भाषा का आविष्कार मनुष्य की महानतम उपलब्धियों में से एक है। मनुष्य ने इसके महत्त्व को हजारों-लाखों वर्ष पूर्व पहचान लिया था, इसलिए इसके विकास के लिए प्रयत्नशील रहा। भाषा भावों एवं विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम है एवं वर्ग, लिंगबोध, जातीयता एवं अस्मिता को स्वयं से जोड़कर अपनी विशिष्टता सिद्ध करती है। मानक हिंदी कोश के अनुसार ‘‘किसी विशिष्ट जनसमूह द्वारा अपने भाव, विचार आदि प्रकट करने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले शब्द भाषा कहलाते हैं।’’
जब हम भाषा की बात करते हैं तो सामान्य तौर पर एक भाषा और उससे जुड़े हुए पहलुओं का प्रश्न मस्तिष्क में उपजता है परंतु बहुभाषिकता नाम से ही स्पष्ट है कि एक नहीं वरन् इससे अधिक भाषाओं को जानना व प्रयोग करना। दूसरे शब्दों में कहें तो भिन्न भाषा-भाषियों के साथ परस्पर भावानुभूतियों के आदान-प्रदान हेतु भिन्न-भिन्न भाषा तथा उपभाषाओं का व्यवहार बहुभाषिकता कहलाता है।
हाॅगेन के अनुसार, ‘‘दो भाषाओं के ज्ञान की स्थिति द्विभाषिक है।’’ वैसे तो बहुत सी भाषाओं को जानने वाले को बहुभाषिक कहते हैं परंतु एक से अधिक भाषा (केवल दो) जानने वाले को द्विभाषिक के साथ-साथ बहुभाषिक भी कहते हैं।
ब्लूम फील्ड के अनुसार – ‘‘बहुभाषिकता की स्थिति तब पैदा होती है जब व्यक्ति किसी ऐसे समाज में रहता है जो उसकी मातृभाषा से अलग भाषा बोलता है और उस समाज में रहते हुए वह उस अन्य भाषा में इतना पारंगत हो जाता है कि उस भाषा का प्रयोग मातृभाषा की तरह कर सकता है।’’ कुछ विद्वानों ने इसे इस रूप में प्रस्तुत किया कि द्विभाषिकता या बहुभाषिकता व्यक्ति के बचपन से ही दो या बहुत भाषाएँ एक साथ सीखकर उसका समान रूप और सहज प्रभाव से प्रयोग करने की स्थिति को कहते हैं परंतु भाषा वैज्ञानिक इसे अस्वीकार करते हुए तर्क देते हैं कि दो भाषाओं में मातृभाषावत् क्षमता एक ऐसा आदर्श है जिसे प्राप्त करना बहुत कठिन है। इस प्रकार एक से अधिक भाषाओं की जानकारी एवं प्रयोग बहुभाषिकता की स्थिति है।
बहुभाषिकता को किसी लक्षण के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। वास्तव में वह व्यक्तिगत गुण है जिसमें वाचक दो या दो से अधिक भाषाओं में न्यूनतम से लेकर अधिकतम (पूर्णता की ओर) दक्षता तक के सोपानों पर खड़ा नजर आता है। हाॅगेन ने इसे लेकर बड़ी सटीक एवं तर्कसम्मत बात कही, ‘‘द्विभाषिकता की परिभाषा को हमें बहुमत अनुपात के रूप में नहीं बल्कि लघुत्तम अनुपात के रूप में ग्रहण करना चाहिए।’’ व्यवहारिक स्तर पर यह कथन ही सही है। व्यावहारिक स्तर पर द्विभाषिकता पर विचार करते हुए वाइनराइख कहते हैं, ‘‘दो भाषाओं का विकल्प से एक के बाद एक प्रयोग की स्थिति ही द्विभाषिकता है।’’
बहुभाषिकता की स्थिति भारत में नई नहीं है। अपने सांस्कृतिक, व्यापारिक एवं सामाजिक कारणों के फलस्वरूप यहाँ बहुभाषिकता बहुत पहले से मौजूद है। स्वयं भारत की संस्कृति इतनी समृद्ध है कि लोग यहाँ कहते हैं, ‘‘कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बदले बानी।’’ तकनीकी के प्रभाव के कारण शिक्षा की व्यापकता, महानगरों के उदय एवं संचार माध्यमों का विकास हो रहा है जिस कारण अधिकाधिक व्यक्ति द्विभाषी या बहुभाषी होने की स्थिति को प्राप्त कर रहे हैं। भारत इन सबसे अछूता नहीं है। बहुभाषा-भाषी राष्ट्र होने के कारण यहाँ यह स्थिति पहले से ही थी परन्तु इन सबने इसके इस स्थिति को और समृद्ध किया है। बहुभाषिकता की स्थिति प्रायः व्यक्ति, राष्ट्र एवं समाज के संदर्भ में की जाती है। समाजभाषा विज्ञान यह मानता है कि व्यक्ति के स्तर पर एक से अधिक भाषाएँ जानना व्यक्तिगत ज्ञान वर्धन या रूचि हो सकती है परन्तु बहुभाषिकता का अर्थ दैनन्दिन जीवन में परस्पर विचार विनिमय के लिए एक से अधिक भाषाओं का प्रयोग। राष्ट्र के स्तर पर एक से अधिक भाषाओं का अस्तित्व संवैधानिक, परम्परागत अथवा धर्म द्वारा पोषित, किसी अन्य समाज अथवा संस्था द्वारा समर्थित होने पर भी द्विभाषिकता की स्थिति में शामिल नहीं किया जा सकता। केवल सामाजिक बहुभाषिकता ही वास्तविक बहुभाषिकता है। बहुभाषिकता केवल समाज से ही जुड़ी है। रोष के साथ तो विशेषण लग जाता है। बहुभाषिकता को हम भाषा-सम्पर्क की स्थिति कह सकते हैं अर्थात् बहुत-सी भाषाओं का एक साथ प्रयोग जो प्रयोक्ता को एक-दूसरे के साथ सम्पर्क करने को बाध्य करता है। द्विभाषिकता या बहुभाषिकता की स्थिति सापेक्ष एवं प्रयोक्ता सापेक्ष में बाँटा जा सकता है।
स्थिति सापेक्ष द्विभाषिकता राष्ट्र के स्तर पर देखने को मिलती है। इसमें प्रयोक्ता का द्विभाषिक होना अनिवार्य नहीं होता। बहुभाषी लोग अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर एक स्थान पर बसे होते हैं तथा अपनी-अपनी भाषा का प्रचार-प्रसार करते हैं। अपने नेटिव स्थान से जाकर दूसरी जगह बसे लोगों में सामान्यतया बहुभाषिकता की स्थिति होती है क्योंकि वे जहाँ बसे होते हैं वहाँ वे अल्पसंख्यक होते हैं और बहुसंख्यक समुदाय से उनका घर्षण होता है। कम ही राष्ट्र ऐसे हैं जो दो अथवा अधिक भाषाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान करते हैं। यह भी संभव है कि राष्ट्र की स्थिति द्विभाषिकता की हो, परन्तु वहाँ के निवासी द्विभाषिक न हों। उदाहरण के रूप में भारत में हिंदी और अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में मान्यता मिली हुई है परंतु यहाँ करोड़ों की संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जिन्हें हिंदी और अंग्रेजी में से कोई भी भाषा नहीं आती।
बहुभाषिकता की दूसरी स्थिति में यानि प्रयोक्ता सापेक्ष में प्रयोग करने वाला व्यक्ति ही इसका आधार होता है। वास्तव में जिस समाज में स्थिति सापेक्ष बहुभाषिकता होगी, व्यक्ति सापेक्ष भी होगी। समाज के भीतर जनसंपर्क के साधन भी बहुभाषिकता बढ़ाने में मदद करते हैं। प्रयोक्ता सापेक्ष बहुभाषिकता में व्यक्ति दो भाषाओं में पूर्ण अथवा आंशिक दक्षता रखता है। प्रयोक्ता सापेक्ष बहुभाषिकता के तीन प्रमुख आयाम शिक्षा, सामाजिकता एवं अभिप्रेरणा हैं।
द्विभाषिकता की शिक्षा संबंधी स्थिति से तात्पर्य यह है कि व्यक्ति ने औपचारिक तौर पर शिक्षा ली है या नहीं। इसका अध्ययन शिक्षा सापेक्ष बहुभाषिकता एवं शिक्षा निरपेक्ष बहुभाषिकता के रूप में किया जा सकता है। वास्तव में शिक्षा निरपेक्ष बहुभाषिकता सामान्य स्थिति है। इसमें प्रयोक्ता अपनी दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मातृभाषा से इतर भाषा सीखता है, इसके लिए औपचारिक रूप से शिक्षा लेने की आवश्यकता नहीं होती वरन् इसको समाज से ही ग्रहण किया जाता है। इसमें अन्य भाषा की प्रवृत्ति सामान्यतः ‘पिजिन’ (अवमिश्रित) भाषा के रूप में ढ़लने की ओर होती है। तमिलनाडु में रहने वाले गुजराती लोगों की भाषा या कलकत्ता व बम्बई के लोगों की हिन्दी में सामान्य द्विभाषिकता विद्यमान है। इस प्रकार की बहुभाषिकता के लिए सामान्य जीवन के अनौपचारिक संदर्भ ही पाठशाला का काम करते हैं और संप्रेषण की आवश्यकताएँ ही शिक्षा का कार्य करती हैं।
शिक्षा सापेक्ष बहुभाषिकता ‘संभ्रांत बहुभाषिकता’ कही जा सकती है। यह औपचारिक स्तर पर अन्य भाषा के शिक्षण से उद्भूत होती है। इस प्रकार की बहुभाषिकता में अन्य भाषा का मानक रूप साध्य होता है। संपर्क भाषा के रूप में अन्य भाषा को यहाँ भी स्वीकार किया जा सकता है पर इसका झुकाव ‘अवमिश्रित’ भाषा को जन्म देने की ओर नहीं होता। इसमें अपनाई गई भाषा का शिष्ट रूप दिखता है। उदाहरणार्थ हिन्दी या तमिल को मातृभाषा के रूप में बोलने वाले अंग्रेजी की औपचारिक शिक्षा लेकर उसे सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। सामान्य द्विभाषिकता सम्भ्रांत द्विभाषिकता की तुलना में हेय मानी जाती है।
सामाजिकता की दृष्टि से द्विभाषिकता को ‘व्यक्तिपरक द्विभाषिकता एवं ‘समुदायपरक द्विभाषिकता’ में बाँटा जा सकता है। व्यक्तिपरक द्विभाषिकता में व्यक्तिपरकता ही महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति अपनी रूचि या वैयक्तिक आवश्यकताओं के कारण भाषा सीखता है। जैसे किसी व्यक्ति को रूसी साहित्य पसन्द आने लगा तो वह मूल रूसी भाषा सीखने का प्रयत्न करता है, पर्यटक गाइड जीविकोपार्जन हेतु अन्य भाषा सीखता है। व्यक्तिपरक अन्य भाषा सीखने के पीछे केाई सम्प्रेषणगत सामाजिक दबाव नहीं होता। इससे भिन्न ‘समुदायपरक द्विभाषिकता’ में सम्प्रेषणगत सामाजिक दबाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वस्तुतः ऐसी स्थिति में अपनाई जाने वाली अन्य भाषा प्रयोक्ता के भाषायी समाज के भाषायी कोश का अंग होती है। उदाहरणार्थ, भारत में हिन्दी, मैथिली या पंजाबी प्रयोक्ता उच्च शिक्षा अथवा तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के लिए अंग्रेजी सीखकर द्विभाषिक या बहुभाषिक बनता है।
अभिप्रेरणा की दृष्टि से बहुभाषिकता उपकरणवादी एवं समग्रतावादी रूप में परिभाषित है। उपकरणवादी बहुभाषिकता अन्य भाषा के सीखने के लक्ष्य को उपयोगिता के आधार पर स्वीकार करते हैं। प्रयोक्ता अपने पर्यटन गाइड के पेशे को सुचारू रूप से चलाने के लिए, अन्य भाषा सीखता है तो अभिप्रेरणा की प्रकृति उपकरणवादी होती है। समग्रतावादी बहुभाषिकता अन्य भाषा को किसी दूसरे भाषायी समुदाय के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त करने हेतु सीखता है। इसके पीछे अपनी सामाजिक अस्मिता उस भाषायी समाज से जोड़ना और उस सांस्कृतिक धरातल की सदस्यता प्राप्त करना लक्ष्य होता है। इसका एक अच्छा उदाहरण फादर कामिल बुल्के हैं। ये पोलैण्ड के रहने वाले इसाई मिशनरी (धर्म प्रचारक) थे। इन्होंने बहुत सी रामायणों पर अद्भुत काम किया है। इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि इनके द्वारा बनाई गई अंग्रेजी से हिन्दी की डिक्शनरी (शब्दकोश) है जो सर्वाधिक प्रामाणिक मानी जाती है।
इसके अतिरिक्त प्रयोक्ता सापेक्ष बहुभाषिकता को उसके गुणात्मक और परिमाणात्मक धरातल पर भी देखी जा सकती है। गुणात्मक धरातल द्विभाषिकों की प्रवृत्ति से संबंध रखता है, यह बताता है कि अन्य भाषा के रूप में सीखी जाने वाली भाषा को प्रयोक्ता किस रूप में ग्रहण करता हैं। परिमाणात्मक धरातल द्विभाषिकों के अन्य भाषा संबंधी ज्ञान और दक्षता के अनुपात को मापता है और यह बताता है कि अन्य भाषा के रूप में सीखी जाने वाली भाषा में द्विभाषिकों की योग्यता कितनी है। गुणात्मक धरातल को प्रकार्य, दक्षता एवं स्थिरता के अंतर्गत समझने में आसानी होती है। गंपर्ज ने प्रकार्यपरक द्विभाषिकता की चर्चा की है। इसे समानाधिकृत व सामासिक बहुभाषिक के रूप में समझें तो समानाधिकृत बहुभाषिक दो भाषाओं को स्वतंत्र रूप से प्रयोग में लाते हैं। इनके व्यवहार में दोनों भाषाएँ दो भिन्न प्रकार की संस्कृतियों एवं जीवनदृष्टि की अभिव्यक्ति का साधन बनती हैं। आर्थी धरातल एक ही होने के कारण प्रयोक्ता इसमें एक दूसरी भाषा के लिए अनुवाद का सहारा नहीं लेता। इसके विपरीत ‘सामासिक बहुभाषिक’ एक ही संस्कृति की अभिव्यक्ति के दो विकल्पगत माध्यमों के रूप में दो भाषाओं की सत्ता को स्वीकार करते हैं। ऐसे बहुभाषिक अन्य भाषा को सीखने के लिए मातृभाषा से अनुवाद-प्रक्रिया का सहारा लेते हैं। परन्तु अन्य भाषा सीखने के बाद वह दोनों का प्रयोग मातृभाषावत् करता है। इसे समानार्थी प्रणाली भी कहते हैं। इस स्थिति में भाषाएँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आने से प्रभावित होती हैं व बदलती हैं।
दक्षता के संबंध में बहुभाषिकों के दो वर्ग सक्रिय व निष्क्रिय अथवा असक्रिय कहें तो ज्यादा उचित होगा, देखे जा सकते हैं। दक्षता का सम्बन्ध भाषा-कौशल से है जो भाषा व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में चार माने गए हैं – बोलना, सुनना, लिखना और पढ़ना। इनमें दो दाता सापेक्ष है – बोलना और लिखना और दो ग्राही सापेक्ष है – सुनना व पढ़ना। वैसे तो ये दोनों दाता व ग्राही ही सक्रिय माने जा सकते हैं परन्तु दाता भाषायी कौशल, संप्रेष्य अथवा कथ्य के संदर्भ में उत्पादक है, इससे प्रसार होता है, ग्राही में इसके विपरीत संकुचन नहीं होता, इसलिए दाता वर्ग को सक्रिय व ग्राही को असक्रिय कहना निष्क्रिय से ज्यादा उचित है।
स्थिरता के धरातल पर द्विभाषिकों को स्थिर व अस्थिर में बाँटा जा सकता है। स्थिर द्विभाषिक स्थायी उद्देश्यों के लिए अन्य भाषा सीखता है। जैसे व्यापार के लिए सीखी जाने वाली अन्य भाषा। इसके विपरीत अस्थिर द्विभाषिक वह होता है जो किसी विशेष उद्देश्य से सीखता है एवं उद्देश्य पूर्ति के पश्चात् उसका प्रयोग बंद कर देता है परिणामतः धीरे-धीरे वह अन्य भाषा भूल जाते हैं। उदाहरणार्थ पर्यटन के उद्देश्य से सीखी गई अन्य भाषा को व्यक्ति पर्यटन के लौटने से पश्चात् धीरे-धीरे भूल जाता है।
परिमाणात्मकता के धरातल पर द्विभाषिकता का अध्ययन करना निश्चय ही कठिन कार्य है। इसमें भाषा कौशल के किस पक्ष के आधार पर मापा जाए यथा किसी का शब्द भंडार अच्छा है परंतु व्याकरणिक ज्ञान नहीं तो किसी का व्याकरणिक ज्ञान अच्छा है, शब्द ज्ञान नहीं। इसके अतिरिक्त ऐसी बहुभाषिक भी हैं जिनमें कोई पढ़ता अच्छा पर लिखता नहीं तो कोई लिखता अच्छा पढ़ता नहीं। इस आधार पर रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने पूर्ण, आंशिक व प्रारंभ श्रेणी के बहुभाषिकों के रूप में वर्गीकृत किया है।
बहुभाषिकता के विविध आयामों को समझने के पश्चात् भारत के संदर्भ में इसे समझने में और अधिक सरलता मिलेगी। भारत में बहुभाषिकता बहुत पहले से उपस्थित है। यहाँ यह कोई नई धारणा नहीं है। डाॅ. विमलेश कांति वर्मा ने ‘द्विभाषिकता एवं बहुभाषिकता’ लेख में लिखा है – ‘‘जिस देश में विभिन्न भाषा परिवारों की 1652 भाषाएँ बोली जाती हों और हर भाषा की अनेक बोलियाँ हों, उस देश में बहुभाषिकता का महत्व स्वयं सिद्ध है। वस्तुतः हर बहुभाषायी समाज में द्विभाषिकता सहज और सामान्य होती है क्योंकि यहीं द्विभाषिकता सामाजिक संरचना और विभिन्न सामाजिक स्तरों पर संप्रेषण की अनिवार्यता भी है।’’ भारत में विविध भाषाओं के संदर्भ में ‘आधुनिक हिन्दी का प्रयोग’ नामक पुस्तक में डाॅ. नारायणदत्त पालीवाल लिखते हैं – ‘‘हमारे देश में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गुजरात से लेकर नागालैण्ड तक अनेक भाषाएँ, उपभाषाएँ, बोलियाँ तथा उपबोलियाँ बोली जाती हैं। इन भाषाओं और बोलियों में विविधता होते हुए भी एकता के दर्शन होते हैं। ….. सभी भारतीय भाषाएँ भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में इस धरती पर सांस्कृतिक एकता की पावन गंगा प्रवाहित करती है।’’
लेकिन देश के सामान्य व्यक्तियों से लेकर चिंतकों तक के मन में कुछ भ्रान्त धारणाएँ समाई हुई हैं जिनका निराकरण ही भारतीय बहुभाषिकता का वास्तविक अर्थ एवं महत्ता समझ सकते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि भारत में बहुभाषिकता सामान्य स्थिति नहीं है। परन्तु यह धारणा गलत है इसे असामान्य नहीं माना जा सकता। यहाँ यह भाषा व्यवहार की विसंगति नहीं अपितु अति सामान्य स्थिति है। बहुभाषिकता यहाँ किसी आपदा या दुर्घटना से नहीं अपितु स्वाभाविक रूप में है। उदाहरण के रूप में अवधी व भोजपुरी दो अलग भाषाओं को बोलने वाला मिलने पर सामान्य रूप से वार्तालाप करने में सक्षम होता है।
अनेक विद्वानों का मत था कि बहुभाषिकता बालक के शिक्षा विकास में बाधक होता है। इस ओर संकेत करते हुए मैक्समारा ने 1966 में कहा कि, ‘‘एक भाषा के माध्यमों से पढ़ने वाले बालकों की प्रगति द्विभाषी माध्यम से पढ़ने वाले बालकों की तुलना में अधिक होती है।’’ परन्तु बाद में इसे अस्वीकार किया गया एवं सिद्ध हुआ कि ये बाधक नहीं सहायक हैं परन्तु उसकी उच्च शिक्षा एक भाषा में अवश्य हुई हो और यह स्वाभाविक रूप से स्पष्ट इससे बाधा क्यों उत्पन्न होगी? वस्तुतः अन्य भाषा का ज्ञान उनके ज्ञान क्षेत्र का विस्तार ही करेगा।
बहुत चिन्तक एक राष्ट्र-एक भाषा का नारा बुलन्द करते हैं और तर्क देते हैं कि आर्थिक व शैक्षणिक दृष्टियों से अधिक समुन्न्त होता है परन्तु बेल्जियम, कनाडा, स्विट्जरलैण्ड, इजराईल एवं पूर्व सोवियत संघ ने इस मिथ को तोड़ा और स्थापित किया कि बहुभाषिकता वास्तव में राष्ट्र के विकास में बाधक नहीं है। इसके विपरीत अल्बानिया, ब्राजील, पुर्तगाल, कोरिया व लीबिया जैसे राष्ट्र भाषिक रूप से एक होने पर भी आर्थिक-शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं।
विद्वानों द्वारा यह मत दिया जाता है कि बहुभाषिकता समाज की सहज भाषाई संप्रेषण व्यवस्था में बाधक है। परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। गुजरात का रहने वाला व्यापारी जो बम्बई में रहता है, इस उदाहरण से इस समस्या को समझ सकते हैं। वह अपने घर में सदस्यों से गुजराती में बात करता है, अपने नौकरों व सब्जी बाजार में सामान्य मराठी भाषा का भी इस्तेमाल करता है। बम्बई में अधिकांश टैक्सी व दूध वाले पूर्वांचल के हैं तो वह उनसे हिन्दी में भी बात करता है। अपने मिर्च-मसाले के व्यापार में कच्छी और कोंकणी को माध्यम बनाता है एवं शिक्षित होने पर अंग्रेजी का भी उपयोग करता है। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि भारतीय बहुभाषिकता का मूलाधार वस्तुतः समाज की अपनी सम्प्रेषण व्यवस्था की अनिवार्य स्थिति है और वह भाषायी सम्प्रेषण व्यवस्था में बाधक नहीं है।
यह भी एक गलत धारणा है कि बहुभाषिकता व्यक्ति की सर्जनात्मकता को कम करती है। सर्जनात्मकता के लिए विभिन्न क्षेत्रों की जानकारी, प्रयोग व अनुभव की आवश्यकता होती है, इसलिए बहुभाषिकता उन्हें एक वृहद फलक देती है जिससे उनका ज्ञान क्षेत्र समृद्ध होता है। तर्क के आधार पर सैमुअल बैकेट (फ्रेंच-इंग्लिश), काफ्का (चेक-जर्मन-चोडिश), नोबोकोव (रूसी, फ्रेंच, जर्मनी, अंग्रेजी), महात्मा गांधी (गुजराती-अंग्रेजी-हिन्दी), दयानन्द (हिन्दी-संस्कृत-गुजराती), टैगोर (बांग्ला-अंग्रेजी) राहुल सांकृत्यायन आदि के नाम प्रस्तुत किया जा सकता है जो द्विभाषिकों की सर्जन क्षमता का स्पष्ट उदाहरण है।
भारतीय बहुभाषिकता में भाषा निर्वाह की समस्या नहीं आती। यहाँ पर पूर्वजों की भाषा का पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनुकरण होता रहता है चाहे परिस्थितियाँ कुछ भी हों। इसे लैंग्वेज मेन्टीनेन्स या भाषा का आत्मसातीकरण कहेंगे। यदि कोई व्यक्ति बम्बई जाता है तो वह बम्बई के लिए मराठी सीखता है परन्तु अपनी भाषा को वह छोड़ता या भूलता नहीं है। बंगाल में रहने वाले मारवाड़ी या दिल्ली में बसे तमिल या बंगाली समुदायों के विवाहों, रीति-रिवाजों व संस्कृति में उनकी मूल भाषा को देखा जा सकता है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानान्तरित होती रहती है परन्तु अमेरिका जैसे राष्ट्रों में स्थिति ऐसी नहीं है, ऐसी परिस्थिति (उपर्युक्त) में भाषा तीसरी से चैथी पीढ़ी तक आते मरने लगती है व वे लोग वर्तमान समुदाय की भाषा को ही पूर्णतया अपना लेते हैं।
यहाँ की बहुभाषिकता के लिए वरदान है यह सामाजिक संप्रेषण व्यवस्था की अपनी अनिवार्य आवश्यकता का केवल परिणाम ही नहीं है, अपितु यह सामाजिक संस्थाओं से समर्थित एवं उनके द्वारा पोषित भी है। उदाहरण के रूप में तमिल समुदाय क्लर्क रूप में बंगाल में बसे, अधिकारी व संवाददाता रूप में दिल्ली में बसे व अध्यापक रूप से अन्य प्रदेशों में बसे, जहाँ गए वहाँ की भाषा तो सीखी पर साथ में अपने मंदिर बनवाए, अपने संगीत प्रसार के लिए अकादमियाँ खुलवाई, शिक्षा के लिए तमिल विद्यालय व खान-पान के लिए रेस्तरां खुलवाए। दिल्ली में बंगाली, तमिल, राजस्थानी, बिहारी आदि लोगों की अपनी संस्थाएँ देखने को मिलती हैं।
भारतीय बहुभाषिकता के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यहाँ पर बहुभाषिकता बोलचाल के स्तर पर ज्यादा है परन्तु साहित्यिक या शैक्षणिक स्तर पर कम है। बंगाली या बम्बईया हिन्दी बोलने वाला या गुजराती व्यापारी जो हिन्दी बोलता है शैक्षणिक स्तर पर उसे हिन्दी समझने में बहुत ही दिक्कत आएगी क्योंकि यहाँ पर बहुभाषिकता की स्थिति पूर्णता में बहुत कम, आंशिक व प्रारम्भिक में ही ज्यादा पायी जाती है।
भारत में लगभग सब प्रमुख भाषाएँ सम्पर्क भाषा हैं पर अंतर-क्षेत्रीय स्तर पर हिन्दी और अंग्रेजी अधिक प्रयोजन सिद्ध भाषाएँ हैं। जब कोई भाषा ‘लिंगुआ फ्रंेका’ के रूप में उभरती है तब राष्ट्रीयता और राष्ट्रवादिता से प्रेरित होकर वह ‘डामिनेन्ट’ भाषा बन जाती है। ‘डामिनेन्ट’ के रूप में यहाँ अंग्रेजी व हिन्दी ही है, जिसे प्रभुता प्राप्त है। जरूरी नहीं कि मातृभाषा के रूप में इसके बोलने वाले सर्वाधिक हों, अपितु द्वितीय भाषा के रूप में इसे बोलने वाले बहुसंख्यक होते हैं। सबसे बड़ी विशेषता इसकी यह है कि इसके मातृभाषी अन्य किसी भाषा के सीखने की ओर प्रेरित नहीं होते।
भारतीय द्विभाषिकता का अनुपात भाषा के प्रयोजन सामथ्र्य के मूल्य के विपरीत है। अर्थात् जो भाषा जितनी अधिक प्रयोजनसिद्ध होती है, जितना ही उसके प्रयोग का क्षेत्र व्यापक होता है, उतना ही उस भाषा को बोलने वाले अन्य भाषा सीखने में शिथिलता दिखाते हैं क्योंकि हर क्षेत्र में उसका कार्य अपनी भाषा से ही सम्पन्न हो जाता है।
यहाँ हर भाषाई क्षेत्र में एक संपर्क भाषा है और इन संपर्क भाषाओं में भी भाषाई स्तर हैं। एक ही भाषा की कई शैली यथा शिक्षित, अर्द्ध शिक्षित या अशिक्षितों की शैली। उदाहरणार्थ बंगाल में शिक्षितों द्वारा बंगाली साधु भाषा व अशिक्षितों की बंगाली चलित भाषा के रूप में मानी जाती है। यह अमेरिका व यूरोपीय राष्ट्रों में दृष्टिगोचर नहीं होता।
भारतीय बहुभाषिकता बहुत जटिल है। यह पश्चिमी मानकों पर समझे जाने पर कठिनाई उत्पन्न करेगी। पश्चिमी राष्ट्रों में बहुभाषिकता अस्थिर है परन्तु हमारे यहाँ भारतीय बहुभाषिकता स्थिर रही है।
भारतीय बहुभाषिकता में, बहुभाषिकता सामाजिक स्तर पर भाषायी क्षेत्र की उस संकल्पना को सामने लाती है जिसमें भाषायी लक्षण भाषाओं के पारिवारिक सम्बन्धों का अतिक्रमण करता है। चार भाषा परिवार के लोग संबंध जोड़े से रहते नजर आते हैं।
इस प्रकार भारतीय बहुभाषिकता को बहुभाषिकता के सभी तकनीकी बिन्दुओं को समझने के बाद आसानी से समझा जा सकता है। यह अन्य किसी राष्ट्र की बहुभाषिकता की स्थिति से पूर्णतया भिन्न एवं किसी-किसी स्तर पर इसकी अवधारणाएँ चैंकाने वाली हैं। कुछ चिन्तकों ने जो भ्रांतियाँ इस समाज में फैलायी हैं उन्हें दरकिनार कर सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि भारतीय बहुभाषिकता समझने के स्तर पर भले कठिन हो परंतु अपने प्रयोग में अति सामान्य एवं विशिष्ट है। यहाँ बहुभाषिकता लोगों के ऊपर बोझ के रूप में नहीं अपितु उनकी वृत्तियों में सामान्तया रची बसी हुई है। यह भारतीय समाज में कोई हानिकारक तत्व नहीं घोलती अपितु बहुत ही सकारात्मक है, यह इस समाज के लिए फायदेमन्द है, साथ ही साथ संप्रेषण के स्तर पर अनिवार्य आवश्यकता का भी परिणाम है।

संदर्भ ग्रंथ
1. भाषा साहित्य और संस्कृति – मुकेश अग्रवाल
2. हिन्दी भाषा का समाजशास्त्र – रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव
3. हिन्दी और उसकी उपभाषाएँ
4. आधुनिक हिन्दी का प्रयोग – नारायणदत्त पालीवाल

 

शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय

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