सरकार ने समाज में दो तरह के विद्यालयों की व्यवस्था कर रखी है। सरकारी प्राथमिक विद्यालय अत्यन्त गरीब बच्चों के विद्यालय है, जहाँ सब कुछ निःशुल्क प्राप्त होता है। वहीं मान्यता प्राप्त और कान्वेन्ट अमीरों के विद्यालय हैं, जहाँ हर कार्य के लिए पैसे खर्च करने होते हैं अर्थात् विद्यालय अब सामाजिक हैसियत का प्रश्न बन गये हैं |  ऐसी सोच बन गयी है अब सरकारी विद्यालयों के प्रति।

मजदूर वर्ग हूँ मैं, अपना दर्द ब्यान करता हूँ

इससे ज्यादा और क्या गम होगा मेरा,

अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाया करता हूँ

       ऐसा कोई भी अभिभावक जिसकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी है, वो तो कतई भी सरकारी विद्यालय में अपने बच्चों का प्रवेश नहीं करायेगा।

       बेसिक शिक्षा विभाग सरकारी विद्यालयों, निजी विद्यालयों के छात्रों के आंकलन के लिए एक जैसे मानक तैयार करता है। जबकि शहरी क्षेत्र में अभिभावकों की सचेतता बच्चे की पढ़ाई को लेकर इतनी अधिक है कि बच्चे की पढ़ाई के अलावा उन बच्चों पर किसी प्रकार का कोई दबाव ना के ही बराबर होता है। जबकि सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्रायें अपने घरेलू कार्यों में हाथ बटाते हैं, मजदूरी पर साथ जाते हैं । साल छोटे बहन भाइयों को सम्भालने की जिम्मेदारी भी उनकी अपनी होती है। विद्यालयों के छः घण्टों में भी न जाने कितनी जिम्मेदारियों की उलझनों के बीच फंसे होते हैं, ये बच्चे। तो फिर कैसे सरकारी स्कूलों में हम शैक्षिक उत्थान की शत प्रतिशत शुद्धता की बात कर सकते हैं?

       निजी विद्यालयों में शैक्षिक संस्थान के लिए नियमितता के साथ-साथ अभिभावकों का सहयोग व ट्यूशन की भी सुविधा रहती है। वही सरकारी विद्यालयों में जा रहे माता-पिता के लिए पढ़ाई प्राथमिकता पर नहीं होती है। पढ़ाई से ज्यादा प्राथमिकता दो वक्त की रोटी की व्यवस्था कर न्यूनतम स्तर के जीवन निर्वाह करने को दी जाती है।

       हालांकि सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे, कुछ छात्र पढ़ना चाहते हैं, उनके अभिभावक भी उन्हें पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन कहीं उनका निम्नतर जीवन स्तर उनके आड़े आता है, तो कहीं स्कूल में मिल रही असुविधायें भी इसकी जिम्मेदार हैं। जैसे-शिक्षक नियुक्ति में निर्धारित मानकों का अभाव दो अध्यापकों पर पूरे पाँच-पाँच कक्षाओं का कार्यभार सम्भालने या कहीं एक अध्यापक को कक्षा 1 से 8 तक का कार्यभार अकेले ही सम्भालना पड़ता है।

भ्रष्टाचार तजे, अध्यापक नियुक्ति निर्धारित मानक जगे

तो सरकारी विद्यालयों में, सब पढ़े, सब बढ़े

       लेकिन कहीं अगर स्थिति समकक्ष है, तो छात्र-छात्राओं का विद्यालय में उपस्थिति अभाव, जहाँ निजी विद्यालयों में माता-पिता अपने बच्चों को टाई-बेल्ट लंच देकर भेजता है, वहीं सरकारी विद्यालयों में बच्चों को बलपूर्वक शिक्षक द्वारा बुलाया जाता है और जब स्थिति जबरन रोके रखने की होती है, तो उसे कुछ सीखा पाना अपेक्षाकृत अधिक कठिन हो जाता है। हालांकि सर्व शिक्षा अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने सभी बच्चों को शिक्षा की दहलीज तो पार करा ही दी है, भले ही बच्चा कुछ सीखे या ना सीखे। जाने या ना जाने कक्षा एक से आठ तो पास कर ही लेनी है।

आंकलन मूल्यांकन का गर बदले नजरिया

तो खिल उठेगी, सरकारी विद्यालयों की बलिया

       विषम पारिवारिक व मानसिक परिस्थतियों में विद्यालयों में लगातार विद्यालयों में उपस्थिति बनाये और पढ़ने के लिए प्रेरित करना अपने आप में एक चुनौती भरा कार्य है।

       सरकारी विद्यालयों में प्रवेश आयु 6 वर्ष होना भी स्कूलों के नामांकन के घटते स्तर को प्रभावित करता है, क्योंकि आज के युग में देखा देखी तौर पर निजी विद्यालयों में प्रवेश आयु से तीन से साढ़े तीन वर्ष है, तो ऐसे में कोई अभिभावक 6 वर्ष तक प्रतीक्षा की अवस्था में नहीं रहता है और निजी विद्यालयों को इसका लाभ होता है।

       सरकारी विद्यालयों में बन रही मध्याह्न भोजन योजना भी शैक्षिक उत्थान में गति अवरोधक है। इस योजना को अगर किसी एन0जी00 को या अन्य किसी संस्था को सौंप दें तो परिणाम और भी बेहतर होंगे।

मेरे गाँव, मेरे स्कूल में बटती रोज खिचड़ी

नहीं जायेंगे खिचड़ी वाले स्कूल,

इसी सोच से बात बिछड़ी।

       विद्यालयों को मुहैया कराये जाने वाली निःशुल्क सुविधाओं का अति विलम्ब से प्राप्त होना भी विद्यालयों को सफलीकरण को चुनौती देता है।

       गाँव-गाँव तेजी से फैलती अंग्रेजी माध्यम व मिशनरी शिक्षा के समक्ष सरकारी शिक्षा के समक्ष सरकारी प्राथमिक शिक्षा टिक नहीं पा रही है।

       सरकारी विद्यालयों में कार्यरत कुछ शिक्षकों का शिक्षण के प्रति उदासीन दृष्टिकोण भी सरकारी विद्यालयों की प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाली प्रभावी कड़ी है।

गुरू जी भी अब तो हो गये है उदासीन,

यूंही प्राथमिक शिक्षा हो गयी चरमाई कुर्सी पर आसीन।

       शिक्षा व्यवस्था के प्रबन्धन में टीम वर्क की भावना का अभाव है, जिसके परिणाम स्वरूप भारत में शिक्षकों के सम्मान के गिरते स्तर पर प्रश्नवाचक? चिन्ह लग गया है।

मिलकर हाथ बढ़ाना है, शिक्षा का दीप जलाना है,

चलो चले, चलते चलते, नामांकन भी बढ़ाना है।।

       1986 में जब से राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी थी, तब से लेकर अब तक प्राथमिक शिक्षा के स्तर में काफी सुधार हुआ है, क्योंकि हर पंचवर्षीय योजना में वैसे ही शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। केन्द्र एवं राज्यों द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा के सर्व सुलभीकरण और सभी के लिए शिक्षा के लक्ष्य की पूर्ति हेतु सर्व शिक्षा अभियान चलाया है।

       इस अभियान के तहत 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चे अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी कर लें। इस क्रान्तिकारी अभियान को सफल बनाने के लिए भारतीय संविधान का 93वां संशोधन विधेयक संसद में पारित किया गया। इसके साथ ही एक क्रान्तिकारी व्यवस्था तय की गयी, जिसमें सभी 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य रूप से शिक्षा देना राज्य सरकारों का कर्तव्य होगा।

शिक्षा है अनमोल रतन, पढ़ने का सब करो यतन

       अगर उत्तर प्रदेश की इस वर्ष की रिपोर्ट जाने तो प्राथमिक शिक्षा के लिए चलाई जा रही अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद देश में पांचवी तक के छात्रों की संख्या में पिछले साल में 7 लाख बच्चों की कमी आई है। रिपोर्ट के अनुसार पांचवी और आठवीं में क्रमशः 13.24 करोड़ और 6.64 यानी कुल 19.88 करोड़ बच्चे पूरे देश में प्रारम्भिक शिक्षा हासिल कर रहे है। लेकिन इतनी बड़ी तादात में बच्चों का प्राथमिक स्कूल से कम होना सवाल खड़ा करता है कि आखिर इतनी सुविधाओं के बावजूद सरकारी विद्यालय असफल क्यों?

सरकारी विद्यालयों पर क्यों चढ़ गयी गर्द

ये ही सर्व शिक्षा अभियान सबसे बड़े दर्द का दर्द

डॉ. अमितेश कुमार शर्मा
प्रधानाचार्य
अल्पाइन कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन
जलालाबाद, शामली

 

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