‘‘धरती खुशी मना तू बरसात आ गयी है
जो बात कल न थी वह बात आ गयी है।’’
बरसात की पहली बूँद ज्यों धरती में समायी त्यों धरती सोधी खुशबू से महक उठी। नभ-जल-थल के इस अद्भुत मिलन का किसान व कवि के लिए अपना-अपना महत्व है। यह संयोग से कुछ अधिक है कि त्रिलोचन एक तरफ ठाठ-बाट से ठेठ अवधी किसान है और दूसरी तरफ धरती-दिगंत के रचनाकार। वे किसान व कवि दोनों की भूमिका में एक साथ धरती की उपादेयता सिद्ध करने में प्रयासरत दिखते हैं। वर्षा-दृश्य के एक अंश के रूप में गोधूली बेला में इंद्रधनुष की रचना व उसका दिगंत तक विस्तार भी शामिल है। यूँ तो त्रिलोचन का ‘दिगन्त’ (1957) 57 साॅनेट का संग्रह है जिसमें तीन बार ‘इंद्र धनुष’ शब्द का प्रयोग हुआ है किन्तु विश्लेषण इंद्र धनुषी सरीखे सतरंगी रचनात्मक एवं कलात्मक सात बिंदुओं को केन्द्र में रखकर है। जिसमें ‘दिगंत’ नाम की सार्थकता है। दिगंत संग्रह के नामकरण पर टिप्पणी करते हुए नलिन विलोचन ने लिखा था- ‘‘उसकी कविताएँ हिंदी के दिगन्त को निर्धारित करती हैं। यह एक महत्वाकांक्षापूर्ण शीर्षक है किन्तु जैसी कविताओं के संग्रह पर है उसके लिए इससे उपयुक्त शीर्षक नहीं हो सकता था।’’
प्रथमतः स्वर-धारा, प्राणों की धारा, लहरों की जीवन धारा, अपनी राह चला, ‘निशिदिन बिना विराम किये’ आदि वाक्यांश पर गौर करे तो त्रिलोचन को स्वभाविक गतिशीलता एवं निरंतरता का कवि कहने पर संशय न होगा। दिगन्त के प्रायः सभी साॅनेटों में गतिशीलता दिख जाती है जो कि मनमाना न होकर सहज, सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध है और सम्पूर्ण प्रभाव में सौंदर्य विधायक है। ‘जीवन धारा’, ‘स्वर धारा’ या प्राणों की धारा में सौंदर्य निरंतरता के साथ है। अंत तो दिगंत में है। जहाँ पहुँचने के लिए त्रिलोचन ‘निशिदिन बिना विराम किये’ भाषा की लहरों के साथ पहुँचने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसी निरंतरता से त्रिलोचन को अपराजेय रचनात्मक शक्ति मिलता है। प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखा है कि- ‘‘त्रिलोचन जीवन भर कक्कड़ और घुमन्तु रहे हैं। उन्होंने न कविता को सहेजा न जीवन का रख-रखाव किया।… वे चलते फिरते विश्व विद्यालय है, जिसमें कई फैकल्टियाँ हैं। आप जिस विभाग में पढ़ना चाहें पढ़ें।’’ हिंदी के दिगंत पर उदित त्रिलोचन, निरंतर चलते-बदलते रहने में विश्वास रखते हैं। सहेजने की प्रवृत्ति के बरक्स नये का सृजन करते हैं-
‘‘लड़ता हुआ समाज, नई आशा- अभिलाषा,
नए चित्र के साथ नई देता हूँ भाषा’’
कबीर में अस्वीकार का साहस है तो त्रिलोचन में स्वीकार का साहस, पहला उलटबासी का कवि है तो दूसरा सरलता का कवि है किन्तु दोनों रात में जागकर चिंतन करने वाले फकीर हैं-
‘‘क्रांति उन्हीं लोगों के पास पला करती है।
दुख के तम में जीवन ज्योति जला करती है।’’
कबीर (मेरा मुझमें कुछ नहीं) व जायसी (नागमती यह दुनियाँ धंधा) को मिलाकर त्रिलोचन सरलता व सहजता का रंग देते है। सहजता का यह रंग इंद्र धनुषी दिगंत का दूसरा रंग है। वे सहज भाव से कहते है-
‘‘सचमुच, सचमुच, मेरे पास नहीं है, पैसा।
वह पैसा जिससे दुनिया-धंधा होता है।’’
उनकी सहजता ही उनकी कविता का प्राण तत्व है क्योंकि ‘‘सीखा नहीं छिपाना मैने मन के भाव। देख कर घोर अंधेरा।’’ कितना सहज है यह स्वीकृति और सरल स्वभाव। यह आँखों में रहे निराला का परिणाम है। दिगंत की पहला साॅनेट- ‘‘उसने तो झूठे / ठाट-बाट बाधें है। चीज किराए की है।… साॅनेट से मजाक भी उसने खूब किया है। जहाँ तहाँ रंग व्यंग्य का छिड़क दिया है।’’ जो कुछ उधार लिया है उसे बिना दुराव-छिपाव के बताया जो कुछ अपना है वह सरलता से कहा है। न किसी तरह का असमंजस है न बनावटीपन। श्री प्रकाश शुक्ल ने लिखा है कि- ‘‘सहजता त्रिलोचन के कवि की स्वाभाविक परिणति है जिसमें एक निरीहता नहीं, गहरा आत्मविश्वास है। यहाँ एक तरफ जीवन के सहज क्रिया व्यापार हैं तो दूसरी तरफ सामूहिकता का उत्सव है।
इंद्रधनुषी दिगंत में तीसरा रंग आधुनिक भावबोध का नवीन रूप है। त्रिलोचन को लेकर यह उहापोह आलोचकों में दिखता रहा है कि वे आधुनिक कवि हैं या नहीं? यह आलोचक की सीमा हो सकती है न कि त्रिलोचन में आधुनिक भावबोध की कमी क्योंकि सोचना ही (चिंतन) जिसका जीवन है। उसके आधुनिक होने पर संदेह करना स्वयं में संदेहास्पद है। ‘कवि हूँ’ का दृढ़ विश्वास, आधुनिक जीवन बोध का विविध रूपों में आत्मसात करने के पश्चात ही आता है। अतः त्रिलोचन बने-बनाये आधुनिकता के प्रतिमान वाले खाँचे में फिट नहीं बैठते, इसलिए नामवर सिंह कहते हैं- ‘‘त्रिलोचन की कविता एक नए काव्य शास्त्र की मांग करती है।’’
‘‘करता हूँ आक्रमण धर्म के दृढ़ दुर्गों पर,
‘कवि हूँ’, नया मनुष्य मुझे यदि अपनाएगा,
उन गानों में अपने विजय-गान पाएगा।’’
‘‘आज नए ढोगों ने सबकों बहकाया… श्रद्धा रही अब कहाँ?…’’
यह रचनाकार के विवेक द्वारा किया गया आधुनिक परिवेश का मूल्यांकन है, जो आधुनिक होने से एक कदम आगे है। यह नयी कविता के संदर्भ में भी है-
‘‘यह भी क्या जिंदगी, वही दिन, वही सवेरा,
वही रात, तेली के बैल सरीखा फेरा।’’
ध्वनिग्राहक त्रिलोचन भेड़चाल वाली बोझ बनती जा रही आधुनिकता बोध नहीं रखते। अपने खुद के नजरिये से जो ठीक है उसे ठीक कहने का साहस रखते हैं जो आधुनिक होने का बुनियादी शर्त है- ‘‘अगर कोठरी अंधेरी / है तो उसे अंधेरी समझने-कहने का / मुझ को है अधिकार। सिफारिस से, सेवा से / गला सत्य का कभी नहीं घोटूँगा।’’
ध्यान देने की बात यह है कि त्रिलोचन कहने से पहले समझने की बात करते हैं स्वयं के तर्क व विवेक से। कहने की आतुरता नहीं है। बल समझने पर दिया, कहना तो सहज व स्वभाविक है। बकौल रामविलाम शर्मा- ‘‘त्रिलोचन एक खास अर्थ में आधुनिक है, और सबसे आश्चर्य तो यह है कि व आधुनिकता के सारे प्रचलित साँचों को आस्वीकार करते हुए भी आधुनिक है।’’
शुक्ल जी के अनुसार साहित्यकार जनता की चित्तवृत्त को अभिव्यक्ति प्रदान करता है किन्तु जनवादी कवि आमजन की भाव अभिव्यक्ति को दिखाने का प्रयास करता है। जनकवि होने की बुनियादी शर्त जनाभिव्यक्ति के प्रति प्रतिबद्धता है और जो कुछ परिधि से बाहर और केन्द्र में नहीं है किन्तु जनहित में है, उसे कविता के माध्यम से परिधि में लाने का प्रयास करता है। इंद्रधनुषी दिगंत का चैथा रंग जनवादी दृष्टि का केन्द्र में होना है। आम जन की अभिव्यक्ति के लिए राई से पहाड़ तक को कविता का विषय बनाता है मसलन भूख, रोटी, छुट्टा-बधुआ, भिखरिया आदि। यहाँ तक कि भाषा भी आम जन का हो। भूख व रोटी सामान्य जन की प्राथमिकता है क्योंकि सभी क्रियाएँ इसके बाद ही होती है, जिसके लिए गरीब संघर्षरत है।
‘‘प्रेम जागता जीवन यों तो दे जाता है।
मगर पेट के आगे वही हार खाता है।’’
त्रिलोचन स्वयं को पथ का रजकण करने में संकोच नहीं करते है। वे स्वयं भूख-रोटी के लिए संघर्षरत रहे हैं-
‘‘तब मैं हारा थका नहीं था लेकिन
मेरा तन भूखा था, मन भूखा था।’’
दिगन्त का अंतिम साॅनेट ‘अपराजेय’ है जिसमें कवि स्वीकारता है कि हिन्दी कविता, अभाव भाव वाले वर्ग (किसान, मजदूर, गरीब आदि) की कविता है-
‘‘भाव उन्हीं है, जो थे अभावमय।
पर आभाव से दबे नहीं जागे स्वभावमय।।’’
केदारनाथ अग्रवाल से त्रिलोचन की जमीन कड़ी मानते हुए शमशेर ने लिखा है कि- ‘‘उनकी (त्रिलोचन) की दृष्टि खरी और पैनी है और एकदम जनवादी मगर उससे (केदारनाथ) से बिल्कुल भिन्न है।… त्रिलोचन में सृजन की अपार, अकूट, अतुलनीय शक्ति है (जानने वाले ही जानते हैं।)’’
त्रिलोचन भारतीय संस्कृति को कविता के केन्द्र में रखते हैं यह अपने पुरखों से प्राप्त की हुई परम्परा से मिला है। परम्परा के मामले में त्रिलोचन अधिक समृद्ध अनुभव रखते हैं क्योंकि वे कबीर-तुलसी-गालिब-निराला के अपनी-अपनी परम्परा को एक साथ ग्रहण करते हैं और इंद्रधनुषी दिगंत का पाँचवा रंग तैयार करते हैं। माँ, भौजी, भादों आदि का प्रयोग केवल शाब्दिक प्रयोग नहीं है वह भारतीय संस्कृति की घुली मिली भावबोध का भी प्रस्तुतीकरण है। कवि भाभी के स्थान पर भौजी शब्द का प्रयोग करता है और आधुनिक परिवार से गायब भौजी को लेकर खेद व्यक्त करता है। यह भारतीय संस्कृति के प्रति अतीत का मोह है और भावनात्मक संबंधों के बिखराव की टीस है-
‘‘भौजी आज नहीं है, जाता हूँ आता हूँ।
पीछा करते कहाँ किसी को कहाँ पाता हूँ।।’’
‘‘एक होली में कर दी अपने मन की,
रंग दी कनई से यह काया।’’
मलयज ने अपने लेख में लिखा था कि- ‘‘त्रिलोचन की कविता एक ठेठ भारतीय जन की कविता है… वह इस देश की जातीय काल परंपरा का वह चिन्ह समूह है जिसके नक्श यहाँ के औसत आदमी के दिलो-दिमाग पर अब भी कायम है।’’ दूसरे शब्दों में त्रिलोचन शब्दों का प्रयोग शब्द के सांस्कृतिक भाव बोध जन संस्कार के साथ जोड़कर करते हैं।
हिन्दी साहित्य के आकाश में त्रिलोचन व सानेट एक-दूसरे के पूरक हैं साथ ही पर्याय भी। त्रिलोचन व सानेट की कदकाठी एक है किन्तु त्रिलोचन अपनी सृजनात्मक प्रतिभा से साॅनेट के तंग रास्ते को भावी कवियों के लिए विस्तार देते हैं। चीज किराये (सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन किट्स आदि) की है किन्तु नकल नहीं। रोला छंद का प्रयोग और बिंब विधायन क्षमता दोनों सौनेट को नयी शक्ल देते हैं। ‘रोला छंद’ प्राचीन परंपरा से ग्रहण किया और ‘बिम्ब विधायन’ आधुनिक परंपरा से दोनों को मिलाकर साॅनेट को कोलाज बनाते हैं-
‘‘अपनी राह चला आँखों में रहे निराला।’’
‘‘तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुम से सीधी
मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो।’’
‘‘गालिब गैर नहीं अपनों से अपने हैं,
गालिब की बोली ही आज हमारी बोली है।’’
गद्य कविता को गेयात्मक बनाने की क्षमता का नाम त्रिलोचन है। यही सातवां रंग है किन्तु अंतिम नहीं। संघर्षशील कवि ने अपनी जीवन की लय को कलात्मक कौशल से कविता में उतार दिया है और गद्य गीत हो गया। केदार नाथ सिंह त्रिलोचन के कौशल की पड़ताल करते हुए लिखा है कि- ‘‘भाषा के प्रति त्रिलोचन एक बेहद सजग कवि हैं- एक ऐसे कवि जो अपनी भाषा की समस्त गूंजों और अनगंूजों को बखूबी जानते हैं और एक रचनाकार की हैसियत से उनके प्रति गहरा सम्मान का भाव रखते हैं।’’
‘‘भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है,
गति में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है।’’
यही कारण है कि अभावमय होने के बावजूद कवि विश्वास से भरा है। अपराजेय कवि विजय श्री तक पहुँचकर ऊँची पताका फहराता है और तुलसी बाबा को पुनः याद करता है- ‘‘सौरज धीरज तेहि रथ चाका।’’ संपूर्ण दिगंत के प्रभाव को इस बात से समझा जा सकता है कि कवियों के कवि शमशेर के प्रिय आधुनिक हिन्दी कवि त्रिलोचन है और यह अकारण ही नहीं है। त्रिलोचन के शब्दों में कहें तो-
‘‘बात कुछ होती है कुछ लोग उड़ा देते हैं,
कब त्रिलोचन से थी पहचान कोई कह तो दे।’’

संदर्भ ग्रंथ
1. दिगंत- त्रिलोचन, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2006
2. त्रिलोचन संचयिता- स. धु्रव शुक्ल, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2002
3. प्रतिनिधि कविताएँ- सं. केदारनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2014
4. त्रिलोचन के बारे में- सं. गोबिन्द प्रसाद, ईशा ज्ञानदीप प्रकाशन, संस्करण 2014
5. लोकचेतना वर्ता- त्रिलोचन जन्मशती अंक-2018, संपादक- रविरजन, वेंकटेश कुमार
6. कविता की जमीन और जमीन की कविता- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2011
7. चुनौती-विशेषांक के त्रिलोचन, सितम्बर 2018, संपादक- सुरेन्द्र प्रसाद सुमन
8. कवि परम्परा: तुलसी से त्रिलोचन- प्रभाकर क्षोत्रिय, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, संस्करण 2013
9. सृजन सरोकार- अक्टूबर-दिसम्बर, 2017, संपादक- गोपाल रंजन

 

शोधार्थी
शिवम सिंह
हिन्दी विभाग,
टी.डी.पी.जी. काॅलेज, जौनपुर

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