हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘छायावाद’ का समय 1918 से 1936 तक माना जाता है । छायावादी काव्य-भाषा और पल्लव को समझने से पूर्व दरअसल छायावाद को समझना होगा ।
छायावाद को दो अर्थों में समझ सकते हैं । एक तो रहस्यवाद के अर्थ में,जहाँ उसका सम्बन्ध काव्यवस्तु से होता है अर्थात जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार की व्यंजना करता है ।जैसा कि हम महादेवी वर्मा की रचनाओं में पातें हैं । ‘छायावाद’ शब्द का दूसरा प्रयोग काव्यशैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है । फ्रांस में रहस्यवादी कवियों का एक दल खड़ा हुआ जो प्रतीकवाद कहलाया । वे अपनी रचनाओं में अप्रस्तुत प्रतीकों का प्रयोग करते थेइसी कारण वे प्रतीकवादी कहलाने लगे । छायावाद में रहस्यवाद के अलावा इस शैली का प्रयोग देखने को मिलता है । सामान्यतः प्रसाद,पन्त,निराला सभी में ये प्रतिक पद्धति या चित्र भाषा की शैली दिख जाती है ।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मानना है – “चित्रभाषा शैली या प्रतीक पद्धति के अंतर्गत जिस प्रकार वाचक पदों के स्थान पर लक्षक पदों का व्यवहार आता है उसी प्रकार प्रस्तुत स्थान पर उनकी व्यंजना करने वाले अप्रस्तुत चित्रों का विधान भी ।अतः अन्योक्तिपद्धति का अवलम्बन छायावाद का एक विशेष लक्षण हुआ ।छायावाद का चलन द्विवेदीकाल की रूखी इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था ।अतः इस प्रतिक्रिया का प्रदर्शन केवल लक्षण और अन्योक्ति के प्राचुर्य के रूप में ही नही ,कहीं-कहीं उपमा और उत्प्रेक्षा की भरमार के रूप में भी हुआ ।”1
पल्लव की बात करें तो ये सुमित्रानंदन पंत जी की 1918 से 1925 तक की काव्य रचनाओं का संग्रह है ।पन्त जी का ये काव्य संग्रह प्रायः सभी समीक्षकों द्वारा सराहा गया है । छायावाद में जिन बिम्बों व प्रतीकों का चुनाव हुआ,वे सभी गति सूचक हैं, स्वतंत्रता के प्रतीक हैं । पल्लव में पन्त जी की एक कविता ‘बादल’ शीर्षक से संकलित है ।बादल-निर्बन्धता,गति,सृजन आर्द्रता का प्रतीक है। नामवर सिंह का मानना है
“वायु और जल की इतनी सघन उपस्थिति छायावाद में स्वाधीनता की चेतना को संकेतित करती है।”
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मानना है – “पन्त जी की पहली प्रौढ़ रचना “पल्लव” है जिसमे प्रतिभा के उत्साह या साहस का तथा पुरानी काव्य पद्धति के विरुद्ध प्रतिक्रिया का बहुत चढ़ा-बढ़ा प्रदर्शन है । इसमें चित्रमयी भाषा, लाक्षणिक वैचित्र्य, अप्रस्तुत विधान, इत्यादि की विशेषताएँ प्रचुर परिमाण में भरी सी पाई जाती है।”3
1920 से पहले की बात करें तो उस वक़्त नायिका-भेद और अलंकार का प्रभाव कितना गहरा था,इसे ध्यान में रखने पर ही हम मैथिलीशरण गुप्त का ऐतिहासिक महत्व समझ सकते हैं । उनके समय की कविता अधिकतर समाजोन्मुख है । उसका उपयोगितावादी लक्ष्य बहुत स्पष्ट है । उसका भावबोध अक्सर उथला विचार शक्तिक्षीण और भाषा असमर्थ जान पड़ती है पर स्मरणीय है कि जिन अनेक विषयों पर द्विवेदी युगीन कवियों ने रचनाएँ की हैं, उन्हीं पर छायावादियों ने और आगे चलकर प्रगतिवादियों ने भी कविताएँ लिखी है। द्विवेदी युगीन कवियों की शैली ने बहुधा छायावादी,कवियों को प्रभावित किया है । सनेही और मैथिलीशरण गुप्त की झलक बहुत जगह निराला की रचनाओं से मिलती है ।यह शैली अतिशय लाक्षणिकता से पीङित नहीं है,उसमे तत्सम शब्दावली की अधिकता नहीं है, वह कवित्वपूर्ण शब्दों की आवृत्ति नहीं करता ,उसका लक्ष्य पढ़े लिखे लोगों को ही नहीं अशिक्षित लोगों को भी प्रभावित करना है। बहुत सी कविताएँ संस्कृत वृत्रों में लिखी गई इनमें सर्वाधिक सफलता मैथिलीशरण गुप्त को मिली है किंतु उनकी ये रचनाएँ तुकांत व्यंग और हास्य-विनोद की प्रवृति इस युग में थी। उसका भरा पूरा विकास आगे चलकर निराला और प्रगतिवादी कवियों की रचनाओं में दिखाई देता है ।
अर्थात इन बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि पन्त को विरासत के तौर पर भारतेंदु और द्विवेदी युग की परंपरा मिली जो कि खड़ी बोली का एक स्वरूप तैयार कर चुकी थी और उसे स्थापित करने में छायावाद और पन्त के पल्लव का एक बड़ा योगदान रहा है। यह छायावाद एवं पन्त की ही देन है कि खड़ी बोली में कोमल भावों को प्रस्तुत करने की चुनौती को स्वीकार किया ।इस बात की सराहना-अज्ञेय जैसे लेखक भी करते हैं और कहते हैं – “अपने नए कथ्य के अनुरूप नयी भाषा की तलाश छायावादी कवियों के सामने एक ऐतिहासिक चुनौती थी और इस चुनौती का सामना छायावादी कवियों ने साहस के साथ किया ।”3
सुमित्रानंदन पंत के काव्य के विकास एवं पल्लव जैसी रचना के पल्लवित होने जे सन्दर्भ में डॉ बच्चन सिंह कहते हैं –“सुमित्रानंदन पंत का काव्य विकास अंतर्मुखता से निरंतर बहिर्मुख होने का इतिहास है जिस प्राकृतिक परिवेश में उनका जन्म और पालन पोषण हुआ वह स्वयं कविता से कम आकर्षक और लुभावना नही है ।उनकी जन्मभूमि कौसानी ने उनके मन में सौंदर्य और प्रेम का जो बीजवपन किया वह समय पाकर ‘पल्लव’ के रूप में पल्लवित हुआ।”4
सुमित्रानंदन पन्त जी भाषा एवं भाव के सामंजस्य और स्वरैक्य के द्वारा ध्वनि चित्रण करने में भी परम् पटु हैं ।इसके लिए उन्होंने स्वर और व्यंजनों को बड़ी सूक्ष्म परीक्षा के बाद चुना है ध्वनि चित्रण में तो व्यजंनों का ही प्राधान्य रहता है,परन्तु जहाँ भावना की अभिव्यक्ति अथवा गति आदि की तस्वीर खींचनी होती है वहाँ पन्त जी स्वरों पर ही अधिक निर्भर रहते हैं ।इसका कारण यह है कि काव्य-संगीत के मूल-तन्तु स्वर है न की व्यंजन और भावना का रूप स्वरों के समिश्रण एवं उनकी यथोचित मैत्री पर ही निर्भर रहता है ।
पल्लव के विषय में इंद्रनाथ मदान का मानना है – पल्लव में कवि की प्रतिभा का प्रौढ़ विकास है ।पल्लव में कीट्स वद्रवर्थ और टेनिसन जैसे कवियों की लाक्षणिकता,सांकेतिकता और प्रतीकात्मकता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है ।इसमें प्रकृति और सौंदर्य की भावना का चरम विकास है ,जो कला के आवरण में और भी खिल उठा है । और इनकी भाषा चित्रात्मकता,लाक्षणिकता सांकेतिकता के साथ-साथ अन्य गुणों से युक्त है जो इसे उत्कृष्ट बनाता है ।5
अगर गौर से देखा जाये तो पता लगेगा छायावाद के अभिव्यंजना शिल्प का एक विशिष्ट गुण है चित्रात्मक व्यंजना ।इस वर्ग के कवियों ने भावों की अमूर्तता और सूक्ष्मता को चित्रमय रूप प्रदान करके उन्हें मांस पटल पर अंकित कर अपने काव्य को प्रभावशाली बनाया ।स्वयं पन्त ने पल्लव के प्रवेश के अंतर्गत कहा है – “कविता के लिए चित्रभाषा की आवश्यकता पड़ती है,उसके शब्द सस्वर होने चाहिए,जो बोलते हों,सेब की तरह जिनके रस की मधुर लालिमा …..जो झंकार में चित्र,चित्र में झंकार हो । 6
पंत जी का चित्र-विधान पूर्ववर्ती हिंदी कविता की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण भाव,प्रकृति,नारी के रस,गन्ध स्पर्श तथा गति आदि से समन्वित अनेक चित्र उनके काव्य में सजग रहे हैं –

“आज पल्लवित हुई है डाल
झुकेगा कल गुंजित मधुमास
मुग्ध होंगे मधु से मधुबाल
सुरभि से अस्थिर मृताकाश |”

पल्लव में कवि प्रकृति के अमूर्त उपमानों का उपस्थित करने में भी सिद्धस्त हैं।अपनी कल्पना के बल पर पन्त जी ने ऐसे अनेक चित्र खीचें हैं –

“कहो कौन हो दमयंती सी
तुम तरु के नीचे सोई?
हाय ! तुम्हे भी त्याग गया क्या
अलि नल सा निष्ठुर कोई ।“7

यहाँ अमूर्त छाया का मानवीकरण है । नल द्वारा परित्यक्त दुःखी दमयंती का चित्र हमारे सामने उपस्थित हो जाता है ।
छायावादी काव्य शैली लाक्षणिक अर्थ पर महत्व देकर चलती है ।जब वाच्यार्थ से कविता का मुख्यार्थ प्रकट नहीं होता तभीलक्षणा शक्ति का आश्रय लिया जाता है ।पन्त काव्य में लक्षणा के विविध प्रकारों का प्रयोग मिलता है।
आज बचपन का कोमलगात
जरा का पीला पात
पल्लव में पन्त ने चित्रभाषा व लाक्षणिकता का भरपूर प्रयोग किया है । इसलिए आचार्य शुक्ल ने भी लिखा है – “चित्रयमयी लाक्षणिक भाषा तथा रूपक आदि का भी बहुत सफल प्रयोग इस रचना के भीतर हुआ है।” 8
छायावादी काव्य-भाषा का स्रोत संस्कृत है । पल्लव में भी पन्त जी ने अधिकांशतः संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक किया है । जैसे -द्रुम, अबा, इंद्रधनुष, लोचन, स्वप्न, जननी, रश्मि, श्वास, सृष्टि, पुलक, निराकार, साकार शब्दों का प्रयोग किया है ।
स्वर सन्धि के आधार पर तत्सम शब्दों को विशाल आकार प्रदान करके भी पन्त जी ने उसमे नवीन अर्थ शक्ति भर दी है ।
जैसे – सघन मेघों का भीमाकाश
गरजना है तब तमसाकार
इसमें भीमाकाश,तमसाकार आदि में सघन मेघों से आच्छादित आकाश की विकरालता को व्यंजित किया गया है। कवि प्रतीकों द्वारा भावनाओं की सशक्त व्यंजना करने में असमर्थ हो जाते हैं,उस समय रचनाकार प्रतीकों के माध्यम से ऐसे चित्र निर्मित करता है,जो उसकी भावनाओं को व्यक्त करने में सक्षम होते हैं।
अर्थात प्रतीक प्रस्तुत के आधार पर अप्रस्तुत का विधान होता है,पर प्रस्तुत अर्थ उसमे व्यंजित होता है । छायावाद ने नए प्रतीकों की सृष्टि की अर्थात पूर्व परिचित वस्तुओं में नवीन अर्थवत्ता भर दी ।
पन्त जी मूलतः सौदर्यवादी होने के कारण उनकी दृष्टि प्रकृति से प्रतीकों का चयन करती है ।पल्लव में पन्त ने अभ्यांतर प्रभाव साम्य के आधार पर लाक्षणिक पद्धति का प्रयोग किया ।

तुम्हारे छूने में थे प्राण
संग में पवन गंगा स्नान
तुम्हारी वाणी में कल्याणी
त्रिवेणी की लहरों का गान ।
अपरिचित चितवन में था प्रा
सुधामय साँसों में उपचारा

इसमें गंगा स्नान सात्विक पवित्रता,त्रिवेणी की लहरों का गान माधुर्य,प्रातः उज्वलता तथा उपचार क्लेश निवारक सुखद,शीतल स्पर्श का प्रतीक है। इसी तरह पन्त ने कई बार भावों की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकों का सहारा लिया है ।
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि ‘पल्लव’ छायावाद के अनुभूति एवं अभिव्यक्ति की सभी विशेषताएँ मिल जाती है। इस कृति के प्रवेश में कवि ने बहिरंग-पक्ष पर विस्तृत विवेचन के साथ-साथ ब्रजभाषा एवं खड़ी बोली की प्रतिद्वंद्विता का अंत किया इसके साथ-साथ कवि ने हिंदी के ब्रजभाषा-काव्य की उपलब्धियों और कमियों पर विचार किया है ,साथ ही हिंदी कविता की प्रकृति पर भी अमूल्य मंतव्य प्रकट किया है । शायद इसीलिए शायद इसे छायावाद का (manifesto) खा जाता है। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने पल्लव और पन्त के बारे में सच ही कहा है कि – “छायावाद की पहली पहचान बनाने वाले कवि सुमित्रानंदन पंत हैं।”9

 

सन्दर्भ ग्रन्थ :
1: हिंदी साहित्य का इतिहास -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,पृष्ठ -362 नागरी प्रचारिणी सभा (वाराणसी)
2: छायावाद -नामवर सिंह,पृष्ठ -36 राजकमल प्रकाशन
3: हिंदी साहित्य का इतिहास -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ -364 नागरी प्रचारिणी सभा (वाराणसी)
4: आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास -डॉ बच्चन सिंह पृष्ठ 207
5: सुमित्रानंदन पंत : मूल्यांकन- इंद्रनाथ मदान पृष्ठ -231
6: पल्लव : सुमित्रानंदन पंत :छाया पृष्ठ -30
7: पल्लव : सुमित्रानंदन पंत :छाया पृष्ठ -101
8: हिंदी साहित्य का इतिहास -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ,पृष्ठ -368
9: हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास – रामस्वरूप चतुर्वेदी ,पृष्ठ -231

आशीष जायसवाल
शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय

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