मेहरून्निसा परवेज हिंदी की चर्चित कथाकार है। सातवें दशक से ही वह निरंतर साहित्य-सृजन की प्रक्रिया से जुड़ी हुई है। हाशिये का समाज उनकी रचनाओं के केंद्र में रहा है। उनका समस्त साहित्य आँखों देखा- परखा और अनुभव किया हुआ है। वह बिना लाग- लपेट के, कल्पना और आदर्श से परे यथार्थ को अधिक महत्त्व देती है। उनके साहित्य में समाज का यथार्थ चित्रण ही अधिक हुआ है। उनकी हर रचना मानव जीवन और मानव समाज का कोई न कोई यथार्थ अवश्य उद्धाटित करती है। कथाकर होने के अलावा उन्होंने आदिवासियों और विशेषकर स्त्रियों के अधिकारो, उनकी अस्मिता- सुरक्षा की लड़ाई में जमीनी स्तर पर बहुत महत्त्वपूर्ण काम भी किया है।

                                   “कोरजा” मेहरून्निसा परवेज का तीसरा उपन्यास है। जो सन् 1977 में प्रकाशित हुआ। इससे पहले उनके दो उपन्यास “आँखों की दहलीज”, सन् 1969 में और “उसका घर”, सन् 1972 में प्रकाशित हो चुके थे। दोनों उपन्यास स्त्री जीवन पर केंद्रीत है। “आँखों की दहलीज” में मुस्लिम समाज और संस्कृति और “उसका घर” में इसाई समाज और संस्कृति का सजीव चित्रण हुआ है। लेखिका दोनों ही समाज की प्रमाणिक जानकारी रखती है। “कोरजा” में उन्होंने बस्तर के “हाशिये के लोगों”, जिसमें मुस्लिम समाज की स्त्रियों के दुख-दर्द और संघर्ष को वाणी दी है। साथ ही आदिवासी जन- जीवन का भी यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। मेहरून्निसा परवेज ने प्रस्तुत उपन्यास में बस्तर के इतिहास पर भी प्रकाश डाला है। यही विशेषता है “कोरजा” उपन्यास की इसलिए उन्हें “कोरजा” के लिए सन् 1980 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा महाराजा वीरसिंह देव पुरस्कार और सन् 1980 में ही उत्तरप्रदेश शासन, उत्तर प्रदेश, लखनऊ द्वारा पुरस्कार सम्मान मिला।

                                    उपन्यास का आरम्भ रब्बो की शादी से होता है। जहाँ नसीमा भी आती है। रब्बो आपा उसे अपनी बेटी रन्नों से मिलवाती है, तो नसीमा को ऐसे लगता है जैसे रब्बो आपा एक बार फिर जवान होकर उसके समाने खड़ी हो गयी है। लेखिका ने मुस्लिम समाज में शादी की रस्मों- रिवाजों तथा वहाँ के वातावरण का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है। रब्बो आपा नसीमा को बताती है कि, “रन्नो की पसंद है। दोनों एक- दूसरे को पसंद करते हैं। अब पहले सा वक्त तो रहा नहीं नसीमा, जब प्यार को घरवालों से छिपाकर करना पड़ता था, जबान से निकलता तक नहीं था कि हम फलाँ से प्यार करते हैं। जहाँ माँ- बाप ने रिश्ता तै कर कर दिया, बस वहीं चले आए‌‌…… वक्त बदल गया है नसीमा, उसके साथ‌-साथ सब बदल गया है।”1 यहाँ लेखिका ने समाज की दो पीढ़ियों के अन्तर को चित्रित किया है। पहली पीढ़ी का समाज, सामाजिक बंधन, पुरानी परम्पराओं और रूढ़ियों से ग्रस्त था जिसमें स्त्री सदियों से शोषित होती आ रही थी। ऐसे समाज में एक प्रेमी‌- प्रेमिका का प्रेम कभी विवाह में परिणत नहीं हो पाता था। लेकिन उसके बाद की पीढ़ी के लिए पहले जितने सामाजिक बंधन नहीं रह गए। इसलिए आज एक- दूसरे से प्यार करने पर लड़के- लड़कियाँ अपने माता- पिता के समर्थन से प्रेम विवाह कर लेते हैं।। शादी के समय नसीमा को यह भी पता चलता है कि रन्नो माँ बनने वाली है। नसीमा जब यह सुनती है, तो उसे न जाने क्यों पुरानी बातें याद आने लगती है। यही से लेखिका ने पूर्व- दीप्ति शैली का प्रयोग करती हुई कहानी को आगे बढ़ाती है।

                                      हमारे समाज में सदियों से स्त्रियाँ शोषित और प्रताड़ित होती रही है। उन्हें द्वितीय स्तर का प्राणी समझा जाता रहा है। आज भी हमारे पितृसत्तात्मक समाज में पुरूष के लिए स्त्री केवल भोग की वस्तु ही समझी जाती है। स्त्रियों की इन तमाम स्थितिओं को मेहरून्निसा परवेज ने उपन्यास में चित्रित किया है। उपन्यास स्त्री जीवन पर आधारित है इसलिए उसका आरम्भ अरमान बी के अतीत से होता है। जहाँ वह अपने ऐयाशी और शराबी पति रहमान खाँ से आए दिन तंग रहा करती थी। उनके पति रहमान खाँ को लोग समझाते तो वह कहते, “अरे खुद कुरान- शरीफ में खुदा ने फरमाया है कि मैंने तुम्हारे लिए औरत पैदा की है, ऐश करने के लिए और खाने के लिए परिन्दे। भई, जैसी एक ही कमीज तीन दिन पहनों तो बदन काटने दौड़ता है, वैसे ही एक औरत के साथ कुछ दिन रह लो तो साला मुहँ का मजा खराब हो जाता है।”2 यहाँ लेखिका ने मुस्लिम समाज में स्त्री की दशा का बड़ा ही कटु किन्तु यथार्थ वर्णन प्रस्तुत किया है। इसके आगे लेखिका रहमान खाँ के द्वारा सेक्स का एक अनोखा सत्य प्रस्तुत करती है। रहमान खाँ जैसा ऐयाशी और शराबी पिता जवान बेटी को देखते ही पुरूष में तब्दील हो जाता है। अरमान बी की नजरे अपने पति की इस तब्दीली को पहचान जाती है और पति के विरोध के बावजूद अपनी बेटी फातमा की शादी कर देती है। फातमा की एक बेटी नसीमा है और एक बेटा था जो इलाज के अभाव में मर जाता है। फातमा और उसके पति में आए दिन पैसों को लेकर झगड़े होते रहते है और बात तलाक तक भी पहुँच जाती है। पति घर छोड़ कर चला जाता है। इस हादसे से फातमा पागल हो कर कुछ दिनों में चल बसती है। फातमा की बेटी नसीमा को अपनी नानी यानी अरमान बी के यहाँ जगदलपुर में रहने के लिए आना पड़ता है। लेखिका यहाँ मुस्लिम समाज में तलाक की प्रक्रिया कितनी आसान है इस पर विचार किया है। हमारे यहाँ भारत में एकमात्र मुस्लिम निजी कानून ही है जिसमें बहुविवाह को मान्यता प्राप्त है तो वही तलाक की पद्धति भी बहुत आसान है जो पुरूषों के पक्ष में है क्योंकि आर्थिक परावलम्बन स्त्री को तलाक जैसे निर्णय लेने नहीं देता और अगर ले भी लिया तो पुरूष के गुनाह साबित होने पर उसे मेहर सहित सभी अधिकारों से वंचित होना पड़ता है। हर तरफ से स्त्री को ही नुकसान झेलना पड़ रहा है। भारतीय मुस्लिम स्त्रियों को भी इन तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

                                नसीमा के आने से पहले अरमान बी के पास साजो खाला और उनके तीन बेटे तथा रब्बो आपा रहती है। साजो खाला और रब्बो आपा दोनों के अपने-अपने अतीत है। रब्बो आपा का अतीत बहुत भयानक है। जहाँ उन्हें बड़ी ही दु:खद स्थिति में रहना पड़ता था। चारामा जैसे छोटे से गाँव में वह अपनी सौतेली माँ के साथ रहने के लिए विवश थी। अपने पिता के मृत्यु के बाद रब्बो पर उसकी सौतेली माँ बहुत जुल्म ढाती थी। रब्बो की सौतेली माँ के दूर के रिश्ते का छोटा भाई जमशेद इनके यहाँ छुट्टियाँ बिताने आता है। यही जमशेद छोटी उम्र की रब्बो और उसकी सौतेली माँ दोनों के साथ रिश्ता बनाता है। कुछ दिन बाद रब्बो गर्भवती हो जाती है। माँ को पता चलने पर वह उसे खूब मारती है। उसे एक ऐसी गलती की सजा मिलती है जिसे उसने किया ही नहीं है। गलती पुरूष करे और उस गलती की सजा हमारे समाज में स्त्रियों को ही भोगनी पड़ती है। रब्बो आपा के साथ भी यही होता है। इसी बीच साजो खाला के पति आकार रब्बो आपा को अपने साथ ले आते है और तब से रब्बो आपा नानी के घर में रह रही है। साजो खाला अरमान बी की बेटी है। उनकी शादी जिस पुरूष से होती है वह आलसी किस्म के निकलते है। अपनी ही सास के घर में रहते है। कर्जा ले ले कर वह अपने शौक पूरे करते है। वह बिमारी से मर जाते है लेकिन नानी का मुनीम जुम्मन खाँ मौके का फायदा उठाकर खेत- मकान सब अपने पास रेहन रख लेता है। इस प्रकार साजो खाला और उनके तीनो लड़के भी नानी के ही घर पर रहते है। अत: लेखिका ने अरमान बी की जिंदगी के साथ साजो खाला और उनके तीन बेटे, रब्बो आपा और नसीमा की जिंदगी किस प्रकार से जुड़ती चली जाती है, का सजीव चित्रण किया है। लेखिका की यह विशेषता है कि प्रस्तुत उपन्यास में प्रत्येक स्त्री पात्र के अतीत की कहानी कहने के बाद वह सभी स्त्री पात्र को एक ही छत के नीचे खड़ा करती है। हर स्त्री पात्र अपने अतीत से किसी न किसी प्रकार शोषित हुई है उसके बावजूद इस दुनिया में अपनी जिंदगी जीने के लिये संघर्षरत है।

                                 भारतीय समाज की तरह मुस्लिम समाज में भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। लेकिन लेखिका ने नानी के घर में पुरूष सत्ता के स्थान पर स्त्री सत्ता को स्थापित किया है। नानी ही घर की मुखिया है। नानी के घर की आर्थिक स्थिति बड़ी गम्भीर है। जिस घर में पुरूष नहीं हो और स्त्रियाँ अशिक्षित हो या कम पढ़ी- लिखी हो, वहाँ परिवार को आर्थिक समस्याओं से जूझना पड़ता है। नानी के घर में भी गरीबी और दरिद्रता धरना दिये बैठी रहती है। इस निम्न वर्गीय परिवार में बड़े से लेकर बच्चे तक अर्थापार्जन की चिंता में लगे रहते है जिससे दो वक्त का खाना सब को नसीब हो। उपन्यास में साजो खाला के तीनो बेटे रफीक, शफीक और मुन्नु बचपन से ही घर की जरूरत को जानकर धन कमाने के उपाय ढूँढने लगते है। तीनों बच्चे सड़कों से गोबर उठाते और साल भर जमा करते है। उसके बाद खाद बन जाने पर उसे बेचते है। इन सब बच्चों की लगन और उत्साह को देखकर उनकी नानी हैरान हो जाती है- “इतनी छोटी सी उम्र में पैसे पैदा करने की सोच इन बच्चों पर आ खड़ी थी। क्या अब और आगे जमाने में माँ के पेट से बच्चा निकलते ही अपने पेट के लिए कमाने निकल पड़ेगा।”3 लेखिका नानी के माध्यम से यह अभिव्यक्त करती है कि आज व्यक्ति के जीवन के लिए अर्थ अनिवार्य हिस्सा बन गया है। अर्थ के अभाव की पहचान के कारण बच्चे बचपन में ही समझदार हो कर कमाने के लिए संघर्षरत है।

                                   नानी का घर मुनीम जुम्मन खाँ के पास रेहन है जिसे वह खाली करने को बोलता है और खाली न करने के लिए एक सौदा भी करता है कि यदि रोज रात साजो खाला उसके यहाँ आयेगी तो यह घर वापिस नहीं लेगा और न किराया ही लेगा। लेखिका ने यहाँ बड़ा ही यथार्थवादी वर्णन किया है-“ रात का खाना खाने के बाद तक भी कोई तय नहीं कर पाया था कि घर छोड़ना है या नहीं। जब पूरा घर गहरी नींद सो रहा था तब नानी ने देखा एक साया उठकर बाहर जा रहा है। पहले तो वह अवाक् हतप्रभ होकर रह गई, फिर धीरे- धीरे सिर झुक गया। मौन समझौता, मौन स्वीकृति।”4 नानी सब कुछ जानते हुए भी कुछ करने में असमर्थ थी। लेकिन यह सौदा साजो खाला ने मौन रूप में स्वीकार था अपने घर को, अपने परिवार की इज्जत को बचाये रखने के लिए साजो खाला ने अपने शरीर को बेच डाला। आज भी  भारत में कई जगहें ऐसी है जहाँ स्त्री अपने शरीर को बेचकर अपने घर परिवार का भरण-पोषण कर रही है। इस प्रसंग में लेखिका पूरी व्यवस्था पर एक प्रश्न उठाती है कि आज भले ही स्त्रियों की सुरक्षा- स्वास्थ्य, उनके अधिकारों के लिए तमाम संस्था और संगठन कार्यरत है लेकिन हाशिये पर स्थित स्त्रियों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है।

                                      “कोरजा” उपन्यास में मेहरून्निसा परवेज पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता है कि उन्होंने केवल मुस्लिम समाज की स्त्रियों के जीवन और उनके संघर्ष को अभिव्यक्त किया है। बल्कि लेखिका ने मुख्यकथा के साथ साथ अमित और मोना दी कि कहानी भी कही है जोकि हिंदू पात्र है। अमित कि बड़ी बहन मोना दी है जो उपन्यास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। अमित की कमजोरी है कि वह शराबी है। जिस कारण मोना दी अपने सारे सुखों का दामन लपेटकर, इस परिवार के लिए दिन-रात अपने आपको झोंक देती है। कम्मो रब्बो आपा की सहेली है जो अमित से प्रेम करती है। कम्मो पढ़ी- लिखी नौकरी करनेवाली स्त्री है। लेखिका ने अमित और कम्मो के माध्यम से बौद्धिक बहस को भी उपन्यास का हिस्सा बनाया है। यहाँ लेखिका प्रेमचन्द से प्रभावित दिखती है क्योंकि इस तरह के पात्र- निर्माण में प्रेमचंद हस्तसिद्ध थे। जिस तरह “गोदान” में मालती और मेहता इन दोनों पात्रों के माध्यम से स्त्री- पुरूष सम्बन्धी धारणाओं को अभिव्यक्त किया था, ठीक उसी तरह लेखिका ने “कोरजा” में अमित और कम्मो के माध्यम से वर्तमान व्यवस्था, आदिवासियों का जीवन, बस्तर के इतिहास की जानकारी, शहरीकरण आदि विचारों को चित्रित किया है।

                                    प्रस्तुत उपन्यास में मेहरून्निसा परवेज ने प्रेम और सेक्स के नये- नये रूपों को चित्रित कर यथार्थ को मुखरित किया है। कम्मो के यहाँ रब्बो का परिचय उसके चचेरे भाई एहसान से होता है। और यह परिचय प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन नानी ने रब्बो आपा की शादी एक पैसे वाले अधेड़ व्यक्ति से तयकर देती है। यह बात नसीमा और कम्मो जब एहसान भाई को बताते हैं, तो वे रब्बो आपा से शादी करने से इन्कार तो नहीं करते है लेकिन जल्द शादी नहीं करने के उनके अपने कारण है। उनके घर की हालत ठीक नहीं है। उनकी तीन जवान बहनें घर में बिन ब्याही बैठी है और घर सम्भालने वाले केवल एहसान भाई है। जब नसीमा यह बात रब्बो को बतलाती है तो वह कहती है, “बस ऐसे ही खत्म अफसाने होते है नसीमा। अच्छा हुआ वहम टूट गया। मर्द हमेशा से बेहरहमी कुत्ते रहे है……बस हड्डियाँ निचोड़ना जानते है…..और कुछ नहीं।”5 रब्बो आपा को उस अधेड़ व्यक्ति से शादी करनी पड़ती है। तो वहीं लेखिका ने अमित और कम्मो के द्वारा सेक्स का एक अलग ही रूप व्यक्त किया है। एक दिन अमित कम्मो को अपने बाहों में भर लेता है, और फिर कम्मो को इच्छा होती है कि आज वह समर्पित हो जाए और वह अमित को पूरी छूट देती है। यहाँ अमित कम्मो को अपनी असलियत बतलाता है कि वह नपुंसक है। इसी कमजोरी को भूलाने के लिए वह शराब पिया करता था। इस सच को सुनकर कम्मो कि स्थिति बड़ी दयनीय हो जाती है। एक दिन अचानक अमित की मृत्यु हो जाती है और इस घटना से परेशान हो कर कम्मो भी आत्महत्या कर लेती है। इस तरह से कम्मो और अमित की प्रेम कहानी का अंत हो जाता है। जुम्मन खाँ का जो साजो खाला के साथ सेक्स का रूप चित्रित किया है वह सेक्स का बीभत्स रूप लगता है। जमशेद रब्बो आपा और उसकी सौतेली माँ को अलग- अलग भोगता है और एक माँ कैसे अपनी बेटी की सौतन बन जाती है, इसका यथार्थ चित्रण लेखिका ने उपन्यास में चित्रित किया है। तो वहीं रहमान खाँ अपनी ही बेटी फातमा पर नजर रखता है। सेक्स की प्रबल इच्छा के लिए एक पिता एक पुरूष बन जाता है। स्त्री और पुरूष पात्रों के अलग- अलग कथाओं में लेखिका ने प्रेम और सेक्स के यथार्थ को चित्रित किया है। मुस्लिम समाज ही नहीं प्रत्येक समाज में स्त्री जीवन की यही दशा है। घर हो या समाज दोनों ही जगहों पर शोषित और धोखा खायी हुई अपना जीवन जीने के लिए विवश है।

                                   यहाँ लेखिका ने नसीमा की मन: स्थिति का चित्रण किया है जिसने सभी स्त्री पात्रों को अपने सामने देखा और उनके साथ जीवन जिया। नसीमा सोचती है कि, “रब्बो आपा, कम्मो और मोना दीदी- तीन विचित्र कैरक्टरो को उसने पास से देखा परखा था। एक गरीबी की आग में अपने को झोंक दिया, दूसरी ने प्यार के लिए अपने को खत्म कर लिया और तीसरी ने……..? तीसरे सारे दु:खों की गवाह रही, अपने जीवन की, अपने सुखों की आहुति दे डाली। नसीमा समझ नहीं पा रही थी तीनों में बड़ा कौन है, कौन था? शायद मोना दीदी। जो सब कुछ देखकर समझकर और सहजकर भी जिंदा है।”6 लेखिका ने मोना दीदी को इसलिए बड़ा माना है क्योंकि वह अभी भी उन परिस्थितियों से जूझ रही है और उन्होंने जीवन से हार नहीं मानी है। दु:खों को झेलते हुए भी वह सहज ही जीवन जीने के लिए प्रयत्नशील है।

                             मेहरून्निसा परवेज ने जहाँ बस्तर के मुस्लिम समाज की स्त्रियों के दु:ख- दर्द और उनके संघर्षों को चित्रित किया है वहीं उन्होंने बस्तर के इतिहास, बस्तर की दो नदी इंद्रावती और खोलाब की कथा, आदिवासियों का जीवन, मुख्यधारा द्वारा आदिवासियों का शोषण और जगदलपुर का शहरीकरण आदि का भी बड़ा सजीव चित्रण किया है। लेखिका का जन्म और बचपन आदिवासियों के बीच हुआ और गुजरा। यही कारण रहा है कि लेखिका इन से भावनात्मक स्तर पर जुड़ी हुई है। अपने कहानी संग्रह “मेरी बस्तर की कहानियाँ” की भूमिका में लिखती है- “बस्तर। जिसे मैं कभी भूल नहीं पाई जिंदगी का पहला पाठ, यथार्थ का पहला शब्द मैंने यही गड़ा था। बस्तर की माटी में खेलकर मेरे नन्हें पैर जवान हुए थे। बस्तर का भयानक जंगल आज भी मेरे मन में बसा हुआ है।”7 इसलिए उनके कथा साहित्य का विषय मध्यप्रदेश का आदिवासी क्षेत्र बस्तर रहा है।

                            मेहरून्निसा परवेज का उपन्यास “कोरजा” को स्त्री जीवन की त्रासदी का आख्यान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। लेखिका ने उपन्यास में भाषा का सरल और सहज रूप और पूर्व दीप्ति शैली का प्रयोग किया है। उन्होंने बोलचाल की भाषा में स्त्री जीवन के दु:ख- दर्द और पीड़ा को अभिव्यक्त किया है। बस्तर जिले में मुस्लिम समाज हाशिये के लोगों की तरह जीवन व्यतीत करने पर मजबूर है। जिसमें मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति और भी दयनीय है। लेखिका ने अरमान बी, फातमा, रब्बो आपा, साजो खाला, नसीमा आदि के माध्यम से मुस्लिम समाज की स्त्रियों के जीवन और उनके संघर्षों का यथार्थ वर्णन किया है। तो वहीं मोना दीदी के माध्यम से हिंदू स्त्रियों के जीवन की दशा को भी चित्रित किया है। लेखिका ने उपन्यास में स्त्रियों कि जिन समस्याओं को व्यक्त किया है वे आज भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है क्योंकि हमारे समाज मे हाशिये पर स्थिति स्त्रियों के जीवन मे कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जो परिवर्तन हुआ भी है वह उच्च और मध्य वर्गीय स्त्रियों तक ही सीमित है। भारत में एकमात्र मुस्लिम निजी कानून है जिस कारण भारतीय मुस्लिम स्त्रियों को बहुविवाह और आसान तलाक प्रक्रिया जैसी कुप्रथाओं का आज भी शिकार होना पड़ रहा है। आज भी मुस्लिम समाज में स्त्री के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। सरकार और तमाम संस्था व संगठन को हाशिये पर स्थिति स्त्रियों की समस्याओं और उनके समाधान के लिए उचित कदम उठाना आवश्यक है तभी इन स्त्रियों के जीवन को नई दिशा मिल सकेगी।

 

सन्दर्भ ग्रंथ –सूची

1-मेहरून्निसा परवेज: कोरजा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1997, पृ.सं.-14.

2-मेहरून्निसा परवेज: कोरजा, पृ.सं.-20.

3-मेहरून्निसा परवेज: कोरजा, पृ.सं.-206

4-मेहरून्निसा परवेज: कोरजा, पृ.सं.-69

5-मेहरून्निसा परवेज: कोरजा, पृ.सं.-181

6-मेहरून्निसा परवेज: कोरजा, पृ.सं.-229

7-मेहरून्निसा परवेज: मेरे बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2006, (भूमिका)

आरती 

शोधार्थी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

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