सोलहवीं शताब्दी के स्पैनिश सन्त सान खुआन का रहस्यवाद – माला शिखा

स्पेन में सोलहवीं शताब्दी के दो सन्त, सान्ता तेरेसा दे खेसूस व सान खुआन दे ला क्रूस, कदाचित स्पेन के आज तक के सबसे प्रमुख रहस्यवादी सन्त रहे हैं। प्रस्तुत […]

बेहद्दी : एक लोकगीत – डाॅ. मंजु तॅवर

इससे पूर्व प्रकाशित भारतीय लोक और स्त्रीमन की 5 श्रृंखलाओं में भोजपुरी के लोकगीत खड़ी बोली के लोकगीत राजसानी लोकगीत, हरियाणी लोकगीत व पंजाबी लोकगीत की बेहद्दी में मैंने जहां […]

असफल होते सरकारी विद्यालयों की कहानी : एक जुबानी – डॉ. अमितेश कुमार शर्मा 

सरकार ने समाज में दो तरह के विद्यालयों की व्यवस्था कर रखी है। सरकारी प्राथमिक विद्यालय अत्यन्त गरीब बच्चों के विद्यालय है, जहाँ सब कुछ निःशुल्क प्राप्त होता है। वहीं […]

अष्टभुजा शुक्ल के काव्य में चित्रित ग्रामीण जीवन – प्रियंका झा

भारत गाँवों का देश है,यहाँ 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग गाँवों में रहते है,और 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का जीवन कृषि पर निर्भर है,लेकिन फिर भी क्यों गाँव और […]

भाषा और अस्मिता का अंतस्संबंध – बीरेन्द्र सिंह

अस्मिता का अर्थ है- पहचान तथा भाषाई अस्मिता से तात्पर्य है- भाषा बोलने वालों की अपनी पहचान। ‘अस्मिता’ शब्द के संदर्भ में डॉ. नामवर सिंह ने कहा है कि- “हिंदी […]

आधुनिक कविताओ में विचारों का संप्रेषण :मिथक – डॉ .मोनिका देवी

आधुनिक कविता में जटिल विचारों के संप्रेषण के लिए मिथक का व्यापक प्रयोग किया गया l आचार्य हजारी प्रसाद दिव्वेदी ने अग्रेज़ी के( myth )शब्द के समानार्थी के रूप में […]

जटिल जीवन नद में तिर तिर – सच्चिदानंद पाण्डेय

वर्तमान समय मनुष्यता की तलाश का है|इस समय यदि किसी में सर्वाधिक क्षरण दृष्टिगत होता है,तो वह मनुष्यता है|आज के इस संकटग्रस्त समय में दुनिया अनेक ध्रुवों में विभाजित होती […]

हिंदी की दशा की पड़ताल  – जयन्त जिज्ञासु

अपनी चेतना को अभिव्यक्त करने व अपने विचारों से दूसरों को अवगत कराने तथा दूसरे की राय व भावनाओं को जानने का माध्यम है भाषा। संप्रेषण व विचार-विनिमय का सशक्त […]

आदिवासी कविता : संघर्ष और विद्रोहधर्मिता – डॉ.धीरेन्द्र सिंह

अपने समय और समाज की यथार्थ स्थिति का उद्घाटन निरूपण व प्रस्तुतीकरण करना ही साहित्य का लक्ष्य है। साहित्य युगीन तब बनता है जब वह अपने समय समाज व जन-सामान्य […]

जन-माध्यमों के बदलते सरोकार – डॉ. माला मिश्र

यह एक विचित्र संयोग है कि जब विभिन्न देशों में जगह-जगह राष्ट्रवादी आंदोलनों ने सिरे उठाना शुरू कर दिया है और राष्ट्रीय अस्मिता तथा संप्रभुता के प्राथमिक सवालों से लोग […]