अपने समय और समाज की यथार्थ स्थिति का उद्घाटन निरूपण व प्रस्तुतीकरण करना ही साहित्य का लक्ष्य है। साहित्य युगीन तब बनता है जब वह अपने समय समाज व जन-सामान्य की पक्षधरता करता है उनसे जुड़ाव रखता है। साहित्यकार जब तक अपने युग समाज व परिस्थिति का चित्रण करने में सफल नहीं होगा तब तक वह अपनी पीढ़ी के साथ न्याय नहीं कर पायेगा। ज्यॉपाल सार्त्र ने ठीक ही कहा था- “एक युग का साहित्य अपने युग को आत्मसात करने के अतिरिक्त और क्या है”

        आदिवासी कविता आज के मनुष्य की हालात उसकी सामाजिक स्थिति और नियति की पहचान कर उससे जूझने और संघर्ष या आत्म-संघर्ष की दशाओं को अभिव्यक्ति देने का प्रयास करती है। समाज के हाशिए से छूटे हुए लोगों को मुख्य धारा में ले जाने की वकालत करती है। समकालीन कविता में स्त्री दलित और आदिवासी समाज की स्थिति पर पुनर्मूल्यांकन होने लगा है। साहित्य और समाज दोनों ही में ये हमेशा हाशिए पर रहे हैं। संविधान में प्रावधान होने के बाद भी इन हाशिए के लोगों में अपने संघर्ष के खिलाफ व्यापक पैमाने पर संघर्ष करने की चेतना शक्ति विकसित हुई। जिसे उत्तर-आधुनिक समय में विमर्श के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में आदिवासी विमर्श इसका ज्वलंत प्रमाण है। आदिवासी किसी भी देश के मूल निवासी को कहा जाता है। भारत के संदर्भ में कहा जाये तो प्रायः जंगलों तथा पहाड़ी प्रदेषों में रहा करते हैं। जो अति पिछड़े हुए है। जंगलों तथा दुर्गम भागों में रहने वाली ये जातियाँ साधन सुविधाओं से वंचित तो हैं ही साथ ही अषिक्षा के कारण अपनी रूढ़ि और परम्परा के चंगुल से बाहर नहीं आ पायी है। आम धारणा है कि आदिवासी समाज के संदर्भ में किया जाने वाला चिंतन              आदिवासी विमर्श है।

        प्रत्येक समय के समाज में सामान्यः दो शक्तियाँ विकसित होती रहती हैं। एक शोषक वर्ग जो परोपजीवी होकर अनेक प्रकार का पाखंड रचता है। दूसरी जन संघर्ष की शक्ति जो अस्तित्व के लिए सामाजिक मूल्यों के संरक्षण के लिए सदैव कार्यरत रहती है। समकालीन आदिवासी कविता इन्हीं मूल्यों के संरक्षण व बदलते मिजाज की कविता है। जिसमें शोषक वर्ग से मुक्ति तथा शोषित वर्ग के संघर्ष शक्ति को सुदृढ़ करने पर बल दिया गया है। आदिवासी कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से भोगे हुए यथार्थ और अपने समय की सामाजिक समस्याओं को व्यक्त किया है। आदिवासी कविताओं में नारी का जीवन-संघर्ष अस्तित्व संकट विस्थापन विभिन्न सामाजिक विद्रोह और शिक्षा जैसी समस्याएं प्रमुख रूप से देखी जा सकती है। निर्मला पुतुल-समस्याओं को सजगता से परखती हैं-आज की तारीख के साथ/कि गिरेंगी बूँदें लहू की धरती पर/उतना ही जनमेगीं निर्मला पुतुल/हवा में मुट्ठी बँधे हाथ लहराते हुए।

2

        आदिवासी स्त्रियों ने अपने हक और अधिकारों के लिए पुरूषों के साथ मिलकर समाज और शासकों का सामना किया है। स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को निडरता के साथ उठाती हैं। अस्तित्व व अस्मिता का संकट यदि है तब उसका विरोध विद्रोह के अलावा दूसरा हो ही क्या सकता है ग्रेस कुजूर समय की विसंगति को निरखती हुई उस पर व्यंग्य करती हैं- हे संगी। तानो अपना तरकस/नहीं हुआ है भोथरा अब तक/बिरसा आबा का तीर/मैं बनूंगी एक बार और सिनगी दई।3

        समकालीन कविता के उन्नायक विनोद कुमार शुक्ल समय और सर्जना की गहरी पड़ताल करते हुए वर्तमान मनुष्य की मानवेतर क्रिया-कलापों को आदर्श समाज निर्माण में बाधा मानते हैं। मनुष्य कितना गैर जिम्मेदार व समाज व्यवस्था की निर्मिति में अपनी कर्तव्यनिष्ठता को भूल गया है उन्हीं विसंगति बोध की ओर इशारा करते हुए दिखायी पड़ते हैं- एक अकेली लड़की को/घने जंगल जाते हुए डर नहीं लगता/बाघ षेरों से डर नहीं लगता/पर महुआ लेकर गीदम के बाजार जाने से/डर लगता है।4

अनेक गैर आदिवासी कवियों ने सभ्यता संस्कृति अर्थव्यवस्था की सजग आलोचक की भाँति पड़ताल की है किन्तु जब आदिवासी स्वयं कलम उठाते हैं तो वह उनकी अपनी स्वानुभूति व अपने साथ हो रहे अन्याय अत्याचार अस्तित्व संकट विस्थापन अस्मिता बोध नक्सलबाड़ी कहलाने का दंश असभ्य व बर्बर आदि विषेशणों पर अपने तरीके से विचार करते हैं। चूँकि वह उनका अपना भोगा हुआ यथार्थ होता है। हिन्दी ही नहीं अन्य भाषाओं के आदिवासी कवि भी प्रमुख रहे है- महादेव टोप्पो रामदयाल मुण्डा हरिराम मीणा लक्ष्मण टोपले उषा किरण भुजंग मे श्राम पाल लिंग दोह निर्मला पुतुल ग्रेस कुजूर वंदना टेटे अनुज लुगुन आदि। नाम उल्लेखनीय है। अनेक भाषाओं जैसे- वोडो संथाली खड़िया मुण्डा गारो मिजो आदि में आदिवासी साहित्य रचा जा रहा है।

        विकास की धारा से अछूते आदिवासियों की एक प्रमुख समस्या असुरक्षा की है। वह जानवरों के बजाय मनुष्य से ही सर्वाधिक भयभीत है चूँकि भूमण्डलीकरण उदारीकरण एवं वैश्वीकरण का प्रभाव आज मनुष्य पर इतना अधिक हो गया है कि उसमें संवेदनात्मक शून्यता की स्थिति बनती जा रही है। आदिवासी कवि अपनी कविताओं में वंचितों की आवाज दर्द पीड़ा को सम्पूर्णता में चित्रित कर रहे हैं। आदिवासी समाज अपनी संस्कृति अपनी अस्मिता और जीवन सत्य को पहचानने लगे हैं। विनोद कुमार विष्वकर्मा की कविता अपने ही घर में उल्लिखित है-अपने ही घर में/अपमानित-पीड़ित-शोषित/शिक्षा और मौलिक अधिकार से विहीन/अपनी पहचान छुपाये/सशंकित और अभिशप्त जीवन जी रहे हम/… हमने भी दिया है अपना बलिदान/अब हमें और दर किनार नहीं किया जा सकता।5

        आदिवासी कवि अपनी कविता में परम्परा के साथ आधुनिकता व उससे भी एक कदम आगे उत्तर-आधुनिकता पर विचार करता हुआ भविष्य को चिन्हित करता है। आधुनिकता और परम्परा के अंतरद्वंद और मनुष्य के भविष्य की सूचना आदिवासी युवा कवि अनुज लुगुन की कविता देती है-कट रहे हैं वृक्ष/माफियाओं की कुल्हाड़ी से और बढ़ रहे हैं कंकरीट के जंगल/ दांडू जाए तो कहां जाए/कटते जंगल में/या बढ़ते जंगल में।6

विस्थापन आदिवासियों की एक प्रमुख समस्या रही है। भारत में विकास के नाम पर 1951-1990 के बीच करीब 2 करोड़ 13 लाख आदिवासी विस्थापित हुए हैं जिनमें से कोई 53 लाख का तो किसी तरह से पुनर्वास किया गया। शेष गणना की संज्ञा से परे हैं। विकास का आधार लेकर गाँव के गाँव बांधों अभ्यारणों के नाम पर सरकारों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा अधिगृहीत कर लिए गये। जो आदिवासी विरोध किए उनको नक्सलवादी घोषित कर मार दिया गया। महिलाओं के साथ व्यापक स्तर पर अनाचार हुए। बाकी लोग शहर कस्बों की झुग्गियों में नारकीय जीवन जीने को अभिषप्त हो गये। (जनसत्ता 14 दिसम्बर 2014)

        जंगल आदिवासी जीवन संस्कृति का एक प्रमुख उपादान है जिसमें उनका जीवन रचा बसा है। किन्तु जब वहाँ फैक्ट्रियाँ या अट्टालिकाएं खड़ी कर दी जाएगी उस समय आदिवासी कहाँ जायेगा। यहाँ जीवन मूल्य व अस्मिता का संकट है। आधुनिकताबोध जंगल काटने व विस्थापन में नहीं बल्कि विस्थापित को भी प्रश्रय देने में होनी चाहिए। कवि अनुज लुगुन विकास के इस पैमाने को प्रश्नांकित करते हुए उसकी धारणा और गति के बदलाव पर बल देते हैं।

        आदिवासी कौन है यह उनकी पहचान और इतिहास का प्रश्न है उन्हें जनजाति कहने से उनके अस्तित्व पर ही एक सवाल पैदा होता है। हमारे देष की राजनीतिक पार्टियाँ व उनके संगठित दल लम्बे अर्से से बनावासी के रूप में उनका नया नामकरण करने को प्रयासरत हैं। वे घर वापसी का नारा देकर उनकी पहचान मिटाने पर अमादा हैं। साथ ही धर्म के नाम पर उन्हें आपस में लड़ाकर उनकी संस्कृति को आपस में मिला लेना चाहती है।

    जल जंगल और जमीन से जुड़ाव आदिवासी जीवन का अभिन्न अंग है। आदिवासी कविता उन बाहरी ताकतों को चिन्हित करती है। जो अपने लाभ के लिए उनके खिलाफ साजिश कर रहे हैं। अपनी स्वतंत्र चित्त प्रवृत्ति के बरवस बाहरी सत्ता की अधीनता को उन्होंने सदैव नकारा है उसका जमकर प्रतिरोध किया है। वर्तमान में आदिवासियों का अस्तित्व संकट व पहचान की समस्या लगातार गहराती जा रही है। लोग उन्हें मनुष्य के तौर पर नहीं बल्कि वनवासी जंगली असभ्य मनुष्य के रूप में परिभाषित करते हैं। आदिवासी समाज की इस विडम्बनापूर्ण स्थिति को निर्मला पुतुल की कविता अभिव्यक्त करती है-इन खतरनाक शहरी जानवरों को पहचानों चुड़का सोरेन पहचानो/ .. तुम्हारे भोलेपन की ओर में/इस पेंचदार दुनिया में रहते/7

        निर्मला पुतुल बाहरी आततायियों से भोले-भाले आदिवासियों को सचेत करती हैं। उनकी मंशा को पहचानने की बात करती हैं जिससे आम आदिवासीजन उनकी चंगुल में न फँस सकें। वे एक अलग ही तेवर में प्रस्तुत होती हैं-ये वे लोग हैं जो हमारे ही विस्तर पर करते हैं/हमारी बस्ती का बलात्कार/ और हमारी ही जमीन पर खड़ा हो पूछते/हमसे हमारी औकात।8

        आदिवासी संचेतना से लबरेज युवा कवि मुन्ना साह की कविता डेहरी में व्यक्त की गयी चिंता भी आदिवासी समय और समाज की चिंता है। मुन्ना साह की कविता किसी विराट व भव्य की कामना नहीं करती और न ही विराट बुनती हैं बल्कि समय और समाज के बिखराव को महसूस कर मूल्यों के हृस का दिग्दर्षन कराती हैं-मिट्टी की बनी चीज/पत्थर के घर में/क्या शोभा देती हैइस्पात से बना डेहरी का बहुरूपिया/आ-गया था।/पत्थर दिल भी होते/पत्थर के घर भी/न मिट्टी बची/न मिट्टी सा हृदय।9

        आदिवासी कृत्रिमता के बजाय प्रकृति में आस्था रखता है। प्रकृति समरसता के भाव पर अवलम्बित होती है। कहीं कोई भेद भाव नहीं करती सभी से प्रेम करती है। किन्तु मनुष्य भौतिकतावादी होता जा रहा है। विकास की इस अंधी दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन कर रहा है। जिससे प्राकृतिक असंतुलन पैदा हो रहा है। अनेक प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं। मानवीय संवेदनाएं खत्म होती जा रही है। आदिवासियों तथा स्त्रियों की दयनीय दषा का जिम्मेदार कुछ हद तक हमारा सभ्य व तथाकथित पढ़ा लिखा समाज है। जो उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर रखा है। आदिवासियों के तन मन व अपमान की अनेक कहानियाँ हैं जिसे व्यक्त करने की आवष्यकता पर युवा कवि बल देता है-दर्द है सभी में/जुबां है बंद/आंखों में पानी है/पर हंसी का आवरण/निगल रहा है पीड़ा को/नहीं उसकी अभिव्यक्ति को/यह कैसी पीड़ा है धर्म अर्थ काम की/तन मन या अपमान की/प्रश्न अनंत हैं।10

        आदिवासी कविता मुख्य धारा के साहित्य से हटकर अपनी एक अलग पहचान का साहित्य रचती है साथ ही आदिवासियों के जल जंगल जमीन जानवर भुखमरी कुपोषण तथा उनके सामाजिक    सांस्कृतिक जीवन के अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। चूँकि आदिवासियों के प्रति मुख्यधारा का दृष्टिकोण नकारात्मक ही रहा है। इसलिए उनकी दृष्टि में वे अभी भी आदिवासी ही हैं। फिर भी वे आशान्वित हैं अपने सपनों को सकारात्मकता की ओर ले जाने के लिए -राहें खत्म नहीं हुई/कई और फासले तय करने हैं/शायद रास्ता एक ऐसा बनाना है।/जो अब तक तय नहीं किया गया।11

        वैश्वीकरण के इस दौर में सर्वाधिक दोहन प्राकृतिक संसाधनों का हो रहा है। और ये प्राकृतिक संसाधन आदिवासी क्षेत्रों में ही हैं। अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आदिवासी क्षेत्रों में आती हैं तथा उन्हें अनेक प्रकार के लुभावने सपने देकर उन्हें छल जाती हैं। राजनीतिक पार्टियाँ भी अपने स्वार्थसिद्धि के लिए कम्पनियों को अनुमति देती हैं साथ ही साथ अनेक दमनकारी नीतियाँ सरकार द्वारा ही बनायी जाती हैं। जिससे जो आदिवासी विरोध करता है उन्हें नक्सलवादी घोषित कर जेल भेज दिया जाता है। इस गम्भीर समस्या से निजात पाने के लिए वह छटपटा रहा है और भविष्य के बारे में सोचता है यहाँ रणेन्द्र की चिंता जायज है-हम बाकी दिन कैसे गुज़ारेंगे/इसका कोई अर्थ नहीं/हमारी रात/भरपूर काली रात होने का आश्वासन दे रही/क्षितिज पर एक भी तारा नहीं।12

        आदिवासी कविता जीवन के साथ न्याय करती हुई समाकलन का सरलतम उपाय है। रुढ़ियों आडम्बरों से दूर वास्तविकता की एक नवीन जमीन की तलाश करती है जिसमें जीवन के विविध रंग घुले हुए हैं। भारत का आदिवासी समाज श्रमशील निष्ठावान और ईमानदार है। समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों का विकास सबसे पहले होना चाहिए। जहाँ एक ओर मुख्यधारा के पास तकनीकि व प्रौद्योगिकी है वहीं आदिवासियों के पास प्रतिभा श्रम व पारंपरिक ज्ञान है। हमें उस ज्ञान से परिचित होना चाहिए। आदिवासी कविता का मुख्य स्वर मुक्ति का है। आदिवासी कवि अपनी कविताओं के माध्यम से रूढ़िवादिता अंधविश्वास शोषण व दासता के खिलाफ मुक्ति का आह्वाहन करते हैं। साथ ही अपनी दबी हुई आवाज को मुखरता प्रदान करते हैं। डॉ. रामदयाल मुंडा आदिवासियों को सर्वप्रथम शिक्षित करने के पक्ष में हैं क्योंकि शिक्षा ही एक ऐसा औजार है जिससे सभी प्रकार की समस्या का हल खोजा जा सकता है। वे कहते हैं-आदिवासी शिक्षा में अत्यधिक पिछड़े हुए रहे हैं। ये अपनी मातृभाषा में आसानी से शिक्षा हासिल कर सकते हैं। इस बात को लेकर हम सब प्रयत्नरत हैं।13

आदिवासी कविताओं में प्रतिरोध की भावना है जो दिकू समाज की दकियानूसी मानसिकता वाले लोगों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करने की महती प्रेरणा देती है साथ ही मुक्ति की कामना करती है। वाहरू सोनवने की कविता स्टेज से इसे समझा जा सकता है- और वें मंच पर खड़े होकर/     हमारा दुःख हमसे कहते रहे/हमारा दुःख हमारा ही रहा/कभी उनका नहीं हो पाया।14

        समाज में आर्थिक आधार पर कितनी असमानता है जबकि अनेक राजनीतिक पार्टियाँ व सरकारें समानता के झूठे दावे पेश करती हैं। इसी झूठी साजिश का पर्दाफाश करती हुईं राजेश जोशी की कविता एक आदिवासी लड़की की इच्छा समाज के यथार्थ को व्यक्त कर सच को सामने लाती है-लड़की की इच्छा है/छोटी से इच्छा/हाट इमलिया जाने की/ सौदा सूत कुछ नहीं लेना/तनिक सी इच्छा है/काजर की बिंदिया की/ तनिक सी इच्छा है/तोड़े की बिछिया की।15

        आदिवासी साहित्य मूलतः सृजनात्मकता का साहित्य है जो मानता है कि दृष्यमान जगत में प्रत्येक वस्तु की अपनी एक स्वतंत्र सत्ता है और वह सुंदर है। आदिवासी साहित्य जहाँ प्रकृति और प्रेम के विविध रूपों के साथ रचाव और बचाव का साहित्य है वहीं समकालीन आदिवासी कविता लेखन में अस्मिता की खोज दिकुओं द्वारा किये गये और किये जा रहे शोषण के विविध रूपों को भी पहचानने लगा है। समकालीन आदिवासी कविता में प्रतिरोध है प्रतिशोध नहीं है। यह उसकी प्रमुख विषेशता है जिसे हमें न सिर्फ समझना चाहिए अपितु उसका सम्मान भी करना चाहिए। यह मनुष्यता की प्रगति का सम्प्रत्यय है।

संदर्भ ग्रन्थ सूची

  1. डॉ. कंचन शर्मा – विचार पुनर्विचार और मूल्यांकन सहयोगी प्रकाशन दुर्गापुर वर्धमान पृष्ठ 80
  2. निर्मला पुतुल – नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली पृष्ठ सं. 91
  3. सं रमणिका गुप्ता – आदिवासी स्वर और नई शताब्दी वाणी प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ सं. 22.23
  4. विनोद कुमार शुक्ल – सब कुछ होना बचा रहेगा राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ सं. 21
  5. डॉ. नवीन नन्दवाना- (सं.) समवेत पत्रिका अंक 3 जुलाई 2014 पृष्ठ सं. 80.81
  6. अनुज लुगुन – वसुधा 85 युवा संवाद
  7. निर्मला पुतुल- नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली पृष्ठ सं. 22
  8. वही पृष्ठ 54
  9. मुन्ना साह- डेहरी आदिवासी चेतना की कविताएं स्वराज प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ सं.15
  10. वही पृष्ठ 36
  11. हरिराम मीणा- (सं.) समकालीन आदिवासी कविता अलख प्रकाशन जयपुर पृष्ठ सं.93
  12. रणेन्द्र- ग्लोबल गाँव के देवता भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली पृष्ठ सं. 74
  13. दुर्गाराव बाणावतु भीमसिंह- (सं.) साक्षात्कारों में आदिवासी अलख प्रकाशन जयपुर पृष्ठ सं. 162
  14. सं रमणिका गुप्ता- (सं.) आदिवासी लेखन एक उभरती चेतना सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ सं.110
  15. राजेश जोशी- प्रतिनिधि कविताएं राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ सं. 24

                                                     डॉ.धीरेन्द्र सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर हिन्दी
क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान
भोपाल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *