पात्र:

इफिगेनी

तोआस, ताउरिअर राजा

ओरेस्त, इफिगेनी का भाई

पिलादेस, ओरेस्त का मित्र

अरकास, ताउरिअर सैनिक

स्थान: देवी डियाना  के मन्दिर का उपवन

पहला अंक

पहला दृश्य

 

इफिगेनी: देवी डियाना के प्राचीन पवित्र उपवन, तुम्हारे ऊँचे घने वृक्षों की शान्त शीतल छाया में मैं जब भी कदम रखती हूँ तो मन में एक अजीब सी घबराहट होने लगती है, जैसे मैं पहली बार यहाँ आ रही हूँ | मुझे अब भी यहाँ अपनेपन का अहसास नहीं होता | इतने वर्षों से एक दृढ़ संकल्प ही मुझे यहाँ रोके हुए है | परन्तु मैं अब भी यहाँ परदेशी ही हूँ | क्योंकि यह सागर मुझे अपने प्रियजनों से अलग किये हुए है | मैं घंटों इस सागर के तट पर खड़ी रहती हूँ और अपनी मातृभूमि ग्रीस को खोजती रहती हूँ | और मेरी गर्म साँसों के बदले सागर की लहरें मुझे दे कर जाती हैं केवल ठंडी आहें | आह, अपने माता-पिता और भाई-बहनों से दूर रहकर एकाकी जीवन जीने वाले को कितना कष्ट सहना पड़ता है ! उसका सन्ताप आने वाले भाग्य को भी उससे दूर कर देता है | उसे तो हमेशा उस घर की यादें सताती रहती हैं जहाँ उगते सूर्य के साथ उसके दिन की शुरुआत होती थी, जहाँ भाई-बहनों के साथ स्नेह की डोर से बँधे खेलते-कूदते जीवन व्यतीत होता था | मैं ईश्वर को दोष नहीं देती; स्त्रियों की स्थिति ही इतनी दयनीय है | घर हो या युद्ध का मैदान, पुरुषों का ही बोलबाला होता है और अनजान स्थानों पर भी वे कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं | अधिकारों से उन्हें ख़ुशी मिलती है; विजय उन्हें वैभव प्रदान करती है, मृत्यु उन्हें कीर्ति प्रदान करती है | और स्त्रियों का जीवन कितना पराधीन होता है ! अभद्र व्यवहार करने वाले पति के आदेशों का पालन करना भी पत्नी का कर्तव्य समझा जाता है और वह धैर्य धारण करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती; और वह स्त्री कितनी बदनसीब होती है जिसे घर से दूर किसी अनजान जगह पर रहना पड़े ! जैसे तोआस, ताउरिअर राजा, ने मुझे कठोर धार्मिक गुलामी की जंजीरों में जकड़कर यहाँ रखा हुआ है | मेरी रक्षा करने वाली देवी डियाना, मैं यह स्वीकार करते हुए कितनी लज्जा महसूस कर रही हूँ कि मैं तुम्हारी सेवा मन से नहीं कर रही ! मुझे तो अपना सारा जीवन पूर्ण रूप से तुम्हारी सेवा में समर्पित कर देना चाहिए था | मैं हमेशा तुम्हारी सहायता पर निर्भर रही हूँ और अब भी तुमसे सहायता माँग रही हूँ | देवी डियाना, तुमने मुझे, एक बड़े राजा की घर से निष्कासित बेटी को, अपनी पवित्र कोमल भुजाओं में शरण दी है | हे जेउस पुत्री, तुमने उस महान व्यक्ति को, उसकी बेटी को बचाने के लिए, भयभीत कर दिया था, तुमने देवतुल्य अगमेम्नोन को, जो अपनी सबसे प्यारी बेटी को तुम्हारे मन्दिर में लेकर आया था, ट्रोया में विजय दिलाकर सम्मानपूर्वक उसके देश वापस भिजवा दिया और उसकी पत्नी, बेटी एलेक्त्रा , पुत्र तथा उसका विशाल वैभव उसे वापस दिलवा दिया; तो अब मुझे भी मेरा खोया हुआ जीवन वापस दिलवाओ, और मुझे, जिसे तुमने मृत्यु से बचाया था, यहाँ की इस जिन्दगी, दूसरी मृत्यु, से भी बचाओ !

दूसरा दृश्य

 

इफिगेनी

अरकास

अरकास: राजा ने मुझे यहाँ भेजा है | वे देवी डियाना की पुजारिन का अभिनन्दन करते हैं और उनके कल्याण की कामना करते हैं | आज का दिन बहुत शुभ है जब ताउरिस के लोग शानदार विजय के लिए अपनी देवी का आभार प्रकट कर रहे हैं | मैं राजा और सेना के आगे-आगे यहाँ आया हूँ, यह सूचना देने के लिए कि वे आ रहे हैं |

इफिगेनी: हम उनका सम्मानपूर्वक स्वागत करने के लिए तत्पर हैं और हमारी देवी तोआस के हाथों से भेंट स्वीकार कर उन पर अनुकम्पा बरसाने के लिए उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही हैं |

अरकास: हे देवी डियाना की पुजारिन, हे आदरणीय पवित्र कन्या, मैं आज तुम्हारी आँखों में पहले से अधिक चमक देख रहा हूँ, हम सबके लिए एक शुभ संकेत ! लेकिन अभी भी तुम्हारा अन्तःकरण विषाद के रहस्यमय परदे से ढका हुआ है | कई वर्षों से हम तुम्हारे दिल से निकले आत्मीय शब्द सुनने के लिए लालायित हैं परन्तु अब तक हमें निराशा ही मिली है | मैंने जब से तुम्हें इस स्थान पर देखा है तुम्हारी दृष्टि हमेशा मेरे शरीर में एक सिरहन पैदा कर देती है; और तुम्हारी आत्मा तुम्हारे हृदय की गहराईयों में बेड़ियों से जकड़ी पड़ी है |

इफिगेनी: जैसा कि निष्कासित, असहाय व्यक्तियों के साथ होता है |

अरकास: तुम यहाँ अपने आप को निष्कासित, असहाय समझती हो ?

इफिगेनी: क्या कोई अपरिचित स्थान हमारी मातृभूमि हो सकता है ?

अरकास: और तुम अपनी मातृभूमि से दूर हो गई हो |

इफिगेनी: यही कारण है कि मेरे हृदय के घाव भर नहीं रहे हैं | किशोरावस्था के प्रारम्भ में जब माता-पिता और भाई-बहनों के साथ आत्मीय सम्बन्ध पनपने लगे थे; युवावस्था की दहलीज पर खड़े भाई-बहन, उत्साह से भरे और स्नेह के रिश्तों से बँधे, पुराने पारिवारिक बन्धनों से ऊपर उठकर आकाश की ऊँचाइयों को छूने के प्रयास करने लगे थे, तभी दुर्भाग्यवश परिवार को मिले एक शाप ने मुझे अपनी चपेट में ले लिया और मुझे मेरे प्रियजनों से अलग कर दिया, अपने कठोर प्रहार से मेरे पारिवारिक सम्बन्धों को छिन्न-भिन्न कर दिया | किशोरावस्था के सुन्दर आनन्द के पल, सुनहरे सपनों का साकार होना, सब कुछ चकनाचूर हो गया | मेरी जान अवश्य बच गयी परन्तु मैं केवल अपनी परछाईं बन कर रह गयी, नया जीवन शुरू करने की इच्छा मेरे भीतर नहीं पनप रही है |

अरकास: यदि तुम अपने आप को इतनी भाग्यहीन समझती हो तो मैं तुम्हें शायद कृतघ्न ही कहूँगा |

इफिगेनी: तुम लोगों के प्रति कृतज्ञता तो मेरे दिल में हमेशा रही है और रहेगी |

अरकास: परन्तु ऐसी  कृतज्ञता नहीं जिसके बदले कोई अच्छा कार्य किया जाता है; तुम्हें देखकर बिल्कुल नहीं लगता कि तुम अपने इस जीवन से संतुष्ट हो और तुम्हारे ह्रदय में हमारे लिए स्नेह है | बहुत वर्षों पहले जब एक रहस्यमयी घटना ने तुम्हें इस मन्दिर पर पहुंचा दिया था तब तुम्हें तोआस मिले थे, एक ईश्वरीय वरदान के रूप में, जिनके मन में तुम्हारे लिए आदर और तुम्हारे प्रति झुकाव था | और इस समुद्रतट पर तुम्हें भरपूर प्यार मिला जबकि इससे पहले प्रत्येक विदेशी के लिए यह अत्यन्त भयावह बना हुआ था; क्योंकि तुमसे पहले एक भी बाहरी व्यक्ति इस राज्य में नहीं आया जिसकी, एक प्राचीन प्रथा के अनुसार, देवी डियाना के पवित्र मन्दिर में बलि नहीं दी गई |

इफिगेनी: खुली हवा में साँस लेना ही जिन्दगी में सब कुछ नहीं होता | इस पवित्र स्थान पर व्यतीत हो रही मेरी जिन्दगी भी क्या है, जैसे अपनी ही कब्र के इर्द-गिर्द फैली परछाईं, जिस पर मैं केवल विलाप ही कर सकती हूँ ? और क्या मैं इसे प्रसन्नता और स्वाभिमान से भरी जिन्दगी कह सकती हूँ जबकि प्रत्येक दिन, जिसके लिए हम व्यर्थ में सपने देखते रहते हैं, हमें उन नीरस दिनों के लिए तैयार कर रहा होता है जब हम लेथे के तट पर अपने आप से बेखबर अपने मृतकों के लिए शोक उत्सव मना रहे होते हैं | निरर्थक जीवन असामयिक मृत्यु के समान होता है; ऐसा ही नारी जीवन मुझे भी यहाँ जीना पड़ रहा है |

अरकास: तुम्हारे अन्दर जो एक असन्तोष की भावना उमड़ रही है उसे मैं समझ सकता हूँ और मुझे तुमसे सहानुभूति भी है; इसी के कारण तुम जीवन के आनन्द से वन्चित हो रही हो | तुमने यहाँ आने के बाद से कुछ नहीं किया है ? राजा की उदासी को प्रसन्नता में किसने बदला है ? इस राज्य में आने वाले प्रत्येक बाहरी व्यक्ति की देवी डियाना के मन्दिर में बलि चढ़ा दी जाती थी, इस प्राचीन क्रूर प्रथा को अपनी मधुर बातों से किसने रुकवाया , और कैदियों को बार-बार मृत्यु के मुख से बचाकर उनके देश वापस किसने भिजवाया ? देवी डियाना ने इस बात पर बिल्कुल भी क्रोध नहीं किया कि उनके मन्दिर में बलि चढ़ाने की प्राचीन प्रथा को रोक दिया गया है, बल्कि उन्होंने तो तुम्हारी प्रार्थनाओं को स्वीकार कर भरपूर कृपा की है | क्या हमारी सेनाओं को युद्धों में पहले से अधिक सफलता नहीं मिल रही ? क्या प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को पहले से अधिक भाग्यशाली नहीं मान रहा क्योंकि हमारे राजा जो लम्बे समय से बुद्धिमानी तथा पराक्रम से राज्य पर शासन कर रहे हैं अब तुम्हारी उपस्थिति से सौम्य हो गए हैं और हमारे लिए उनकी आज्ञाओं का पालन करना आसान हो गया है ? तुम्हारे यहाँ रहने से जब हजारों लोग राहत की साँस ले रहे हैं तो तुम इसे व्यर्थ समझती हो ? जब उन लोगों के लिए, जिन्हें तुम किसी दैवीय कृपा से मिली हो, एक नए भाग्योदय का स्त्रोत बन गई हो, और इस भयावह मृत्यु के तट पर विदेशियों के लिए सुरक्षा तथा घर-वापसी का कारण बन रही हो ?

इफिगेनी: जब हम भविष्य की ओर देखते हैं कि कितना कुछ करना बाकी है तो अब तक किया हुआ थोड़ा सा कार्य दृष्टि से ओझल हो जाता है |

अरकास: तो तुम ऐसे लोगों को पसन्द करती हो जो अपने किये हुए कार्यों को महत्व नहीं देते ?

इफिगेनी: उन लोगों की आलोचना होती है जो अपने किये हुए कार्यों के बारे में ही सोच-विचार करते रहते हैं |

अरकास: और उन लोगों की भी जो अपना सही मूल्यांकन नहीं करते और अपनी उपलब्धियों पर गर्व नहीं करते, और उनकी भी जो झूठी प्रशंसा के लिए अपने कार्य को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं | मुझ पर विश्वास करो और एक ऐसे आदमी की बात सुनो जो तुम्हारे प्रति निष्ठावान है: आज जब राजा तुम्हारे साथ बात करें तब उन्हें अपनी बात कहने में उनकी सहायता करना |

इफिगेनी: तुम अपनी अच्छी बातों से मुझे भयभीत कर रहे हो; मैं अक्सर उनके विवाह-प्रस्ताव को बहुत कठिनाई से टालती रही हूँ |

अरकास: अच्छी तरह सोच-विचार कर लो कि तुम्हें क्या करना है और तुम्हारे लिए क्या लाभदायक है | जब से राजा ने अपने पुत्र को खोया है तब से वे बहुत कम लोगों पर भरोसा करते हैं और इन लोगों पर भी इतना भरोसा नहीं करते जितना पहले करते थे | सामन्तों के पुत्रों को वे अपने राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में आशंका की दृष्टि से देखते हैं | उन्हें डर है कि वे वृद्धावस्था में अकेले लाचार हो जाएँगे, उनके खिलाफ विद्रोह हो सकता है और उनकी समय से पूर्व मृत्यु हो सकती है | राजा को बीच की बात करनी नहीं आती, उन्हें तो केवल आदेश देने और अपनी इच्छानुसार कार्य करने की आदत है | उन्हें किसी वार्तालाप को अपने आशय के अनुसार धीरे-धीरे सही दिशा में मोड़ते हुए अपने उद्देश्य को प्राप्त करने की कला नहीं आती | अपने रूखे व्यवहार से, जल्दबाजी में किसी गलतफहमी का शिकार बन कर उनके लिए कठिनाई पैदा न कर देना | अच्छा तो यही होगा कि तुम उनकी आधी बात से ही उसका पूरा अर्थ समझ लो |

इफिगेनी: क्या मैं अपनी ओर आ रहे खतरे को और अधिक शीघ्रता से अपने नजदीक ले आऊँ ?

अरकास: तुम उनके प्रणय निवेदन को खतरा समझती हो ?

इफिगेनी: मेरे लिए इससे बुरा और कुछ नहीं है |

अरकास: अपने प्रति उनके स्नेह पर विश्वास करके देखो |

इफिगेनी: यदि वे पहले मेरे मन के भय को दूर कर दें |

अरकास: तुम अपने वंश की जानकारी राजा से क्यों छुपा रही हो ?

इफिगेनी: क्योंकि मन्दिर की पुजारिन के लिए वंश की जानकारी गुप्त रखना ही उचित है |

अरकास: राजा से कुछ भी छुपाना ठीक नहीं है; हालाँकि वे खुल कर नहीं कहते, परन्तु महसूस तो करते ही हैं और अपने विशाल ह्रदय की गहराईयों में महसूस करते हैं कि तुम सावधानीपूर्वक उनसे दूरी बनाकर रखती हो |

इफिगेनी: क्या उनके दिल में मेरे लिए रोष उत्पन्न हो गया है ?

अरकास: लगता तो यही है | यद्यपि वे साफ़-साफ़ कुछ नहीं कहते; तथापि उनकी बातों से मुझे ऐसा लगता है कि उनके दिल में तुम्हें पाने की तीव्र इच्छा है | उन्हें उनकी हालत पर ऐसे ही मत छोड़ो ! कहीं उनकी अप्रसन्नता इतनी न बढ़ जाए कि तुम्हारे लिए संकट पैदा हो जाए और तुम बाद में यह सोच कर पछताती रहो कि तुमने मेरी अच्छी सलाह क्यों नहीं मानी |

इफिगेनी: क्या ? क्या राजा कुछ ऐसा करने की सोच रहे हैं जैसा कोई सम्भ्रान्त पुरुष नहीं सोचेगा जिसे अपने मान की चिंता हो और जो अपने पूर्वजों के सम्मान के लिए अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण रखना जनता हो ? क्या वे मुझे देवी के मन्दिर से बलपूर्वक उठाकर अपने बिस्तर पर ले जाने की सोच रहे हैं ? तब तो मैं सभी देवताओं को और विशेषतः देवी डियाना को पुकारूंगी | मुझे विश्वास है देवी डियाना अपनी पुजारिन, और एक कन्या दूसरी कन्या को अवश्य सुरक्षा प्रदान करेंगी |

अरकास: शान्त रहो ! राजा के शरीर में ऐसा नया गर्म खून प्रवाहित नहीं हो रहा जो वे इस प्रकार नौजवानों की तरह बलप्रयोग करने की धृष्टता करें | परन्तु वे जिस प्रकार सोचते हैं, मुझे डर है कि वे कोई और कठोर निर्णय ले सकते हैं जिसे पूरा करने से उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा: क्योंकि वे एक बार पक्का निर्णय कर लेते हैं तो कोई उन्हें बदल नहीं सकता | इसलिए मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि राजा में विश्वास रखो, यदि तुम उन्हें कुछ और नहीं दे सकती तो कम से कम उनके प्रति कृतज्ञता तो प्रकट कर सकती हो |

इफिगेनी: मुझे बताओ कि तुम और क्या जानते हो |

अरकास: उन से ही सुन लेना | मैं राजा को आते हुए देख रहा हूँ; तुम उनका सम्मान करना, मित्रता और विश्वास के साथ उनसे मिलना तुम्हें भी अच्छा लगेगा | एक सम्भ्रान्त पुरुष पर महिलाओं के स्नेहपूर्ण शब्दों का बहुत प्रभाव पड़ता है |

इफिगेनी (अपने आप से): मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं एक निष्ठावान व्यक्ति के सुझावों का कैसे पालन कर सकती हूँ; परन्तु मैं अपने कर्तव्य का पालन करुँगी और राजा को उनके उपकारों के लिए धन्यवाद अवश्य दूँगी, मैं कामना करती हूँ कि राजा के मन को अच्छी लगने वाली बातें मैं सच्चाई के साथ उनके सामने रख सकूँगी |

तीसरा दृश्य

 

इफिगेनी

तोआस

इफिगेनी: देवी डियाना आपको राजसी वैभव प्रदान करें, आपको विजय तथा यश की प्राप्ति हो | आपके राज्य में समृद्धि और खुशहाली छाई रहे | आपकी सभी इच्छाएँ पूरी हों | आप अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते हैं, आपके भाग्य का सितारा सदा चमकता रहेगा |

तोआस: मुझे तो तब सन्तोष मिलता जब मेरी प्रजा मेरी प्रशंसा करती: मैंने जो कुछ प्राप्त किया है उसका दूसरे मुझ से ज्यादा आनन्द ले रहे हैं | वही व्यक्ति भाग्यशाली होता है, चाहे वह राजा हो या कोई और, जिसे अपने घर में सुख मिलता हो | तुमने उस समय मेरी तीव्र पीड़ा में मेरा साथ दिया था जब शत्रु की तलवार ने मेरे पुत्र, मेरे अन्तिम, सबसे प्रिय पुत्र, को मुझसे छीन लिया था | जब तक मेरे मन में प्रतिशोध की अग्नि दहकती रही तब तक मैंने अपने घर में नीरसता का अनुभव नहीं किया; परन्तु अब जब मैं युद्ध के मैदान से सन्तुष्ट होकर लौट आया हूँ, शत्रु का नाश कर अपने पुत्र की मृत्यु का बदला ले लिया है, तब मुझे मेरे घर में ऐसा कुछ नहीं लगता जिससे मुझे ख़ुशी मिल सके | पहले जो प्रसन्नता से मेरी आज्ञाओं का पालन करते थे उनकी आँखों में मैं अब चिंता और असन्तोष झलकता देख सकता हूँ | सब यही सोच रहे हैं कि भविष्य में क्या होगा, वे केवल मजबूरी में ही मुझ सन्तानहीन की आज्ञाओं का पालन करते हैं | मैंने जो विजय प्राप्त की है उसके लिए धन्यवाद देने तथा भविष्य में विजय का वरदान प्राप्त करने के लिए आज मैं इस मन्दिर में आया हूँ जहाँ मैं पहले भी अक्सर आता रहा हूँ | मेरे मन में बहुत समय से एक इच्छा है जिसे तुम भी भली प्रकार जानती हो: तुम मेरी दुलहन बन कर मेरे घर चलो तो मेरे तथा मेरी प्रजा के लिए यह बहुत सौभाग्य की बात होगी |

इफिगेनी: हे राजन्, आप एक अजनबी पर बहुत अधिक कृपा कर रहे हैं | आपके सामने एक शरणार्थी सिर झुकाए खड़ी है जिसे इस तट पर सुरक्षा और शान्ति के सिवाय कुछ नहीं चाहिए और यह सब आपने उसे प्रदान किया है |

तोआस: तुम यहाँ क्यों और कहाँ से आई हो, इस बारे में तुमने मुझे और पहले के राजा को भी कुछ नहीं बताया; इन बातों को गुप्त रखना किसी भी राज्य में उचित नहीं माना जाएगा | यह समुद्र तट विदेशियों के लिए बहुत भयावह है: यहाँ का कानून उन्हें यहाँ रहने की आज्ञा नहीं देता | केवल तुम्हें ही यहाँ अतिथि की भॉति सम्मान प्राप्त हुआ है, तुम्हें यहाँ के सभी अधिकार प्राप्त हैं और तुम अपनी इच्छानुसार जीवन का आनन्द ले सकती हो | इसलिए तुमसे विश्वास की अपेक्षा करना मेरे लिए अनुचित नहीं होगा |

इफिगेनी: हे राजन्, मैंने अपने माता-पिता और अपने वंश की जानकारी गुप्त रखी तो इसका कारण मेरी घबराहट थी, मेरा अविश्वास नहीं | यदि आपको पता चल जाता कि आपके सामने कौन खड़ा है, कैसे पापी व्यक्ति को आपने शरण दी है तथा सुरक्षा प्रदान की है, तो आपके विशाल ह्रदय में ऐसी घृणा उत्पन्न हो जाती कि मुझे अपने सिंहासन पर अपने साथ बिठाने की बजाय आप मुझे अपने राज्य से बाहर निकाल देते; इससे पहले कि मैं अपने प्रियजनों के पास वापस जा सकती और मेरा इधर-उधर भटकना समाप्त हो जाता, आप शायद मुझे ऐसी दुर्दशा की ओर ढकेल देते जो प्रत्येक राज्यविहीन, घर से निष्कासित व्यक्ति के भाग्य में लिखी होती है |

तोआस: देवी-देवताओं की राय तुम्हारे बारे में कुछ भी हो, वे तुम्हारे और तुम्हारे वंश के बारे में कुछ भी सोचते हों, परन्तु जब से तुम यहाँ रह रही हो और एक विनम्र अतिथि के रूप में यहाँ के सभी अधिकार भोग रही हो, तब से मेरे ऊपर ईश्वर की असीम कृपा बरस रही है | मैं यह नहीं मान सकता कि तुम्हारे रूप में मैंने एक पापी व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान की है |

इफिगेनी: आपके ऊपर ईश्वर की कृपा आपके नेक कार्यों के कारण हो रही है, इस अतिथि के कारण नहीं |

तोआस: निकृष्ट व्यक्तियों के प्रति किये गए कार्यों से ईश्वर कृपा प्राप्त नहीं होती | इसलिए अब तुम अपनी खामोशी और अपने इनकार को विराम दो; तुमसे यह माँग करना मेरे लिए कदापि अनुचित नहीं है | देवी ने तुम्हें मेरे हाथों में सौंपा था; जिस प्रकार तुम देवी के लिए पवित्र थीं उसी प्रकार मेरे लिए भी पवित्र थीं | भविष्य में भी देवी का संकेत मात्र ही मेरे लिए कानून होगा: यदि तुम्हारे लिए घर वापस जाने का अवसर आता है तो मैं तुम्हें सभी बन्धनों से मुक्त कर दूँगा | परन्तु तुम्हारे लिए सभी रास्ते हमेशा के लिए बन्द हो चुके हैं | और यदि तुम्हारा वंश निष्कासित हो चुका है या किसी भीषण संकट ने उसे मिटा दिया है, तो तुम एक से अधिक कारणों से मेरी हो | खुल कर बोलो ! और तुम जानती हो कि मैं अपने वचन का पालन करता हूँ |

इफिगेनी: पुराने बन्धनों में जकड़ी जिव्हा किसी लम्बे समय से छुपाकर रखे गए रहस्य को इतनी आसानी से बाहर निकालकर नहीं लाती; क्योंकि एक बार किसी पर भरोसा करके जब यह रहस्य दिल की गहराइयों में बने अपने सुरक्षित स्थान से बाहर आ जाता है तो लौटकर वापस नहीं जा सकता, फिर चाहे किसी को हानि हो या लाभ, जैसी ईश्वर की इच्छा | सुनो राजन् ! मैं तान्तालुस वंश से हूँ |

तोआस: तुम इतनी बड़ी बात कितनी सहजता से कह रही हो | क्या तुम उन्हें अपना पूर्वज बता रही हो जिनके बारे में कहा जाता है कि वे देवताओं के बहुत करीब थे ? क्या यह वही तान्तालुस हैं जिनके साथ बृहस्पति विचार-विमर्श करते थे और उनके साथ भोजन करते थे | जिनकी लम्बे अनुभवों पर आधारित, अनेक सारयुक्त बातों को देवता भी देववाणी के समान मान कर उनसे प्रसन्न होते थे ?

इफिगेनी: हाँ वही; परन्तु देवताओं को मनुष्यों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जैसे वे उनके समान हों; नश्वर मनुष्य इतने कमजोर होते हैं कि अत्यधिक ऊँचाई पाने पर आसानी से भटक जाते हैं | तान्तालुस निकृष्ट मनुष्य नहीं थे और न ही वे विश्वासघाती थे; वे इतने बड़े थे कि किसी की दासता स्वीकार नहीं कर सकते थे, और देवताओं के साथी बनने के लिए केवल एक मनुष्य | उनका व्यवहार भी मानवोचित था; देवताओं द्वारा दी गई सजा कठोर थी, और कवि कहते हैं: अत्यधिक उल्लास और विश्वासघात ने तान्तालुस को योविस की मेज से नीचे गिराकर पुराने तारतारुस को कलंकित कर दिया | और उनके पूरे वंश को देवताओं की घृणा का सामना करना पड़ा !

तोआस: क्या तान्तालुस के वंशजों को अपने पूर्वज के अपराधों का दण्ड भुगतना पड़ा या अपने स्वयं के अपराधों का ?

इफिगेनी: हालाँकि उनके पुत्रों और पौत्रों की बलप्रयोग और हिंसा की प्रवृत्ति के लिए वंशानुगत प्रभाव भी जिम्मेदार है; परन्तु यह भी सच है कि ईश्वर ने उनके मस्तिष्क को लोहे की जंजीरों में जकड़ दिया था | विचार-विमर्श, आत्मसंयम, बुद्धि और धैर्य को ईश्वर ने उनकी आँखों से ओझल कर दिया था | कुछ भी पाने की लालसा उन्हें अत्यधिक उत्साहित कर देती थी और वे अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए किसी भी सीमा को लाँघ सकते थे | स्वयं पेलोप्स, बलप्रयोग में विश्वास रखने वाले, तान्तालुस के प्रिय पुत्र, ने विश्वासघात और हत्या का सहारा लेकर अत्यन्त सुन्दर, ओएनोमौस की पुत्री हिप्पोदामियन को अपनी पत्नी बनाया था | हिप्पोदामियन ने अपने पति को दो पुत्र दिए, तिएस्त और अत्रौस | उन दोनों ने जब देखा कि इनके पिता का स्नेह एक दूसरी स्त्री से प्राप्त अपने पहले पुत्र के लिए बढ़ता जा रहा है तो उन्हें ईर्ष्या होने लगी | इस घृणा ने उन दोनों को एक कर दिया और उन्होंने मिलकर चोरी-छुपे अपने भाई की हत्या कर पहला जघन्य अपराध किया | पिता को लगा कि हिप्पोदामियन हत्यारिन है; उन्होंने क्रोधित होकर उससे अपना पुत्र वापस माँगा तो हिप्पोदामियन ने आत्महत्या कर ली | —

तोआस: तुम चुप क्यों हो गईं ? बोलती रहो ! तुम्हें अपने भरोसे पर पछताना नहीं पड़ेगा ! बोलो !

इफिगेनी: वे भाग्यशाली होते हैं जो अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके कार्यों और उनकी महानता के बारे में औरों को बताते हैं, और अन्त में अपने आप को उनसे जुड़े देखकर प्रसन्न होते हैं ! क्योंकि केवल एक घर ही किसी देवता या दानव को जन्म नहीं देता; बुरे या अच्छे कार्यों की एक श्रृंखला ही अन्त में नीचे गिरा देती है या संसार की खुशियाँ प्रदान करती है | — अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अत्रौस और तिएस्त मिलजुलकर राज्य का शासन सँभालने लगे | परन्तु उनकी एकता अधिक समय तक नहीं टिक सकी | कुछ समय बाद ही तिएस्त ने अपने भाई की पत्नी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना लिए | अत्रौस ने क्रोध में आकर उसे राज्य से निष्कासित कर दिया | इससे बहुत पहले ही तिएस्त ने छल-कपट से, बुरे काम करने के उद्देश्य से, अपने भाई के एक पुत्र को चुरा लिया था और चोरी-छिपे उसे अपने पुत्र की तरह अपने विश्वास में लेते हुए उसका पालन-पोषण कर रहा था | उस युवक के ह्रदय में क्रोध और बदले की भावना भरकर उसने उसे अपने भाई के राज्य में भेज दिया ताकि वह वहाँ अनजाने में अपने ही पिता की हत्या कर दे | वहाँ जाकर युवक पकड़ा गया: राजा उस हत्या के इरादे से भेजे गए युवक को कड़ी सजा देते हैं, यह सोच कर कि वे अपने भाई के बेटे को मार रहे हैं | बाद में उन्हें पता चलता है कि उनकी आँखों के सामने किसे मारा गया था; अपने ह्रदय में धधक रही बदले की आग को शान्त करने के लिए वह ऐसा घिनौना काम करने की योजना बनाता है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता | उसने ऐसा दिखावा किया कि वह बिल्कुल शान्त है और अपने भाई से पुनः मेल-जोल करना चाहता है ; इस प्रकार उसने धोखे से अपने भाई को उसके दोनों पुत्रों के साथ अपने राज्य में बुला लिया | वहाँ उसने दोनों लड़कों को पकड़ लिया और मार डाला, और फिर उनके माँस मिला भोजन उनके पिता को ही परोस दिया | जब तिएस्त ने भोजन कर लिया तो उसका मन विषाद में डूबने लगा | उसे लगा उसने कक्ष के द्वार पर अपने पुत्रों की पदचाप और उनकी आवाज सुनी है | उसने अपने पुत्रों के बारे में पूछा तो अत्रौस ने भद्दी हँसी हँसते हुए उसके पुत्रों के सिर और पैर उसके सामने फ़ेंक दिए | — तुम अपना घृणित चेहरा किसी को नहीं दिखाओगे, ओ राजा: सूर्यदेव ने अपनी किरणों को समेट लिया और अपना मार्ग बदल लिया | तो ऐसे थे इस पुजारिन के पूर्वज; पुरुषों के अनेक अशुभ, कुटिल बुद्धि से उत्पन्न अपराधों ने रात्रि को भी गहरे अन्धकार से ढक दिया है और हमें केवल भयावह धुंधलका ही नजर आता है |

तोआस: बस करो | इतनी भयंकर कहानी अब और नहीं ! मुझे बताओ कि इतने उग्र कुल में तुम्हारे जन्म के पीछे क्या चमत्कार है |

इफिगेनी: अलत्रेउस के सबसे बड़े पुत्र का नाम था अगमेम्नोन: वह मेरे पिता हैं | परन्तु मैं कह सकती हूँ कि जब से मैंने होश सम्भाला है मैंने उन्हें एक आदर्श पुरुष के रूप में देखा है | मुझे मेरी माता क्लितेमनेस्त्रा ने जन्म दिया, मेरे माता-पिता के प्यार की पहली निशानी के रूप में, और उसके बाद मेरी बहन एलेक्ट्रान का जन्म हुआ | हमारे पिता शान्तिपूर्वक शासन कर रहे थे, और तान्ताल परिवार लम्बे समय के पश्चात चैन से रह रहा था | माता-पिता को अपने जीवन में केवल एक कमी महसूस हो रही थी, एक पुत्र की | और जैसे ही उनकी यह इच्छा पूरी हुई, दोनों बहनों के बीच सबका प्यारा ओरेस्त बड़ा होने लगा, इस शान्ति से जी रहे परिवार को एक नई विपत्ति ने घेर लिया | युद्ध का बिगुल बज गया | सबसे सुन्दर स्त्री के अपहरण का बदला लेने के लिए ग्रीस के राजाओं की सारी सेनाओं ने मिलकर त्रोयन को घेर लिया | क्या उन्होंने त्रोयन जो जीत लिया और क्या उन्होंने बदला ले लिया, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है | मेरे पिता ग्रीस की सेनाओं का नेतृत्व कर रहे थे | आउलिस में वे हवा के अनुकूल बहने की प्रतीक्षा करते रहे परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ: क्योंकि देवी डियाना ने, जो कि सेना का नेतृत्व कर रहे मेरे पिता से नाराज थीं, सेनाओं का आगे बढ़ना रोक दिया था और कालचा के माध्यम से राजा की सबसे बड़ी बेटी की माँग की | उन्होंने मुझे और मेरी माता को कैद कर लिया; मुझे वे वेदी के सामने ले आए और यह शरीर देवी को अर्पित कर दिया | देवी प्रसन्न हो गईं: उन्हें मेरा खून नहीं चाहिए था और उन्होंने मुझे अपने संरक्षण में ले लिया | इस मन्दिर में मुझे एक नई पहचान मिली | मैं वही हूँ, मैं इफिगेनी हूँ, अलत्रेउस की पौत्री, अगमेम्नोन की पुत्री, देवी डियाना की सम्पत्ति, जो आपसे बात कर रही है |

तोआस: मैं राजा की बेटी को उससे अधिक महत्व और विश्वास नहीं दे सकता जितना एक अजनबी स्त्री को दिया था | मैं अपना पहले वाला प्रस्ताव दोहराता हूँ: मेरे साथ चलो और जो कुछ मेरे पास है उसमें भागीदार बनो |

इफिगेनी: हे राजन्, मैं ऐसा करने का साहस कैसे कर सकती हूँ ? देवी ने मेरी रक्षा की थी और जो जिन्दगी उन्हें अर्पित की गई थी क्या उस पर एकमात्र उन्हीं का अधिकार नहीं है ? उन्होंने मेरे लिए सुरक्षित स्थान का चयन किया है और वे यहाँ मुझे उस पिता के लिए सुरक्षित रख रही हैं जिन्हें समुचित दण्ड दे देने के पश्चात् वे वृद्धावस्था में उन्हें मेरे रूप में अपार प्रसन्नता प्रदान करना चाहती हैं | शायद बहुत जल्दी मुझे घर वापस जाने की ख़ुशी मिलने वाली है; और मैं देवी की इच्छा के विपरीत यहाँ बन्धन स्वीकार कर लेती ? मुझे यहाँ रुके रहने के लिए देवी डियाना के संकेत की प्रतीक्षा थी |

तोआस: और वह संकेत है कि तुम अभी तक यहाँ रह रही हो | किसी आशंका के अधीन होकर इस प्रकार बच निकलने का रास्ता मत खोजो | इनकार करने के लिए व्यर्थ में ही बहुत सी बातें कही जाती हैं; दूसरे व्यक्ति को तो इन सबमें केवल नहीं सुनाई पड़ता है |

इफिगेनी: मेरे शब्द केवल आपकी आँखों में धूल झोंकने के लिए नहीं हैं; मेरे ह्रदय की गहराई से निकली मेरी भावनाएं ही इन शब्दों के द्वारा आप तक पहुँच रही हैं | और क्या आप स्वयं यह नहीं सोचते कि मुझे अपने माता-पिता और भाई-बहनों के लिए चिंता करनी चाहिए और उनसे मिलने के लिए लालायित होना चाहिए ? उन भवनों में, जहाँ अब भी कभी-कभी शोक की लहर मन्द-मन्द मेरा नाम लेकर सरसराती होगी, हर्षोल्लास का सागर उमड़ने लगेगा जैसे शिशु के जन्म के समय | यदि आप मुझे वहाँ भिजवा दें तो मुझे और मेरे परिवार को नया जीवन मिल जाएगा !

तोआस: तो चली जाओ वापस ! वही करो जो तुम्हारा दिल कहता है, सही सलाह और समझदारी की बातें मत सुनो | पूरी तरह स्त्री बनी रहो और अपने आप को उस आकांक्षा के सुपुर्द कर दो जो तुम्हें अपने नियन्त्रण में लेकर इधर से उधर भटकाती रहे | जब स्त्रियों के दिल में कोई आकांक्षा बलवती होती है तो अपने पिता या पति के साथ लम्बे समय से चला आ रहा विश्वसनीय पवित्र बन्धन भी उन्हें विश्वासघात से नहीं रोक सकता; और यदि उनके दिल में तीव्र आवेग नहीं है तो उनकी जिव्हा सक्रिय हो जाती है और बड़ी-बड़ी बातों द्वारा व्यर्थ में ही दूसरे को प्रभावित करने का प्रयास करने लगती है |

इफिगेनी: हे राजा, अपने वचन को याद करो ! क्या आप मेरे विश्वास का बदला इस प्रकार चुकाएँगे ? आप तो सब कुछ सुनने के लिए तैयार थे |

तोआस: मैं उसके लिए तैयार नहीं था जिसकी कोई उम्मीद ही नहीं थी; परन्तु मुझे इसकी भी उम्मीद होनी चाहिए थी: क्या मुझे पता नहीं था कि मैं एक स्त्री से बात कर रहा था ?

इफिगेनी: स्त्री जाति का यूँ तिरस्कार न करो, हे राजा | पुरुषों के हथियारों की तरह दिखने में शानदार न सही परन्तु स्त्रियों के हथियारों का प्रभाव कुछ कम नहीं होता | विश्वास करो, इस मामले में मैं आपसे बेहतर ही हूँ कि आपके भाग्य के बारे में मैं आपसे अधिक जानती हूँ | आप समझते हैं कि हमारे बीच सम्बन्ध स्थापित होना हम दोनों के लिए बहुत शुभ होगा, हालाँकि हम इस बारे में कुछ भी नहीं जानते | बड़ी हिम्मत और तीव्र इच्छा से आप मुझ पर दबाव डाल रहे हैं कि मैं आपका प्रस्ताव स्वीकार कर लूँ; और यहाँ मैं ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने मुझे इतना साहस दिया कि मैं ऐसे गठबन्धन को स्वीकार न करूँ जिसमें देवी डियाना की सहमति न हो |

तोआस: यह ईश्वर की आवाज नहीं है; यह तुम्हारे अपने दिल की आवाज है |

इफिगेनी: ईश्वर भी तो हमारे ह्रदय के माध्यम से ही हमसे बातें करते हैं |

तोआस: क्या मुझे उनकी आवाज सुनने का अधिकार नहीं है ?

इफिगेनी: ह्रदय में तूफान हो तो उनकी मन्द, मधुर आवाज सुनाई नहीं पड़ती |

तोआस: शायद केवल पुजारिन ही उन्हें सुन सकती है ?

इफिगेनी: सबसे पहले राजा को उसका अनुभव होना चाहिए |

तोआस: तुम्हारे पवित्र कार्य और विरासत में मिले योविस की मेज पर तुम्हारे अधिकार ने तुम्हें देवी-देवताओं के बहुत निकट पहुँचा दिया है, पृथ्वी पर जन्मा एक असभ्य व्यक्ति ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकता |

इफिगेनी: तुमने मुझे अपने ऊपर विश्वास करने के लिए बाध्य किया था, अब मुझे उस विश्वास का दण्ड मिल रहा है |

तोआस: मैं एक मनुष्य हूँ; और अच्छा होगा हम बहस करना बन्द कर दें | अब मेरा निर्णय है: तुम देवी डियाना की पुजारिन बनी रहो क्योंकि उन्होंने तुम्हें इस कार्य के लिए चुना है; देवी को बलि चढ़ाने की प्राचीन परम्परा को रोक कर मैंने जो अपराध किया है उसके लिए देवी मुझे क्षमा करें | कोई भी विदेशी इस तट पर आकर जीवित नहीं रहता; बहुत पुराने समय से ही उसके लिए मृत्यु निश्चित है | तुमने अपने मैत्रीपूर्ण व्यवहार से, जिसमें मैं कभी पुत्री का कोमल स्नेह तो कभी पत्नी का शान्त प्रेम देखकर प्रसन्न होता रहा, मुझ पर ऐसा जादू सा कर दिया कि मैं अपना कर्तव्य भूल गया | तुमने मेरी इन्द्रियों को इतना शिथिल कर दिया था कि मैं अपनी प्रजा की आवाज को नहीं सुन सका ; अब तो लोग मेरे पुत्र की असमय मृत्यु के लिए खुलकर मुझे ही दोषी बताने लगे हैं | अब मैं तुम्हारे कारण उन्हें और नहीं रोकूंगा जो बलि चढ़ाने की परम्परा को पुनः प्रारम्भ करने के लिए अत्यन्त उत्सुक हैं |

इफिगेनी: मैंने अपने लिए कभी ऐसी अभिलाषा नहीं की | देवी-देवताओं को रक्त-पिपासु समझना बहुत बड़ी गलती है; उनके नाम से लोग अपनी क्रूर इच्छाओं को ही आगे बढ़ाते हैं | क्या देवी ने मुझे स्वयं पुजारी के हाथों से नहीं छीना था ? उन्हें मेरी मृत्यु से अधिक मेरी सेवा प्रिय थी |

तोआस: हमारे लिए यह उचित नहीं है कि हम अपनी अस्थिर बुद्धि से अपनी इच्छाओं के अनुसार पवित्र परम्पराओं की व्याख्या करें और उन्हें बदलने का प्रयास करें | तुम अपने कर्तव्यों का पालन करो, मैं अपने कर्तव्यों का पालन करूँगा | दो विदेशी, जो यहाँ की कन्दराओं में छुपे मिले थे और जो इस राज्य के हितैषी नहीं जान पड़ते, हमारी कैद में हैं | इन विदेशियों के रूप में तुम्हारी देवी को लम्बे समय के पश्चात् पुनः पहली बलि प्राप्त होगी ! मैं उन विदेशियों को यहाँ भेज दूँगा; तुम जानती हो तुम्हें क्या करना है |

चौथा दृश्य

इफिगेनी (अकेली). हे दयावान, रक्षा करने वाली देवी डियाना, तुम्हारे पास मेघ हैं जिनमें तुम निरपराध उत्पीड़ितों को छुपा सकती हो, तुम्हारे पास हवाएँ हैं जिनके द्वारा तुम उत्पीड़ितों को अत्याचारियों के हाथों से छुड़ाकर समुद्र के पार, पृथ्वी के दूरस्थ स्थानों और जहाँ तुम चाहो वहाँ ले जा सकती हो | तुम बुद्धि का भण्डार हो और भविष्य में जो कुछ होगा तुम भली-भान्ति जानती हो; जो कुछ बीत चुका वह भी तुम्हारी आँखों के सामने प्रत्यक्ष ही है | तुम्हारे अपनों पर सदा तुम्हारी दृष्टि बनी रहती है जैसे तुम्हारा प्रकाश रात्रि के अन्धकार को मिटाने के लिए पृथ्वी के ऊपर छाया रहता है | हे देवी, मेरे हाथों को रक्त से बचाओ ! यह कभी भी सौभाग्य और शान्ति प्रदान नहीं करता | जब इस प्रकार किसी व्यक्ति की अप्रत्याशित हत्या की जाती है तो उसकी यादें अशान्त-कुपित हत्यारे को बुरे समय में व्याकुल करती रहती हैं | क्योंकि देवी-देवता भी भले मनुष्यों को चाहते हैं; वे इन नश्वर मनुष्यों की अल्पावधि वाली जिन्दगी को थोड़ा और आगे बढ़ा देते हैं ताकि वे उनकी शाश्वत प्रकृति को निहारकर कुछ और क्षणों के लिए आनन्दित हो सकें |

दूसरा अंक

पहला दृश्य

ओरेस्त

पिलादेस

ओरेस्त: यह मृत्यु की ओर ले जाना वाला पथ है जिस पर हम चल रहे हैं: हर कदम के साथ मेरा ह्रदय और शान्त होता जा रहा है | जब मैंने अपोलो से प्रार्थना की थी कि वे बदला लेने की क्रूर भावना को मेरे मन से निकाल दें, तब उनके आशापूर्ण वचनों से ऐसा प्रतीत हुआ था कि उनकी प्यारी बहन, जो ताउरिस की अधिष्ठात्री देवी हैं, के मन्दिर में पहुँचकर हमें सहायता मिलेगी और अपने संकटों से छुटकारा मिलेगा; परन्तु अब ऐसा लग रहा है कि सारी विपत्तियों का अन्त मेरे जीवन की समाप्ति के साथ ही होगा | कितना सरल होगा मेरा अन्त जब एक ईश्वरीय शक्ति ही मेरे ह्रदय की गति को रोक देगी और मुझे सदा के लिए सूर्य के प्रकाश से दूर कर देगी | यदि आत्रेस के पौत्रों के भाग्य में लिखा है कि उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त नहीं होगी; यदि मेरे भाग्य में लिखा है कि मेरे पूर्वजों, मेरे पिता की भाँति मेरा भी बलि के पशु की तरह रक्त बहे: तो ऐसा ही सही ! और यदि ऐसा ही होना है तो किसी अपवित्र स्थान पर अपनों के विश्वासघात का शिकार होने की बजाय यहाँ देवी के मन्दिर में बलि-वेदी पर प्राण त्यागना बेहतर है | अरे, जमीन के नीचे रहने वाले कीड़ों, मेरे कदमों से बून्द-बून्द रिसते मेरे रक्त की गन्ध लेते हुए मेरा पीछा क्यों कर रहे हो, तब तक तो मुझे चैन से रहने दो | छोड़ो मुझे, मैं शीघ्र ही वहाँ नीचे तुम्हारे पास आने वाला हूँ; दिन का प्रकाश न तुम्हें देखना चाहता है और न ही मुझे | पृथ्वी पर बिछा यह सुन्दर हरा-भरा कालीन तुम कीड़ों के खेलने का मैदान नहीं है | वहाँ नीचे आकर मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा; वहाँ तो सभी का भाग्य एक जैसा होता है: सदा के लिए अँधेरी रात | परन्तु दुःख तो मुझे इस बात का है, मेरे प्रिय पिलादेस, कि तुमने कोई अपराध नहीं किया फिर भी मेरे अपराध के कारण तुम्हें भी इतनी जल्दी वहाँ अन्धकार में जाना पड़ रहा है ! अब तो केवल तुम्हारा जीवन ही मेरे लिए आशा की किरण है और तुम्हारी मृत्यु ही मेरे लिए भय का कारण है |

पिलादेस: ओरेस्त, मैं अभी भी तुम्हारी तरह वहाँ नीचे अन्धकार के साम्राज्य में जाने के लिए तैयार नहीं हूँ | मैं अभी भी यही सोच रहा हूँ कि जो टेढ़े-मेढ़े रास्ते हमें अँधेरी रात की ओर ले जाते दिखाई दे रहे हैं उन्हें किस प्रकार दुबारा हमारी जिन्दगी की ओर मोड़ा जा सकता है | मैं मृत्यु के बारे में नहीं सोच रहा; मैं चिन्तन कर रहा हूँ और ध्यानपूर्वक सुन रहा हूँ कि देवता हमारे बच निकलने के लिए कोई रास्ता तो नहीं बना रहे | मृत्यु तो जब आनी होती है तब आती ही है, चाहे हम उसके बारे में सोचें या न सोचें | जिस समय पुजारिन बलि-वेदी पर हमारी गर्दन पर वार करने के लिए अपना हाथ ऊपर उठा रही होगी, उस समय भी मेरा मस्तिष्क तुम्हारे और मेरे बचाव के बारे में सोच रहा होगा | निराशा को अपने मन से निकाल दो; तुम्हारा अविश्वास हमारे संकट को बढ़ाने का ही काम करेगा | अपोलो ने हमें वचन दिया है: बहन के पवित्र मन्दिर में तुम्हें सहायता मिलेगी और तुम सकुशल वापस जा सकोगे | देवताओं के शब्दों में दोहरे अर्थ नहीं होते जैसा कि मन में निराशा होने पर व्यक्ति सोच लेता है |

ओरेस्त: मेरे जीवन को तो मेरी माता ने बचपन में ही अँधेरी चादर में लपेट दिया था, और इस प्रकार बड़ा होते-होते मैं बन गया अपने पिता की प्रतिमूर्ति, मेरी मूक दृष्टि अपनी माता और उसके प्रेमी के लिए घोर भर्त्सना से भरी थी | मेरी बहन एलेक्त्रा अक्सर घर के एक कोने में निस्तब्ध बैठी होती थी, मैं व्याकुल होकर उसकी गोद में जाकर बैठ जाता था और जब वह रोती थी तो आँखें फाड़कर उसे देखता रहता था | तब वह हमारे महान पिता के बारे में बहुत सी बातें बताती थी: मेरा कितना मन करता था उन्हें देखने का, उनके पास जाने का ! कभी मेरा दिल चाहता मैं ट्रोया चला जाऊँ, कभी मेरा दिल चाहता मेरे पिता वापस आ जाएँ | और वह दिन भी आया —

पिलादेस: अरे रहने दो उन बातों को नरक-वासियों के मनोरंजन के लिए ! हमें तो अच्छे दिनों को याद करना चाहिए जिनसे हमें साहस के काम करने के लिए नई ऊर्जा प्राप्त होती है | देवताओं को कुछ अच्छे लोगों की आवश्यकता होती है जो इस पृथ्वी पर उनकी सेवा कर सकें | उन्होंने तुम पर भी भरोसा किया है: उन्होंने तुम्हें पिता के साथ नहीं जाने दिया जब वे अपनी इच्छा के विरुद्ध ओरकुस गए थे |

ओरेस्त: ओह, यदि मैं उनके पीछे-पीछे वहाँ चला गया होता !

पिलादेस: इस प्रकार जिन्होंने तुम्हें सुरक्षित रखा उन्होंने ही मेरा भी ध्यान रखा है: क्योंकि यदि तुम नहीं होते तो मेरा क्या होता, मैं सोच भी नहीं सकता; मैं तो बचपन से ही तुम्हारे साथ और तुम्हारे लिए ही जीता रहा हूँ और जीना चाहता हूँ |

ओरेस्त: मुझे उन सुनहरे दिनों की याद मत दिलाओ जब मुझे तुम्हारे घर में आजादी से जीने की जगह मिली थी, तुम्हारे पिता ने बड़ी उदारता से स्नेहपूर्वक लगभग निर्जीव हो चुके एक बालक का पालन-पोषण किया था; जब तुम सदा प्रफुल्लित रहने वाले, जैसे एक छोटी सी रंग-बिरंगी तितली किसी फूल के इर्द-गिर्द मँडराती रहती है, प्रतिदिन नई ऊर्जा से भरे मेरे चारों ओर घूमते रहते थे, अपनी प्रसन्नता से मुझे भी इतना प्रसन्न कर देते थे की मैं अपने सारे कष्ट भूलकर कब तुम्हारे साथ-साथ युवावस्था में आ गया पता ही नहीं चला |

पिलादेस: जब से मेरा तुमसे लगाव हुआ तभी से मेरा जीवन प्रारम्भ होता है |

ओरेस्त: कहो: मेरे संकट प्रारम्भ हुए, और तुम बिल्कुल ठीक कह रहे होगे | यही मेरी नियति का भयावह पहलू है कि एक दूषित, निष्काषित व्यक्ति की भाँति मेरे ह्रदय में पीड़ा और मृत्यु भरी हुई हैं; मैं किसी खुशियों से भरे स्थान पर कदम रख दूँ तो मेरे इर्द-गिर्द खिलते हुए चेहरों पर भी धीरे-धीरे मृत्यु की झलक दिखाई पड़ने लगती है |

पिलादेस: ओरेस्त, यदि तुम्हारी साँसों से विष निकलता है तो उससे मरने वालों में मेरा भी नाम होना चाहिए था | क्या मैं अभी भी साहस और प्रसन्नता से भरा हुआ नहीं हूँ ? प्रसन्नता और प्रेम ही हमें बड़े-बड़े कार्य करने के लिए शक्ति प्रदान करते हैं |

ओरेस्त: बड़े-बड़े कार्य ? हाँ, एक समय ऐसा भी था जब हम उन्हें अपनी आँखों के सामने देखा करते थे !

 

अनुवादक
डॉ. प्रशांत कुमार पांडेय 
शोधार्थी 
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय 
नई दिल्ली 
    
रामचन्दर गुप्ता
सेवानिवृत्त असोशीएट प्रोफेसर
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय 
नई दिल्ली 
    

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