मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में घटित घटनाओं से अछूता नहीं रह सकता और समाज का उस पर गहरा प्रभाव पडता है। जब व्यक्ति का नैतिक स्तर गिरता है तो व्यक्ति सामाजिक इकाई होने से समाज भी पतनोन्मुख अवस्था की ओर जाता हैं। इस तरह पतन चाहे मानसिक, बौद्धिक एवं व्यवहारगत हो सत्ता, धर्म एवं समाज पर इसका प्रभाव अवश्यंभावी हैं। समाज या युग को ऐसी संक्रमणकालीन अवस्था से बाहर निकालने का महत्वपूर्ण कार्य महान् व्यक्तित्व द्वारा ही संभव होता हैं। संक्रमणकालीन भारतीय समाज में जहाँ चहॅुओर बिखराव व्याप्त था, इस समाज को एकता में पिरोने का कार्य सन्त कवि ‘कबीर’ द्वारा किया गया। पण्डित रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर के इस सामाजिक एकीकरण केकार्य को इस प्रकार रेखांकित हैं- “ उनके द्वारा यह बहुत ही आवश्यक कार्य हुआ। इसके साथ ही मनुष्यत्व की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्म गौरव का भाव जगाया और भक्ति के ऊँचे से ऊँचे सोपान की ओर बढने के लिए बढावा दिया।”1 इस तरह कबीर ने प्रेम और साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना का प्रसार उत्तर भारत में किया जो सामाजिक एकीकरण के भाव को दिखाता हैं।
कबीर युग में सर्वाधिक हाहाकार सामाजिक क्षेत्र में मचा था। समाज अनेक सम्प्रदायों, जाति-उपजाति समूह एवं वर्गों में बटा हुआ था। पण्डित पुरोहितों, मुल्ला मौलवियों के धार्मिक बाह्याडम्बर, पाखण्ड चरम अवस्था पर थे। हिन्दू और मुसलमानों में आपसी वैमनस्य अन्दर ही अन्दर उग्र रूप ले रहा था। सामाजिक जीवन में द्वेष, ईष्र्या, अविश्वास, हिंसा-प्रतिहिंसा की भावना का प्रसार हो रहा था। जात-पात, ऊँच-नीच की भावना समाज में चहॅु ओर विद्यमान थी। मध्यकालीन भारतीय समाज में व्याप्त विषमताओं का प्रभाव सामान्यजन पर ज्यादा था। तात्कालीक परिस्थितियों पर महान विचारक के. दामोदरन कहते है-
“व्यक्ति आन्दोलन का मूल आधार भगवान विष्णु अथवा उनके अवतारों, राम और कृष्ण की भक्ति थी। किन्तु यह शुद्धतः एक धार्मिक आन्दोलन नहीं था। वैष्णवों के सिद्धान्त मूलतः उस समय व्याप्त सामाजिक, आर्थिक यथार्थ की आदर्शवादी अभिव्यक्ति थे। सांस्कृतिक क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय नवजागरण का रूप धारण किया। सामाजिक विषयवस्तु में वे जातिप्रथा के आधिपत्य और अन्यायों के विरूद्ध अत्यन्त महत्वपूर्ण विद्रोह के घोतक थे। इस आन्दोलन ने राष्ट्रीय इकाईयों के उदय को नया बल प्रदान किया। व्यापारी और दस्तकार सामन्ती अवशोषण का मुकाबला करने के लिए इस आन्दोलन से प्रेरणा प्राप्त करते थे। यह सिद्धान्त कि ईश्वर के सामने सभी मनुष्य, फिर वे ऊँची जाति के हो अथवा नीची जाति के, समान हैं, इस आन्दोलन का ऐसा केन्द्र बिन्दु बन गया, जिसने पुरोहित वर्ग और जाति-प्रथा के आतंक के विरूद्ध संघर्ष करने वाले आम जनता के व्यापक हिस्सों को अपने चारों ओर एकजुट किया। इस प्रकार मध्ययुग के इस महान आन्दोलन ने न केवल विभिन्न भाषाओं और विभिन्न धर्मो वाले जन समुदायों की एक सुसम्बद्ध भारतीय संस्कृति के विकास में मदद की, बल्कि सामन्ती दमन और उत्पीडन के विरूद्ध संघर्ष चलाने का मार्ग भी प्रशस्त किया।”2
संक्रमणकालीन समाज की विषम राजनैतिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों से व्यथित सामान्यजन की पीडा की अभिव्यक्ति का माध्यम सन्त काव्य बना। ऐसे में संत कबीर ने इन सब विकट परिस्थितियों से उबारने के लिए निर्गुण ईश्वर और धर्म की सुलभता, इत्यादि विशेषताओं युक्त काव्य धारा का आर्विभाव किया जो सामाजिक एकीकरण के सूत्रों को दिखाता हुआ प्रतिध्वनित हुआ। कबीर काव्य भाखापन लिए हुए सामाजिक एकीकरण के भाव में अभिवृद्धि इस प्रकार रेखांकित की जा सकती है-

कबीर काव्य: सामाजिक एकीकरण के भाव

कबीर जुलाहा जाति से संबंधित थे। उनके स्वभाव में निर्भिकता, अक्कडपन , सत्यता की भावना थी। कबीर स्वयं स्वीकार करते थे कि उन्हे शास्त्रीय ज्ञान की बजाय व्यावहारिक ज्ञान जो अनुभव से संबंधित, आता हैं। कबीर की दृष्टि में शास्त्रीय ज्ञान पुरोहितवादी और दिशाहीन तत्व है जो किसी के लिए भी हितकारी नहीं हैं। इनकी विचारधारा ‘ आखिन देखी ’ पर आधारित है जो सामाजिक एकीकरण के दायित्व का निर्वहन करती हैं। कबीर के इसी व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते है- “ कबीर ऐसे ही मिलन बिन्दु पर खडे थे, जहां से एक ओर हिन्दुत्व निकल जाता है और दूसरी मुसलमानत्व, जहा एक ओर ज्ञान निकल जाता है, दूसरी ओर अशिक्षा, जहा पर एक ओर योग मार्ग निकल जाता हैं, दूसरी ओर भक्ति मार्ग, जहा एक तरफ निर्गुण भावना निकल जाती है, दूसरी ओर सगुण भावना, इसी चैरास्ते पर वे खडे थे। वे दोनो ओर देख सकते थे और परस्पर विरूद्ध दिशा में गए हुए मार्गों के दोषगुण उन्हे स्पष्ट दिखाई दे जाते थे।”3

कबीर के इस व्यवहार से मध्ययुग में धार्मिक पाखण्डों के आका रूष्ट हुए फिर भी वह विचलित न होकर सत्य के मार्ग का जीवनपर्यन्त अनुसरण करते रहे और जनसामान्य में सामाजिक सद्भाव और बन्धुत्व की भावना का पोषण किया। कबीर ने जो काव्य आधार वर्णित किए है उनकी प्रांसगिकता आज छः सैा वर्षों बाद भी है। अतः आज भी उपयोगी है। इन्ही सामाजिक एकीकरण के सूत्रों को रेखांकित करने का प्रयास करेंगे-

(1) सामाजिक सद्भाव और बन्धुत्व की भावना का विकास-कबीर समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, जात-पात, छूआछूत के बजाय सभी मनुष्य में आपसी सद्भाव और बन्धुत्व की भावना को महत्व देते थे। डा. बच्चन सिंह के शब्दों में कबीर कहते है- “ उन्हे कोई भी मत स्वीकार्य नहीं जो मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद उत्पन्न करता है। उन्हे कोई भी अनुष्ठाता या साधक मंजूर नहीं है, जो बुद्धि विरूद्ध है। उन्हे कोई भी शास्त्र मान्य नहीं है, जो आत्मज्ञान को कुण्ठित करता हैं। वेद कितेब प्रमोत्पादक है, अतः अस्वीकार्य है। तीर्थ, व्रत, पूजा, नमाज, रोजा गुमराह करते है, इसलिए अगाह्म हैं। पंण्डित पांडे, काजी, मुल्ला उन धर्मों के ठेकेदार है जो धर्म नहीं हैं। अतः घृणास्पद है।”4 कबीर ने सामाजिक विषमताओं का प्रखर विरोध किया और आदर्श समाज बन सके ऐसे प्रयास किए। इसीलिए कबीर ने कहा-

“ ऐसा भेद बिगुचन भारी।
वेद कतेव दीन अरू दुनिया, कौन पुरिप्प कौन नारी।।
एक बूंद एकै मल मूतर, एक चाम, एक गूदा।
एक ज्योति से सब उत्पना, कौन बाम्हन कौन सूदा।।
माही का प्यंड सहजि उत्पना, नाद रूंद समाना।
बिनसि गया थैं का नाव धरि हौ, पढि मुनि भ्रमं जाना।।
रजगुन ब्रह्म तम गुन संकर, सत गुन हरि है सोई।
कहै कबीर एक राम जयहुरे, हिन्दू तुरक न कोई।।5

कबीर की सभी विचारधाराओं में यही भावना निहित है कि सभी मनुष्य समान हैं। सभी में ईश्वर है और सार्वभौमिक तथा सर्वकालिक हैं।

(2) वर्ण और जाति व्यवस्था पर प्रहार-सामाजिक एकीकरण में मुख्य बाधा संकुचित वर्ण और जाति व्यवस्था पर प्रहार सन्त कवि कबीर ने किया। तात्कालीन समाज की इस परिस्थिति का चित्रण करते हंुए डा. रघुवंश लिखते है- “ कबीर के युग में पूरा समाज अनेकानेक जातियों और उपजातियों में बँटता जा रहा था, अनेक मत मतांतरों, पूजा पद्तियों, कर्मकाण्डों, साधना रूपों, देवी देवताओं के स्वीकार-अस्वीकार में खण्डित-विखण्डित हो रहा था और मूल्यों के स्तर पर समाज धर्म की जडताओं, कुंठाओं तथा हीनताओं के बीच छिन्न-भिन्न हो रहा था।”6 कबीर ने मानवीय धर्म के आधार पर समाज को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। उन्होंने जाति भेद प्रथा पर कटाक्ष किया-

“ सन्तन जात न पूछो निरगुनियां।
साध ब्राहमन साध छतरी, साधै जाति बनियाँ।
साधन माॅ छत्तीस कौम है, टेढी तौर पुछनियाँ।”7

उन्होंने जन्म से सभी मनुष्य को समान बताया-
जन्मत सूद्र भए पुनि सूद्रा।
कृत्रिम जनेउ घालि जगदूदा।।8
“साई के सब जीव है कीरी कुँजर दोय।”9
‘जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।

सामाजिक एकीकरण का सूत्र है जाति के बजाय ज्ञान को तरजीह देकर कबीर कहते है-

“जाति न पूछो साधू की, जो पूछो तो ग्यान।
मोल करो तरवार का , पूरा रहन दो म्यान।।”10

कबीर निचले तबको की आवाज को महत्व देते हैं और ऊँची जाति के लोगों के बाह्मयाचार, पाखण्ड पर प्रहार करते हैं। ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं-

“जौ तू बामनी जाया, ता आन बाट हवै क्यो नहीं आया।”11
इस तरह कबीर ने निम्न वर्ग की हीन भावना को दूर किया।

(3) बाह्यआडम्बर, अंधविश्वास और रूढियों की व्यर्थता-कबीर के समकालीन युग में पण्डित, पुरोहित, मुल्लाओं ने जन सामान्य में वेद कतेब के आधार पर अंधविश्वास और रूढिया फैलाकर शोषण की नीतियां अपनाई। मूर्तिपूजा और बाह्यआडम्बर को आधार बनाकर भेदभाव प्रारम्भ कर दिया। जिसकी कबीर ने कडें शब्दों में भत्र्सना की-

“ मोको कहाँ ढूढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।
न मैं देवल ना मैं मस्जिद ना कावे कैलास में।”12

कबीर ने मूर्तिपूजा का विरोध इन शब्दों में किया-

“ पाहन पूजै हरि मिलै तो मं पूूजूँ पहार।
ताते वह चक्की भली पीस खाय संसार।।13

इस तरह धर्म के मिथ्या आधार पर ही प्रश्चचिन्ह लगाकर कठघरे में खडा किया।

(4) मानव प्रेम की महत्ता-कबीर ने सभी लोगों को आपसी प्रेम, भाईचारे और बन्धुत्व की भावना पर बल दिया। इसी से सामाजिक एकीकरण के सूत्र में बाँधने के लिए मुख्य आधार था। इस आधार की प्रासंगिकता आज भी बरकरार हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल रेखांकित करते है कि-
“ उपासना के बाह्य स्वरूप पर आग्रह करने वाले और कर्मकाण्ड को प्रधानता देने वाले पण्डितों और मुल्लों दोनो को खरी-खरी सुनायी और राम रहीम की एकता समझ कर हृदय को शुद्ध और प्रेम मय करने का सन्देश दिया। देशाचार और उपासना विधि के कारण मनुष्य-मनुष्य में जो भेदभाव उत्पन्न हो जाता है उन्हे दूर करने का प्रयास उनकी वाणी बराबर करती रही।”14
समाज में बिखराव लाने वाले तत्वों पर कबीर द्वारा किये गये कटाक्ष पर डा. रघुवंश लिखते हैं-
“ कबीर के सामने पूरा भारतीय समाज था और वह मूल्यों के आधार पर समाज पर विचार करने में संलग्न रहे है। वस्तुतः समस्त तपववाद के आधार के बावजूद भी यह स्पष्ट था कि उस समय के समाज का विघटन और उसके मूल्यों की विश्रृखंलता का मूल कारण यह सारा आचार तथा कर्मकाण्ड रहा हैं। ऐसी स्थिति में कबीर का पण्डित तथा मुल्लों से बार-बार उनके बारे में प्रश्न करना सहज रहा हैं। उनका प्रश्न है, यह छुआछूत कहा से आई, सबका जन्म एक स्थान से और एक ही तत्व से होता है। सारा मानव समाज अनादि कर्म प्रवाह में बह रहा है और इसके आधार पर ही व्यक्ति पर विचार करना अपेक्षित हैं।”15
कबीर कहिन-

“ साधो एक रूप सब माही
अपने मनहि विचारि कै देखो और दूसरो नाहीं।।
एकै त्वचा रूधिर पुनि एकै विप्र सूद्र के माही।”16

कबीर काव्य में समानता और सद्भाव के आधार पर सामाजिक एकीकरण पर बल देते हैं।

(5) हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल-कबीर युग में धार्मिक वैमनस्य की जडे काफी गहरी थी। इस संक्रमण काल में कबीर ने सामाजिक एकीकरण के प्रयास किये। तत्कालीन समाज की इस धार्मिक वैमनस्य के बारे में डा. द्वारिका प्रसाद सक्सेना लिखते है-
“कबीर के समय में उत्तरी भारत के अन्तर्गत हिन्दू और मुसलमान दो बडी जातियाँ निवास करती थी। इन दोनो में अपने-अपने आचार-विचारों, रीति रिवाजों, सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताओं आदि के बारे में दृढता और कट्टरता विद्यमान थी, जिसके परिणाम स्वरूप दोनो जातियाँ एक दूसरे से लडती रहती थी, द्वेष एवं वैमनस्य रखती थी और कोई भी किसी से समझौता करने को तैयार नहीं थी। उस समय हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म के ठेकेदार भोली-भाली जनता को बहकाकर अनेकानेक पाखण्डों, बाह्माचारों, अन्धविश्वासों एवं मिथ्या आडम्बरों में फसाये रखते थे और अपने मत की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हुए पारस्परिक मनोमालिन्य एवं ईष्र्या द्वेष को प्रश्रय देते थे। इन संकीर्ण विचारों के कारण उस समय समाज का सन्तुलन बिगड रहा था। कुरीतियों एवं कुप्रथाओं का बोलबाला था, धार्मिक अव्यवस्था बढती जा रही थी, सामाजिक विषमता देश में घर कर रही थी। अतएव उस समय किसी ऐसे महात्मा या धर्म प्रवर्तक अथवा सामाजिक नेता की आवश्यकता थी, जो दोनो धर्माें की बुराईयों का अध्ययन करके उनसे ऊपर उठकर बुराईयों को दूर कर सके और सामाजिक अव्यवस्था को दूर करके समाज में सुन्दर एवं सुदृढ व्यवस्था स्थापित कर सके।”17
ऐसी धार्मिक परिस्थितियों के समय कबीर मानव धर्म द्वारा सामाजिक एकीकरण करना चाहते थे। हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए कबीर ने भक्ति का मूलाधार एकैश्वरवाद को बनाया-

“ हमरै राम रहीम करीमा, कैसो अलह राम सति सोई।
बिसमिल मेहि बिसंभर एकै और न दूजा कोई।।”18

यह कहकर एक ही ईश्वर पर जोर देते है। ताकि सामाजिक एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हो सके। सामाजिक एकीकरण के प्रयासों में कबीर सर्वाधिक विद्रोही थे। उन्होंने सभी विपंथियों को सही राह पर लाने का प्रयास किया और उन्होंने कहा- ‘अरे इन दोऊ राह न पाई’ । कबीर के इन सामाजिक एकीकरण के सूत्रों की आज भी प्रासंगिकता बराबर हैं।
निष्कर्षतः हम यह देखते है कि कबीर न तो किसी जाति बन्धन में बंधे न ही किसी सम्प्रदाय से, वे तो जीवनपर्यन्त निर्भीक, समाज सुधारक, निःसंशय कवि थे। इस सम्बन्ध में पण्डित परशुराम चतुर्वेदी लिखते है-
“कबीर की साधना और सिद्धान्तों में एक साथ नाथपंथ वेदान्त, वैष्णव मत, सूफी मत प्रत्येक के कुछ मुख्य तत्वों का संग्रह देखकर यह धारणा होना स्वाभाविक है कि वे किसी एक मत व सम्प्रदायों में न बन्धे रहकर एक स्वतन्त्र विचारक थे और जिस मत में जो अच्छा लगा उसी का संग्रह कर लेते थे।”19
वस्तुतः कबीर काव्य में सामाजिक एकीकरण के अनेक आयाम स्थापित हुए है जो कि आज भी इसकी प्रासंगिकता और महत्व को बनाये हुए है।

संदर्भ सूची-
1.रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 2012 पृ. 55
2. के. दामोदरन, भारतीय चिन्तन परम्परा-पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली पृ. 315
3. हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर, ग्यारवी आवृति, 2004, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली पृ. 144
4. डा. बच्चन सिंह, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, स. 2009, राधा कृष्ण प्रकाशन, दिल्ली पृ. 84
5. कबीर ग्रन्थावली, पृ. 57
6. डा. रघुवन्श, कबीर एक नई दृष्टि, इण्डियन प्रेस प्रा0 लि0 इलाहाबाद पृ. 23
7. हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर, पृ. 179
8. डा. माता प्रसाद गुप्त अंग सारवी 31-20-पृ. 237
9. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 64
10.डा. युगेश्वर, कबीर, समग्र अंग-455
11.कमलापति पाडेय, कबीर ग्रन्थावली पृ. 420
12.वही पृ. 712
13.डा. माता प्रसाद गुप्त अंग सारवी 25-2-पृ. 231
14.आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 65
15.डा. रघुवन्श, कबीर एक नई दृष्टि, पृ. 110
16.हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर, पृ. 239
17.डा. द्वारिका प्रसाद सक्सेना, हिन्दी के प्राचीन प्रतिनिधि कवि ,श्री विनोद पुस्तक मन्दिर आगरा, पृ. 90
18.वही पृ. 74
19. प. परशुराम चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्या का वृहत इतिहास पृ. 137

शान्तिलाल
अजमेर (राज.)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *