कबीर ने अनुभव की पाठशाला में जीवन की शिक्षा ली थी। उस समय का समाज मानवता की कब्र पर पल्लवित और पोषित हो रहा है । सामंतवाद का बोलबाला था, जात-पांत का खूब जोर था । एक हाड़-मांस का पुतला दूसरे को खबरदार कहता था | कहीं उसकी हड्डी में छूत न लग जाए, बिल्कुल बिजली करंट की तरह । कर्मकाण्ड और धार्मिक पाखण्ड का बाजार खूब गर्म था । कबीर का संवेदन मन ऐसे हालात को देखकर अचम्भित था, उसके अंदर एक सहज आक्रोश था । एक तरफ से सभी तत्कालीन स्थापित मान्यताओं और कुरीतियों को उसने खारिज कर दिया । तर्क, अनुभव और ज्ञान की कसौटी पर जो खरा नहीं उतरा वह कबीर का नहीं था और न कबीर उसका था कबीर जैसा अस्वीकार का अद्भुत साहस और कहीं नहीं मिलेगा । उम्र भर कबीर अपनी वाणी द्वारा सभी बुराइयों के खिलाफ हल्ला बोला और समाज को संमार्ग पर प्रेरित किया ।

          कबीर, जुलाहा थे कपड़ा बुनना, व्यापारियों को बेचकर खर्च चलाना और साधु-संगति में घूम-घूम कर भक्ति के लिए विचारों का प्रकाश फैलाना उनका काम था । वे परम्परागत ढांचे से बंधे न थे वे उस समाज से लाभ उठाने वाले वर्ग के भी न थे । इसलिए समाज को एक सनातन व्यवस्था की तरह ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने वाले रूढ़िवादी विचारों से उनका तालमेल न था। उनके समाज सुधारक विचारों का यह मुख्य कारण था। 14वीं, 15वीं और 16वीं शताब्दी में विद्रोही बातें संगठित राजनीति के माध्यम से व्यक्त नहीं की जा सकती थीं । इसलिए धर्म की पुरानी भाषा में हिन्दु धर्म के पुराने आडम्बर और विचारों को छोड़ते हुए नयी भावना को वाणी देने का यह प्रयत्न सक्रिय हुआ । इन मध्यकालीन सीमाओं और अंतर्विरोधों विचारधारा काफी कुछ सुसंगत रूप से हमारे सामने आती है । मनुष्य की गरिमा की ओर इशारा करते हुए कबीर कहते हैं ।

‘‘मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाॅनि।

दस द्वारे का देहरा, तामें जोति पिछांनि।।

          कबीर का स्पष्ट संदेश है-मन को मथुरा, दिल को द्वारिका और काया को काशी समझो । दस द्वारों वाला देवालय रूपी शरीर तुम्हारे पास है । इसमें जो आत्मज्योति है उसे पहचानों और उसी की उपासना करो, बाहर व्यर्थ भटकते फिरते हो ।

          कबीर कारीगर थे, उन्हें सामंतों से दबकर न रहना पड़ता था, व्यापार ने कारीगरों को काम दिया और सामंतों की पुश्तैनी क्षमता की की, साथ ही, गारीगरों के माल को सस्ते में खरीदना या सस्ती मजदूरी पर उनसे काम लेना व्यापारी के मुनाफे की मात्रा बढ़ाने के लिए जरूरी था। जिस तरह सामंती समाज के जात-पांत के बंधनों, धार्मिक पाखण्ड और सामाजिक रूढ़ियों के विरूद्ध प्रहार करते हैं, उसी तरह कारीगर और व्यापारी के बीच तनावपूर्ण संबंधों को वह व्यक्त करते हैं-

मन बनिया बनिज न छोड़ें।

जनम-जनम का मारा बनिया अजहूँ।

पूर न तोलै……।।

कुनबा वाके सकल हरामी अमृत माँ विष घोलै।।

          स्वभावतः भक्ति के आवरण में व्यापारी और कारीगर के बीच के सामाजिक, आर्थिक तनाव को कबीर अपनी अक्खड़ भाषा में पेश करते हैं।

          कबीर का विरोध व्यापारी वर्ग के शोषण और स्वार्थ से है। वे कारीगर के नजरिये से इस तनाव को व्यक्त करते हैं इसलिए उनका दृष्टिकोण समाज के धनी-मनी-वर्गों वे चाहे सामंत हों या व्यापारी से दूर, मेहनतकश कारीगर का दृष्टिकोण है। इसलिए उनकी विचारधारा और भक्ति इतनी मूलगामी और क्रांतिकारी है।

          कबीर स्वयं हिन्दू मुसलमान की अविभाजित, स्वीकृत भारती जीवनधारा के प्रतीक थे और साधारण जनता के बीच पनपने वाली यह एकता उनके अनुभव का आधार थी। इसी लिए, साधारण श्रमिक जनता के दृष्टिकोण से धर्म, पंथ या सम्प्रदाय के प्रश्नों को हल करते हुए वे निर्भीक होकर हिन्दुओं और मुसलमानों के धार्मिक ठेकेदारों को ललकार सकते थे।

अरे इन दोउन राह न पाई

हिंदुअन आपन करै बड़ाई, गागर छुअन न देई

वेश्या के पायन तर सोवैं, यह देखी हिंदुआई।

मुसलमान के पीर औलिया, मुरगा-मुरगी खाई।

खाला के ही बेटी ब्याहैं, घरहिं में करैं सगाई।

          दोनों समुदायों के रूढ़िवाद का विरोध करके कबीर ने भारतीय जनता की एकता का रास्ता साफ किया। एक-दूसरे के खिलाफ द्वेष का प्रचार करने वाले व्यक्ति न थे। वे धर्म को राजनीतिक स्वार्थ संबंध का विषय नहीं बना रहे थे। इसलिए संत थे। वे संत होकर संसद की ओर भी नहीं दौड़ रहे थे। उनका संत-शब्द सामाजिक हित से प्रेरित था। इसलिए वे जनता को एकता और भाईचारे की राह पर ले जा रहे थे। इस राह में सबसे बड़ी बाधा थे धार्मिक मुखिया। जिन्हें पुरोहित या मुल्ला कहते हैं, वे सामंती समाज व्यवस्था धर्म के नियमों से चलाने वाले नेता ही थे। पंडित और मौलाना का एक साथ विरोध करते हुए कबीर कहते हैं-

हिन्दु की दया मेहर तुरकन की दोनों घर से भागी।

वह करै जिबह यह झटका और आग दोऊ घर लागी।।

          ऐसा लगता है कि आज की सांप्रदायिक हिंसा पर खींझकर कोई ये पंक्तियाँ लिख रहा है। दोनों सम्प्रदायों के कठमुल्लों का विरोध और जनसाधारण में प्रेम का प्रसार, यह कबीर की उसी दृष्टि का परिणाम है, जिस दृष्टि से वे सामाजिक जीवन की अन्य घटनाओं की व्याख्या करते थे। हिन्दू और मुसलमान दोनों में व्यापारी और सामंत हैं, वह किसानों और कारीगरों को सताते हैं। जनता में फूट डालकर अपनी लूट कायम रखते थे। किसान और कारीगर भी सह सम्प्रदायों में है और उनका हित इस एक तत्व का ज्ञान पा जाने में है कि उनकी एकता-आपस का प्रेम सबसे मूल्यवान है। अकारण नहीं है कि कबीर पाखण्ड के प्रति जितने कठोर हैं, प्रेम के उतने ही बड़े उपासक हैं, कहने को वे ज्ञानमार्गी कहे जाते हैं, पर वे यह मानते हैं कि ‘‘एकै आखर प्रेम का पढै सो पंडित होय। कोरा ज्ञान या कोरा पोथी पांडित्य उनके लिए वैसा ही है, खर चंदन जैसे भार। गधा चंदन का भार ढोता है, उसकी सुगंध नहीं पाता। ज्ञान का चंदन प्रेम के जल में घिस कर ही सुगंध देता है। उनके लिए तत्व और ज्ञान सभी का स्रोत प्रेम है-

बेद-कितेब पढ़े वे कुनुबा, वे मोलना वे पांडे।

बेगरि-बेगरि नाम धरायै, एक मंटिया के भांडे।

वेद और कुरान पढ़ने से एक ही मिट्टी के भारत की मिट्टी के बरतन अलग-अलग नाम से पहचाने जाते हैं। यह तत्व ज्ञान है। यह तत्व ज्ञान हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई का जाप करके दोनों संप्रदाय के कट्टरपंथियों को मंच प्रदान करने वाली राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता से अलग हैं। यह दोनों तरह के कट्टरपंथियों का विरोध करके जनसाधारण की एकता का रास्ता तैयार करने वाली जनवादी धर्मनिरपेक्षता है। कबीर ने अपने समय की धर्म व्यवस्था और पाखण्ड का विरोध करने के लिए बीजक की चैदहवीं रमैनी में बावनावतार के कुल का वर्णन करते हुए कहा है कि ब्राह्मण किसी का कार्य नहीं करता, सभी चोरियाँ ब्राह्मण ही करता है, सभी वेदों की रचना उसी ने की है। ब्रह्म का पंथ उसने ही चलाया है। उसने ही गोपाल कृष्ण की रचना की है, उसने ही स्वयंभू बनकर पंथ संचालन किया है, उसने ही भूत-प्रेत की कल्पना की है, उसने ही जैन विचारों की स्थापना की है, उसने ही निहुर कर नमाज पढ़ी है, वह किसी काम का नियंत्रण नहीं मानता। लेकिन कबीर झूठे खसम का विश्वास नहीं करता। इसलिए कबीर सत्य है सत्य का वक्ता है। वस्तुतः कबीर के तर्क इतने सशक्त हैं कि विरोधियों के पास उनके कोई उत्तर नहीं थे। वह तिलमिला देने वाली भाषा में मुल्ला से पूछते हैं कि यदि सुन्नत ही तर्क इतने सशक्त हैं कि विरोधियों के पास उनके कोई उत्तर नहीं थे। वह तिलमिला देने वाली भाषा में मुल्ला से पूछते हैं कि यदि सुन्नत ही तुर्क का लक्षण है तो फिर स्त्रियों को तुर्क कैसे माना जाए? स्त्री अर्धांगिनी होती है, उसकी सुन्नत हो नहीं सकती। अतः आधा समाज हिन्दू ही बना रह जाता है। इसी प्रकार वह हिन्दुओं के बाह्माचार पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यदि यज्ञोपवीत धारण करना ही द्विज का चिन्ह है तो स्त्रियों को क्यों नहीं पहनाया गया? जिससे वे द्विजों में गिनी जा सके। वे जो जन्म से अंत तक शूद्र ही बनी रहती है। फिर उनका परोसा भोजन तुम कैसे खाते हो?

          इसलिए वह ब्राह्मणों को सावधान करते हुए कहते हैं कि उच्च जाति में जन्म लेने के गर्व में प्रभु की भक्ति क्यों भूल जाते हैं? जिस मुख से तुम वेद गायत्री का उच्चारण करते हो, उस मुख से राम-नाम का जप और अच्छे ढंग से होना चाहिए। जिन ब्राह्मणों को श्रेष्ठ समझ कर लोग उनका चरण स्पर्श करते हैं, आश्चर्य है कि वहीं ब्राह्मण बलिदान के लिए जीव वध करते हैं। वे स्वयं श्रेष्ठ बनते हैं, किन्तु सामान्य से सामान्य यजमान के यहाँ बलिदान आदि घृणित कर्म करके उसी के यहाँ अपना उदर पोषण करते हैं।

          कबीर अपने समय के सर्वाधिक जागरूक एवं संवेदनशील प्राणी थे। उनकी पैनी दृष्टि से समाज की कोई गतिविधि छिपी नहीं रह सकी थी। उनका मानना था कि धार्मिक रूढ़ियों की जकड़बंदी के कारण मनुष्य सारतत्व को ग्रहण नहीं कर पाता है। ऐसी स्थिति में वह सदाशयता, उदारता, बंधुत्व भावना आदि सद्गुणों से वंचित हो जाता है और रूढ़ियों की चारदीवारी में बंद होकर संकीर्ण मानसिकता में आबद्ध हो जाता है। बाह्यचार अहंभाव का भी जनक होता है। उन्होंने देखा था कि इसी अहं से ग्रस्त कोई अपने को परम ज्ञानी मान बैठा है और कोई त्यागी, किसी को इन्द्रियों को जीत लेने का अभिमान है। वस्तुतः जिसने अहभाव का त्याग नहीं किया वह रोगी है और रोगी का कोई उपचार नहीं। पूजा, जप, पाठ, दान, तीर्थयात्रा आदि आचार कर्ज के समान है, मूलधन नहीं। मूलधन है। आत्मतत्व। इसीलिए कबीर कहते हैं कि यदि आत्मतत्व को नहीं पहचाना तो नग्न रहने अथवा मृगछाला धारण करने से क्या लाभ? यदि नग्न रहने से मोक्ष प्राप्त हो जाता तो जंगल के सारे पशु मोक्ष को प्राप्त हो गए होते। यदि सिर मुडाने से ही सिद्धि प्राप्त हो जाती तो भेड़ अवश्य ही सीधे स्वर्ग को पहुँच जाती। यदि केवल वीर्य रक्षा से मोक्ष प्राप्त हो जाता तो घोड़ा और बैल (जिनको बधिया किया जाता है) मोक्ष को क्यों नहीं प्राप्त कर लेते ? कबीर ने माला, जप, बाह्य, वेशभूषा, जातिगत मिथ्याभिमान, तीर्थ-यात्रा, दिखावटी साधुओं तथा उनके द्वारा बताए गए काल्पनिक बैकुण्ठ लोक आदि की भी निंदा की है। उनके विचार से यदि मन पर नियंत्रण नहीं है तो विषयासक्त मन से माला फेरने से कोई लाभ नहीं, जो मन रूपी माला को घुमाता है अर्थात् मन को विषयों से विमुख करें श्वरोन्मुख करत है, वही सच्चा साधु है। सच्ची माला तो मन ही है, गले में पड़ी हुई माला सांसारिक दिखावा मात्र है। यदि ऐसी माला धारण करने से प्रभु मिल सकते हैं तो ऐसी बहुत बड़ी माला रहट के गले में दिखाई पड़ती है, उसे ईश्वर की प्राप्ति अवश्य हो जाना चाहिए।

          कबीर के काव्य में नारी के अनेक रूप मिलते हैं। उन्होंने नारी के कन्या रूप, तरूणी, विवाहिता, कर्कशा नारी, पतिव्रता नारी, माता भगिनी तथा वेश्या आदि रूपों का यथार्थ अंकन किया है। विवाह द्विरागमन आदि प्रथाओं का मोहक चित्र खींचा है। पति ग्रह में पहुँचकर वह प्रिय मिलन की किस प्रकार उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करती थी। उस समय उनके मन में नाना प्रकार के भाव उमड़ते रहते थे। ऐसे मनोरम चित्रों के द्वारा कबीर ने तत्कालीन पारिवारिक स्थिति और सांसारिक तथा सांस्कृतिक चेतना को रेखांकित किया है। वह ऐसी पतिव्रता नारी की प्रशंसा करते हैं जो प्रियतम से मिलन के लिए सहज श्रृंगार करती है ध्यान और लवलीनता के सुंदर वस्त्र धारण करती है हाथें में शील और संतोष के कंगन पहनती है औरपति के प्रति ही आकृष्ट रहती है। अतः कबीर की दृष्टि में पतिव्रता नारी ही समाज का आदर्श है।

          अतः कबीर पढ़े लिखे नहीं थे-मसि कागद छूयो नहीं कलम गहों नहिं हाथ किन्तु उनमें विलक्षण काव्य प्रतिभा विद्यमान थी। कबीर के काव्य में कला का चमत्कार, अनुभूति की सच्चाई एवं अभिव्यक्ति का खरापन विद्यमान है।

 

डाॅ. सरिता देवी

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