रखना। आओ, नाश्ता तैयार है। आओ रवि, बबली तुम्हे क्या पसंद है?“
करीने से सजी नाश्ते की मेज के इर्द-गिर्द कुर्सियों पर सभी जा बैठे। सरला त्यागी ने रवि की ओर प्यार से देखते हुए कहा; रवि बेटा, इस कटोरे से प्लेट हटाओ। रवि ने हौले से प्लेट हटाई, “बड़ी नानी; खीर“ वह चहक उठा। “तुम्हें खीर पसंद है न और मनोज को भी।“ उन पांचों की उन्मुक्त हँसी से पूरा परिवेश चहक उठा।
सरला त्यागी से विदा लेते समय मालती ने विनम्रता से कहा, “आंटी, चाहे आप इसे छोटा मुहँ, बड़ी बात कहें पर मैं आपसे कहना चाहती हूँ कि मैं आपके साथ मिल कर कुछ अच्छा काम करना चाहती हूँ। आज पूरे देश मे कोर्ट-कचहरियाँ तलाक के मामलों से अटी पड़ी हैं। प्रायः पति पत्नी अपने अज्ञानवश अथवा अहम और अहंकार के नशे में चूर अपने बच्चों की भी परवाह नहीं करते और पहुंच जाते हैं कोर्ट-कचहरी अपनी बसी बसाई गृहस्थी को तोड़ने। यदि पति पत्नी में बन गई खाई को किसी तरह पाटा जा सके तो कितना पुण्य का काम होगा… आप यह पुण्य रोज कमा रहीे हैं; क्या मुझे भी अपने साथ इसमें मदद करने की इज़ाजत दंेगी……।“
सरला त्यागी ने आगे बढ़ कर मालती को अपने वक्ष से लगाते हुए उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया।

डॉ.संतोष खन्ना

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