भारत अपनी आजादी का 75वां साल पूरा करने जा रहा है। इतनी लम्बी अवधि किसी देश के निवासियों के लिए एक गर्व की बात है। इस बीच भारत ने वह ऊंचाई हासिल की, जिसकी तमन्ना हर देशवासी की होती है। सबने देखा, भारत का जीडीपी 8 प्रतिशत तक पहुंच चुका था। भारत की सेनाएँ जमीन से आसमान तक मार करने की क्षमता रखती हैं। बड़े आविष्कारों ने बड़ी उपलब्धि दी और भारत अंतरिक्ष अनुसंधान में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। शिक्षा का स्तर ऊंचा उठा है और साक्षरता का प्रतिशत 72 पार कर चुका है। बड़े-बड़े विश्वविद्यालय, डैम, पब्लिक यूनिट्स, करोडों नौकरियां और रोजगार, विदेशों में भारतीयों और भारतीय वस्तुओं की मांग दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। दुनिया के विकसित देशों में भारतीय उनके बड़े पदों पर विद्यमान हैं। वे दुनिया के हर क्षेत्र में अपने पैर जमा चुके हैं। वे कहां नहीं हैं – हर जगह हैं। शिक्षा, व्यवसाय, चिकित्सा, कृषि, अंतरिक्ष, शोध – लगभग हर जगह भारतीयों ने अपना परचम लहराया है। यह किसी भी देश के लिए गर्व की बात है। मेरे लिए भी है। इतनी बड़ी लोकवादी व्यवस्था किसी को भी चकाचौंध कर देगी। आजादी के इस अमृत महोत्सव में मैं भी देश और देशवासियों के साथ हूं।

मैं इस लेख में इस बात की जांच-पड़ताल करना चाहूंगा कि दक्षिण एशिया में सर्वाधिक शक्तिशाली देश बनाने वाला श्रमजीवी वर्ग इन पछत्तर सालों में क्या खोया और क्या पाया। उसकी उपलब्धियां क्या रही हैं और वे आज किस मुकाम पर हैं। श्रमजीवी वर्ग साहित्यिक हलकों में जगह क्या रखता है तथा इसके इतर उसकी क्या दशा है – यह भी जानना इस पड़ताल का हिस्सा है। मैं चाहूंगा कि इस लेख में पिछले पछत्तर सालों का पूरा लेखा-जोखा रख सकूं। ऐसा लिखने से पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहता हं कि देश का मजदूर वर्ग देशी और विदेशी संस्कृति की देन है। लूट, हिंसा, गरीबी, अपमान तथा अमानवीयता की तमाम पहलुएं संस्कृति में विद्दमान रही हैं। परिणामस्वरूप, हजारों वर्षों से भारतीय जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ‘मजदूर वर्ग’ का रहा है। श्रम करना ही उनकी नियति थी और शोषक वर्ग उन्हीं की कमाई पर ऐश कर रहे थे। हां, अंग्रेजों ने तो उन्हें पारम्परिक श्रम से बाहर निकालकर आधुनिक बनाया। हालांकि, आजादी के पहले तक श्रमिकों ने बहुत कुछ हासिल कर लिया था, लेकिन देश की आजादी के सवाल पर वे भी देश के साथ थे। स्वतंत्रता सभी को प्यारी लगती है। ऐसे में, श्रमिक भी अपने संघर्षों के साथ-साथ देश की आजादी भी चाहते थे। स्वतंत्रता से पूर्व भारतीय श्रमिक यातना, दुख तथा शोषण से गहरे दुखी थे। उनकी इस हालत के लिए देशी-विदेशी दोनों एक समान थे, बल्कि भारतीय शोषक अंग्रेजों के साथ थे और दोनों मिलकर श्रमिकों पर दोगुनी अत्याचार बरपा रहे थे। वे श्रमिकों के खिलाफ ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ के रिश्ते से बंधे थे। इसलिए श्रमिक भी चाहते थे कि देश आजाद हो जायेगा तो सम्भव हो, देश में लोकवादी सत्ता स्थापित हो और उनका वाजिब हक मिलेगा। उल्लेखनीय है कि श्रमिकों को आधुनिक बनाने में रूस की साम्यवादी व्यवस्था और उसकी विचारधारा ही प्रमुख रही है। इसी विचारधारा ने उन्हें पल्लवित और पुष्पित किया। 1920 ई। में स्थापित आल इंडिया ट्रेड यूनियन इसी विचारधारा की उपज थी। इस संगठन ने श्रमिकों के बीच काम करना शुरू किया। ‘उसने भारत में साम्यवादी राज्य की स्थापना, उत्पादन के स्रोतों का राष्ट्रीयकरण, मजदूरों की आर्थिक स्थिति में सुधार, सामाजिक समानता तथा भाषण, संगठन निर्माण और हड़ताल करने की स्वतंत्रता व अधिकार को अपना उद्देश्य बनाया’1

श्रमिकों के संघर्षों ने देशी-विदेशी पूंजीपतियों, शोषकों, सामंतों, क्रूरता के नम्बरदारों, ऊंच-नीच के ठेकेदारों और इस तरह शोषण को अपना पैदाइशी अधिकार समझने वालों – दोनों की सारी कोशिशों के बावजूद श्रमिक एक-पर-एक अधिकार हासिल करते जा रहे थे। उन्होंने 1920 से लेकर आजादी की पूर्व संध्या तक अनेक महत्वपूर्ण संघर्ष किया, जो इतिहास में दर्ज है। यहां इस बात का उल्लेख करना लाजिमी है कि 1956 तक भारतीय श्रमिकों ने जो कुछ भी पाया था उसके केंद्र में डा। भीमराव आम्बेडकर थे। वे सन् 1930 से ही भारतीय श्रमजीवी वर्ग के साथ खड़े थे और परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उनके नेता भी उनसे सलाह-मशविरा करते थे। डा। आम्बेडर खुद भी अनेक बार श्रमिकों की हड़तालों में शामिल हो चुके थे तथा उनका नेतृत्व भी किया था। 1930 के बाद अंग्रेजों ने अनेक श्रम कानून बनाये, जिसमें ढा। आम्बेडकर की भूमिका और प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है। वे सन् 1930 के बाद भारत के सर्वाधिक काबिल और प्रतिष्ठित नेता के तौर पर उभर कर सामने आये थे। उनकी अहमियत को अंग्रेजों के साथ-साथ भारतीय भी जानते थे। वे भी श्रम कानूनों पर डा। आम्बेडकर से सलाह-मशविरा करते थे। उन्हीं का प्रभाव है कि भारतीय श्रमिकों ने बहुत ही कम समय में वह सब कुछ हासिल कर लिया था, जिसकी उन्हें आवश्यकता थी।

श्रमजीवियों के लिए डा। आम्बेडकर एक प्रकाशस्तम्भ रहे हैं। गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में, अम्बेडकर ने जबरदस्ती उचित मजदूरी, काम करने की सम्मानजनक स्थिति और क्रूर जमींदारों के चंगुल से किसानों की स्वतंत्रता की मांग की थी। उन्होंने दलितों और शोषितों के जीवन को प्रभावित करने वाली सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए भी लड़ाई लड़ी.

उन्होंने 1936 में भूमिहीन, गरीब काश्तकारों, कृषकों और श्रमिकों की जरूरतों और शिकायतों को पूरा करने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम के साथ इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (ILP) का गठन किया। 1937 में हुए चुनाव में 1935 के नव अधिनियमित भारत सरकार अधिनियम के तहत पहला चुनाव ILP ने बॉम्बे विधान सभा के लिए लड़ी गई 17 सीटों में से 15 सीटों पर जीत हासिल करके शानदार सफलता हासिल की। 17 सितंबर, 1937 को बॉम्बे असेंबली के पूना सत्र के दौरान उन्होंने कोंकण में खोटी प्रथा को समाप्त करने के लिए एक विधेयक पेश किया। उन्होंने औद्योगिक विवाद विधेयक, 1937 को पेश करने का विरोध किया क्योंकि इससे श्रमिकों के हड़ताल के अधिकार को हटा दिया गया था.

1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान श्रम मामलों के उनके गहन ज्ञान को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया और प्रदर्शित किया गया। जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विश्व व्यवस्था अपने उफान पर थी, अम्बेडकर भारतीय श्रम का मार्गदर्शन कर रहे थे। बदलती अर्थव्यवस्था ने उद्योगों के विस्तार के अवसर प्रदान किए, जबकि उद्यमी और प्रबंधक समृद्धि की आशा कर सकते थे, श्रम को उसका उचित हिस्सा नहीं दिया गया था। अम्बेडकर ने सरकार की श्रम नीति के लिए बुनियादी ढांचे की नींव रखकर श्रम कल्याण के उपायों को शुरू किया और पेश किया। उन्होंने जटिल समस्याओं का सामना किया तथा कर्मचारियों और नियोक्ताओं से समान रूप से सम्मान प्राप्त किया। 8 नवम्बर, 1943 को अंबेडकर द्वारा पेश किए गए भारतीय ट्रेड यूनियन (संशोधन) विधेयक ने नियोक्ताओं और ट्रेड यूनियनों को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया.

8 फरवरी, 1944 को कोयला खदानों में भूमिगत कार्य-स्थल पर महिलाओं के रोजगार पर से प्रतिबंध हटाने पर बहस के दौरान विधानसभा में अम्बेडकर ने कहा, “यह पहली बार है कि किसी भी उद्योग में सिद्धांत स्थापित किया गया है। मुझे लगता है कि समान काम के लिए समान वेतन की व्यवस्था बिना किसी लिंगगत भेदभाव के दी गई है, जो एक सराहनीय कदम है.” यह भारतीय श्रमजीवियों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। खान मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक 1943 के माध्यम से उन्होंने महिला श्रमिकों को मातृत्व लाभ के साथ सशक्त बनाया.

26 नवंबर, 1945 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय श्रम सम्मेलन को संबोधित करते हुए अम्बेडकर ने प्रगतिशील श्रम कल्याण कानून लाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया, “मैं अच्छी तरह से कह सकता हूं कि अंग्रेजों को श्रम कानून का एक उचित कोड बनाने में 100 साल लग गए थे। कोई तर्क नहीं है कि हमें भारत में भी 100 साल लगने चाहिए। इतिहास हमेशा एक उदाहरण भर नहीं होता बल्कि अधिक बार एक चेतावनी भी है.”2

श्रमेव जयते की निरंतर बढ़ती भावना के साथ राष्ट्र निर्माण में अनगिनत मजदूरों के अनगिनत योगदान को याद करते हुए हमें अम्बेडकर के योगदान को याद रखना चाहिए। वे पहले कानून और न्याय मंत्री के तौर पर 15 अगस्त 1947 से 11 अक्टूबर 1951 तक रहे और इस बीच श्रम अधिकारों के लिए महान काम किया। यह उन्हीं का प्रयास था कि श्रमिक हितों से सम्बन्धित उन्हीं के रहते धड़ाधड़ अनेक कानून पास हुए। यह अगल बात है कि भारत सरकार और प्राइवेट कम्पनियों ने श्रम अधिकारों से सम्बन्धित अनेक कानूनों और धाराओं को कभी लागू नहीं किया।

मैं अनावश्यक विस्तार से बचने के लिए अगस्त 1947 से पहले के श्रमिक आंदोलनों, कानूनों और धाराओं का उल्लेख यहां नहीं करूंगा, लेकिन आजादी से लेकर अब तक हुए सर्वाधिक उल्लेखनीय संघर्षों-आंदोलनों और कानूनों का संक्षिप्त विवरण अवश्य रखूंगा। उल्लेखनीय यह भी है कि हड़ताल भारतीय श्रमिकों का सर्वाधिक प्रिय और सशक्त हथियार रहा है, जिसका इस्तेमाल वे आजतक करते आ रहे हैं। सबसे पहले संघर्थ देखें –

रेलवे कामगारों की हड़ताल (1974) – आजादी के स्वप्न और हकीकत में जी रहे भारतीय श्रमजीवी वर्ग का मोह बना  हुआ था, लेकिन बीस साल पूरे होते-होते उनका मोहभंग होना शुरू हुआ और वे फिर से संघर्ष के लिए संगठित होना शुरू हो गये थे। फलस्वरूप, आजादी के बाद श्रमिकों के संघर्ष की पहली प्रबल हड़ताल 1974 का रेलवे कामगारों की हड़ताल है। इस हड़ताल में लाखों रेलवे कर्मचारियों ने भाग लिया था। उन्होंने यह आंदोलन सरकार द्वारा वेतनमानों में भेदभाव रखने, काम करने के अनिश्चित समय, श्रमिक समस्याओं के सम्बंध में एकरूपता न बरतने और बोनस देने से इंकार के विरोध में किया था। ‘इसने पूरी रेल प्रणाली को ठप्प कर दिया था’3।  यह हड़ताल बीस दिनों तक चली। आखिरकार, विशाल पुलिस और सैनिक कार्रवाइयों ने इसे कुचल दिया। सरकार ने इस हड़ताल को ‘राजनैतिक हड़ताल’ का नाम दिया और इसका इस्तेमाल आपातकाल को तर्कसंगत ठहराने में किया।

बम्बई के कपड़ा मजदूरों की हड़ताल (1982) – यह हड़ताल कपड़ा मजदूरों की सबसे बड़ी हड़तालों में से एक है। इसका नेतृत्व दत्ता सामंत ने किया था। इसमें ढाई लाख से ज्यादा मजदूरों ने भाग लिया था। श्रमिकों की मांग थी कि उन्हें विभिन्न श्रेणियों के अनुसार उनके वेतन में 250 से 400 रुपये प्रतिमाह के हिसाब से बढ़ोतरी की जाए। दूसरी, लगभग एक लाख बदली श्रमिकों को स्थायी की जाए। तीसरी, मशीनीकृत और आधुनिक बनी इकाइयों में छुट्टियों की संख्या में बढ़ोतरी की जाए। लेकिन सरकार इन मांगों को मानने से इंकार कर दी। सालाना बोनस को लेकर शुरू हुई यह हड़ताल डेढ़ साल से अधिक समय तक चली। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे लम्बे समय तक चली हड़तालों में से एक साबित हुई। इस हड़ताल से श्रमिकों के वेतन और सौदेबाजी क्षमता पर दूरगामी व सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

हड़ताल पर गये ढाई लाख मिल मजदूरों में से लगभग एक लाख बदली श्रमिक थे। इस हड़ताल ने इस महत्वपूर्ण मांग को भी पुरजोर तरीके से उठाया कि बहुमत के समर्थन वाली यूनियनों को अनिवार्य रूप से मान्यता दी जाये और बहुमत की पुष्टि के लिए गुप्त मतदान कराया जाए। वास्तव में, यह एक दीर्घकालिक वर्ग-संघर्ष की अभिव्यक्ति थी, जिसने महाराष्ट्र के गंवई मेहनतकशों का पूरा सहयोग प्राप्त किया। हालांकि श्रमिकों के बीच आंतरिक विभाजन और फूट पड़ने से यह हड़ताल खत्म हो गई।

कमानी श्रमिकों का आंदोलन (1985) – सितम्बर 1988 में भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना घटी। यह घटना कमानी ट्यूब्स लिमिटेड, बम्बई में घटी, जहां और जिसके मजदूरों ने कारखाने का सारा कामकाज अपने हाथों में ले लिया। कमानी ट्यूब्स लिमिटेड देश की अकेली ऐसी फैक्टरी है, जिसे श्रमिक, कर्मचारी और अधिकारी मिलकर चलाते हैं। औपचारिक रूप से इसका उद्घाटन 6 अप्रैल 1989 को किया गया था। गौरतलब है कि सितम्बर 1985 में फैक्टरी में उत्पादन बंद हो गया था, क्योंकि महानगरपालिका ने लम्बे समय से बिल न जमा करने के कारण बिजली और पानी की सप्लाई बंद कर दी थी। इसी वजह से कम्पनी के मालिकों और बड़े अधिकारियों ने फैक्टरी छोड़ दी, जबकि कर्मचारी इसकी सुरक्षा में मुस्तैदी से जमे रहे। श्रमिकों को कम्पनी ने पिछले नौ महीने से वेतन नहीं दिया था। तीन साल के लम्बे आंदोलन के बाद 23 सितम्बर, 1988 को आखिरकार श्रमिक कम्पनी का प्रबंधन अपने हाथों में लेने में कामयाब हो गये। फिर श्रमिकों ने ‘केटीएल कामगार औद्योगिक उत्पादक सहकारी सोसायटी लिमिटेड’ नामक सहकारी समिति बनाई, जो बाद में केटीएल की मुख्य शेयरधारक बन गई। यह घटना भारतीय श्रमिक इतिहास में मील का पत्थर बन गई। उल्लेखनीय है कि श्रमिकों ने आर्थिक रूप से बीमार इस फैक्टरी को फिर से स्थापित करने का बीड़ा उठाया, जब कम्पनी के मालिकों ने इसे छोड़ दिया था। मजदूरों ने अपने रोजगार और उत्पादन में बढ़ोतरी के दो मूलभूत मकसदों को पूरा करने के लिय ही यह कदम उठाया था। यह साबित करता है कि श्रमिकों के पास भी एक पुख्ता आर्थिक विजन होता है, बशर्ते कि सरकार और व्यवस्था उन्हें मौका दे।

बंदरगाह तथा गोदी श्रमिक हड़ताल (1989) – देश के दस प्रमुख बंदरगाहों व गोदियों के कर्मचारियों ने 17 अप्रैल, 1989 को देशव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल की शुरुआत की। इस हड़ताल में तीन लाख से ज्यादा कर्मचारियों ने भाग लिया। उनकी मांग थी कि उनके वेतनमानों को संशोधित किया जाये और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं के समतुल्य अंतरिम सहायता का भुगतान किया जाये। यह हड़ताल पूरी तरह से सफल रही। स्वतंत्रता के बाद बंदरगाह व गोदी कर्मचारियों की यह सबसे बड़ी हड़ताल साबित हुई। अधिकारियों की धमकियों के बावजूद श्रमिकों ने इस हड़ताल में एकजूट होकर भाग लिया और सफलता दर्ज की।

मछुआरों का संघर्ष (1994) – केंद्र सरकार की गहरे समुद्र में मछली पकड़ने सम्बन्धी नीतियों के खिलाफ देश भर के लाखों मछुआरों ने 4 फरवरी, 1994 को देशव्यापी हड़ताल छेड़ी। यह हड़ताल जल्दी ही एक राष्ट्रीय घटना बन गई, क्योंकि इसमें गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल आदि समुद्र तटीय राज्यों के मछुआरों ने भाग लिया था।

मछुआरे सरकार द्वारा गठित टेक्नालाजी मिशन की सिफारिशों से बुरी तरह असंतुष्ट थे। वे बड़े औद्योगिक घरानों व विदेशी कम्पनियों के प्रवेश के भी खिलाफ थे। भारत सरकार की नीति के मुताबिक छोटे व मझोले शी फिशिंग बोट्स गहरे समुद्र में नहीं जा सकते थे। ऐसे में, कम पूंजी वाले मछुआरों के सामने जीवन-मरण का सवाल खड़ा हो गया था। श्रमिकों की मांग थी कि छोटे मछुआरों के कार्यक्षेत्र का विस्तार गहरे पानी तक किया जाए, साथ ही गहरे समुद्र में जाने वाले मछुआरों को उदार केंद्रीय सब्सीडी और कर्ज दिये जाएं। घरेलू खपत के लिए मछली आपूर्ति में बढ़ोतरी की जाए, डीप शी फिशिंग को बढ़ावा देने के लिए खाद्यान्नों की तरह मछली पर भी सब्सीडी दी जाए, लघु श्रेणी के मछुआरों के लिए कानूनी अधिकार और कम से कम आसपास के क्षेत्रों को आरक्षित की जाए। कुल मिलाकर, इनके आंदोलन को एक राष्ट्रीय पहचान मिली।

महाराष्ट्र के गरीब किसानों का विरोध प्रदर्शन (2018) – यह विरोध प्रदर्शन अपने-आप में एक विशेष संकट को राष्ट्रीय बना गया, जिसके बारे में देशवासी सुनते खूब थे, मगर उनको गुनते न थे। वहां हर साल हजारों किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। सरकारों की निष्ठुरता का नतीजा है कि छोटे किसान तेजी से किसानी छोड़कर मजदूर बन रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र देश के धनी राज्यों में से एक है। महाराष्ट्र के 135 से अधिक गांवों के किसानों ने 5 मार्च, 2018 को नासिक शहर के सीबीएस चौक से पैदल यात्रा शुरू की। यह विरोध प्रदर्शन अखिल भारतीय किसान सभा (अखिल भारतीय किसान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से संबद्ध है) द्वारा आयोजित की गई थी, जिसके नेतृत्व में ये किसान रविवार 11 मार्च, 2018 की दोपहर मुंबई की उत्तर-पूर्वी सीमा ठाणे-मुलुंड टोल नाका पर पहुंची। यह सात दिवसीय 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा थी, जिसमें 35000 गरीब किसान शामिल थे। किसानों ने 12 मार्च को आजाद मैदान से अपनी बात महाराष्ट्र सरकार और मुम्बई के रईसों के सामने रखी और बताया कि वे किन परेशानियों से जूझ रहे हैं। वे मार्च की चिलचिलाती धूप और तपती धरती को मां की गोद मानकर बढ़ते चले गये। उनकी हालत देखकर प्रत्यक्षदर्शियों का कलेजा मुंह को आ गया था, विशेषकर उनका जो सम्वेदनशील थे। उनके ज्यादातर जूते-चप्पल और सैंडल रास्ते में ही जवाब दे गये थे। कुछ के बुजुर्ग परिवार पीछे छूट गये थे। जहां रात होती वे वहीं रुक कर खाना पकाते, खाते और नंगी धरती पर फटेहाल जहां सो सकते थे सो गए। वे हर दिन 30 किमी पैदल चलते थे। उनकी सम्वेदनशीलता का परिचय इसी बात से मिलता है कि वे परीक्षा में बैठने वाले छात्रों और काम पर आने वाले नागरिकों को परेशानी से बचाने के लिए रास्ता छोड़ देते थे। महाराष्ट्र के कृषि क्षेत्र में इस साल कम बारिश के कारण 8.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी और कई सिंचाई परियोजनाओं के बावजूद राज्य में केवल 18% कृषि भूमि सिंचित हो पाई थी। महाराष्ट्र का कृषि संकट देश भर के किसानों का आम संकट है, जिनमें से कई कम रिटर्न पाते हैं और कर्ज में आकंठ डूबे होने के कारण वे अक्सर मृत्यु के मुंह में समा जाते हैं। मौसम का अनिश्चित मिजाज भी उन्हें किसानी छोड़ने पर मजबूर कर रहा है.

राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल (2019) – यह एक आम हड़ताल थी, जिसमें 200 मिलियन कामगारों ने शिरकत की थी4

प्रत्यक्षदर्शी जैमी वूडोक बता रहे हैं कि बंगलौर में सार्वजनिक परिवहन कर्मचारियों, औद्योगिक कर्मचारियों, बैंक कर्मचारियों, बीमा कर्मचारियों, आंगनवाड़ी (बाल देखभाल) और आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) कार्यकर्ताओं के बीच हड़ताल सबसे मजबूत थी। प्रदर्शनकारियों ने तर्क दिया कि सरकार मजदूर विरोधी और किसान विरोधी उपायों पर जोर दे रही है, विशेष रूप से निजीकरण, विमुद्रीकरण और अन्य हालिया परिवर्तन जो नौकरियों को नष्ट कर रहे थे। सरकार विरोधी कार्रवाई के रूप में हड़ताल ‘राजनीतिक’ थी, लेकिन इसकी कई मांगें भी थीं5। यह आम हड़ताल दो दिवसीय थी, जो जनवरी 8 – 9, 2019 को बैंगलोर में सम्पन्न हुई थी।

इस आम हड़ताल का नेतृत्व इंटक, एटक, सीटू, एचएमएस, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, ऐक्टू, केडब्ल्यूयू, केजीडब्ल्यूयू, बैंक, बीमा, जेएएफ और अन्य स्वतंत्र संघों ने किया था। ट्रेड यूनियनों की संयुक्त समिति (जेसीटीयू) द्वारा समर्थित मजदूर वर्ग की मांगों का 12 सूत्री चार्टर, जिसकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं –

  1. श्रम कानूनों में सभी कॉर्पोरेट समर्थक व मजदूर विरोधी संशोधनों को रोकें
  2. मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2017 में प्रस्तावित परिवहन प्रणाली के निजीकरण और निगमीकरण के खिलाफ है
  3. सभी कामगारों के लिए 18,000/- रुपये प्रति माह का राष्ट्रीय साझा न्यूनतम वेतन लागू करें
  4. मुद्रास्फीति और मूल्य वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली स्थापित करें
  5. 45 दिनों के भीतर यूनियनों की अनिवार्य मान्यता और ट्रेड यूनियनों के अनिवार्य पंजीकरण के कानून के लिए संसद में ILO के सम्मेलन 87 और 98 (संघ की स्वतंत्रता और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार के लिए) के अनुसमर्थन के लिए पेश करें
  6. सम्विदा श्रम प्रणाली को समाप्त करें। समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत को लागू करें और अनुबंध व सभी अस्थायी रोजगार के रूपों को नियमित करें
  7. सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश को रोकें और बैंकिंग, बीमा, रक्षा क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति न दें
  8. 43वें भारतीय श्रम सम्मेलन की सिफारिशों के अनुसार सरकारी कर्मचारियों के रूप में योजना कर्मियों के नियोजन को नियमित करें
  9. पर्याप्त बजटीय आवंटन के साथ असंगठित कार्यबल के लिए सामाजिक सुरक्षा निधि की स्थापना और सभी असंगठित श्रमिकों के लिए भविष्य निधि कवरेज प्रदान करें
  10. विमुद्रीकरण और आर्थिक संकट के कारण नौकरी छूटने के संदर्भ में स्थिर रोजगार उत्पन्न करने के लिए तत्काल उपायों को लागू करें और संशोधनों के माध्यम से रोजगार के NEEM, NETAP और FTE रूपों को नियमित करें
  11. वार्षिक बोनस, ग्रेच्युटी, भविष्य निधि और ईएसआई के भुगतान के लिए पात्रता सीमा और अधिकतम सीमा बढ़ाएँ। प्रोविडेंट फंड और पेंशन फंड का शेयर बाजारों में निवेश बंद करें। रिलायंस समूह को ईएसआई फंड का डायवर्जन बंद करें
  12. एमएस स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करें जिसमें कृषि ऋण की पूर्ण छूट और ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने का अधिकार’ का कानून शामिल है

सामूहिक आम हड़ताल (2020) – यह सामूहिक आम हड़ताल 26 नवम्बर, 2020 को नई दिल्ली में बुलाई गई थी6। इस हड़ताल के सम्बन्ध में एसएमइएफआई के जनरल सेक्रेटरी और इंडस्ट्रीयलआल एक्जुक्यूटिव कमेटी सदस्य मि। संजय वाधवकर का कहना है कि पूरे देश में पुलिस की कड़ी कार्रवाई के बावजूद कार्यकर्ताओं ने उत्साह से हड़ताल में भाग लिया। सामाजिक सुरक्षा, मजदूरी और औद्योगिक संबंधों पर नए कोड सहित हाल के श्रम कानून में बदलाव को रद्द कर दिया जाना चाहिए क्योंकि वे कामगारों के मौलिक सिद्धांतों और अधिकारों की रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं। कई पहलुओं पर वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और श्रम अधिकार मंचों पर भारत की प्रतिबद्धताओं के खिलाफ जाते हैं। कोविड-19 के गलत संचालन और जनविरोधी आर्थिक नीतियों ने लाखों लोगों को संकट में डाल दिया। यह हड़ताल और किसानों के साथ संयुक्त कार्रवाई सरकार को मजदूरों और जनोन्मुखी नीतियों की मांग करने वाला एक कड़ा संदेश देगी7

वाल्टर सांचेज कहते हैं, हम असहमति की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हिंसक तरीकों की निंदा करते हैं। IndustriALL भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के साथ एकजुटता के साथ खड़ा है और जनविरोधी नीतियों के खिलाफ किसानों और कृषि श्रमिकों के साथ व्यापक आधार पर गठबंधन बनाने के उनके प्रयास की सराहना करता है। भारतीय ट्रेड यूनियनों की मांगें वास्तविक हैं, विशेष रूप से उच्च बेरोजगारी और नौकरी के नुकसान के साथ आज की स्थिति में, जो दुनिया और विशेष रूप से भारत को तबाह करने वाली महामारी से बढ़ गई है। सरकार को ट्रेड यूनियनों की बात सुननी चाहिए और मुद्दों को सुलझाने के लिए वास्तविक बातचीत करनी चाहिए8। उनकी मांगों का संयुक्त ट्रेड यूनियन चार्टर है:

  1. आयकर सीमा से कम आय वाले सभी परिवारों को 7,500 रुपये (US $101) का प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण
  2. सभी जरूरतमंदों को हर महीने प्रति व्यक्ति 10 किलो मुफ्त राशन
  3. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का ग्रामीण क्षेत्रों में वर्तमान 100 दिनों से 200 दिनों में काम और मजदूरी के साथ विस्तार तथा साथ ही इस कार्यक्रम का शहरी क्षेत्रों में भी विस्तार हो
  4. सभी मजदूर विरोधी श्रम संहिता परिवर्तन और किसान विरोधी कानूनों को वापस लेना
  5. वित्त क्षेत्र सहित सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों का निजीकरण बंद करो। रेलवे, आयुध निर्माण, बंदरगाहों और इसी तरह के क्षेत्रों में सरकार द्वारा संचालित विनिर्माण और सेवा संस्थाओं के निगमीकरण को रोकें
  6. सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की जबरन समय से पहले सेवानिवृत्ति के कठोर परिपत्र को वापस लें
  7. सभी को पेंशन प्रदान करें, पुरानी पेंशन योजना को बहाल करें और ईपीएस 95 में सुधार करें

संयुक्त ट्रेड यूनियन प्लेटफॉर्म में INTUC, AITUC, HMS, CITU, AIUTUC, TUCC, SEWA, AICCTU, LPF और UTUC जैसे केंद्रीय ट्रेड यूनियन शामिल हैं। इसमें 250 मिलियन (25 करोड़) से ज्यादा कामगारों ने हिस्सा लिया। इसे जैकोबिन ने इतिहास का सबसे बड़ा हड़ताल बताया है। इस हड़ताल के बाद किसानों ने नई दिल्ली तक मार्च निकाला, जो 30 नवंबर, 2020 को वहां पहुंचा।

भारतीय किसानों का विरोध-प्रदर्शन (2020-21) – यह विरोध-प्रदर्शन तीन किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ किया गया है। इसकी शुरुआत 9 अगस्त, 2020 को हुई थी, जो अभी तक जारी है (20 सितम्बर, 2021)। ये तीनों कानून हैं – (1) किसान उत्पादन, व्यापार और वाणिज्य (पदोन्नति और सुविधा) अधिनियम, 2020; (2) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौते, 2020; और (3) आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020। ये तीनों कानून किसान व किसानी आधारित श्रमिकों के खिलाफ जाते हैं, इसीलिए प्रदर्शनकारियों ने इन्हें काले कानून की संज्ञा दी है। किसान इन तीनों कानूनों को वापस लेने तथा मिनिमम सपोर्ट प्राइस की मांग कर रहे हैं। इस विरोध-प्रदर्शन में कुल 21 किसान यूनियनों की भागीदारी है, जो इस प्रकार हैं – (1) भारतीय किसान यूनियन (उग्रहान, सिधुपुर, राजेवाल, चडूनी, दकौंडा), (2) किसान स्वराज संगठन, इंदौर, (3) जय किसान आंदोलन, (4) आल इंडिया किसान सभा, (5) कर्नाटक राज्य रायता संघ, (6) नेशनल एलायंश फार पीपल्स मूवमेंट्स, (7) लोक संघर्ष मौर्चा, (8) आल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन, (9) किसान मजदूर संघर्ष कमेटी, (10) राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन, (11) आल इंडिया किसान मजदूर सभा, (12) क्रांतिकारी किसान यूनियन, (13) ASHA – किसान स्वराज, (14) लोक संघर्ष मोर्चा, (15) आल इंडिया किसान महासभा, (16) पंजाब किसान यूनियन, (17) स्वाभिमान शेतकारी संघटन, (18) संगतिन किसान मजदूर संघटन,  (19) जम्हूरी किसान सभा, (20) किसान संघर्ष समिति, और (21) तेराई किसान सभा।

इन्होंने सरकार के सामने दस सूत्री मांगें पेश की हैं। ये मांगें हैं –

  1. कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाना
  2. एमएसपी और फसलों की राज्य खरीद को कानूनी अधिकार बनाएं
  3. आश्वासन कि पारंपरिक खरीद प्रणाली बनी रहेगी
  4. स्वामीनाथन पैनल रिपोर्ट को लागू करें और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को उत्पादन की भारित औसत लागत से कम से कम 50% अधिक करें
  5. कृषि उपयोग के लिए डीजल की कीमतों में 50% की कटौती करें
  6. एनसीआर में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और उससे जुड़े अध्यादेश 2020 को निरस्त करना और पराली जलाने के लिए सजा और जुर्माने को हटाना
  7. पंजाब में पराली जलाने के आरोप में गिरफ्तार किसानों की रिहाई
  8. विद्युत अध्यादेश 2020 को समाप्त करना
  9. केंद्र को राज्य के विषयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, व्यवहार में विकेन्द्रीकरण
  10. किसान नेताओं के खिलाफ सभी मामलों को वापस लेना और उनकी रिहाई

अब तक 477 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है9। इनके विरोध के तरीके निम्नलिखित हैं – रेल रोको और दिल्ली चलो, बोर्डर और रोड को ब्लाक करो, काउंटर प्रोटेस्ट और रिपब्लिक डे किसान परेड। किसान प्रदर्शनकारियों को पूरी दुनिया से समर्थन प्राप्त हुआ। भारतीय किसानों के परिजन जहां भी हैं, जिस देश में हैं – वहीं से वे प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके समर्थन और कोविड-19 महामारी काल में सिक्खों की दिलेरी और मानव-सेवा का पूरी दुनिया कायल हो चुका है। उन्होंने दिल खोलकर मानवता की सेवा की है।

मुजफ्फरनगर किसान विरोध-प्रदर्शन (2021) – यह भी किसान और किसानी आधारित श्रमिकों का विरोध-प्रदर्शन है, जिसमें 5 लाख किसानों ने भाग लिया। 6 सितम्बर, 2021 को किसानों ने अपना विरोध-प्रदर्शन किया और हिंदू-मुस्लिम एकता पेश की। माना जाता था कि वे हार जायेंगे और अपना विरोध-प्रदर्शन वापस ले लेंगे। लेकिन हुआ इसका उल्टा। वे आज भी अपने रास्ते पर अड़े हुए हैं। उन्हें विश्व बिरादरी से भी समर्थन प्राप्त हो रहा है। इसमें भारी संख्या में खेतिहर किसान-मजदूरों ने भाग लेकर अपनी एकजुटता पेश की, साथ ही अपने भविष्य की चिंता जाहिर की।

देश की आजादी के बाद भारत में श्रमिकों के हितार्थ अनेक ऐसे कानून बने, जिनसे भारतीय कामगार की स्थिति कुछ अच्छी हो सकी। यह उन्हीं की सचेत दृष्टि व अनवरत संघर्ष का नतीजा है। उन्होंने जो कुछ पाया वह अपने संघर्ष की धार को तेज रखकर पाया और उस तेज को निरंतर बनाये रखा। यही कारण रहा कि 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में देश की जीडीपी 8 प्रतिशत पर पहुंच सकी तथा देश और देशवासी प्रगति की सीढ़ियां चढ़ सके। अब मैं यहां कुछ प्रमुख श्रम कानूनों की चर्चा करूंगा, जिससे स्पष्ट हो सकेगा कि उन्होंने क्या पाया था।

औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947) – देश की आजादी हासिल करते ही भारत सरकार ने श्रम हितों को ध्यान में रखकर औद्योगिक विवाद अधिनियम पेस किया। यह अधिनियम 1929 के ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट के स्थान पर लाया गया था। यह कानून सामाजिक कानूनों में काफी प्रगतिशील किस्म का था, जिसका उद्देश्य कामगारों के काम के हालात को सुधारना था। इस अधिनियम के अंतर्गत एक उद्योग के अंदर मालिक और कामगार के बीच पैदा होनेवाले औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए समुचित मशीनरी और प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। इस अधिनियम से सरकार को अधिकार प्राप्त हुआ कि वह औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए मध्यस्थ अधिकारी की नियुक्ति कर सकती है। शारीरिक श्रम करनेवाले, क्लर्क, आपरेशनल और टैक्नीकल सभी प्रकार के श्रमिक और ऐसे सभी संस्थान इस अधिनियम के दायरे में आते हैं, जहां निरंतर और नियमित काम चलता है।

यह अधिनियम सिर्फ ऐसी छंटनी को ही स्वीकार्य और वैध मानता है, जिसमें मालिक की तरफ से कामगार को एक महीने का नोटिस या फिर मुआवजे के तौर पर एक महीने का वेतन, नौकरी के हर वर्ष के लिए 15-15 दिन का वेतन और इस विषय में श्रम आयुक्त को नोटिस दिया गया हो।  प्रावधान किया गया था कि यदि मालिक छंटनी के बाद नयी नियुक्ति करता है तो ऐसी स्थिति में नौकरी पाने का पहला अधिकार पहले हटाए गये मजदूर का ही होगा।

अधिनियम के अनुच्छेद 2 (के) ‘औद्योगिक विवाद’ को मालिकों और मालिकों या मालिकों और श्रमिकों या श्रमिकों और श्रमिकों के बीच किसी भी मतभेद या विवाद के रूप में परिभाषित करता है। इस विवाद या मतभेद का रोजगार या बेरोजगारी या रोजगार की शर्तों या किसी भी व्यक्ति के श्रम के हालात से सम्बन्धित होना आवश्यक है। अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य ऐसे उपायों को बढ़ावा देना है, जिनसे मालिक और कामगार के बीच सद्भावपूर्ण और सम्बन्ध अच्छा बना रहे, उद्योगों में विवादों की छानबीन और निपटारा किया जा सके, गैरकानूनी हड़ताल और तालाबंदी को रोका जा सके, ले आफ और छंटनी की अवस्था में कामगारों को राहत दिलायी जा सके तथा सामूहिक सम्वाद किया जा सके।

कारखाना अधिनियम (1948) – इसका उद्देश्य मुख्य रूप से श्रमिकों की औपचारिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कल्याण सुविधाओं, काम के घंटों और वेतन सहित सालाना छुट्टियों के प्रावधान जैसे मुख्य मुद्दों को कानून के दायरे में लाना था। यह अधिनियम ऐसी निर्माण या उत्पादन प्रक्रिया में लागू होता है, जिसमें 10 या उससे अधिक मजदूर लगे हों और जो बिजली से चलती हों या अगर बिजली की आवश्यकता नहीं हो तो वहां 20 या उससे अधिक मजदूर काम करते हों।

इस अधिनियम की धारा 11-20 में मजदूरों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का ब्यौरा दिया गया है। धारा 21-41 मजदूरों के लिए सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधानों पर केंद्रित है। धारा 41-49 मजदूरों के लिए कल्याण सुविधाओँ के बारे में है। धारा 51-60 काम के घंटे तय करने और उनके नियमन के विषय में है। धारा 78-84 वेतन सहित सालाना छुट्टियों के बारे में है। धारा 88 कहती है कि यदि कहीं फैक्टरी या कार्य-स्थल पर कोई ऐसी दुर्घटना होती है, जिससे मृत्यु हो जाती है या कोई शारीरिक आघात या चोट पहुंचती है तो मालिक को तत्काल सम्बन्धित इंस्पेक्टर को नोटिस भेजना चाहिए। अधिनियम में कई पेशागत बीमारियों को भी सूचीबद्ध किया गया है।

न्यनूतम वेतन अधिनियम (1948) – इस अधिनियम में कुछ विशेष रोजगारों में वेतन की न्यूनतम दरें निश्चित करने का प्रावधान किया गया है। अधिनियम का स्पष्ट उद्देश्य न्यूनतम वेतन का वैधानिक निर्धारण करना है, ताकि श्रम के शोषण की सम्भावनाएं कम रह जाएं। अधिनियम श्रमिकों का शोषण रोकने पर केंद्रित है और सम्बन्धित सरकारों को अधिकार देता है कि वे अनुसूचित उद्योगों में वेतन की न्यूनतम दरें निर्धारित करे। अधिनियम की दृष्टि में यदि न्यूनतम वेतन से कम भुगतान किया जाता है तो इसे जबरिया या बंधुआ श्रम माना जायेगा, जो कि अपराध है।

सामाजिक सुरक्षा अधिनियम – इस अधिनियम के तहत भारत सरकार ने समय-समय पर अनेक कानून पारित किया है। परिणामस्वरूप, भारतीय श्रमिकों को काफी हद तक सुरक्षा मिल सकी। इस नियम का उद्देश्य असंगठित श्रमिकों को सुरक्षा देना है, ताकि उन्हें शोषण से बचाया जा सके। किये गये काम के मुताबिक वेतन मिले, वेतन एक विशेष स्तर से कम न हो और वेतनों में समयबद्ध संशोधन होता रहे। यदि राज्य सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम से कम वेतन का भुगतान किया जाता है तो जुर्माने सहित बकाये की वसूली और तत्पश्चात उल्लंघनकर्ता पर मुकदमा चलाये जाने का प्रावधान है।

सामाजिक सुरक्षा का सामान्य अर्थ ऐसी आय सुनिश्चित करना है, जो बेरोजगारी, बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में भी प्राप्त होती रहे। सामाजिक सुरक्षा का विचार इस बात की भी व्यवस्था करता है कि जब व्यक्ति सेवानिवृत हो जाये तो भी उसको कुछ आय आती रहे, जिससे उसे जन्म, मृत्यु व विवाह जैसे आकस्मिक खर्चों में सहायता मिले। औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947), कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (1948), कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम (1952), मातृत्व लाभ अधिनियम (1961), ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम (1972), राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (2005) और सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) भारत के प्रमुख सामाजिक सुरक्षा कानून हैं। इनमें से कुछ कानून संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र के श्रमिकों के लिए हैं।

कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (1948) को भारत में पहला न्यूनतम श्रमिक कल्याण कानून माना जाता है। इस अधिनियम के तहत एक एकीकृत सामाजिक बीमा व्यवस्था शुरू की गई थी, जिसमें स्वास्थ्य, प्रसूति और दुर्घटना आदि को शामिल किया गया था। अधिनियम सभी बीमा प्राप्त कर्मचारियों को छ प्रकार के लाभ देता है – बीमारी लाभ, प्रसूति लाभ, अपंगता लाभ, आश्रित लाभ, चिकित्सा लाभ और अंतिम संस्कार लाभ।

कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम (1952) में प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक मालिक को भविष्य निधि योजना को लागू करना चाहिए। उसे अपने और कामगार दोनों के हिस्से को भविष्य निधि में जमा कराना चाहिए, जिसके लिए कामगार के हिस्से को उसके वेतन से काट सकता है। इस अधिनियम का प्रावधान हर उस फैक्टरी या उद्योग पर लागू होता है, जिसमें 20 या उससे अधिक श्रमिक काम करते हों। कर्मचारी पेंशन योजना (1995) को कर्मचारी परिवार पेंशन योजना (1971) के स्थान पर लागू किया गया  है। पुरानी योजना के सभी सदस्यों के लिए नयी योजना अनिवार्य रूप से लागू होती है। इस योजना में जो राशि जमा की जाती है, वह वेतन के 8.33% के बराबर होती है और इस राशि को भविष्य निधि में मालिक वाले हिस्से से लिया जाता है। नये पेंशन कोष में केंद्र सरकार का योगदान सदस्य के वेतन के 1.16% के बराबर निर्धारित किया गया है।

इस योजना में व्यवस्था की गई है कि 58 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर सेवा-निवृत्ति या सेवा-समाप्ति या स्थायी पूर्ण अपंगता या नौकरी के दौरान मृत्यु या सेवा-निवृत्ति, सेवा-समाप्ति, स्थायी पूर्ण अपंगता के बाद मृत्यु की अवस्था में मासिक पेंशन दी जाये या बाल पेंशन और अनाथ पेंशन दी जाये। योजना के अनुसार, 20/10 वर्ष की नौकरी के बाद कोई भी सदस्य सेवा-निवृत्ति, सेवा-समाप्ति और अल्पकालिक सेवा पेंशन प्राप्त कर सकता है। अपंग व्यक्ति एक माह की स्वीकार्य नौकरी के आधार पर ही पेंशन का अधिकार प्राप्त कर लेता है।

बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम (1986) एक बड़ी उपलब्धि है। यह अधिनियम 14 साल से कम उम्र के बच्चों को किसी भी संस्थान में काम करने से प्रतिबंधित करता है। कानून में प्रावधान है कि काम के इच्छुक बच्चों का पंजीकरण अनिवार्य है, उनसे जबरदस्ती काम नहीं लिया जायेगा, उनकी शिक्षा व सेहत का पूरा प्रबंध होना चाहिए तथा उनके प्रति किसी भी तरह का गलत व्यवहार अपराध की श्रेणी में गिना जायेगा। बावजूद इसके हमारे देश में बाल मजदूर एक आम चलन है, जो आज भी बदस्तूर जारी है। इस अधिनियम में संशोधन (2016) करके यह उपबंधित कर दिया गया कि किसी भी प्रकार के व्यवसाय चाहे वह खतरनाक हों या न हों बच्चों को श्रमिक के तौर पर नहीं रखा जा सकता है। ऐसा करना एक अपराध माना जायेगा।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ‘मनरेगा’ (2005)10 देश के ग्रामीण क्षेत्रों में निवासरत परिवारों की आजिविका को सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे लाखों गंवई कामगार लाभान्वित हुए। इस अधिनियम के तहत गंवई कामगारों को काम का अधिकार दिया गया तथा सुनिश्चित किया गया कि उन्हें साल में कम से कम 100 दिन काम मिले। इसके तहत श्रमिकों को कम-से-कम 100 रुपया प्रतिदिन पारिश्रमिक देने का प्रावधान है। अधिनियम के उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. अधिनियम के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र के परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिवस का वयस्क सदस्यों को अकुशल मानव श्रम रोजगार सुनिशिचत करना एवं स्थायी परिसम्पत्तियों का सृजन करना.
  2. छत्तीसगढ़ राज्य में महात्मा गांधी नरेगा के अंतर्गत 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन रोजगार प्रदान किया जा रहा है। अतिरिक्त 50 दिन पर होने वाला व्यय राज्य शासन द्वारा वहन किया जा रहा है.
  3. किसी भी ऐसे ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य जो अकुशल शारीरिक श्रम करने को तैयार है, आवेदन किये जाने के 15 दिन के भीतर रोजगार मुहैया कराये जाने की गारंटी लागू होती है.
  4. काम की मांग करने वाले आवेदक को 15 दिन के भीतर कार्य उपलब्ध नहीं होने पर बेरोजगारी भत्ता दिया जाता है। बेरोजगारी भत्ता पहले 30 दिन हेतु न्यूनतम मजदूरी दर का एक चौथाई होता है एवं 30 दिन के उपरांत न्यूनतम मजदूरी दर का आधा होता है। इस हेतु राज्य द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार बेरोजगारी भत्ता नियम 2013 का छत्तीसगढ़ राजपत्र में प्रकाशन किया गया है.
  5. योजना के अंतर्गत मजदूरी का भुगतान बैंक, डाकघर के बचत खातों के माध्यम से किया जाता है। भारत सरकार द्वारा राज्य के 5 जिलों में आवश्यकता पड़ने पर नगद मजदूरी भुगतान करने की अनुमति प्रदान की गई है.
  6. योजनांतर्गत वर्तमान में 190/- प्रति दिन मजदूरी दर भारत सरकार द्वारा निर्धारित किया गया है.
  7. योजनांतर्गत ग्राम पंचायत स्तर पर मजदूरी एवं सामग्री का 60-40 के अनुपात में राशि व्यय का प्रावधान है.

इसी कड़ी में भारत सरकार ने असंगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कानून (2008) बनाया। इसमें सरकार ने कानून के दायरे से छूट गये श्रमिकों को शामिल किया है तथा कई और ऐसे क्षेत्रों को भी जोड़ा गया है। दरअसल, इस अधिनियम का उद्देश्य था श्रमिकों को चिन्हित करके उनके लिए कानूनी सहायता के अलावा आर्थिक समृद्धि प्रदान करना। भारत सरकार अपने उद्देश्य में सफल रही और मनमोहन सिंह की सरकार खत्म होने तक देश की जीडीपी 8 प्रतिशत पर बनी रही। यह सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

घरेलू कामगार (पंजीकरण, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम (2008) को भुगतान और काम करने की स्थिति को विनियमित करने तथा महिलाओं और अन्य युवा घरेलू श्रमिकों के शोषण और तस्करी को रोकने के लिए पेश किया गया था। घरेलू कामगारों में महिलाओं और बच्चों के शोषण का मामला भारत का सर्वाधिक पुराना और घिनौना है। कोई अधिकार और नियम न होने के कारण अधिकांश घरेलू कामगार गुलामों-सा जीवन जीते थे। यह भी एक तथ्य है कि कई महिलाएं और प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा बच्चों की तस्करी और शोषण किया जाता है तथा ये बिना किसी प्रतिबंध और विनियमों के खुले तौर पर करते थे। इसकी मांग पिछले दशक से बहुत तेजी से बढ़ी है। घरेलू कामगार के कारण अवैध यौन व्यापार और शोषण के अन्य रूपों में भी बढ़ोतरी हुई है। इस क्षेत्र में महिलाओं और बच्चों की मांग जितनी तेजी से बढ़ी है उतनी ही तेजी से हजारों प्लेसमेंट एजेंसियां भी खुली हैं तथा उतनी ही तेजी से घरेलू कामगारों के साथ अपराध विशेषकर यौन शोषण भी बढ़ा है। उन्हें प्रति दिन 16-18 घंटों से अधिक काम करना पड़ता है, उचित भोजन और रहने / सोने की सुविथा का अभाव होता है और उन्हें जबरन अपने परिवार से काट दिया जाता है। वे बंधुआ मजदूर बन जाते हैं। उनके साथ यौन शोषण प्लेसमेंट आफिस, कार्यस्थल तथा नियोक्ताओं के घर, आफिस आदि जगहों पर खूब होता है। परिणामस्वरूप, वे भयंकर रोग से ग्रस्त हो जाते हैं और इस प्रकार वे जानवर में तब्दील कर दिये जाते हैं। उल्लेखनीय बात है कि ये सारे अपराध तथाकथित ऊंची जातियों, बाबुओं, पैसेवालों तथा सामंतों द्वारा किया जाता है। शोषित होते हैं  गरीब दलित, आदिवासी और पिछड़ी जाति व अल्पसंख्यक लोग। हमारे समाज का इज्जतदार तबका इनके साथ अपराध व जानवरों-सा बर्ताव करना अपनी शान और अधिकार समझता है। इस तरह की घिनौनी सोच के कारण जातिगत, धर्मगत, रंगगत व लिंगगत भेदभाव आज चरम पर पहुंच गया है। यह केंद्रीय कानून घरेलू कामगारों के खिलाफ किये गये किसी भी तरह के अपराध को रोकने हेतु बड़ा कारगर हथियार साबित हुआ है। यह कानून कामगारों का पंजीकरण करता है तथा उनके प्रति किये गये अपराध के लिए कड़ी सजा का प्रावधान करता है।

भारत सरकार ने असंगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कानून को बेहद मजबूत बनाया था कि कोई भी श्रमिक सरकारी लाभ से वंचित न रह जाये और न किसी सामंत या नियोक्ता द्वारा शोषित हो। इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर सरकार ने अब तक अनेक सामाजिक सुरक्षा स्कीम चलाया है, जो निम्नलिखित हैं – (1) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, (2) राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना, (3) जननी सुरक्षा योजना, (4) हथकरघा बुनकर व्यापक कल्याण योजना, (5) हस्तशिल्प कारीगरों की व्यापक कल्याण योजना, (6) मास्टर शिल्पकारों को पेंशन, (7) मछुआरों के कल्याण, प्रशिक्षण और विस्तार के लिए राष्ट्रीय योजना, (8) जनश्री बीमा योजना, (9) आम आदमी बीमा योजना और (10) राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना। उक्त योजनाओं का प्रतिफल है कि करोड़ों गंवई कामगार कोरोना -19 महामारी को झेल गये, वरना हालात और भी भयावह हो गया होता।

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम (2013) – यह अधिनियम महिलाओं को उनके कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाने हेतु लाया गया है। इस अधिनियम की आवश्यकता सालों से महसूस की जा रही थी। इससे लाखों महिलाओं को बचाया जा सका है। यह अधिनियम कार्यस्थल पर महिला श्रमिकों के किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न को प्रतिबंधित करता है। यौन उत्पीड़न के अंतर्गत आनेवाली गतिविधियां हैं – (1) पोर्नोग्राफी दिखाना, (2) यौनिक अनुग्रह के लिए अनुरोध या मांग, (3) कामुक टिप्पणी, (4) शारीरिक संपर्क और प्रगति, (5) यौनिक प्रकृति का कोई अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक व्यवहार, और (6) भद्दी टिप्पणी।

यह अधिनियम उन सभी सार्वजनिक या निजी और संगठित या असंगठित क्षेत्रों द्वारा लागू किया जाना तय है जिनमें 10 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। इस अधिनियम में सभी महिलाओं को शामिल किया गया है, चाहे उनकी उम्र या रोजगार की स्थिति कुछ भी हो। अधिकांश भारतीय नियोक्ताओं ने इस कानून को लागू नहीं किया है।

कृषि और अन्य ग्रामीण श्रमिक (संरक्षण और कल्याण) अधिनियम (2018) – यह अधिनियम कृषि और अन्य ग्रामीण श्रमिकों को शोषण के खिलाफ सुरक्षात्मक उपाय प्रदान करने और न्यूनतम मजदूरी, पेंशन, भविष्य निधि की सुविधा तथा दुर्घटनाओं के मामले में भुगतान, छुट्टी के साथ वित्तीय मुआवजा, महिला श्रमिकों को चिकित्सा, मातृत्व और क्रेच सुविधाएं, शिक्षा और पोषण सुनिश्चित करने सम्बन्धी नियमों पर कार्य करने की मंशा को व्यक्त करता है।

भारतीय श्रमिकों का चित्रण करने में हिंदी भाषा ने कोई कोताही नहीं की है। इसमें विपुल मात्रा में श्रमिकों को जगह दी गई है। भारतीय लेखकों का सर्वाधिक हिस्सा श्रमिकों पर केंद्रित रहा है। प्रगतिशील लेखकों का पूरा दल तो श्रमिकों को ही अपना उपजीव्य मानता रहा है। व्यवस्था के खिलाफ लिखा गया पूरा लेखन श्रमिक-केंद्रित है। दलित-आदिवासी-शूद्र लेखन भी श्रमिक-केंद्रित है। सामंतवाद के खिलाफ लिखा गया सम्पूर्ण साहित्य श्रमिक-समर्पित है। शोषण-भेदभाव-अत्याचार को अभिव्यक्त करनेवाला पूरा साहित्य श्रमिकों पर केंद्रित है। सारा समाजवादी साहित्य श्रमजीवियों को समर्पित है। अन्याय-अत्याचार के खिलाफत का पूरा साहित्य श्रमजीवि-केंद्रित है। कुल मिलाकर, देश के सर्वाधिक बड़े हिस्से को हिंदी साहित्य अपने में पूरा जगह देता है। श्रमिकों का कोई भी ऐसा वर्ग नहीं है, जो साहित्य की दुनिया से छूट गया है। उल्लेखनीय बात यह भी है कि साहित्य की सभी विधाओं में श्रमिक-लेखन हुआ है। कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण, रिपोर्ताज, निबंध, आलोचना आदि सभी विधाओं में मजदूर या श्रमिक वर्ग भरा पड़ा है। हिंदी साहित्य का सर्वाधिक भाग श्रमजीवियों को समर्पित है। श्रमिक चाहे संगठित हो, असंगठित हो, गंवई हो, शहरी हो, घर का नौकर-नौकरानी हो, चमड़ा-मछली या कोई भी पेशेवर हो, खेतिहर हो, रिक्सा पुलर हो, दर्जी हो, होटल का बेयरा हो, घर का खानसमा हो – कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिस पर लिखा न गया हो। कुल मिलाकर, पूरा साहित्य श्रमजीवियों का साहित्य है।

उल्लेखनीय बात है कि मार्क्सवाद को अपनी विचारधारा मानने के कारण श्रमजीवियों को मोहनदास करमचंद गांधी सरीखे लोगों ने देशद्रोही कहा है। बुद्ध और चार्वाक समर्थक व तर्क-विज्ञान समर्थक लोगों को भी यही कहा गया है। हमारे यहां बुद्धिजीवियों को भी इसी की संज्ञा दी गई है, जबकि यही वर्ग तर्क-विज्ञान, जनतंत्र और आधुनिकता का समर्थक है। श्रमजीवियों से नफरत की वजह है कि ऐसे लेखन को टेढ़ी दृष्टि से देखा गया है। ऐसे साहित्य को पढ़ा नहीं गया और उनका पुनर्प्रकाशन नहीं हो सका। देश की जनता ने भी इसे अपनी स्वाद का नमक नहीं बना सका। परजीवियों का साहित्य संरक्षणीय बना दिया गया और श्रमजीवियों का साहित्य कूड़ा-कचरा मानकर जेहन से बाहर कर दिया गया है। परिणामस्वरूप, मानसिक गुलामों की फेहरिस्त बढ़ गई है। ऐसे में, साहित्य अपना वजूद खोता जा रहा है। लेकिन जीवन का सातत्य और निरंतरता गतिशील रहेगी – यह चरम सच है। श्रमजीवियों के लिए जड़ता एक अभिशाप है, जिसे मिटाये बिना उनका अस्तित्व नहीं बच सकता। जिन देश व समाजों ने श्रमजीवियों की ताकत को पहचाना और उन्हें अपना प्रेय-श्रेय बना लिया वह दुनिया का सिरमौर बन गया। चीन इसका उदाहरण है। मानव संसाधन हमारे पास भी कम नहीं है, लेकिन हमने मानव को संसाधन माना ही नहीं और न उनका सदुपयोग ही किया है। ‘श्रम एव जयते’, ‘धार’, ‘ऐसी नगरिया में केहि विधि रहना’, ‘नरक कुंड में बास’, ‘आवां’, ‘बीज’, ‘महाभोज’, ‘सावधान! नीचे आग है’, ‘धुआं, आग और इंसान’, ‘काला हीरा’, ‘काला सोना’, ‘समय बीता हुआ’, ‘उनका फैसला’, ‘क्रांतिदूत’, ‘गीता पार्टी कामरेड’, ‘जलती चट्टान’, ‘तलघर’, ‘तालाबंदी’, ‘मजनूं का टीला’, ‘रोमिंग इन कलकत्ता’, ‘रोशन’, ‘सती मैया का चौरा’, ‘समर शेष है’, ‘संघर्षों के बीच’, ‘सीता’, ‘श्रमिक संसार’, ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’, ‘बसंती’, ‘झुनिया’, ‘बलचनमा’, ‘मशाल’, ‘आदमी और जंजीरें’, ‘लोहे के पंख’, ‘नदी फिर बह चली’, ‘धरती धन न अपना’, ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘पांव तले की दूब’, ‘दूसरा घर’, ‘गगन घटा घहरानी’, ‘प्रतिरोध’, ‘कंचन बरसाते नर्क’, ‘ग्लोबल गांव का देवता’, ‘हुल पहाड़िया’, ‘आपरेशन महिषासुर’, ‘ठहरिये! आगे जंगल है’, ‘महुआ मंडल और अंधेरा’ आदि कुछ उपन्यास हैं, जिनमें श्रमजीवियों को देखा जा सकता है। जिस देश और समाज की कार्यसंस्कृति हो गरीबी बनाये रखना, अनपढ़ बनाये रखना, रोजगार विहीन बनाये रखना, उद्योग स्थापित न करना, श्रमजीवियों को जानवर समझना – वहां लोकवाद स्थापित नहीं हो सकता। आज भारत की स्थिति ऐसी ही हो गई है।

भारत में एक अनुमान के मुताबिक कामगारों की संख्या 45 करोड़ है, जिनमें 93% (41.85 करोड़) लोग असंगठित क्षेत्र में लगे हुए हैं11। लेकिन इन कामगार परिवारों पर आश्रित सदस्यों की संख्या कम-से-कम दो गुनी है। मनमोहन सिंह की सरकार ने सन् 2013 में नेशनल फुड सिक्योरिटी एक्ट पारित किया था, जिसमें बताया गया था कि भारत में 70% लोग ऐसे हैं जिन्हें तीनों समय का भर पेट भोजन नहीं मिल पाता। इससे यह साबित हो जाता है कि भारत में गरीबों की संख्या कुल जनसंख्या का सत्तर प्रतिशत है। ‘यह अधिनियम सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है, और अखिल भारतीय आधार पर, 81.34 करोड़ व्यक्तियों के अधिकतम कवरेज में से, लगभग 80 करोड़ व्यक्तियों को वर्तमान में अत्यधिक सब्सिडी वाले खाद्यान्न प्राप्त करने के लिए एनएफएसए के तहत कवर किया गया है’12। उल्लेखनीय है कि ये सारे लोग भारत के श्रमजीवी वर्ग में आते हैं, जिनके पास श्रम ही उनकी शक्ति या पूंजी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहनेवालों की संख्या कुल जनसंख्या का 21.9% (26.8 करोड़) है, जिनकी दैनिक आय 142.80 रुपया या उससे कम है। 2019 में प्रकाशित ग्लोबल हंगर इंडेक्स में कुल 117 देशों में भारत का स्थान 102वां है। इससे साफ होता है कि भारत में श्रमजीवी वर्ग बेरोजगार होता चला जा रहा है। उनके पास काम नहीं है, इसलिए वे भूखे रहने को मजबूर हैं। देश में 12 कानूनों और 14 कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद खेतिहर मजदूरों की दशा दयनीय बनी हुई है। कुल मिलाकर, आबादी के बड़े हिस्से की आमदनी और रहन-सहन में भारी गिरावट आई है। आज भारत में अमीरी-गरीबी की खाई दिन-प्रति-दिन बड़ी होती जा रही है। अमीर और अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है।

सरकार प्राइवटाईजेशन की ओर तेजी से बढ़ रही है। यहां की सारी योजनाएं कार्पोरेट घरानों को दी जा रही हैं। जो पब्लिक सेक्टर यूनिट्स देश की रीढ़ हुआ करती थीं, अब धड़ल्ले से उन्हें कार्पोरेट घरानों को बेचा जा रहा है। इसी का नतीजा है कि अब तक अनेक पब्लिक सेक्टर यूनिट्स बेच दिये गये और अनेक बिकने के कगार पर खड़े हैं। बाहरी मल्टीनेशनल कम्पनियों का भारत में आना लगभग बंद हो गया है। जो भी पहले से मौजूद मल्टीनेशनल कम्पनियां थीं वो भी अब अपने सटर उठाकर भाग रही हैं। इसके परिणाम बहुत भयावह होंगे। अब काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 किये जा रहे हैं। इससे मजदूर लोहे के मशीन बनकर रह जायेंगे। उनकी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। अब बहुत बड़ी संख्या में कुशल कामगार बेरोजगार हो जायेंगे, क्योंकि कार्पोरेट पूंजीपति कम-से-कम श्रमिक से काम चलायेगा। साथ ही, वह वेतन भी कम देगा तथा श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करेगा। इससे श्रमिक सामाजिक सुरक्षा न के बराबर रह जायेगी। परिणास्वरूप, भारत में बेरोजगारों की फौज खड़ी हो जायेगी। इससे विकास के सारे चक्के जाम हो जायेंगे तथा वह ह्रास में तब्दील हो जायेगा। इसी का परिणाम है कि अप्रैल-जून 2020 में भारत का वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) गिरकर 23.9 % हो गया था13। इस ह्रास में कोरोना -19 महामारी ने आग में घी का काम किया। सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी  के मुताबिक, कोरोना काल अप्रैल 2021 में 12.2 करोड़ भारतीयों ने अपनी नौकरी और रोजगार गंवाया14। महामारी रोकने की दिशा में भारत में लगाए गए लाकडाउन का सर्वाधिक बुरा प्रभाव असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर पड़ा। उनके सामने अर्थोपार्जन की भारी कमी देखी गई15। शहर से भागकर आये करोड़ों श्रमिकों को गांव ने उन्हें शरण दिया तथा अनौपचारिक क्षेत्र ने उन्हें बचाया, लेकिन कोरोना ने उन्हें मिटाया। महामारी का प्रभाव ग्रामीण इलाकों में काफी अधिक रहा। गंगा नदी के किनारे दफनाये एवं गंगा में बहाए गए लाश इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं16

आज श्रमिक संगठित कम और असंगठित ज्यादा हो रहा है, क्योंकि निजीकरण की प्रक्रिया में श्रम का औपचारिक क्षेत्र सिकुड़ रहा है और अनौपचारिक क्षेत्र विस्तृत हो रहा है। अब हड़ताल कम और तालाबंदी ज्यादा दिखाई देती है। औपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के हितों की रक्षा करनेवाले मौजूदा कानूनों को खत्म करने का बड़ा भारी अभियान चलाया जा रहा है। अब राज्य का हस्तक्षेप निजीकरण की प्रक्रिया को तेजी से बढ़ाने के रूप में सामने आ रहा है। सीपीआई महासचिव एबी वर्धन के शब्दों में, मजदूर वर्ग आज चौतरफा हमले का शिकार है। निजीकरण के कार्यक्रम राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को चौपट करने और गरीबी, बेरोजगारी की समस्या को बढ़ाने के साथ-साथ खुद ट्रेड यूनियन आंदोलन को ही नष्ट करने पर आमादा है।

संदर्भ सूची –

  1. चौधरी, मुन्नी – हिंदी उपन्यासों में श्रमिक (2015), देव प्रकाशन, दिल्ली, पेज 20।
  2. आम्बेडकर, बी आर: अर्जुन राम मेघवाल का लेख, ‘BR Ambedkar laid the Foundation for Worker’s Rights, Social Security in India’, Indian Express, May 1, 2020।
  3. चौधरी, मुन्नी – मजदूर वर्ग और हिंदी उपन्यास (2015), देव प्रकाशन, दिल्ली, पेज 29.
  4. https://peoplesdispatch.org/
  5. Woodcock, Jamie: https://notesfrombelow.org/article/india-general-strike-2019
  6. https://en.wikipedia.org/wiki/2020_Indian_general_strike
  7. वाधवकर, संजय: http://www.industriall-union.org/over-250-million-workers-join-national-strike-in-india
  8. सांचेज, वाल्टर: वही
  9. https://indianexpress.com/article/cities/chandigarh/477-protesters-died-during-six-months-of-delhi-morcha-87-from-punjab-skm-7331842/
  10. https://www.tumbhidekho.com/2021/01/2005-what-is-purpose-of-mnrega-and.html
  11. https://www.google.com/search?client=firefoxbd&q=unorganized+sector+in+India+statics+2020
  12. https://nfsa.gov.in/portal/NFSA-Act
  13. खालिद भट्टी, इंटरनेशनल द न्यूज, दिसम्बर 04, 2020।
  14. 25/05/2021 from https://hindi.news18.com/blogs/sumit-verma/unorganized-sector-situation-challenge-and-government-efforts-in-the-corona-period-3189769.html
  15. रिया राणा, मार्च 30, 2020: inventiva.co.in/stories/
  16. हाशिये की आवाज, जुलाई 2021, नई दिल्ली, पेज 1

 

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