अनुक्रमणिका

संपादकीय 

डॉ. आलोक रंजन पांडेय

बातों – बातों में 

प्रो. रत्नाकर नराले से डॉ. दीपक पांडेय जी की बातचीत

शोधार्थी 

साहित्य में व्यंजित लोक-संस्कृति की महत्ता – डॉ. कुलभूषण शर्मा

भक्ति आंदोलन के अवसान संबंधी आलोचनात्मक मतों का विश्लेषण – श्वेतांशु शेखर

भगवान श्रीराम के सच्चे सखा ‘गुहराज निषाद’ – मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

 निराला के काव्य में आक्रोश एवं संवेदना –   डॉ. दिनेश कुमार

हिंदी सिनेमा में चित्रित आदिवासी समाज और उनकी समस्याएँ – ज्ञान चन्द्र पाल

भूमंडलीकरण को असग़र वजाहत का संदेश – प्रियंका कुमारी

मध्यकालीन कथानक रूढ़ियाँ – अनुराग सिंह

आजादी का अमृत महोत्सव और श्रमजीवी वर्ग: कुछ साहित्यिक कुछ जगबीती – मुन्नी चौधरी

भूमण्डलीकरण, लोकतन्त्र और भारतीय किसान की ‘फाँस’ – राम विनय शर्मा

 अनुभूति 

सुशांत सुप्रिय जी की कविताएं

मजमाबाज (लघु-कथा) – संजय कुमार सिंह

गौरीशंकर वैश्य विनम्र की कविता

जरा हट के 

साहित्य को लोकतान्त्रिक बनाने की आवश्यकता है : प्रो॰ श्यौराज सिंह बेचैन (व्याख्यान) – अनुज कुमार

हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार काजी नज़रुल इस्लाम – शैलेन्द्र चौहान

तर्जुमा

इफिगेनी ( योहान्न वोल्फ़गांग फ़ॉन ग्योते, एक जर्मन नाटक) (Iphigenie auf Tauris) : एक नाटक – अनुवादक: प्रशांत कुमार पांडेय, रामचन्दर गुप्ता

समीक्षा 

कवि होने की सादगी-भरी और संजीदा कोशिश (पुस्तक ‘वसंत के हरकारे’ की समीक्षा) – शिखर जैन

सिनेमा / फैशन 

अपनी ब्रांड वैल्यू को भुनाने में नाकाम ‘बंटी बबली 2’ – तेजस पूनियां

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