कुसुम मेघवाल के अनुसार- ” दलित का शाब्दिक अर्थ है कुचला हुआ । अतः दलित वर्ग का सामाजिक संदर्भो में अर्थ होगा वह जाति समुदाय जो अन्यायपूर्वक सवर्णों या उच्च जातियों द्वारा दलित किया गया हो , रौंदा गया हो । दलित शब्द व्यापक रूप में पीड़ित के अर्थ में आता है पर दलित वर्ग का प्रयोग हिन्दू समाज – व्यवस्था के अतर्गत परंपरागत रूप में शूद्र माने जाने वाले वर्गों के लिए रूढ़ हो गया है । दलित वर्ग में वे सभी जातियाँ सम्मिलित है जो जातिगत सोपान – क्रम में निम्नतम स्तर पर हैं और जिन्हें सदियों से दबाकर रखा गया है । ‘
कोई भी व्यक्ति सस्ती लोकप्रियता से ‘ युग – पुरुष ‘ नहीं बन सकता । उसके लिए जनता के बीच उसकी गहरी जड़ें होना व समाज तथा राष्ट्र को विकसित करने की प्रबल इच्छाशक्ति , दृष्टिकोण तथा योग्यता का होना ज़रूरी है । अंबेडकर के व्यक्तित्व में ये गुण अकूत मात्रा में विद्यमान थे । उनकी सामाजिक समझ , दृष्टि , नीयत व नीति एकदम साफ थी । अछतों के नेता के रूप में अंबेडकर की सार्वजनिक पहचान कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज ने कराई थी । उन्होंने 1920 में मान गाँव की विशाल परिषद में यह सार्वजनिक घोषणा की –
        ” अछूतों को अब अपना नेता मिल गया है । ” अंबेडकर केवल एक व्यक्ति नहीं थे वे संविध न शिल्पी थे , दर्शनशास्त्री विचारक थे , अर्थशास्त्री थे , दर्शनशास्त्री विचारक थे अर्थशास्त्री थे , समाजशास्त्री थे , कानूनवेत्ता थे , समाज सुधारक थे , पत्रकार थे , धर्म – विश्लेषक थे वास्तव में वह एक युग थे । जिसे ‘ अंबेडकर युग ‘ कहा जाता है उसके निर्माण में अनेक युगीन का अमूल्य योगदान था । पछिड़ी जातियों ने शूद्र शब्द को अपने नाम से नोंच फेंका था । पर वह अछूतों से चिपका हुआ था । यदि इन्होंने सामाजिक सुधार की आँच पहले से न जलाई होती अंबेडकर भी मात्र पुस्तकीय व्यक्तित्व बन जाते ‘ युग निर्माता ‘ न बनते । उनके विराट व्यक्तित्व के कारण दलितों ने उन्हे प्रेरणास्पद मानने के स्थान पर श्रद्धास्पद बना दिया ।
डॉ . अंबेडकर ने कभी नहीं चाहा कि उन्हे देवता मानकर पूजा जाए , उनके नाम की आरती गाई जाए लेकिन गाजीपुर के ‘ सिवाना ‘ गाँव में अंबेडकर का मंदिर बनाया गया है जो अंबेडकर के विचारों का लगभग अपमान ही है । यह उनके दलित चिंतन को निस्तेज करने जैसा ही है ।
अंबेडकर ने शिक्षार्जन करते हुए सामाजिक बुराइयों का कटु पाठ भी पढ़ा । अपने परिवार से कबीरपंथी विचार और संस्कार प्राप्त किए । अनुशासन और सहजता का पाठ पढ़ा । प्रतिकूल परिस्थितियों से विद्रोही तेवर अर्जित किए । पिता के अवकाश प्राप्त करने पर उन्हें आर्थिक तंगहाली   की स्थिति भी झेलनी पड़ी । दुनिया को खुली किताब मानकर पढ़ने की कोशिश ने उन्हें बहुआयामी व्यक्तित्व प्रदान किया । अपनी अध्ययनशीलता तथा चिंतन मननशीलता के परिणाम स्वरूप वे विदेशों में भी पढ़ने गए और व्यापक सोच तथा व्यावहारिकता प्राप्त कर सके । वे दुनिया भर में भ्रमण करते रहे और अपने दलित बंधुओं को अर्जित ज्ञान और अनुभव बाँटते रहे उन्हें दिशा दिखाते रहे ।
इस एक व्यक्ति ने संस्थाओं की तरह अनेक क्षेत्रों में आधार भूत काम किया । विशाल राजगृह को महाग्रंथालय में बदल दिया- ” जो एशिया के तमाम निजी पुस्तकालयों में सबसे बड़ा था । ”
उनके इस रचनात्मक व्यक्तित्व को मनु और ज्ञानदेव कहा गया । किसी ने उन्हें हिन्दुस्तान का बुकरटी वाशिंगटन , भारत का मार्टिन लूथर , भारत का रॉबर्टसन , भारत का इब्राहिम लिंगकन , भारत का टामस जैफरसन इत्यादि विशेषण उनके व्यक्तित्व की महानता और व्यापकता को ही सूचित करते हैं ।
अंबेडकर का दर्शन मूलतः है भारतीय ही है । वह यूरोपीय दर्शन से प्रभावित तो है लेकिन पूर्णतः अनुयायी नहीं । वे स्पष्ट लिखते हैं ” सकारात्मक दृष्टि से मेरा समाज दर्शन तीन शब्दों से बना है । स्वतंत्रता , समता और भ्रातृत्व भाव में सन्निहित मेरा दर्शन फ्रांस की क्रांति का अनुकरण नहीं है क्योंकि मेरे दर्शन का मूल धर्म है राजनीति विज्ञान नहीं । ‘ बुद्ध ‘ की शिक्षाओं ने मेरा पथ प्रदर्शन किया है ।
गाँधी और अछूतों की मुक्ति नामक ग्रंथ में वे भौतिकवादी ‘ दर्शन ‘ के विरुद्ध खड़े नजर आते हैं- ” मनुष्य केवल रोटी से ही जीवित नहीं रह सकता उसके पास पेट ही नहीं मस्तिष्क भी है । ”
अंबेडकर एक अर्थशास्त्री भी था । अर्थशास्त्री के रूप में उन्होंने भारतीय समाज में भाईचारे व समता को महत्व देते हुए अपने भाषणों में कहा- ” हिन्दुओं के शास्त्रागार में सबसे बड़ा हथियार उनकी आर्थिक शक्ति है जिसके बल पर वे दलित जातियों का शोषण करते हैं । ‘
 उनका यह मानना था कि- ” आर्थिक शोषण को समाप्त करने की दृष्टि में मूल उद्योगों का स्वामित्व और प्रबंध राज्य के हाथ में रहे और बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण हो । यह सुझाव भी दिया था कि कृषि के क्षेत्र में मालिकों काश्तकारों आदि को मुआवजा देकर सरकार भूमि को अधि ग्रहण करे और उस पर सामूहिक खेती कराए । ‘
अंबेडकर राजनीकय समाजवाद के प्रबल समर्थक थे । वे उसके माध्यम से शोषितों पिछड़ों , दलितों , अस्पृश्यों ओर स्त्रियों की सहभागिता का स्वप्न देखते थे । उनका कहना था- ” जिस लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आस्था है उन्हें तानाशाही ले जबर्दस्त ऐतराज है और वे स्वतंत्र समाज के शासन तंत्र के रूप में लोकतंत्र पर जोर देते हैं । अतः हमारी समस्या है कि हमारे यहाँ बिना तानाशाही का राजकीय समाजवाद हो हमारा समाजवाद संसदीय प्रणाली के साथ हो ।
उन्होंने भारत में प्रचलित धार्मिक कानूनों स्मृतियों इत्यादि का विधिवत् अध्ययन किया । रूढ़ियों ग्रंथों , परंपराओं , प्रचलनों के अच्छे बुरे परिणामों वे प्रभाव का गंभीरतापूर्वक विश्लेषण किया । उनके मध्य से व्यावहारिक जीवन मूल्यों को खोजा व सारहीन को को बहिष्कृत किया । सरलता और सुगमता पूर्वक जीने का सही रास्ता दिखलाकर दलितों व पिछड़ों को जीने का नया अंदाज और साहस प्रदान किया । यही उनके सामाजिक दर्शन की सबसे बड़ी सार्थकता व मूल्यवत्ता है । यही मौलिक सोच दलित विमर्श के रूप में हिन्दी कथा साहित्य में कहीं स्फुट रूप में तो कहीं व्यापक प्रभाव के रूप में दिखाई देती है । अंबेडकर की प्रतिबद्धता और सजगता ने बहुत से साहित्यकारों को दिशा और प्रेरणा प्रदान की जिसने हिन्दी साहित्य को एक नया तेवर और एक नई भंगिमा प्रदान की ।
*” हमनी के इनरा के निगिचे न जाइले जा*
*पांके में से भरि – भरि , पचितानी पानी ।*
*पनही से पिटि – पिटि हाथ गोड़ तुरि दैलें ,*
*हमनी के एतनी काहे के हलकानी ॥*
ये पंक्तियाँ दलित कवि हीरा डोम के द्वारा ‘ अछूत की शिकायत ‘ नामक रचना में लिखी गई थी जो 1914 की सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थीं । ये पंक्तियाँ दलितों की प्रथम दस्तक को साहित्य के रूप में चिह्नित करती हैं । आज दलित साहित्य चर्चा के केन्द्र में है । इसका अपना सौंदर्य शास्त्र और विमर्श हैं दलित साहित्य के प्रारंभिक स्वर के प्रस्फुटन के संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार अभयकुमार दुबे ने लिखा है  :-
    ” यह भी एक गलतफहमी है कि आधुनिक दलित साहित्य का जन्म सबसे पहले मराठी में हुआ था । बीस और तीस के दशक में भाग्य रेड्डी कर्मा के नेतृत्व में आदि आंध्र के क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों के शादीक प्रयासों से बने माहौल में एक सर्वथानयी दलित साहित्यिक – सांस्कृतिक परंपरा ने जन्म लिया । इसके शीर्ष पर गुर्रम जाषुवा थे जो अपनी प्रखरता और अनूठे कृतित्व के लिए दलित महाकवि कहलाए । जाषुवा के साथ थे भीमन्ना , कुसुम धर्मन्ना और स्वयं भाग्य रेड्डी वर्मा ।
भारतीय दलित साहित्य के आदिस्रोत के संदर्भ में अर्जुन डांगले चवपेमदमक इतमंक में लिखते हैं  –
A number of researchers have atempted to trace the origin of the Dalit literary movement , some trace it back to the budhist period for some the originator is the saint poets chokhamela ( 14 A.D. ) some give credit to mahatma phule ( 1828-90 ) and some to prot . S.M mate ( 1886-1957 ) The researchers main tain that the term Dalit literature did not exist during this period … a historical and objective exanination of the situation reveals that is was Dr. Ambedkar who was the enabling factor in dalit literature because of his idea , outlook Towards life and his struggle to achieve what he felt just . ” डॉ . सी.बी. भारतीय की मान्यता है ।।
 ” दलित साहित्य नवयुग का एक व्यापक , वैज्ञानिक व यथार्थ परक संवेदनशील साहित्यिक हस्तक्षेप है । जो कुछ भी तर्कसंगत , वैज्ञानिक परंपराओं के पूर्वाग्रहों से मुक्त साहित्य सृजन है हम उसे दलित साहित्य के नाम से संज्ञापित करते हैं । राजेन्द्र यादव ‘ दलित ‘ शब्द को व्यापक परिधि में देखते हैं । वे स्त्रियों और पिछड़ी जातियों की पीड़ा को भी दलित चेतना और साहित्य में शामिल कर लेते हैं । ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित साहित्य को जन साहित्य मानते हैं यानी मास लिटरेचर । उनके अनुसार यह लिटरेचर ऑफ एक्शन है । जो मानवीय मूल्यों की भूमिका पर सामंती मानसिकता के विरुद्ध आक्रोश जनित संघर्ष है सच तो यह है कि भारतीय व्यवस्था अनेक प्रकार के शोषण , पीड़ा और अन्याय से घिरी है । इसके बावजूद ‘ दलित चेतना और साहित्य शब्द का प्रयोग भ्रामक न होते हुए भी एक वर्ग विशेष से जुड़ा है जिन्हे ‘ डिप्रेस्ड क्लासेस ‘ और ‘ हरिजन ‘ कहा गया ।
अंबेडकर ने दलितों को मनोवैज्ञानिक मुक्ति का अहसास कराया और उन्हें बौद्धिक मनुष्य बनाने का प्रयास किया । इसी से दलितों में विद्रोह की मानसिकता के साथ – साथ बुद्धि , तर्काशीलता व चिंतनशीलता विकसित हुई । जो आधुनिक समाज की चुनौतियों को झेलने के लिए बहुत ज़रूरी था । वस्तुतः साहित्यकार अपनी कलम से ‘ बहुजन हिताय ‘ लेखन करता है । साहित्यकार की यही दृष्टि साहित्य को ऊर्जा प्रदान करती है । माननीय मूल्यों को स्थापित करते हुए ‘ मानवीय अधिकारों के प्रति प्रत्येक जन को जगाना ही दलित साहित्य की प्रेरणा ‘ है ।
किसी भी प्रकार की सामाजिक , राजनीतिक या आर्थिक स्वतंत्रता तभी सार्थक हो सकती थी जब दलित अपने भीतर की हीन ग्रंथियों और कुंठाओं से मुक्ति पा सके । इस आंदोलन ने दलितों को गाँव छोड़कर शहर की ओर आने के लिए मजबूर कर दिया । अभयकुमार दुबे के अनुसार –
” गाँव के बाहर पड़ा रहने वाला अत्यंत ऐसे स्थान की तलाश में निकल पड़ा जहाँ से उसे बहिष्कृत किया जाना संस्थागत रूप से नामुमकिन हो । यह स्थान हार था जो आधुनिकता के घटनास्थल के रूप में उभर रहा था । दलित चेतना उत्तरोत्तर नगर केन्द्रित होती गयी और दलित साहित्य नागरिकता की खोज में जाति पूछे जाने के औचित्य पर सवालिया निशान लगाने लगा । इस तथ्य के समर्थन में ‘ जूठन ‘ के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं : ‘
“आज प्रजातंत्र के युग में भी सामंती व्यवस्था का खुला नृत्य गाँवों और कस्बों में होता है । उन सबसे भागकर दलित नगरों में आते रहे हैं जहाँ उन्हें सुरक्षा और रोटी रोजी की गुंजाइश ज्यादा दिखलाई पड़ती है । कल कारखानों में मजदूर बनकर दलितों ने एक नया जीवन शुरु किया । पर शहर की सच्चाई भी अलग न थी । “
भारतीय साहित्य में आज दलित स्वर अपनी पहचान बना चुके हैं । उनकी पहचान को समाहित किए बिना आज भारतीय साहित्य की संपूर्णता को टटोलना बेमानी है । दलितों के करुण स्वरों की अनेदेखी , अनसुनी अब संभव नहीं है ।
हिन्दी के प्रारंभिक उपन्यासकारों के लेखन पर सुधारवादी आंदोलनों का गहरा प्रभाव द्रष्टव्य है । वे भी शताब्दियों से रूढिग्रस्त भारतीय समाज को बदलना चाहते थे । प्रारंभ में ये बदलाव बालविवाह , सती प्रथा आदि के विरोध तथा विधवा विवाह के समर्थन के रूप में दिखाई दिए बाद में धीरे – धीरे रूढ़ियों , कुरीतियों एवं कुप्रथाओं के प्रखर विरोध के रूप में अभरने लगे । इन सुधारवादी आंदोलनों ने भारतीय समाज व साहित्य को एक नई दिशा व नूतन परिप्रेक्ष्य प्रदान किया । इसी दिशा में गाँधी और अंबेडकर के दलित व हरिजन उद्धार का आंदोलन भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है । दलितों व उपेक्षितों की पीड़ा को वाणी देते हुए जीवन को जीने की नई दृष्टि प्रदान करने में हिंदी के साहित्यकार उनके दर्शन व सोच से प्रभावित नज़र आते हैं । उपन्यास मानवीय जीवन का महाकाव्य कहलाता है । मानव जीवन के हर क्षेत्र , विषय और हर्ष – विषाद का उसमें विस्तृत चित्र होता है ।
इस लिहाज़ से मानव जीवन की समस्याओं उनके स्वरूप तथा समाधान इत्यादि का प्रकाशन अपेक्षाकृत रूप से उपन्यास में कहीं अधिक संभव है । युगीन हिन्दी उपन्यासकारों ने अछूतों को मंदिर प्रवेश धार्मिक उत्सवों में सम्मिलित न होने देने व भगवान के दर्शन न करने देना आदि ध रिणाओं का विरोध किया । इससे उन रचनाकारों की सामाजिक संवेदनापरकता का आभास होता है । प्रेमचंद ने तो उस भीषण समस्या को बखूबी उठाया है ।
‘ कर्म भूमि ‘ में ठाकुर जी के मंदिर में अछूतों द्वारा रामायण की कथा को सुनने पर उनकी पिटाई कर दी जाती है । यह अमानवीय घटना अछूतों के मानवीय अधिकारों के हनन को प्रकाशित करती है । इस संदर्भ में प्रेमचंद डॉ . शांतिकुमार नामक पात्र के माध्यम से उपस्थित होकर प्रखर शैली में कहते हैं : – “ अंधे भक्तों की आँखों में धूल झोंककर यह हलवे खाने को नहीं मिलेंगे , महाराज समझ गए । अब वह समय आ रहा है जब भगवान पानी से स्नान करेंगे , दूध से नहीं । “
 इस प्रकरण में डॉ . शांकि कुमार समस्त अछूतों को संगठित करते हैं और उनका मंदिर में प्रवेश कराते हैं । ” यह अछूत वर्ग को उनकी एकता , अटूट संघर्ष तथा जागरूकता और बलिदान से मिली हुई वास्तविक विजय है ।
रमेश तिवारी ने लिखा है कि ” वर्ण व्यवस्था तथा उससे उत्पन्न अछूत समस्या एक अंतर्जातीय विवाह की समस्या आदि ने हिंदी के उपन्यासकारों को बहुत कुछ प्रभावित किया है और समय तथा तत्कालीन प्रगति के साथ – साथ समस्याओं के प्रगतिशील समाधानों की ओर भी पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है । ”
हिन्दी उपन्यासों में दलित वर्ग के चित्रण के आधार पर उन्हें इन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है –
1. दलित उद्धार से संबंधित उपन्यास ।
2. निम्न वर्गों के प्रति अन्याय को प्रस्तुत करने वाले उपन्यास ।
3. क्रांति एवं विद्रोही चेतना से संबद्ध उपन्यास ।
4. दलित पात्रों की प्रमुख भूमिका वाले उपन्यास ।
प्रथम वर्ग के अंतर्गत प्रेमचंद के उपन्यास कर्मभूमि ( 1932 ) गोदान ( 1936 ) ; मन्मथनाथ गुप्त का उपन्यास मानव – दानव ( 1965 ) , निराला का उपन्यास ‘ कुल्लीभाट ‘ ( 1965 ) , चतुरसेन का उपन्यास उदयास्त ( 1963 ) , पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र का मनुष्यानन्द ( 1964 ) , श्रीराम शर्मा का ‘ नदी का मोड़ ‘ ( 1965 ) , गोपाल उपाध्याय का ‘ एक टुकड़ा इतिहास ( 1975 ) , दामोदर सदन का नदी के मोड़ पर ( 1979 ) ; नरेन्द्र कोहली का उपन्यास अवसर ‘ आदि परिगणनीय हैं ।
द्वितीय वर्ग के अतर्गत रामदरश मिश्र के उपन्यास ‘ जल टूटता हुआ ( 1969 ) , सूखता हुआ तालाब ( 1972 ) , शिव प्रसाद सिंह का उपन्यास ‘ अलग – अलग वैतरणी ( 1967 ) , फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘ मैला आँचल ( 1954 ) , परती परिकथा ( 1961 ) , मधुकर सिंह के उपन्यास , सबसे बड़ा छल ( 1975 ) सोनभद्र की राधा ( 1976 ) सीताराम नमस्कार ( 1977 ) , गोपाल उपाध्याय का उपन्यास ‘ एक टुकड़ा इतिहास ‘ ( 1975 ) , मृतलाल नागर का उपन्यास ‘ नाच्यो बहुत गोपाल ‘ ( 1979 ) , मन्नू भंडारी का उपन्यास ‘ महाभोज ‘ ( 1979 ) , श्री चंद्र अग्निहोत्री का उपन्यास ‘ नयी बिसात ‘ ( 1980 ) गिरिराज किशोर का उपन्यास यथा प्रस्तावित ( 1982 ) , रांगेय राधव का उपन्यास कब तक पुकारू ( 1958 ) , बाला दुबे का उपन्यास ‘ मकान दर मकान ‘ 1981 , आरिगपूडि का उपन्यास ‘ अभिशाप ‘ ( 1981 ) विश्वेश्वर का उपन्यास ‘ महापात्र ‘ ( 1981 ) यादवेन्द्र शर्मा चंद्र का उपन्यास ‘ हजार घोड़ों का सवार आदि उल्लेखनीय उपन्यास हैं ।
तृतीय वर्ग में रांगय राघव के उपन्यास ‘ कल तक पुकारूँ ‘ ( 1958 ) , ‘ मर्दो का टीला’ ( 1948 ) , गोपाल उपाध्याय का उपन्यास ‘ एक टुकड़ा इतिहास ‘ ( 1975 ) की चर्चा की जा सकती है।
चतुर्थ वर्ग में प्रेमचंद के उपन्यास ‘ रंगभूमि ‘ 1924 , गबन ( 1929 ) , अनिता ( 1956 ) तथा भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘ भूले बिसरे चित्र ‘ ( 1959 ) व ‘ सबहिं नचावत राम गोसाईं ( 1975 ) की गणना की जाती है ।
प्रेमचंद एक सामाजिक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जीवन को सामाजिक संदर्भ में अंकित किया है । उन्होंने अंबेडकर की ही भाँति समाज के अंतराल को पाटने के लिए रोटी बेटी के संबंध की बात कर्मभूमि में एक नए विचार के रूप में प्रदान की है ।
प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में समाज के उपेक्षित वर्ग स्त्री , शूद्र ( दलित ) किसान , मजदूर इत्यादि की समस्याओं का सजीव व मार्मिक चित्रण करके उनके समाधान खोजने का प्रयास भी किया है । सामाजिक समस्याओं छुआछूत , आंडबर , ऊँच – नीच , अशिक्षा , अंधविश्वास आदि को बड़ी कुशलता से उभारा है ।
उनकी सद्गति , ठाकुर का कुआँ तथा कफन आदि कहानियों की संवेदना दलित न्याय दिलाने का प्रयास दिखती है । अछूतोद्धार व रूढ़ियों से मुक्ति के प्रयास में प्रेमचंद कदम बढ़ाते दिखाई देते हैं ।
उग्र ने समाज के घोर यथार्थ का चित्रण किया है जिसमें तत्कालीन समाज पतनोन्मुख हो रहा था । “ उग्र ने समाज के घृणित परिवेश का द्वार खोला था जिसमें मानवता अपने खंडित रूप में कराण आर्तनाद कर रही थी ।
उग्र के उपन्यास बुधुआ की बेटी में मनुष्यानंद के भंगी आधुनिक सामाजिक और राष्ट्रीय जागरण के युग की उपज है । वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं ।
 इसी प्रकार ‘ कुल्ली भाट ‘ में निराला कुल्ली को सामाजिक क्रांति के अग्रदूत के रूप में चित्रित करते हैं । कुल्ली अछूतों की पाठशाला चलाता है । एक मुस्लिम महिला से विवाह करने के कारण जीवन पर्यंत भी और मरणोपरांत भी सामाजिक बहिष्कार का शिकार बनता है । इस उपन्यास में निराला ने अछूतोद्धार व सांप्रदायिकता को आधार बनाकर सामाजिक पाखंड को उजागर किया है।
प्रेमचंद युग के अंत में यही कहना समीचीन होगा । प्रेमचंद , उग्र , निराला ने अछूतोद्धार को सशक्त वाणी दी , उनके समाधान प्रस्तुत करने की कोशिश की । प्रेमचंदोत्तर युग के उपन्यासकारों ने अज्ञेय ( शेखर एक जीवनी ) भगवतीचरण वर्मा ( भूले बिसरे चित्र ) अमृतराय ( बीज ) आदि ने अछूत व दलित समस्या का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है ।
यद्यपि उपन्यास विद्या के माध्यम से दलितों की समस्याओं और पीड़ा को काफी अभिव्यक्ति मिली है फिर भी सामाजिक समता के स्तर पर उनके मूल सरोकार आज भी कही न कहीं अनुत्तरित ही है । जब तक उन्हें सामाजिक समकक्षता प्राप्त नहीं होगी तब तक दलित विमर्श यूँ ही विद्यमान रहेगा ।
 *संदर्भ*
1. हिन्दी उपन्यासों में दलित वर्ग – कुसुम मेघवाल पृष्ठ -32
2 .अंबेडकर गाँधी और दलित पत्रकारिता पृ .12
3. वही पृ. 13
4. अंबेडकर, गाँधी और दलित पत्रकारिता श्यौराज सिंह बेचैन, पृ – 31
5. वही
6. वही पृ. 25
7. वही पृ. 14
8. वही पृ. 17
9. वही 19
10. अंबेडकर, गाँधी ओर दलित पत्रकारिता श्यौराज सिंह बेचैन, पृ. 24
11. वही पृ. 25
12. स्वतंत्र भारत : जातीय तथा भाषाई समस्या पृ. 18 अनुवादक नरेश वेदी (बारीस क्लूयेव)
 *सहायक ग्रन्थ सूची*
1. वेदप्रताप वैदिक हिन्दी पत्रकारिता के विविध आयाम- नेशनल पब्लिशिंग हाउस , नई दिल्ली
2. ब्रह्मानंद भारतीय पत्रकारिता आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता
3. बाबा साहेब अंबेडकर के 15 व्याख्यान- संकलन – पं . चत्रिका प्रसाद जिज्ञासु , बहुजन कल्याण , उ.प्र .
4. आरजी सिंह- भारतीय दलितों की समस्याएँ एवं उनका समाधान- मध्य प्रदेश , हिन्दी ग्रंथ अकादमी ।
5. डी.सी. डीनकर – स्वतंत्रता आदोलन में अछूतों का योगदान बोधिसत्त्व प्रकाश , लखनऊ -1986
6. एम . आर . विद्रोही – दलित दस्तावेज दलित साहित्य प्रकाशन संस्था , दिल्ली -1989
7. डॉ . अंबेडकर कांग्रेस और गाँधी ने अछूतों के लिए क्या किया- अनु , जगन्नाथ कुरील समता साहित्य प्रकाशन लखनक 1988
8. डॉ . धर्मवीर डॉ . अंबेडकर और दलित आदोलन शेष साहित्य प्रकाशन , शाहदरा , दिल्ली -1990
9. शंकरानंद शास्त्री – युगपुरुष बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर अंबेडकर रिसर्च इस्टीट्यूट , दि . 1990
10. हिमांशु राय- युग पुरुष- बा सा भीम , अबेडकर- समता प्रकाशन दिल्ली -1990
11. भारतराम भट्ट- मनीषी अंबेडकर , साहित्य केन्द्र प्रकाशन , दिल्ली- 1986
12. बोरिस क्लूयेव- स्वतंत्र भारत – जातीय तथा भाषाई समस्या – अनु नरेश वेदी , प्रगति प्रकाशन , मास्को , 1986
13. मधु लिमये- अंबेडकर एक चिंतन अनु , अस्तराम कपूर , सरदार वल्लभ भाई पटेल , एज्यूकेशन सोसाइटी , न दि- 1989
14. डी . आर . जाटव- डॉ . अंबेडकर व्यक्तित्व एवं कृतित्व , समता साहित्य सदन , जयपुर , 1990
15. रामचंद्र वनौधा- अंबेडकर का जीवन संघर्ष , इलाहाबाद
16.डी.आर जारव – भारतीय समाज एवं संविधान , समता साहित्य सदन जयपुर 1989
17. बाबुराव वागुल – दलित साहित्यः उद्धेश्य और वैचारिकता . दलित साहित्य प्रकाशन , नागपुर
 *( Endnotes )*
1. हिन्दी उपन्यासों में दलित वर्ग – कुसुम मेघवाल पृष्ठ -32
2. अंबेडकर गांधी और दलित पत्रकारिता पृ . 12
3. वही पृ. 13
4. अबेडकर गाँधी और दलित पत्रकारिता श्यौराज सिंह बेचैन , पृ . – 31
5. वही
6. वही पृ . 25
7. वही पृ. 14
8. वही पृ. 17
9. वही 19
10. अंबेडकर , गाँधी और दलित पत्रकारिता श्यौराज सिंह बेचैन , पृ . 24
11. वही पृ 25
12. स्वतंत्र भारत : जातीय तथा भाषाई समस्या पृ. 18 अनुवादक नरेश वेदी ( बोरीस क्लूये
डॉ . माला मिश्र
एसोसिएट प्रोफेसर 
अदिति महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय

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