हमने संसार जगत में फिल्में तो बहुत देखी है लेकिन ऐसी फिल्म नहीं। जिसकी साहित्य दृष्टि से कहानी भी इतनी उत्कृष्ट और सशक्त हो और वह सबका मन भी हर्षित कर सके। हाँ हम बात कर रहे हैं पंचलैट फिल्म की। जो कि पूर्व दीप्ति शैली में फिल्मांकित हुई है। इस फिल्म में 1954 के भारत का एक ऐसा गाँव दिखाया गया है। जिसमें विभिन्न जातियां हैं और उनके अपने टोले हैं –  गोया कि जैसे यादव टोला, कायस्थ टोला, ब्राह्मण टोला, राजपूत टोला, महतो टोला इन सबमें बंटी हुई है। यह गाँव अंधविश्वास, रूढ़िवादिता से ग्रस्त है।  गांव में इन टोलों में आपसी खींचतान और एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ हमेशा नजर आती है। इस फिल्म में शुरूआती कथन में आता है कि इस सलीमा के सभी पात्र काल्पनिक नहीं है वह लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। सलीमा बनाने के लिए हमने कुछ पात्रों और घटनाओं को जोड़ा है अगर वह आपको काल्पनिक लगे तो सारी जिम्मेदारी हम सलीमा बनाने वालों की। इस कथन के बाद शुरू होती है यह फिल्म। और रेणु के उस गांव में एक प्रेमी युगल गोधन और मुनरी की कथा को दिखाती है जिस गाँव को रेणु ने अपनी कहानी में आधार बनाया था। उन गाँव वालों के  इर्द-गिर्द घूम कर ही पंचलैट फिल्म की कहानी पूर्ण होती नजर आती है और पंचलैट शीर्षक भी।

गोधन गाँव का एक साधारण और गुणवान व्यक्ति हैं जो कि माता-पिता की कोसी नदी में आई बाढ़ के समय मृत्यु होने के बाद अपनी नानी शिवरंजनी देवी के घर आ जाता है जिसका बहुत पहले ही देहांत हो चुका है। और मुनरी गांव की एक साधारण बाला और गुलरी की बेटी है। जिसके पिता का देहांत हो चुका है। यह फिल्म पूर्व दीप्ति शैली में पर्दे पर दिखाई देती है। गोधन और मुनरी का बचपन में एक भोली सी साधारण दृष्टि में हुआ प्रेम इतना असाधारण रूप ले सकता है यह इन दोनों ने भी कल्पना नहीं की होगी। बचपन के बाद गोधन का युवावस्था में अपनी नानी के आना और वहां पर मुनरी और कनेली दोनों को देखकर बचपन में हुई आपसी हरकत का दोहराव करते ही मुनरी के मन में बचपन में प्रथम दृष्टया प्रेम का बींजाकुर प्रस्फुटित होकर पुष्पित और पल्लवित हो जाता है। तब कनेली कहती है कि ‘मुनरी पगला गई है क्या।’ और तभी मुनरी प्रफुल्लित होकर भागते हुए अपने घर जाकर गोधन के लिए भोजन लाती है। गोधन एक निष्कपट इंसान है जो मुनरी से सात्विक प्रेम करता है। गोधन द्वारा भोजन करने के बाद गुलरी मौसी के यहाँ बर्तन गिराना और उसके घर पुनः रात्रि में अपने मित्र नंदू के साथ जाकर माफी मांगना और कहना कि ‘देखिए हम जानते हैं कि जिस थाली में खाओ उसमें छेद मत करो। हम जिसमें खाए उसको लाकर पटक दिए बहुत बड़ा गलती है अपराध है पाप है हम माफी मांगते हैं माफ कीजिएगा जरूर।’ गलती होने पर इतना सोच विचार केवल एक सात्विक प्रेमी ही कर सकता है। फिर रूदल शाह बनिये की दुकान पर मुनरी और कनेली का साथ आना और गोधन का मिलना और वहाँ मुनरी द्वारा गोधन को देखकर कहना ‘कनेली का लाने को बोली थी माई।’ और वहाँ पर गोधन द्वारा डिब्बे में रखे लेमन जूस की गोलियां मुट्ठी भर कर दुकानदार से नजरें चुरा कर उनको दे देना प्रेम के भावनात्मक रूप को उजागर करता है। गुलरी द्वारा बीच चौंक में जब गोधन को मुनरी की ओर इशारा करते हुए देख लिया जाता है तब गुलरी उन दोनों पर बिगड़ जाती है और नाराज होकर मुनरी एकांत में आकर बैठती है। वहाँ पर मेहतो टोला सरपंच की पत्नी कहती है कि सुनो बबुनी जब दिल लगाया है ना, तब यह खरा खोटा सुनने की आदत डाल लो, सुनो सबका बस करो अपने मन का। सरपंच की पत्नी भी एक रूप में सात्विक प्रेम को ही महत्व देते हुए प्रतिष्ठित करने का प्रयास करती है।

गोधन द्वारा मुनरी को देखकर सलीमा का गाना ‘हम तुझसे मोहब्बत करके सलम, हंसते भी रहे रोते भी रहे हँस हँस के सहें उल्फत के सितम’ गाने के कारण उसको मेहतो टोला द्वारा जाति बिरादरी से जब बाहर कर दिया जाता है और उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाता है। फिर भी गोधन अपने सात्विक प्रेम की चाँह में गाँव में रहकर हर वो सजा मँजूर करता है जिसको वहाँ मिलती है। गोधन उस गाँव के पंच पटेलों के आदेशों की दृढ़ता के साथ अवहेलना भी करता है। मेहतो टोला के पंच पटेलों द्वारा उसको कभी सुकराना भरने के लिए कहकर प्रताड़ित करने की कोशिश की जाती तो कभी जुर्माना भरने का कहकर। गोधन गाँव के पंच पटेलों की नियति से अच्छी तरह वाकिफ था। फिर भी उस गांव में रहते हुए बस सब कुछ सहन करता था। अपने प्यार में बाधक बने मेहता टोला के लोग और मुनरी की माई के लिए वह आँख में गिरे तिनके के समान था। गाँव में रासलीला मंडली के विद्वानों के संपर्क में आने पर गोधन स्वयं को श्रीकृष्ण समझ कर मुरली कमर में ही बांधकर रखता है। रासलीला मंडली के विद्वान द्वारा प्रेम से संबंधित निम्न बातें प्रेमी युगल के हृदय को उत्साहित और प्रोत्साहित करती हुई हमें दिखाई देती है। अपनी मुरलिया सुनाएं बिना, उनसे छिड़की खाए बिना, कान्हा रह नहीं पातो उनके अनुराग से राधा खींची चली आती है, प्रेम में भगवान वैसो ही बन जावे जैसो भगत चावे हैं और भगत भी वैसो ही बन जावे जैसो भगवान चावे है। रासलीला मंडली के विद्वान भी राधा कृष्ण से संबंधित सात्त्विक प्रेम की बातों पर ही अधिकाधिक बल देते हुए अपना प्रवचन सुनाते थे। इन सब बातों से गोधन और मुनरी एक दूसरे के प्रति अधिकाधिक आकृष्ट होने लगे। गोधन के प्रेम में निडरता भी भरपूर रूप से समाहित थी। क्योंकि कहा जाता है जहाँ डर है वहाँ खुलकर प्रेम नहीं हो सकता। गोधन और मुनरी जब आपस में मिलते हैं और गोधन कहता है कि ‘तुम जब शर्माती हो तब तुम्हारे कान लाल हो जाते हैं।’ और तभी गोधन द्वारा झुमका देने पर मुनरी कहती है कि हम तुम्हारा झुमका तभी पहनेंगे जब तुम हमें गाना सुनाओगे सबके सामने। फिर रासलीला मंडली में गोधन द्वारा गाना गाते हुए लोगों की नजरों से चुराकर झुमका मुनरी के हाथों में थमा देना एक सच्चे प्रेमी की दास्तां को बयां करता है।

गोधन के प्रेम में एकनिष्ठता का आभास हमें वहां भी दृष्टित होता है। जब गाँव की एक औरत उसको देखकर मुँह बिगाड़ कर हँसती है और गोधन उससे बचकर निकलने का प्रयास करता है। और भोले रूप में रासलीला मंडली के विद्वान के पास जाकर इस बारे में जानकारी प्राप्त करता है। फिल्म पुनः अपने केंद्र बिंदु पर आती है। जहाँ हर टोला वालों के पास अपना अपना पंचलैट होने पर मेहतो टोला वाले भी मेले से पंचलैट खरीद कर गाँव में लाते हैं। तब टोला की औरतों द्वारा पंचलैट आने की खुशी में गीत गाकर उस जगह को सजाकर उत्सव मनाने की तैयारी शुरू कर दी जाती है। पंचलैट आने के बाद जब उसको जलाने के लिए टोला में किसी को जानकारी नहीं होती है। तब दूसरे टोला के लोगों द्वारा मेहतो टोला पर हंसकर उनको शर्मिंदा किया जाता है। तभी मुनरी को गोधन से पूर्व में हुई बात याद आती है, जिसमें मुनरी गोधन को पंचलैट के बारे में कहती हैं तब गोधन कहता है हम बहुत जलाए हैं बहुत बुझाए हैं हम कोई गाँव का बुझ है क्या। तभी मुनरी अपनी सहेली कनेली द्वारा गोधन का नाम बताती हैं। महतो टोला के सरपंच द्वारा कहा जाता है कि जाति की बंदिश का क्या, जब जाति की इज्जत ही पानी में बही जा रही है। और गोधन को खोल दिया जाता है। यानी दंड माफ कर दिया जाता है। दूसरी ओर गोधन जाति बिरादरी से बाहर होने के कारण अपने घर पर पकवान बनाकर दिये जलाने की तैयारी करता रहता है। गोधन को बुलावा भेजने पर और उसके बावजूद नहीं आने पर टोला की औरतों द्वारा कहा जाता है कि ज्यादाती हो गई उसके साथ, सब एक साथ चलें। तभी गुलरी कहती हैं कि कोई नहीं जाएगा, हम जाएंगे। जब गुलरी गोधन को बुलाने जाती है तब गोधन आ जाता है। गोधन द्वारा स्पिरिट मांगने पर पंच पटेल द्वारा मना किया जाता है तब टोला की सभी औरतें उनको भला बुरा सुनाती है। और कनेली कहती है कि यह तो गोधन आ गया वरना हमारे तो कैसे पता चलता। गोधन तब गरी के तेल के बारे में कहता है तब टोला में से कोई कहता है कि रुदल शाह की दुकान तो बंद हो गया है। फिर गोधन मुनरी के पास आकर अपनी भाव भरी निगाहों से देख कर जा तू अपना खुशबू वाला तेल ले आ के लिए बोलता है। जोकि उसके द्वारा ला कर दिया गया था। इतना सुनकर मुनरी पास में खड़ी अपनी माँ गुलरी की और देखती है तब गुलरी कहती है कि कम्मू कहाँ मुँह तांक रही है। गोधन कह रहा है तो ले आ। मुनरी द्वारा जब गरी का तेल लाया जाता है तब गोधन द्वारा पंचलैट में पंप मारकर उसको जला दिया जाता है। पूरा टोला खुशी से हर्षित हो जाता है और पूरे टोला के मन में और मुनरी की मां के मन में गोधन के प्रति जो द्वेष ईर्ष्या रहती है। वो चंद समय में ही समाप्त हो जाती है। और गोधन सबका प्रिय बन जाता है। महतो टोला के सरदार द्वारा कहा जाता है कि शाबाश शाबाश तुम्हारे सात खून भी माफ। और उसी समय गुलरी गोधन को कहती है कि खाना खाने घर आना, आएगा ना बेटा मौसी के घर। पंचलैट से हुई रोशनी अंधेरे को चीरकर सर्वत्र हुई रोशनी तो है ही। साथ में गोधन और मुनरी के प्रेम की भी नई रोशनी प्रकट हुई है और दोनों का भावी अग्रिम जीवन वहाँ उद्दीप्त हुआ है जो कि इतने दिन सात्विक होते हुए भी छुप कर अंधेरे में समाहित हो रखा था। जिसको आज नई रोशनी और नई ऊर्जा प्रदान हुई है।

नवीन कुमार जोशी
शोधार्थी
हिंदी विभाग
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

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