प्रस्तुत लेख में समकालीन कविता के बहाने वर्तमान समाज के नए पण को दर्शाया गया है। हम इस बात से परिचित हो जायेंगे कि किस प्रकार हम इतिहास, धर्म-दर्शन एवं स्वार्थ की दुनियामें फसें हुए हैं। समकालीन कविता बदलते संदर्भों के साथ व्यापक परिदृश्य में बनती-बिगड़ती स्थितियों को दर्शाती है।  सांप्रदायिकता, धार्मिकता, वर्ग-वर्ण, भेदभाव, शोषण को दर्शाती हैं। असहाय, निरापराध जनों की आवाज़ बनकर प्रस्तुत होती है। मनुष्य को स्क्रीन की नई दुनिया से बाहर निकाल कर स्किन की दुनिया का नये सिरे से परिचय कराती हैं। समकालीन कविता अस्मिता की तलाश करती हैं। आम आदमी के जीवन का हलफ़नामा है।

की वर्ड :-  नया इलाका, अस्मिता की तलाश, प्रतिरोधी संस्कृति, औद्योगिक मानसिकता, बाज़ार तंत्र, यथार्थ, मानवता,  इतिहास, विमर्श, धर्मनिष्ठा, चारण।

शोध विस्तार :-

            चारों ओर का कोलाहल, बहस, नारेबाजी तथा सामाजिक परिवर्तन की पहल के भ्रमिक जंजाल में भिन्न-भिन्न सनातनी रस्सियों को पकड़े हुए लोग अपनी अस्मिता, धर्मनिष्ठा का प्रदर्शन करके जातिगत धारणाओं को प्रबल बनाने में जुटे हुए हैं। उनके सामाजिक परिवर्तन की पहल धीरे-धीरे क्रमिक होती है। यह मार्गक्रम कब तक चलता रहेगा यह बताना संभव नहीं है। हम अतीत के तथ्यों को याद तो करते हैं लेकिन उससे सबक सीखते नहीं। उनसे संबंधित छोटी-छोटी चीजों को अक्सर भूल जाते हैं। इस प्रकार तमाम तरह की गतिविधियों के बीच शनैः शनैः प्रतिरोध की संस्कृति जन्म लेती है। कला के रूप में उसकी अभिव्यक्ति मानवीय मन को गहरे तक प्रभावित ही नहीं करती बल्कि सचेत भी करती है। मन में विशिष्ट भावना शक्ति का संचार करती है। इसमें तर्क को प्रधानता है। यह संस्कृति तरह-तरह की विसंगियों को एक सीरे से ख़ारिज करके मानवता को महत्त्वपूर्ण मानती है और  उसकी महत्ता को भी प्रतिपादित करती है।

            आज विशिष्ट प्रकार की धर्मान्धता, हिंदू-मुसलमान, शिया-सुन्नी, रंग, नस्ल, वर्ण-वर्ग की भावना के कारण समाज का स्वरूप बदल रहा है। बहुसंख्यक कमज़ोर जनसमुदाय के मन में डर और सिरहन का संचार हो रहा है। निर्दोष एवं निष्पक्ष होने के दावे बुद्धिजीवी आसानी से समझ तो सकता है किंतु वह भी आजकल उधार का चोला पहनकर दिखावटी नुस्खा अपना रहा है। परिणाम स्वरुप भोली-भाली ग़रीब, लाचार, निरापराध जनता शिकार हो रही है। भिन्न-भिन्न भ्रांतियों में से फंसा आम आदमी अपनी मूल समस्याओं व सपनों से बेदखल हो रहा है। राजनीतिक दुनिया नई उलझनों में उसका ध्यान भटका रही है। उनके बीच से महत्त्वपूर्ण सवाल गयाब हो रहे हैं। उसके बीच से महत्त्वपूर्ण सवालों का गायब होना अर्थात् उसके सपनों का मृत होना हैं। उसके सपनों का मृत होना मतलब उसका भविष्य अंधकारमय हो जाना है। राजनीतिक गुटबाजी, धार्मिकता अब किसी एक वर्ग (धर्म) तक सीमित नहीं है। उसका सर्वंकष स्वरूप अपनी सर्वोंच्च सीमा पर विराजमान है। दीर्घ काल तक अगर यही स्थिति रही तो असंतोष फ़ैलने में देरी नहीं होगी। आज जो भी स्थितियाँ निर्माण हो रही है उनके मूल में एक ऐसा मस्तिष्क कार्य कर रहा है जो धर्म, संप्रदाय व सत्ता को सब कुछ मानता है और उसकी प्राप्ति के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है। इसके लिए उसने बड़ी सहजता से संस्कृति एवं सभ्यता के लुप्त ध्वंशाशेष को चर्चा के केंद्र में लाया है। जहाँ अतीत के प्रति ऐसा लगाव हो वहाँ पर मानवता एवं सहिष्णुता का भाव कैसे पनप सकता है? समकालीन काव्य इस प्रकार के तमाम तथ्यों एवं विमर्शों को केंद्र में रखकर अपनी भूमिका स्पष्ठ कर रहा है। साथ-ही-साथ ऐतिहासिक चीजों एवं विभिन्न मिथकों को नये दृष्टिकोण से दिखा ने का काम समकालीन कविता का मुख्य प्रतिपाद्य है। काव्य सर्जना के बहाने समकालीन कवि नये इलाके के यथार्थ को व्यक्त कर रहा है। समकालीन कविता संग्रहित तथ्यों को केवल नये दृष्टिकोण से परिभाषित ही नहीं करती है बल्कि उसके समकालीन संदर्भों को भी प्रस्तुत करती है। इस अर्थ में समकालीन कवि मिथकों के बहाने वर्तमान को तलाशता है। अदम गोंडवी जब कहते हैं –

“मानवता का दर्द लिखेंगे

माटी की बू बास लिखेंगे

हम अपने कालखंड का

एक नया इतिहास लिखेंगे।”[1]

            तब साहित्य की चारण काव्य परंपरा समाप्त हो जायेगी और मानवता का दर्द प्रखरता के साथ उभरकर आयेगा। मनुष्य की वेदना, उसकी जीवनानुभूति साहित्य का मुख्य प्रतिपाद्य होगी। और कवि-मन समसामयिक गतिविधियों से आहत होकर यथार्थ के धरातल पर अभिव्यक्त होगा। उसकी चेतना मुक्ति की अर्थवत्ता को स्पष्ठ करेगी। समकालीन कविता स्मृति में सदियों से दबी पड़ी वेदना का नया इतिहास गढ़ने की कोशिश करती है। रूढ़ि-प्रथा एवं अमानवीयता का अस्वीकार करनेवाला इतिहास ऐसे इलाके को प्रमुखता प्रदान करेगा जिस पर हमने सोचना बंद कर दिया है। नव इतिहास की चेतना, नई जीवन पद्धति को यथार्थ के धरातल पर व्यक्त करती है। यही कारण है कि समकालीन कवि इन तथ्यों का पर्दा फाश करते हुए भीड़ भरे बाज़ार तंत्र में अपनी अस्मिता तलाशते व्यक्ति की पहचान करता है। यह कवि जानता है कि नया इलाका मनुष्य को असंवेदनशील बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इसलिए समकालीन कवि जीवन की गहराई तक उतरकर नये संकेतों को प्रस्तुत ही नहीं करता अपितु आम जन जीवन का मार्ग भी प्रशस्त करता है। तमाम प्रकार की असंगतियों को व्यक्त करके निरापराध, निहत्थे मनुष्य की वेदना को मुखरित करता है। समकालीन कविता की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि नये इलाके के संस्कारों की अभिव्यक्ति अर्थात् नागरीय जीवन में आये बदलाव, स्मृति पर होने वाला प्रभाव, मसलन स्मृति भ्रंश, कुछ बनने और बिगड़ने की प्रक्रिया का भावबोध कविता में जगह पा रहा है। कविता की विषयवस्तु भूख, ग़रीबी, जीवन संघर्ष, अज्ञानता इत्यादि ही नहीं है अपितु अत्याधुनिक समाज का यथार्थ भी है। यह वह समाज है जहाँ नित्य नई चीजें बनती-बिगड़ती है। कुछ घटता-बढ़ता है। हर दिन नये पण का अहसास होता है। क्षण में स्मृतियाँ पुरानी पड़ जाती है। कविता के शीर्षक भी नये इलाके का आभास दिलाते हैं। कई प्रकार के सवाल खड़े करते हैं। मसलन राजेश जोशी की कविता ‘मारे जायेंगे’ का शीर्षक मन में कई सवाल पैदा करता है। कवि शीर्षक के जरियें मनोवैज्ञानिक तरीके से मानवीय भावबोध को दर्शाता है। उसका यथार्थ मनुष्य के स्वप्नवत (आभासी) संसार से बाहर निकालकर यथार्थ जगत की पहचान कराता है। और सवाल करता है कि कौन मारे जायेंगे? मंगलेश डबराल की कुछ काव्य पंक्तियाँ भी देख सकते हैं, जिसमें कवि डरावने सपने और यथार्थ यथार्थ के बीच अग्निकांडों में घिरे झुलस चुके समाज का हलफ़नामा दिखाते हैं-

“एक डरावने स्वप्न और डरावने यथार्थ के बीच

कही बैठ वह देखता है

अग्निकांडों में घिरे झुलस चुके हैं उसके शब्द

उनमें नहीं बचा कोई प्रकाश

रंगों में बह रहा है मारे गये लोगों का रक्त।”[2]

            आज हर गली मोहल्ले, विश्वविद्यालय रक्त से नहा रहे हैं। कोई भी स्थान सुरक्षित नहीं है। सामान्य व्यक्ति अपनी खुशहाल जीवन की चाह में संघर्ष पर उतारू हो रहा है। वह अपनी आवाज को अंजाम तक पहुंचाने की प्रक्रिया में अग्निकांडों में झुलस दिया जाता है। वस्तुतः समकालीन कविता संस्कृति एवं धर्म-संप्रदाय की श्रेष्ठता का बखान करनेवालों को आड़े हाथ लेती हैं। उन्हें वास्तविकता का अहसास कराती है। समकालीन कवि कहते हैं-

“यह प्राचीन नगर जिसकी महिमा का तुम बखान करते हो

सिर्फ धूल और पत्थरों का पर्दा है

और भूरी पापड़ी की तरह दिखता सिंहासन

जिस पर बैठकर न्याय किये गये

उसी के नीचे यहाँ हुए अन्याय भी दबे हैं

सभ्यता का गुणगान करनेवालों

तुम अगर सभ्य नहीं हो

तो तुम्हारी सभ्यता  का क़द तुमसे बड़ा नहीं है

एक लंबी शर्म से ज्य़ादा कुछ नहीं है इतिहास।”[3]

            समकालीन कविता के केंद्र में धर्म-संप्रदाय, संस्कृति, सभ्यता का वह रूप है जिसकी कल्पना भाववादी नहीं करता। यह कविता केवल वर्ग एवं वर्ग संघर्ष की बात नहीं करती या किसी एक वर्ग के हितों की रक्षा की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट नहीं करती अपितु स्त्री, दलित, आदिवासी जीवन जगत की यथास्थिति को भी दर्शाती है। इस अर्थ में समकालीन कविता की विषयवस्तु का कोई नियत दायरा नहीं है। उसमें व्यापकता एवं विषयों की विविधता है। नये पण का आभास है। समकालीन कवि स्त्री एवं दलित की परंपरागत छवि को प्रस्तुत करने के साथ उसके बदलते स्वरूप को भी व्यक्त करता है। स्त्री का विद्रोही रूप सभी प्रकार की रूढ़ि-प्रथाओं एवं बंधनों को अस्वीकार करता है। समकालीन कविता में अस्वीकार का साहस देखने को मिलता है। कवि कविता के बहाने पुरुषवादी मानसिकता को कटघरे में खड़ा करता है। स्त्री रचनाकारों का काव्य स्त्री की महत्ता को प्रतिपादित करता है। नये इलाके में उपस्थित घुटन, पीड़ा, बाजार, औद्योगिक मानसिकता, टूटते मानवीय संबंध, स्क्रीन की आभासी दुनिया में स्त्री के वजूद को बचाकर रखने की कोशिश समकालीन कविता में दिखाई देती है। यह कविता महज वक्तव्य न होकर करुण व्यथा को व्यक्त करनेवाली सार्थक अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि इस कविता के संदर्भ में कहा जाता है कवि उस वर्ग तक पहुँचना चाहता है जो सबसे कमजोर है। सदियों से बहिष्कृत है। न वह शासक बन सकता है और न शोषक बनकर शोषण कर सकता है। वह दर-ब-दर जंगलों-पहाड़ों में रहकर अपनी अस्मिता व संस्कृति बचना चाहता है। अपने आजीविका के साधन बचाना चाहता है। उसे नये इलाके की संस्कृति का मोह नहीं है। आकर्षण नहीं है किंतु नये पण का आभास उसे हो जाता है। वह समझता है कि अब तक जो आया है वह पुराना हो चुका है जो आनेवाला है उसमें कुछ नया हो सकता है। उदाहरण के लिए कुछ काव्य पंक्तियाँ देख सकते जिसमें कवि आशावादी है। कवि अनिश्चित वक्त में पंचाग से बाहर, भाग फल की आस से ऊपर उठकर यथार्थवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

“फिर भी निश्चित रहने का वक्त तो यह है नहीं

इस उम्मीद पर बैठने का वक्त तो यह है नहीं

कि एक न एक दिन बदलेगा सब कुछ

कि यही है नियम और यही होगा भागफल

बहुत कुछ है जो है किसी पंचांग से बाहर

किसी भी नक्शे में नहीं हैं सारी नदियाँ सारे पहाड़

कितना अधूरा कितने काटकूट से भरा है

आत्मा का रोकड़”[4]

निष्कर्ष :- 

            इस प्रकार हम देख सकते हैं कि समकालीन कवि अपने समय की पहचान ही नहीं करता अपितु समय और समाज से रूबरू होकर जो निरापराध, असहाय है। जो छला जा रहा है उसकी आवाज बनता है। कविता में ऐसे कई बिंब देखने को मिलेंगे जो नये इलाके का परिचय कराते हैं उसके यथार्थ को दर्शाते हैं। समकालीन कवि रहस्यवादी नहीं है। वह सहजता से अपनी बात कहता है। आभासी स्क्रीन की दुनिया से बाहर निकालकर स्किन की दुनिया का परिचय कराता है। वस्तुतः समकालीन कविता अहसास की अभिव्यक्ति है न की अल्फ़ाज की।

संदर्भ ग्रंथ :-   

  1. गोंडवी, अदम. (सं.). (2014). समय से मुठभेड़. दिल्ली : वाणी प्रकाशन.
  2. डबराल, मंगलेश. (सं.). (2000). आवाज भी एक जगह है. दिल्ली : वाणी प्रकाशन.
  3. कमल, अरुण. (सं.). (2006). नये इलाके में. दिल्ली : वाणी प्रकाशन.
  4. पांडेय, मनोज. (सं.). (2017). समकालीन कविता की वैचारिक चुनौतियाँ. दिल्ली : ए. आर. पब्लिक

सहायक ग्रंथ – 

[1] गोंडवी अदम. (सं.). (2014). समय से मुठभेड़. दिल्ली : वाणी प्रकाशन. पृ. 27

[2] डबराल, मंगलेश. (सं.). (2000). आवाज भी एक जगह है. दिल्ली : वाणी प्रकाशन. पृ. 80

[3] डबराल, मंगलेश. (सं.). (2000). आवाज भी एक जगह है. दिल्ली : वाणी प्रकाशन. पृ. 85

[4] कमल, अरुण. (सं.) .(2006). नये इलाके में. दिल्ली : वाणी प्रकाशन. पृ. 79

कदम गजानन साहेबराव
शोधार्थी
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

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