सिनेमा का भाषिक और सामाजिक अध्ययन (विशेष संदर्भ नसीरूद्दीन शाह अभिनीत फिल्में)-डॉ. माला मिश्र

 पिछली सदी शुरू होने से पूर्व ही जब देश अपनी स्वतन्त्रता पाने की ओर अग्रसर था और देश में राजनैतिक और सामाजिक सुधार का व्यापक दौर चल रहा था, उसी […]

सिनेमा के कैनवास का लोक रंग – अर्चना पाठक

लोकाचार या लोकजीवन भारत जैसे ग्राम्य आधारित समाज का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसकी पैठ समाज की अन्तर्षिराओं में रक्त की भाँति है। इस दृष्टि से हिन्दी सिनेमा के […]

महारानी पद्मिनी: इतिहास या मिथक – डा. वीरेन्द्र भारद्वाज

इन दिनों चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी की जीवन-गाथा भारतीय जनमानस को झकझोर रही है । संजय लीला भंसाली बम्बईया फिल्मों के मझे हुए डायरेक्टर हैं जो अक्सर ऐतिहासिक किरदारों में […]

प्रतिरोध का सिनेमा वाया कड़वी हवा – तेजस पूनिया

प्रदूषण हर तरह का हानिकारक होता ही है उसी के परिणामस्वरूप हमें और कई गम्भीर परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं । वर्तमान में तेजी से बदलते हमारे देश भारत में […]

फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति – डॉ.ममता धवन

आजकल का दौर तीव्रता से कहानी कहने का चल रहा है। फिल्म प्रदर्शित करने की समय अवधि कम होती जा रही है। फिल्म के इस कम समय को बनाए रखने […]