कथा जनवरी महीने के पूर्वार्ध की है।
दिनचर्या के अनुसार सबेरे पास के रेलवे स्टेशन के ओर दौड़ने गयी थी। नित्य की भाँति सबकुछ सामान्य था ।
रेलवे – स्टेशन को मुड़ने वाली सड़क के नुक्कड़ पर गली के कुत्ते ऊँघ रहे थे।
नुक्कड़ से परे बने जंगलनुमा पार्क के घास पर ओस ठण्ड के मारे काँप रही थी। रात – भर आकाश में नक्षत्रों के बीच ऊँघ रहा चाँद भी थकान  से थका जान पड़ता था।
सड़क पर भारी वाहन रह – रहकर तेज रफ़्तार से गुजर जाते । सड़क पर लगे लैम्पों की पीली बत्ती में शांत सड़क स्वर्णमयी लंकानगरी का भान करा रही थी।
‘ लेबर टी’ नामक चाय की दुकान, जो  चौबीस घंटे सेवा देने के कारण श्रमिक वर्ग का विशेष आकर्षण थी, चूल्हे पर बीसियों बार चाय छान चुकी पत्ती फिर से कड़क रही थी।
वास्तव में यह काफी प्यारी सुबह थी, सौम्य , शांत जयशंकर प्रसाद विदित ‘ वरुणा नदी ‘ की
‘ शांत कछार ‘ सी –
‘अरी वरुणा की शांत कछार !
तपस्वी के विराग की प्यार !’
दौड़ने से शरीर का ताप वातावरण के ताप से अवश्य ही बढ़ गया था। ठंडी -ठंडी सुबह में अदरकयुक्त चाय वास्तव में चित्त को विश्राम देती है। रेलवे – ब्रिज के उस पार चाय की एक दुकान सबेरे खुल जाती है।
अदरक की चाय वहां की काफी कड़क होती है । रेलवे – पुल की सीढ़ी चढ़ने के लिए जैसे ही मैं मुड़ी कि एक असामान्य  दृश्य लछित हुआ।
तन पर एक फटी कमीज डाले, कमर पर लुंगी बांधे एक अधेड़ खड़े – खड़े कांप रहे थे। श्याम वर्ण , पकी हुई नुकीली दाढ़ी जिसे पिछले हफ्ते बनाया गया हो, आधे सिर पर बाल, खाली पैर , गिजबिज – गिजबिज आँखें , मुश्किल से खड़े हो पा रहे थे।
मुद्रा अवश्य ही भिक्षुकों सी थी। वैसे तो नित्य ही एकाध भिखारी इस छोटे से स्टेशन पर मिल जाते ,पर न जाने क्यों उसने ध्यानाकर्षित किया।
कारण शायद इनके अंदाज का नाटकीय न होकर प्राकृतिक हो ।
खैर मैं मुखातिब हुई।
पॉकेट से एक गर्म नोट निकाल कर उनके हाथों को गर्माहट की हल्की आंच देने से मन को सुकून मिला।
मानस पर बचपन से रटा एक श्लोक स्मरित हो आया।
‘ अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:
चत्तवारि तस्य वर्धनते आयुविद्यायशोबल..।’
मैंने उसने बातचीत आरम्भ की ।
‘ आप कहाँ से हैं  बाबा ?’
मैं …… मैं ……  अलीगढ …. वो जो ‘
‘ आप यहाँ क्या करते है?’
‘……………………………………….’
‘ आप घर नहीं जाते?’
‘ नहीं । आँख खराब हुई। इलाज में सारा जमीन बिक गया।’
‘ यहाँ कहाँ रहते हैं ?’
‘  वो कोने पर बने पार्क में । मेरे साथ …… मेरी पत्नी भी रहती है। आज कपड़े धुलने है।
इसलिए……………….?’
थोड़ी देर में चुप रही । वे काँपते हुए खड़े रहे।
लोग कहते हैं कि आँखें दिल की आवाज होती हैं । मैंने उसकी आँखों में झांकने की कोशिश की। वहां केवल अँधेरा था।
गिजबिज –  गिजबिज , अँधेरा।
कभी – कभी ‘ समाज कल्याण विभाग ‘ की आँखों की तरह ये आँखें भी हल्की खुलती , फिर केवल हिल – हिल कर अपने वजूद का भान देती।
मैंने प्रश्नों से उन्हें कुरेदना छोड़ दिया ।
आगे बढ़ चली।
‘ इंशा अल्लाह …….. आपको सलामत रखे …….. घर में खूब बरक्कत हो।…………’
पीछे दुवाओं की झड़ी शुरू हो चुकी थी । एक – एक कदम बढ़ाना दूभर होने लगा।
खैर कुछ पल चित्त को अशांत कर बात आई – गयी हो गयी। मैं भी इसे नियति का क्रूर रूप मान बैठी।
घटना ने दूसरे दिन परेशान करना शुरू किया जब किसी पत्रिका में ‘ बुजुर्ग एवं ओल्ड – एज होम’ शीर्षक से लेख पढ़ा झट इन्टरनेट पर शहर के ‘ओल्ड एज होम्स’ की सूचनाएँ एवं संपर्क इकठ्ठा करना शुरू किया।
तीन चार दिन की जानकारी एवं पता नोट कर तीसरे दिन सुबह -सुबह रेलवे- पुल की सीढ़ियों पर पहुंची।
वहां कोई नहीं था ।
पूरा स्टेशन देख चुकी , लोग थे , भिखारी थे , पर वो गिजबिज आँखों वाले बुजुर्ग न थे।
नुक्कड़ पर बनी जंगलनुमा पार्क के एक कोने में कुछ फटे -चीथड़े पड़े थे।
जलकर काला स्याह बन चुकी कुछ लकड़ियाँ थी , राख थी । वो कहीं न थे।
बुझे मन से घर वापिस आयी । मन बहलाने हेतु अखबार खोल ‘ताजा’ के नाम पर परोसी जा रही  ‘वासी’  ख़बरों में मन रमाने लगी।
अंदर के एक पृष्ठ के कोने में वही गिजबिज आँखें दिख गयी ।
ऊपर छपा था — ‘ अज्ञात की पहचान’ ।
मन सन्न रह गया ।
पूरा पढ़ने की हिम्मत न हुई। बस कुछ शब्द कानों में गूंजने लगे — ‘ अल्लाह …… आपको सलामत रखे…….घर में खूब बरकत हो ……..।

शिवांजलि पांडेय

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