आधुनिक युग का दौर प्रतियोगिताओं का दौर है। हर तरफ प्रतियोगिता ही प्रतियोगिता है। मनुष्य को इस तनाव, चिन्ता व प्रतियोगिता के दौर में जीने व इसके साथ चलने के लिए बहुत सी विशेषताओं से संलग्न होना जरूरी है जैसे स्वस्थ, तंदुरुस्त, होशियार, बुद्धिमान, चुस्त, संयमशील, ऊर्जावान, शक्तिशाली इत्यादि। इन सब विशेषताओं के लिये मनुष्य के लिए शारीरिक गतिविधियों एवं खेलों का अभ्यास बहुत ही आवश्यक हो गया है। आज का युग तकनीक का युग है और मनुष्य चारों तरफ से इलेक्ट्रोनिक उपकरणों से घिरा हुआ है। ये इलेट्राॅनिक उपकरण मानव के अभिन्न अंग बन गये है जैसे कम्प्यूटर, टेलीविजन, मोबाइल फोन, लैपटाप, दूरभाष यंत्र, कैलकुलेटर इत्यादि और इन उपकरणों का प्रयोग करते करते मनुष्य इन उपकरणों का दास बनता जा रहा है। वह इन उपकरणों के साथ इतना व्यस्त हो गया है कि अपने स्वास्थ्य का ध्यान करना ही भूलता जा रहा है, और शारीरिक गतिविधियों से दूर हो गया है। बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक सभी इन्हीं उपकरणों पर आश्रित है और उनके कारण शारीरिक गतिविधियों का महत्व कम हो गया है। पारंपरिक खेल जैसे गुल्ली-डंडा, स्टापू, गिट्टे, लंगड़ी टांग, गैलरी इत्यादि की जगह कम्प्यूटर एवं मोबाइल के खेलों ने ले ली है। ये खेल मनुष्य के चर्तुमुखी विकास को प्रभावित करते थे और इन्हीं खेलों से शरीर में ताकत, लचीलापन संतुलन एवं इसके अतिरिक्त एकाग्रता, अनुशासन एवं टीम भावना आदि भी जागृत होती थी। परन्तु आज के इस गतिहीन जीवन शैली से मनुष्य बीमारियों से ग्रस्त होता जा रहा है जैसे मधुमेह, मोटापा, कैंसर अस्थि सुषिरता, उच्च रक्त चाप एवं हृदय की बीमारियां इत्यादि। इसके अतिरिक्त यह जीवन शैली मनुष्य को कमजोर एवं असहाय, आश्रित बनाती जा रही है।

तनाव एवं चिन्ता के इस दौर में खेल ही एक ऐसा माध्यम है जो मनुष्य का इस तनावपूर्ण, चिन्तामय एवं प्रदूषित वातावरण से मुक्त कर सकते हैं। खेल ना केवल शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करता है अपितु तनाव, चिन्ता, अनिश्चितता, उत्तेजना आदि से भी युक्त कर, आत्मविश्वास को बढ़ाते हुए एक अच्छा जीवनयापन करने में मदद करते हैं।
खेल मनुष्य के उत्पन्न होने के साथ ही प्रकृति से उपहार स्वरूप में मिले है। बच्चा जब तक खेलता है तब तक उसे कभी भी तनाव नहीं होता है। बच्चे की शारीरिक गतिविधियाँ उसके शारीरिक एवं मानसिक विकास में मदद करती है। मनुष्य सदा से ही कर्मशील रहा है, चाहे आदिमानव हो या आधुनिक मानव। परन्तु अन्तर बस इतना है कि आदिमानव प्रकृति से अधिक जुड़ा हुआ था और शारीरिक कार्य ज्यादा करता था, आधुनिक मानव मानसिक तौर पर ज्यादा व्यस्त रहता है। मानव शरीर की प्राकृतिक बनावट ऐसी है कि वह श्रम करता है तो स्वस्थ व तंदुरुस्त रहता है और उसके सभी अंग एवं तंत्र सुचारू रूप से कार्य करते हैं। परन्तु मनुष्य के अविष्कारों ने हर कार्य को स्वचालित कर दिया है जिसके परिणाम स्वरूप मनुष्य को एक गतिहीन दिशा की तरह धकेल दिया है। इसका दुष्प्रभाव केवल बच्चों के जीवन पर ही नहीं बल्कि महिलाओं एवं पुरुषों, व्यस्को, बुजुर्गों अथवा किसी भी वर्ग एवं आयु के व्यक्तियों के जीवन पर पड़ा है। एक दौर में बच्चे घर के बाहर अपने दोस्तो के साथ खुले मैदान में खेलना पसंद करते थे। वहीं आज घर के अन्दर मोबाइल के साथ खेलना पसंद करते हैं। व्यस्क जो अपने कार्य के अतिरिक्त समय में अपने मित्रों के साथ समय व्यतीत करते थे वे भी टेलीविज़न, कम्प्यूटर, मोबाइल पर ही व्यस्त रहते हैं। बच्चों के बचपन की किलकारी, हंसी मस्ती की जगह अब तनाव, चिन्ता एवं आलस्य ने ले ली है। इसके अतिरिक्त किताबों का बढ़ता बोझ एवं हर कदम की प्रतियोगिता और खेलों का कमी शारीरिक विकास को कम कर रही है। आँखों पर चश्मा, स्थूलता, कमर का झुकना, आलस्य, भूख की कमी इत्यादि अभाव बचपन से प्रभावित कर रहे हैं। मोबाइल के कुछ खेल जैसे ब्लयू वहेल, मोमो, साल्ट और आईस इत्यादि बच्चों में निराशा का स्थिति भी उत्पन्न करते हैं जो उनके आत्मविश्वास का अन्त कर करके उसको अनिश्चितता के गर्त में धकेल देते हैं।
आधुनिक युग की इस जीवन शैली को देखते हुए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि मानव को एक नई जीवनशैली का अत्याधिक आवश्यकता है जो कि मनुष्य को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ बनाये।
खेल एक वास्तविक शक्ति है जो जीवन को सही तरह से जीने की प्रेरणा देता है। खेलों के माध्यम से ही मनुष्य की योग्यता का सही आकलन करके उसको प्रयोग में लाया जा सकता है। खेल मनुष्य को अपनी योग्यता के अनुसार दिशा एवं उद्देश्य निर्धारित करने में मदद करते हैं खेल में लगातार अभ्यास करने व भाग लेने से मनुष्य के संस्कारों में खेलों की सभी विशेषताएँ जैसे साहस, लचीलापन, मजबूत दिल, मुस्तैदी, स्फूर्ति, एकाग्रता, धैर्य, बलवत्ता, मन व इन्द्रियों का काबू करने की कला, त्याग, परिश्रम, सहयोग इत्यादि उसके व्यवहार में समाहित हो जाते हैं और यही विशेषताएँ उसे देश, समाज, परिवार, मित्रों, कार्यालय, विद्यालय से जोड़ देती है। खेलों की ये विशेषताएँ देश के लिये एक ऐसा नागरिक उत्पन्न करने में सहायता करती है जो अपने देश, परिवार, समाज की रक्षा करने के लिए पूर्ण आत्म विश्वास के साथ हमेशा तत्पर रहता है।
आधुनिक युग प्रतियोगिताओं का दौर है। प्रत्येक व्यक्ति एक सुन्दर, विद्वान, प्रभावशाली, आलोचक, बुद्धिजीवी, स्वयं को अधिक आकर्षक प्रस्तुत करना पड़ता है। इस प्रतियोगिता के दौर में स्वयं को पूर्ण रूप से साबित करने के लिये उसे अनेक मुश्किलों के दौर से गुजरना पड़ता है। और उक्त लिखित विशेषताओं को पाने के लिये दिन रात मेहनत करनी पड़ती है। इसके लिये खेल ही एक मात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य परिश्रम करके अपने आपको समर्थ बना सकता है। खेलों के क्षेत्र में अपना नाम स्थापित करने वाले ऐसे बहुत से नाम है जिनको किसी परिचय की जरूरत नहीं होती, ऐसे बहुत से नाम है जिन्होंने अपने अथक परिश्रम से अपने आप को सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध किया है जैसे सचिन तेंदुलकर (क्रिकेट), मिल्खा सिंह (एथलेटिक्स), पी.वी. संधु (बैड़ मिन्टन), सुशील कुमार (कुश्ती) राज्यवर्धन सिंह राठौर (निशाने बाजी) इत्यादि।
खेलों में भाग लेने से शरीर में आक्सीजन का मात्रा बढ़ती है और मस्तिष्क को आॅक्सीजन की अधिक मात्रा मिलने से मस्तिष्क की कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है और कार्य की उपलब्धि भी बढ़ जाती है। खेलों में प्रतियोगिता से शरीर में रक्त संचालन पूर्ण हो जाता है और शरीर के सभी अंग सुदृढ़ एवं शक्तिशाली हो जाते हैं। मांस पेशियाँ गठित हो जाती है। शरीर सुडौल एवं गठित हो जाता है। अतिरिक्त वसा एवं कैलोरी कम हो जाती है जिससे शरीर आकर्षक लगता है। खेल केवल शरीर को आंतरिक स्वास्थ्य ही नहीं देते अपितु खेलों में भाग लेने से आप स्वस्थ रहते हैं और स्वस्थ व्यक्त ही अपने किसी भी कार्य को सुचारू रूप से पूर्ण कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति अधिक से अधिक मेहनत कर सकता है, एवं कुशलता लाने के लिये उस कार्य को बाम्बार कर सकता है जबकि बीमार या अस्वस्थ व्यक्ति किसी भी कार्य को अच्छी तरह से नहीं कर सकता और न ही अपना उद्देश्य प्राप्त कर सकता है।
किसी भी कार्य को करने के लिय ऊर्जा का होना बहुत आवश्यक है। खेलों में भाग लेने से शरीर के सभी तंत्र जैसे श्वसन तंत्र, परिसंचरण तंत्र, मांसपेशीय तंत्र, पाचन तंत्र आदि सुचारू रूप से कार्य करते हैं। और शरीर में ऊर्जा का उत्पादन अधिक हो जाता है। जिससे कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है और प्रदर्शन एवं उपलब्धियां भी बढ़ जाती है। ऊर्जा क्षीणता कार्य के प्रदर्शन को कम कर देती है।
एक सक्षम नेतृत्व किसी भी टीम या कम्पनी की उन्नति के लिय बहुत ही आवश्यक है। अच्छा नेतृत्व ही टीम के सभी सदस्यों में सामंजस्य स्थापित कर सकता है और उनको प्रेरित कर, एक जुट होकर किसी भी उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है। खेल खिलाड़ी में नेतृत्व करने की क्षमता पैदा करता है। किसी भी प्रतियोगिता में जीत को हासिल करने के लिय एक कुशल नेतृत्व की आवश्यकता होती है जो खिलाड़ियों की कार्यकशुलता को देखते हुए उनको सही समय में कहाँ पर प्रयोग में लाना है और टीम के सभी खिलाड़ियों में एकता स्थापित करते हुए लक्ष्य को प्राप्त करना है।
खेलों में भाग लेने से खिलाड़ी के जीवन में ऐसे बहुत से नैतिक मूल्यों का समावेश हो जाता है जो स्वस्थ जीवन का आधार है। जैसे संयम, त्याग, परिश्रम, इन्द्रियों को काबू में लाने की कला, आत्म विश्वास, मुस्तैदी, एकाग्रता, आदर सत्कार, सहनशीलता, भाई चारा, अनुशासन इत्यादि। ये नैतिक मूल्य जीवन की किसी भी कठिनाईयों या परिस्थिति में आपको सुदृढ़ बनाते हैं एवं जीवन को अपने नियमों के अनुसार यापन करने में सहायता करते हैं।
खेलों में लगातार परिश्रम करने से खिलाड़ी स्वयं को एक अच्छे स्तर पर ले जाने में समर्थ हो जाते हैं। खिलाड़ियों का अथक परिश्रम उन्हें अच्छे प्रदर्शन पर उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर भी प्रदान करती है और इसके आधार पर खिलाड़ियों की विभिन्न विभागों में नौकरियों के अवसर प्रदान किये जाते हैं और उन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित पदों पर भी आसीन किया जाता है। और विभाग में अपने अच्छे प्रदर्शन के लिये सम्मानित भी किया जाता है। लगातार और लम्बे समय तक परिश्रम करने की क्षमता से वे कहीं भी कार्यरत होकर लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम रहते हैं।
सभी देशों की संस्कृति एवं सभ्यता कहीं न कहीं खेलों से जुड़ी हुई है। प्रतियोगिता के दौरान विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एवं खिलाड़ी भाग लेते हैं और आपस में अपने देशों कि संस्कृति एवं सभ्यता एवं विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इससे आपसी सहयोग एवं मेलजोल की भावना विकसित होती है
खिलाड़ी जब किसी संस्था, विद्यालय, महाविद्यालय या देश का प्रतिनिधित्व करते हैं तो वह पूरी तरह अपनी इस संस्था का समर्पित होते हैं और अपनी सम्पूर्ण शक्ति अपनी संस्था के लिये ख्याति लाने में लगा देते हैं, चाहे वह टीम के सदस्य हो या व्यक्तिगत रूप से भाग ले रहे हो। उनकी निष्ठा केवल अपने देश या अपने संस्था के लिये ही समर्पित होती है और यही निष्ठा की भावना उनमें सदा ही समाहित होती है।
खेलों में भाग लेने के लिये किसी भी खिलाड़ी के नियमों के दायरे में रहना होता है। और एक अनुशासन के अन्दर रहकर ही वह खेल का भागी हो सकता है। अनुशासनहीनता खिलाड़ी को खेलों से बाहर कर सकती है, इसी तरह अच्छी तरह पर प्रदर्शन करने के लिये उसे लगातार लम्बे समय तक अथक परिश्रम करना पड़ता है। अभ्यास के दौरान समय की पाबन्दी भी रखनी जरूरी होती है। इस तरह लगातार इन नियमों का पालन करते हुए यह उनके स्वभाव में ही सम्मलित हो जाते हैं जो एक अच्छे व्यक्तित्व के गुण है।
खिलाड़ी अच्छी तरह से तभी प्रदर्शन कर सकते हैं जब वह बुरी आदतों के सेवन से बचे रहे अन्यथा ये पदार्थ उनके खेल जीवन पर बुरा प्रभाव डाल सकती है। जैसे शराब, सिगरेट, मादक पदार्थ, नशीले पदार्थ, इत्यादि ये सभी पदार्थ खेलों के प्रदर्शन को हमेशा के लिये खराब कर सकते हैं। इसी तरह इन पदार्थों का सेवन खिलाड़ी ही नही सामान्य व्यक्ति के जीवन को भी बर्बाद कर सकते हैं। इनका सेवन ना करने वाले व्यक्ति ही प्रभावशाली तरीके से जीवन यापन कर सकते हैं।
खेलों में खिलाड़ी सदा ही टीम के अन्य सदस्यों के साथ रहता है और उसे अनुशासन के नियमों का पालन भी करना होता है उसको निर्धारित सीमा के अन्दर रहकर ही सुविधाओं का लाभ उठाना पड़ता है और इसके लिये वह अपने सहयोगियों के साथ ही, एक दूसरे को सहयोग करते हुए टीम में रहता है। खेल में भाग लते हुए भी सभी सदस्य एक दूसरे का सहयोग करते हुए, जोश दिलाते हुए, प्रेरित करते हुए, शाबासी देते हुए जीत की ओर अग्रसर होते हैं। यही आचरण उनको परिवार में, समाज में, कार्यालय में, देश में सामंजस्य स्थापित करने में मदद करता है।
आज की प्रतियोगिता के दौर में हर मनुष्य भागदौड़ की जिन्दगी जी रहा है। और इतनी व्यस्तता से उसे बहुत कम समय ही मिल पाता है और वह उस समय को अच्छे से व आराम के मूड में बिताना चाहता है। खेल इस कीमती समय को व्यतीत करने का एक उत्तम साधन है जो मन की शान्ति व आराम के साथ-साथ स्वस्थ और तंदुरुस्त भी रखता है। खेल जीवन का जीवन्त बनाते हैं। खेल परेशानियेां को सहजता पूर्वक हल करने में सहयोग करते हैं और यही अनुभव हमें जीवन की कठिनाइयों को भी सहज मन एवं बुद्धिमता से हल करने में सहयोग करते हैं। खेल आंतरिक खुशी प्रदान करते हैं और तनाव, चिन्ता, इत्यादि को दूर करते हैं। खेल खेलते समय मनुष्य सब चिन्ताओं और परेशानियों को भूलकर पूर्ण रूप से तन्मय होकर भाग लेता है और खुशी महसूस करता है। यह आत्मिक खुशी उसे जीवन की तरह सकारात्मक बनाती है और वह आत्म विश्वास का अनुभव करता है और यही आत्मविश्वास उसको सफलता की तरफ ले जाता है।
निष्कर्षः-
मनुष्य का जीवन बहुत ही महत्वपूर्ण है। लेकिन एक अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिय शरीर का स्वस्थ होना जरूरी है, जैसाकि कहा गया है कि “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है।” परन्तु आधुनिक युग की इस प्रतियोगिता से पूर्ण एवं भागदौड़ की ज़िदगी में मानव अपने स्वास्थ्य के बारे में भूल ही गया है। नई तकनीकों के आविष्कारों से शारीरिक श्रम भी बहुत कम हो गया है। तभी वह बीमारियों से ग्रस्त होता जा रहा है। तकनीकी आविष्कार हमारे लिये कुछ हद तक तो सहायक भी है परन्तु हमारी जीवन शैली पूर्णतया इस प्रर आश्रित ना हो इसलिये हमें उपकरणों एवं शारीरिक श्रम में सामंजस्य बनाना अति आवश्यक हो गया है। खेल ना सिर्फ जीवन में रौनक लाते है अपितु शरीर को एक नई ऊर्जा भी प्रदान करते है। पुरातन काल में जीवन शैली इस प्रकार थी कि मनुष्य जाने अनजाने शारीरिक श्रम कर लेता था किन्तु आधुनिक युग में भोग विलासिता के साधन उपलब्ध होने के कारण मनुष्य का जीवन मशीनों पर निर्भर हो गया है। उसके पास आने जाने के लिय वाहन, बातचीत करने के लिये दूरभाष यंत्र और मनोरंजन के लिये यांत्रिक खेल उसके आसपास उपलब्ध है। इस सुविधाजनक उपलब्धता की परिणिति उसके अक्षम शारीरिक विकास और तंदुरूस्ती से नियामक के विघटन के रूप में सामने आये हैं। इसीलिए आधुनिक जीवन में खेल ना सिर्फ तंदुरुस्ती प्रदान करते हैं अपितु अन्य लाभ जैसे आपसी मेल-मिलाप, भाईचारा, स्वास्थ्य आदि-आदि भी स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। खेलों में जीवन का सम्पूर्ण आनन्द प्राप्त करने की चेष्टा कीजिए।

 

डाॅ. सुनीता अरोड़ा
सहायक प्रोफेसर
शारीरिक शिक्षा विभाग
लक्ष्मीबाई काॅलेज,
दिल्ली विश्वविद्यालय

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