राज के समय के जिलों की भौगोलिक सीमाएं आज के दौर के मण्डलों या प्रमंडलों से भी अधिक फैली थीं और जिला मजिस्ट्रेट का पद मूल रूप से अंग्रेजी के लिए सुरक्षित था | कभी-कभार बहुत जान लड़ा कर कोई गैर अंग्रेज इस पर पहुँच भी जाता तो उसका इतना तिरस्कार एवं अपमान होता कि वह नौकरी छोड़कर ही भाग जाता या फिर स्वतंत्रता आंदोलन में प्रतिभाग करने लगता | बहुत बाद में अंग्रेजों के साथ कुछ भूरे, गेंहुए और सांवले वर्ण के अधिकारियों को भी बर्दाश्त किया जाने लगा | इस अति प्रतिष्ठित एवं अनन्य सेवा को उस समय इंडियन सिविल सर्विस के नाम से जाना जाता था, जो आजकल अपने तमाम अधिकारों में दीर्घकालिक तथा भारी भरकम कटौती के साथ, आई.ए.एस. नाम से जानी जाती है |

यूनाइटेड प्राविंस ऑफ अवध एंड आगरा, जिसे अब उत्तर प्रदेश के नाम से जाना जाता है, का एक, कदम उत्तर-पूर्व से स्थित जनपद है, गोरखपुर | राज के समय जिसकी सीमाएं उत्तर  में नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पश्चिम एवं दक्षिण दिशा में घाघरा एवं पूरब में नारायणी तथा गंगा नदियों के तट तक फैली थीं | नवांगत आई.ए.एस. अधिकारियों को प्रशिक्षण देने एवं अनुभव प्रदान कराने के उद्देश्य से ज्वाइंट मजिस्ट्रेट नामक एक विशिष्ट पद करीब-करीब प्रत्येक जनपद में सृजित था, जिस पर अनुभवहीन, उन्मादी एवं अतिउत्साही युवा अधिकारियों का प्रथम पदस्थापन होगा | गोरखपुर जनपद में यह ‘ज्वाइंट मजिस्ट्रेट पडरौना एट कसयां’ के नाम से अस्तित्व में था |

उस समय कसयां एक गाँव था, परन्तु मुख्यालय से आज की ही भांति गोरखपुर से जुड़ा हुआ पडरौना एक सब डिविजन |

कसयां में करीब चार-पांच एकड़ के एक उपयुक्त स्थान पर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट का बंगला बनाया गया, कहते हैं यह सन् उन्नीस उन्नीस में दो ढाई साल के परिश्रम के उपरांत इसका निर्माण रूड़की इंजीनियरिंग कॉलेज से शिक्षा प्राप्त एक दक्ष एवं कुशल अंग्रेज अभियंता मि. रैंडल द्वारा कैंप लगाकर स्वयं अपनी देखरेख में करवाया गया | कालांतर में यही कैंप लोक निर्माण विभाग का कार्यालय, डाक बंगला स्टोर एवं आवास के रूप में कार्यान्तरित हुआ | बंगले के निर्माण में बेशकीमती साख की गर्म पानी में परिपक्व की गई लकड़ियाँ, छतों पर जापानी टाइल्स, फर्श पर मिर्जापुरी पत्थर, फायर प्लेस में कलकत्ता से मंगवाई गई फायर ब्रिक्स का प्रयोग करते हुए ड्राइंग, डाइनिंग एवं छः बेडरूम के साथ आँगन, बड़ा बरामदा, फाल्स सिलिंग एवं दो-दो चिमनी सहित फायर प्लेस की पूर्व नियोजित व्यवस्था को मूर्तरूप दिया गया | बाद में एक चबूतरा तथा मछली पालने के लिए छोटा सा पक्का पोखर भी इससे जुड़ा | उष्ण कटिबंध जलवायु को दृष्टिगत रखते हुए कोठी परिसर के चारों तरफ सागवान के जुड़ा | उष्ण कटिबंध जलवायु को दृष्टिगत रखते हुए कोठी परिसर के चारों तरफ सागवान के वृक्षों की तीन सामानांतर कतारें लगायी गईं | बची हुई सामने की भूमि का प्रयोग साहब, मेमसाहब के टेनिस कोर्ट के रूप में एवं शेष उर्वर, भूखंड पर कृषि कार्य होने लगा |

पेड़-पौधों की सेवा एवं उन्हें सुसज्जित ढंग से रखने के प्रयोजन से कोठी के प्रथम अध्यासी के रूप में श्रीमान डबलू.सी. रदरफोर्ड साहब ने बुद्धिचंद नाम एक माली को नियुक्त कर लिया और इसके अंतिम अंग्रेज अध्यासी श्रीमान एडवर्ड ब्राउन ने बुद्धिचंद के असामयिक मृत्यु के कारण उसके नाबालिग बेटे कमला का नियोजन | पेड़ पौधों एवं घास के मैदान में चांपाकाल (हैण्डपंप) चलाकर पानी डालना, उन्हें चूने तथा गेरू से रंगना, गमलों की देखभाल, सूखे पत्ते तोड़ना और घास धुनना, मकड़ी की जाली साफ करना उस माली की दिनचर्या थी | वह बताता कि ब्राउन साहब के समय कोठी एक दुल्हन की तरह सजाकर रखी गई थी जिसके देखने के लिए आस-पास के लोग आते थे | अब कमला को सेवानिवृत्त हुए करीब सत्ताईस वर्ष बीत चुके हैं | वह पास के ही एक गाँव का रहने वाला है और इस समय उसकी आयु लगभग सत्तासी वर्ष होनी चाहिए, (जैसा वह स्वयं ही अनुमानित कर बताता है ) | वह प्रायः दो-तीन दिन के अंतराल पर अब भी कोठरी पर आकर चुपचाप बैठ जाता और कभी-कभी श्रोता मिल जाते तो, अपने पोपले मुँह से अंग्रेजी काल के अंतिम, स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक, इंदिरा जी के इमरजेंसी तथा अटल जी के समय की कहानियां रूचि लेकर सुनाता एवंत माम अधिकारियों के संस्मरण का विस्तारपूर्वक वर्णन करता, इस कड़ी में अंग्रेज, बंगाली, दक्षिण भारतियों से लेकर वर्तमान में कार्यरत. प्रदेश स्तर के ज्येष्ठ पदाधिकारी होते, जिनसे अपना व्यक्तिगत परिचय बताने में उसे गर्वानुभूति होती थी | वह कहता ‘भूपलाल साहब अंतिम ज्वाइंट मजिस्ट्रेट थे, इसके बाद इस कोठी में एसडीएम साहब लोग ही आने लगे, अभी साहब प्रदेश के सबसे शक्तिशाली अधिकारी हैं, कभी-कभी साहब और मेमसाहब से फोन पर बात हो जाती है | बड़ी वाली पतोहू का ईलाज पीजीआई लखनऊ में कराना उन्हीं की कृपा से संभव हो सका | कार्यरत कर्मचारीगण मेमसाहब के द्वारा भीतर से भेजी गई बासी-पुरानी मिठाइयों और अपने भोजन में से उसे भी साथ खिलाते तथा कभी-कभी चुटकियाँ लेते पर इज्जत देते | अपने द्वारा लगाए एवं सेवा किए गए सागवान तथा बोटल पाम के वृक्षों को वह वैसे ही निहारता जैसे वह उसकी संतान हों | वह बताता “इन पेड़ों को ब्राउन साहब ने सन् बयालीस के आन्दोलन के पूर्व गोरखपुर से विशेष रूप से मंगवाकर लगवाया था |”

चूंकि ब्राउन साहब उसके नियोक्ता थे, इसलिए उनके समय के संस्मरण उसके लिए विशेष स्थान रखते थे | उसके कहने के अनुसार ब्राउन साहब एंग्लो इंडियन थे, उनके पिता एक अंग्रेज मवेशी डॉक्टर तथा माँ बंगाली मुसलमान थीं | साहब इस देश से बहुत प्यार करने वाले एवं चौबीस पच्चीस वर्ष के एक अविवाहित थे | वह प्रतिदिन फिटिन में बैठकर गोरखपुर क्लब में अन्य साहब लोगों की सोहबत में शाम गुजारकर देर रात तक लौटकर आते | एक दिन वह बताते-बताते बोल गया कि उनका सम्बन्ध सुगनी नाम की एक बाल विधवा से हो गया था | सुगनी रास्ते में उसकी बड़ी साली थी और प्रतिदिन दूध और फूल लेकर कोठी में आती थी | साहब सही मामले में उससे प्रेम करते थे, और तरह-तरह के उपहार कलकत्ता, इलाहाबाद तथा गोरखपुर से लाकर उसे दिया करते, वह भी दिन का अधिकांश समय तथा कभी-कभी रात भी कोठी पर व्यतीत करने लगी, हालाँकि उसे केवल उपहारों का लोभ और वासना से ही मतलब था, साहब की तरह प्रेम के सही अर्थ से एकदम अनजान थी, कुल मिलाकर बस मदन प्यास की मारी | डर से कोई चूं तक नहीं करता, आखिर बड़े-बड़े जमीदारों तक की अंग्रेज साहबों के सामने बात करने की हैसियत नहीं थी फिर लल्लू पंजूओं की क्या औकात | फिर बताता कि एक बार इलाके में हैजा फैला और सुगनी अपने पेट के पाप के साथ अचानक चल बसी, कोठी परिसर के एक कोने में ही उसे ससम्मान दफना दिया गया, उसके कुछ दिनों के उपरान्त ही ब्राउन साहब और उनके फिटिन के घोड़े तक मर गए | उनके मरने का कारण वह घोर अवसाद को बताते हुए कहता “सुगनी के मरने के बाद साहब कभी भी गोरखपुर नहीं गए, उनका गोरा चेहरा लगभग काला पड़ गया था, महीने भर भी नहीं खेप सके और मरने से पहले गोरखपुर चर्च के पादरियों को बुलवाकर साहब ने कहा था कि अगर वह भी मर गए तो सुगनी के कब्र के बगल में ही उन्हें भी दफना दिया जाए |”

वह इशारे से दिखाता हुआ बताता कि आज भी उन दोनों की कब्र वहीँ हैं, पर उनके ऊपर अब कंजास जमा है, चबूतरा टूटकर गुम हो चुका है, उसमें लगे ईटों को माल मवेशी का खूंटा ठोंकने वालों से लेकर ईंट चोरों द्वारा गायब कर दिया गया है | अब तो पता ही लगेगा कि किसी की कब्र भी कभी थी वहां | ब्राउन साहब के बाद श्रीमान् पी. सुब्बाराव साहब करीब सन् पैंतालीस में यहाँ आए थे | कोठी के आसपास वियावान ही था, देर रात कभी-कभी फिटिन आने और एक औरत के चीखने की आवाज सुनाई दिया करती | एक दफा एक उन साहब ने सागवान की डालियाँ, सुखाकर जलावन के रूप में प्रयोग करने के उद्देश्य से कटवा ली, नतीजतन उनकी हालत अचानक नाजुक हो गई और उन्हें इलाज के लिए इलाहाबाद भेजना पड़ा, फिर वे कभी इस कोठी में लौटकर नहीं आए, बाद में उनका पदस्थापक भी कट्टी उसके बाद और हो गया | इस घटना का परिणाम यह निकला कि जो भी साहब यहाँ रहने आए, उन्होंने इस कोठी के किसी सामान को, कोई भी नुकसान पहुंचाने वाले को ब्राउन साहब आज भी नहीं छोड़ते, कहीं न कहीं, कभी न कभी और कोई न कोई कष्ट निश्चित रूप से भोगना पड़ता है |

खैर, अंग्रेजीराज का दौर समाप्त हुए कई दशक बीत चुके हैं | हो सकता है वे अत्याचारी, निष्ठुर और लुटेरे थे ऐसा हम सबों ने सुना और पढ़ा है, होंगें भी, इससे कोई बहस नहीं | फिर उनके जाने के कुछ वर्षों बाद तक उनकी बनाई गई व्यवस्था और उनके तौर तरीकों की खुमारी का दौर भी चला | पर कहते हैं न नकल भर कर लेने से आपकी मौलिकता का कायांतरण नहीं हो जाता, आधुनिकता की चाह में आप बस अपने जीवन शैली का पश्चात्यीकरण भर कर सकते हैं, उस पर वैचारिक, नैतिक एवं सैद्धांतिक रूप से अपरिष्कृत एवं अपरिपक्व होने के साथ आपकी स्वभावगत सामंतवादी मानसिकता, शक्तिशाली बनाने की चाह में स्वतः ही आपको अपराधिक चरित्र का बना कर रख देती है | अंग्रेजों के बाद जिन्होंने भी यहाँ की व्यवस्था को क्रमशः संभालना प्रारंभ किया, उन्होंने उस सर्वमान्य और स्थापित व्यवस्था में सेंध मार-मार कर, अपने हितों के अनुकूल बनाने के क्रम में उसकी जड़ें ही खोद डाली | व्यवस्था ही रूग्नता का वास्तविक आंकलन भयभीत करने के साथ घनघोर हताशा को जन्म देती है | हालात तुगलकों एवं मुहम्मदशाह रंगीला के दिल्ली तथा वाजिद अली शाह के लखनऊ के समय जैसे हो रहे हैं | उपभोक्तावाद ने जिस मध्यकालीन और सामंतवादी मानसिकता को पैदा करते हुए समाज और व्यवस्था में उसे सर्वव्याप्त करा दिया है, वह हमें किस दिशा में ले जा रहा है, यह एक विचारणीय प्रश्न है | इन कुरीतियों के विरूद्ध समाज एवं व्यवस्था में अपने आप को स्थापित करने के लिए जो भी व्यक्ति अनवरत रूप से संघर्ष कर रहा होता है, उसे विक्षिप्त, अनुपयुक्त या अवपथित जैसे विशेषणों से विभूषित किया जाता है |

इसी विरूपित व्यवस्था के युग में एक श्री एस.एन.सिंह नाम के एस.डी.एम. जो व्यवहारिक प्रचलित एवं सर्वमान्य कार्यशैली से कार्य करने में माहिर कहे जा सकते थे, उस कोठी के नए अध्यासी के रूप में पधारे | कुछ दिनों तक वहां रहने के पश्चात् उन्होंने जिलाधिकारी महोदय को विस्तृत एवं तार्किक रूप से यह सूचना दी कि यह कोठी खतरनाक रूप से जर्जर हो चुकी है और अब मनावोपयोगी नहीं रह गई है | लिहाजा, उन्हें जनपद मुख्यालय पर स्थित एक टाइप फाइव श्रेणी का पदावास आबंटित कर दिया गया | अब उस आलीशान एतिहासिक कोठी के एक कमरे में श्री छोटेलाल नाम एक तहसीलदार रहने लगे, शेष कमरों में धूल की चादर, मकड़े की जाली, चींटियों के अंडे एवं उनके अपशिष्ट के साथ एक विशेष प्रकार की बासी बदबू ने अपना स्थान बनाना प्रारंभ कर दिया | दो में से एक फायर प्लेस का उपयोग लकड़ी जलाकर रोटी सेंकने में होने लगा और दूसरे में कीड़े-मकौडों, गिरगिट से लेकर छुछुंदर तक ने अपना ठिकाना बना लिया | जलावनी लकड़ी की कमी के स्थिति में कभी-कभी उसके पुराने एवं सड़े हुए कड़ी सहतीरों का उपयोग ईंधन के रूप में भी होने लगा, परिणामस्वरूप उसकी छत जगह-जगह धंसने, फर्श टूटने एवं घासफूस और काई फफूंद जहाँ तहां प्रकट होने लगे | यदा कदा एसडीएम साहब भी मुफ्त में गूस्त बाटी  खाने तथा धूम्रपान एवं मदिरा पान करने के प्रयोजन से संध्याकाल इसका उपयोग भी करते थे |

एसडीएम साहब मूल रूप से एक सिविल अभियंता थे और इस सेवा में आने के पूर्व केंद्र सरकार की किसी निर्माण संस्था में कार्यरत रह चुके थे | उनके व्यक्तित्व का एक पहलू यह था कि संभवतः किसी बात का परदा नहीं करते थे | सार्वजिक रूप से बताते कि आज अगर वह उस नौकरी में कार्यरत होते तो प्रतिवर्ष बिना किसी कठिनाई के कितना धनार्जन करते रहते | अगर इस सेवा में सालाना डेढ़ से दो करोड़ नहीं अर्जित कर पाएंगे तो कहीं उनका डाइवोर्स न हो जाए | एक बार उन्हें नगर पालिका का प्रशासक बनाया गया तो रातों-रात उन्होंने भण्डार से बिजली, सफाई एवं जलापूर्ति में प्रयोग होने वाले सामानों को नगर पालिका के एक नावेद नाम भ्रष्ट बताकर जिलाधिकारी से शिकायत कर दी गई | वह अतिभ्रष्ट एवं चतुर लेखपालों के साथ पुराने अखबारों पर रख कर लईया, पकौड़ी खाते हुए दर्शन बघाडते की अधिकारियों को टीम भावना से काम करना चाहिए | ऊंच-नीच का भेद-भाव ठीक नहीं, फिर बदले में उनसे हाजमा दुरूस्त करे का चूरन, साग-सब्जी, फल-मेवा, मांस-मछली से लेकर शराब, सिगरेट एवं माचिस की डिब्बी के साथ सोडा और मिनरल वाटर तक मंगवाते | अपनी अधिकारिता से परे नगरपालिका, मंडी परिषद, जल निगम, वन निगम और परिवहन निगम के कार्यों में भी घुसपैठ करने की चेष्टा करते | अपने कार्यक्षेत्र में उन्होंने नकली पेट्रोलियम पदार्थ बनाने वालों, अवैध रूप से मत्स्य आखेट करने वालों, वन उत्पाद, पशुधन तस्करों तथा तमाम प्रकार के आर्थिक अपराधियों को अभयदान दे रखा था | वकील, पत्रकार और सूचना अधिकार कार्यकर्ता सहित आदतन शिकायतकर्ताओं को उन्होंने अपना दलाल बनाने में निपुणता के साथ सफलता प्राप्त कर ली थी | हाथ से बनाए गए खतौनी, दाखिल ख़ारिज, हैसियत प्रमाण पत्रों की संख्या के अनुसार पैसा वसूलने और बिना कोई लाभ लिए न्यायिक फैसला नहीं देना उनकी पहचान थी | यही नहीं मृत्यु प्रमाण पत्र तक निर्गत करने की अनुमति देने की स्थिति में भी वह आवेदकों से कहा करते “तुम्हारा भाई या बाप कोई हमसे पूछकर तो मरा नहीं, जो व्यवस्था है, वैसे ही काम होगा नहीं तो मत करे तो तुम भी कहीं जाकर मर जाओ” | फिर निर्लज्जतापूर्वक अपने एक सीनियर को याद करते हुए कहते “मेरे गुरू, जो अभी ए.डी.एम. हैं, कहते थे किसी से भी पांच हजार से कम नहीं मांगो, कम से कम साला एक बीड़ी पिलाकर भी तो जाएगा” | घूस का पैसा पॉकेट में डालते हुए नुकसान हो रहा है, का जुमला वह आदतन बोला करते | चौक-चौराहों की चर्चा में लोग उन्हें “सेठ जी” उपनाम से याद आते | कर्मचारी चातुर्य के दृष्टान्त के रूप में प्रचलित एक घटना जिसे ‘चौतीस रूपए काण्ड’ के नाम से कर्मचारी हलके में जाना जाता था, उसके सहनायक एस.डी.एम. साहब ही थे | हुआ यूं था कि एक दिन किसी कारणवश उनकी बोहनी तक नहीं हुई, तो वह तमतमाकर करीब तीन बजे दिन में अपने लाव-लश्कर के साथ शिकार करने के उद्देश्य से निकल पडे, शिकार के रूप में उन्हें एक दुर्भाग्यशाली सरकारी राशन के दुकानदार की दुकान खुली हुई नजर आई | छापा मारा गया और उनके अर्दली विशम्भर ने कोटेदार के पूरे गल्ले को लूट लिया जिसमें उसे मात्र दो सौ चौतीस रूपए हाथ लगे, जिसमें से चौंतीस रूपए साहब को और शेष अपने पास रखते हुए उसने बताया कि “बस चौंतीस रूपए ही मिला” इसी को चौंतीस रूपए कांड कहा जाता था |

कभी-कभी उनके लिए पूर्णतः निष्प्रयोज्य राजकीय व्यवस्था जिसे तहसील दिवस कहते हैं,के अवसर पर वह एकांत में अपनी व्यथा को आह भरते हुए अन्य अधिकारियों से इस प्रकार से व्यक्त करते “अब देखिए यह पी.डी.एस. (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) भी अगर हमारे क्लच से बाहर निकल गया, तो समझिए हम भूंजे के लिए भी मंहगे ही जाएंगे, रह क्या जाएगा महाराज इस नौकरी में, समझ लीजिए एक एस.डी.एम. पूरा जिला चला लेगा | उनकी इस बात का समर्थन अतुल सिंह नाम का उनका एक मित्र जो वाणिज्य कर विभाग का अधिकारी था, अपना दुःख भी अपने बांगडू अंदाज में निर्लज्जता के साथ खांटी भोजपुरी में माँ-बहन की गालियों के साथ राज्य एवं केंद्र सरकार के नितिकारों को देते हुए कुछ यूं व्यक्त करता, “भाई साब, अगर व्येपारी चोरी ना करी, त ही का हमन के, सब सुधरवा हमनिए के जमाना में लगावे के रहे इ हरमियन के, के माँ………की……….., ए सब के त पकड़-पकड़ के लातियावे के चाहीं” |

वह अपने बंगारूपन, भ्रष्ट आचरण एवं निर्लज्जता को अपनी मौलिकता बताता था | खैर एस.डी.एम. साहब उसके बड़े भाई होने के नाते सभी क्षेत्रों में उसके श्रेष्ट रहने के स्वाभाविक प्रवृत्ति से संक्रमित थे | अपने लक्ष्यों को यथाशीघ्र प्राप्त करने के उद्देश्य से, उन्होंने इसमें सबसे बड़े बाधक, ‘संकोच’ नामक शब्द को अपने शब्दकोश से सदैव के लिए निकाल कर अपने व्यक्तित्व को नैसर्गिक रूप से डीठ, निर्लज्ज एवं अतिभ्रष्ट के रूप में प्रक्षेपित होने दिया था |

इसी बीच पश्चिम बंगाल में उत्पन्न होकर ‘हुद-हुद’ नाम आंधी-पानी अचानक ही उत्तर प्रदेश के कुशीनगर क्षेत्र में अपने पूरे वेग के साथ रात्रिकाल में पहुँच गई | सर्वत्र अभूतपूर्व तबाही मची और उस प्राकृतिक आपदा के वेग को कोठी में लगे वे सत्तर-सत्तर वर्ष पुराने एवं क्षमतावान सागवान के वृक्ष भी झेल पाने में अंशतः विफल रहे | परन्तु कोठी का भवन ‘रॉक ऑफ जिब्राल्टर’ की भांति अक्षुण्ण रहा | कोठी परिसर में आंधी के पश्चात् अगले दिन पहुँच कर कमला अपने कातर आँखों से रूआंसा होकर इस विपदा का आंकलन करते हुए रह-रह कर अपना सर धुनता हुआ इधर-उधर घूम रहा था | एस.डी.एम. साहब ने तहकीकातन पुछा, “यह बुढ्ढा कौन है ? विशम्भर अर्दली ने सूचना दी, “साहब ये पुराने माली हैं, इन्होंने ही ये पेड़ लगाए थे |”

विस्मित और रोषपूर्ण लहजे में एस.डी.एम. साहब ने आदेश दिया “पुराना माली ! रिटायर हो गया है तो क्या मराने कोठी पर पहुँच जाता है | बैठ कर राम-नाम जपे, ये स्साला फिर यहाँ कभी नजर नहीं आना चाहिए, किसी आवंछित तत्व का कोठी में प्रवेश निषेध है, कोई मंदिर, मस्जिद नहीं है ये कि कोई भी घुसा चला आए, समझे……..ध्यान रखना” | फिर उन्होंने लाख-लाख रूपए के ऊपर पूर्वानुमानित मूल्य के उन वृक्षों को वन विभाग के रेंजर को बुलवाकर पूर्ण रूप से भग्न, क्षत-विक्षत एवं अकाष्ठ श्रेणी का प्रमाणित कराते हुए एक रिपोर्ट प्राप्त करके अलाव की लकड़ी योग्य घोषित कर दिया | अवैध आरा मशीन संचालकों को बुलवाकर उनसे लाखों रूपए में सौदा कर उन्हें बेच डाला गया, कुछ को अपने निर्माणाधीन बंगलेएवं पिता द्वारा संचालित विद्यालयों में इमारती कार्य एवं फर्नीचर बनाने के प्रयोजन से ट्रक में लदवाकर ब्रह्मबेला की शुभ मूहुर्त में ही पहुंचवा दिया | प्राकृतिक आपदा की असामान्य स्थिति को स्वीकार करते हुए कमला ने अपने मन को समझा लिया | पर एस.डी.एम. साहब ने प्राकृतिक आपदा का लाभ लेने के पश्चात कोठी में स्थित संभावनाओं को संसाधन बनाकर लाभ लेने का सूत्र पकड़ लिया, जिसमें सर्वप्रथम, उन्होंने पुरानी साखू की लकड़ियाँ को कोठी की छत को करीब सौ वर्षों से सहारा दे रही थीं, धीरे-धीरे निकलवाकर आरा-मशीन मालिकों को बेचना शुरू किया, फिर उस छत को नगर पालिका के जे.सी.बी. मशीनों की सहायता से तोड़ डाला गया | परिणामस्वरूप कुछ ही दिनों में कोठी एक खंडहर के रूप में परिवर्तित हो गई | उसके बाद आपदा की स्थिति में भी अपने बजट को बचाए रखने में सक्षम  सागवान के वृक्षों को जड़ सहित ढाह और आगे से कटवा-कटवा कर तीन-चार की संख्या में प्रति सप्ताह की गति से बेचा जाने लगा | अब कोठी की हरा-भरा परिसर भी बियावान बनने की दिशा में बढ़ने लगा |

परन्तु निपुणता तथा प्रबंधन के तमाम कौशल कभी-कभी बेकार चले जाते हैं | कुछ पुराने आदर्शवादी पत्रकारों तथा तिब्बती बौद्ध मठ के प्रबंधक ने जिलाधिकारी श्री नाम्बियल साहब को सबूत सहित यह सूचना पहुंचा दी | एक दिन तहसील भ्रमण के क्रम में उन्होंने उस कोठी का भी औचक निरीक्षण करते हुए उसकी दयनीय स्थिति को दृष्टिगत करते हुए अपर जिलाधिकारी से जांच कर तीन दिवसों के अन्दर अपनी आख्या प्रेषित करने का आदेश निर्गत कर दिया | एस.डी.एम. साहब अब एक की जगह तीन डिब्बी किंग साइज सिगरेट धूक कर अपना तनाव दूर करने का प्रयास करने लगे | ए.डी.एम. सहित लोकसेवकों के मध्य सभी सूत्रों को टटोलने के बाद भी उन्हें बस एक ही उत्तर मिला कि दूसरा कोई होता तो कुछ भी हो सकता था, पर यह नाम्बियाल तो किताबी किस्म का ईमानदार है, संभव नहीं | फिर एक कच्ची शराब बनाकर बेचने वाले, उनके एक चेले ने स्थानीय सत्ताधारी दल के विधायक के शरण में चलने की सलाह दी | अपने तमाम दलालों की फ़ौज एवं इलाके भर के अवैध कारोबारियों के गाड़ियों के काफिले के साथ उस विधायक के पैत्रिक आवास पर वह रात्रिकाल में पहुँचे | पहुँचने के साथ ही उन्होंने गिडगिडाते हुए उसका पैर पकड़ कर याचना करते हुए कहा ‘विधायक जी, अब आप ही का आशीर्वाद चाहिए, नहीं तो बर्बाद हो जाऊँगा | ‘ जवाब में विधायक ने यथासंभव उनकी माँ, बहन तथा बेटी के साथ मौखिक रूप से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करते हुए पांच लाख रूपए पहुँचाने का दबाब बनाया | इस मांग को निवेश की श्रेणी का मानते हुए उन्होंने घंटे भर के भीतर ही पूरा कर दिया | फिर उस भदेश और पूर्व में एक गुंडे का अधोवस्त साफ़ करने वाले विधायक ने जिलाधिकारी को पहले प्रेमपूर्वक फिर धमकाते हुए कहा कि अगर जांच समाप्त नहीं हुई, तो आपको इस जिला में रहने नहीं दूंगा | फिर आगे जो कहा उसका आशय यह था कि समय खराब चल रहा है अन्यथा तुम्हारे जैसे ‘बहादुर’ नाम के तथाकथित पहाड़ी लोग दरबानी करते रहते और एस.डी.एम. जैसा योग्य व्यक्ति तुम्हारी जगह होता | बहरहाल इस हड़काने का इतना असर अवश्य हुआ कि जांच की गति धीमी कर दी गई |

एक दिन कमला को कोठी के घटनाचक्र की विस्तृत सूचना, एज पुराने पत्रकार ने संयोग से हुए भेंट के कर्म में दी | नब्बे के करीब वह वृद्ध व्यक्ति भागा-भागा आया, पर गेट पर तैनात होमगार्ड ने साहब के पूर्वादेश का पालन करते हुए उसे प्रवेश करने से रोक दिया | उसने कातर आँखों से कोठी परिसर में झांकते हुए कांपते स्वर में लगभग शाप देने की मुद्रा में घोषणा की “देख लेना ब्राउन साहब, सब को सजा देंगे, तड़पोगे…….. तड़पोगे सब, जा रे देशी साहब  सब, अपने तो कुछ कर नहीं सके और जो अंग्रेज साहब बहादुर करके गए, उसे भी नेस्तनाबूद कर दिया, कीड़े-पड़ेंगे, कीड़े……….”|

उपहास उड़ाते हुए होमगार्ड ने भाग जाने की सलाह दी |

कुछ दिनों के पश्चात् बीर बहादुर नाम नेपाली ड्राईवर ने उसे के सूचना दी की भूपलाल साहब विभागीय समीक्षा करने कुशीनगर आ रहे हैं | वह अपने नाती की नौकरी के लिए क्यों नहीं उनसे कहता है, कुछ ना कुछ जुगाड़ लखनऊ में नए पार्कों के माली के पद पर लग सकता है | विभागीय समीक्षा का स्थल कुशीनगर हवाई अड्डे पहुँचा | कुछ देर बाद राज्य सरकार के छोटे हवाई जहाज से भूपलाल साहब उतरे, उनकी आगवानी में मंडलायुक्त, आई.जी., डी.आई.जी. सभी चार जनपदों के जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक समेत बड़ी संख्या में अधिकारी, कर्मचारी, सिपाही, पत्रकार एवं आम जनता भी उपस्थित थीं | वह भी हवाई अड्डे के मुख्य द्वार पर गेंदे की फूलमाला लेकर, नए धोती-कुर्ता एवं फेंटें में हांफते-हांफते अन्य लोगों की तरह भीतर आने का प्रयास करने लगा | किन्तु वहां तैनात सिपाही और दारोगा रह-रह कर उसे धकिया देते एवं विशम्भर अर्दल लगातार जमीन पर लाठी पटक-पटक कर लोगों को भयभीत करता | पर बैठक प्रारंभ होने से पूर्व पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम में बदलाव करते हुए भूपलाल साहब ने मीटिंग हाल के दरवाजे पर खड़े होकर बाहर के दृश्य का अवलोकन कर ही रहे थे कि मुख्य द्वार पर बदहाल कमला दिखा, जिसे पुलिस कर्मी रह-रह कर धकेल रहे थे | उन्होंने एस.पी. को आदेश दिया “उस बूढ़े आदमी को रेस्पेक्ट के साथ अन्दर लेकर आइए | डू यू नो, ही समर्ड येज ऐ गार्डनर ऑफ जॉइंट मजिस्ट्रेट रेजिडेंस सिंस इंगलिस पिरियड लुक हाउ योर पुलिसमेंस आर बिहेविंग विद हीम, गो एंड ब्रींग हीम इमेडियेटली बीद रेस्पेक्ट |”

एस.पी. साहब विद्युत गति से मुख्य द्वार की तरफ चिल्लाते हुए बढ़े और पुलिस वालों को ऐसा करने से रोका, फिर उसका हाथ पकड़कर मीटिंग हाल की तरफ ससम्मान लेकर आए | सारे अधिकारी, पत्रकार, कर्मचारी एवं फरियाद तथा शिकायती नेतागण इस दृश्य को अपलक निहारने लगे | अभिवादन करते हुए उसने भूपलाल साहब को माला पहनाते हुए अपने सजल धंसे हुए आँखों देखते हुए उलाहना दिया “साहब आपको बहुत फोन लगाया, पर उठा नहीं हुजूर को फुर्सत नहीं होगी | साहब हम बहुत दुःख में है, कुछ एल्तजा करनी है |”

भूपलाल साहब ने अपने कान उसके पोपले मुंह की तरफ लगाते हुए कहा “बाबा आप तो कर्मयोगी हो, आपको क्या कष्ट हो गया |”

उसने फुसफुसाकर उनकी कानों में कुछ देर तक कुछ बताया, जिससे भूपलाल साहब का मुखमंडल लाल हो गया | उन्होंने माइक कमला के मुँह के पास ले जा कर रोषपूर्ण शब्दों में कहा “जो आप मुझसे कह रहे हैं, बाबा उसे जोर-जोर से सबों के सामने कहिए……….कहिए बाबा………..|

कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद अंग्रेजी दौर के खालिस उर्दू का प्रयोग करने वाले उस ब्रिटिशराज के समय के कर्मचारी ने अपने लम्बे अनुभव का साथ लेते हुए अधिकारीयों की उस भरी मीटिंग में अपने ध्वनि तंत्र पर सभी इन्द्रियों को केन्द्रित करते हुए शुद्ध हिंदी में बिना लड़खड़ाते अपनी बात कुछ यूँ रखी,

“तमाम वरिष्ठ अधिकारीगण, पत्रकार बंधुओं एवं कर्मचारी साथियों आज मैं विवश होकर आपके समक्ष अपनी व्यथा कहने आया हूं | श्रीमानजी  मैंने श्रीमान् ब्राउन साहब जो सन इकतालिस

में जॉइंट मजिस्ट्रेट थे से लेकर श्रीमान ज्योतिनाथ मुखर्जी साहब एस.डी.एम. के समय सन् उन्नीस सौ सत्तासी तक जॉइंट साहब के बंगले में माली का काम किया, अंग्रेज साहबों ने अगर कुछ बढ़ाया नहीं तो बहुत नाश भी नहीं किया, पर अब कुछ नए साहब लोग आ रहे हैं, जिन्होंने इन्हें बचाना-बढ़ाना तो दूर, नोंच-नोंच कर तबाह कर डाला | जो एस.डी.एम. साहब यहाँ काम कर रहे हैं, उन्होंने उस कोठी को लूट लिया है | उसकी लाकदिम टाइल, ईट, पेड़-पौधे और यहाँ तक कि खिड़की दरवाजे तक नोंच कर या तो बेच दिया या अपने घर ले गए हैं | साहब, हमने अपने बच्चों को की तरह उन हरे-भरे पेड़ों, बाग़-बगीचों की सेवा की है, उसमें हमारा प्राण बसता है साहब, कम से कम जो बचा है उसे तबाह होने रोकिए, त्राहिमाम साहब, त्राहिमाम |”

मंडलायुक्त महोदय ने एक पत्रकार द्वारा मोबाइल से लिए गए फोटो जिसमें एस.डी.एम. पेड़ों को कटवाते हुए नजर आ रहे थे, देखते हुए व्यंगात्मक लहजे में कहा “ऐसा प्रतीत हो रहा है, एस.डी.एम. साहब ब्रिटिश राज के सभी प्रतीकों को समाप्त करने पर आमादा हैं |”

कुछ को छोड़ सभी अधिकारियों के सर शर्म से झुक गए | जिलाधिकारी ने फुसफुसाकर भूपराम साहब को स्थिति स्पष्ट किया |

तदोपरान्त भूपराम साहब ने माइक पर घोषणा की “एस.डी.एम. कसयाँ को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए तात्कालिक प्रभाव से निलंबित करते हुए उनके द्वारा किए गए आपराधिक कृत्यों को दृष्टिगत रखते हुए वाद चलाने के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने की विभागीय अनुमति इस सकारण आदेश द्वारा दी जाती है, साथ ही इनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार एवं गबन की जांच के लिए तीन अलग-अलग जांच कमेटी जो त्रि-स्तरीय होगी गठित की जाए | “दीस पर्सन इज थोरोली करप्ट, फंडामेंटली ए क्रिमिनल एंड टोटली अनएक्सेपटेबल फॉर दी सिस्टम |” फिर मंडलायुक्त और जिलाधिकारी की तरफ देखते हुए बोले “सेम ऑन यू जेंटलमैन आई विल टॉक टू यू लैटर |” एस. डी. एम. कपालभांति योग करने की मुद्रा में पसीने से तरबतर चलते-चलते मीटिंग से बाहर हो गए |

मीटिंग हाल से बाहर निकलकर कमला ने जाते-जाते बाहर खड़े सिपाहियों से कहा “देखा ब्राउन साहब ने फिर से सजा दे दी ना, मैं कहता था, वे किसी को छोड़ेंगे नहीं |”

नई पीढ़ी के सिपाही टुकुर-टुकुर उसका मुँह देखते रहे | नावेद और विशम्भर अर्दली एस.डी.एम. के सरकारी सूमो गाडी में दुबक कर छिप गए | सेवानिवृत्ति के निकट पहुँच रहे वीरबहादुर ड्राईवर के मुखमंडल पर संतोष का भाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा था | वह बोला “माली चचा के ऊपर कभी-कभी ब्राउन साहब का भूत सवार हो जाता है |”

 

 

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