मूल कविता श्रीमती लीना पाणी
 हे गांधारी  ! तुमने अपनी आँखों में पट्टी बाँधते समय उचित अनुचित नहीं सोचा था,
 अपने स्वामी के साथ खड़े होकर तुम दुनिया के सम्मुख दृष्टांत बन गई थीं,
जब अपने पति की विवशता देखकर भाव विगलित होकर तुमने यह निर्णय लिया था।
तुम्हारा सुकोमल नारी हृदय निश्चित ही बहुत उद्विग्न हुआ होगा,
द्रौपदी के असह्य अपमान ने तुम्हें अवश्य ही आंदोलिन किया होगा,
 उस दिन तुमने स्वयं को बहुत धिक्कारा भी होगा,
 आँख पर पट्टी बांधना कितनी बड़ी भूल था स्वीकारा भी होगा।
 तुम वीरांगना थीं काश धृतराष्ट्र की मात्र संगिनी नहीं सारथि बनी होतीं ,
 उनका अनुगमन करने की बजाय उनकी पथप्रदर्शक बनी होतीं,
 गांधारी तुमने आँखें होकर भी देखा नहीं,
नियति के खूबसूरत उपहार इन  आँखों के महत्व को  तुमने स्वीकारा नहीं ,
पुत्र प्रेम में तूम इतनी विवश हो गईं कि हित – अहित ,उचित – अनुचित तुमने सोचा  तक नहीं ,
हर स्त्री  आज यही कहती है गांधारी  ! तुमने पट्टी बाँधकर सही नहीं किया ,
आँखे होते हुए भी तुमने क्यों देखा  नहीं ।
भाषांतरण
प्रो. माला मिश्र
दिल्ली  विश्वविद्यालय

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