
“तुलसी साहित्य में राम”
“श्रीरघुनाथ कथामृत-पोषित,
काव्यकला रति-सी छवि छाई ।
ताहि अनेकन भूषन भूषित,
बरी तुलसी अति ही हरसाई ।।
जीवत सो जुग जोरी खरी,
हुलसी-हुलसी अति मोद उछाई ।
सो हुलसी के हिये को हुलास,
हरैं हमरे जिय की जड़ताई ।।”
कविकुल चक्र चूड़ामणि गोसाई श्री तुलसीदास जी हिन्दी साहित्य के महान सन्त कवि थे । मध्यकालीन सगुण भक्ति धारा में एक सच्चे राम भक्त के रुप में गोस्वामी जी की लोक-प्रियता, उत्कृष्टता तथा प्रभावशीलता सभी स्तरो पर अद्वितीय है । यदि भक्ति काल के काव्य का समस्त वैभव एक साथ देखना हो तो गोस्वामी तुलसीदास के काव्य का अनुशीलन करना होगा । उनका “मानस” भक्ति के रस से तो पूर्ण है ही साथ ही उसमें लोकाचार, समाज-नीति, राजनीति तथा धर्म का आदर्श रुप भी प्रतिबिम्बित हुआ है । तुलसीदास जी किसी परिचय के मोहताज नही है । उनकी ख्याति भारतीयों से लेकर विदेशों तक सदियों से फैली हुई है । वे एक कालजयी व्यक्तित्व के रुप में अमर हैं ।
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भारतीय महापुरुषों के जीवन-चरित्र के सम्बन्ध में प्रायः विसंगतियां पायी जाती हैं । उनके लौकिक जीवन की सूचना देने वाली निश्चित घटनाओं, तिथियों आदि का उल्लेख बहुत कम मिलता है । कोई प्रमाणिक साक्ष्य उपलब्ध न होने की स्थिति में उनके जीवन-चरित्र के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं और बहुत-सी मन-गढ़ंत कथाएं प्रचलित हो जाती हैं।
जो उनके असाधारण महत्व की द्योतक होती है जीवन की यर्थाथ घटनाओं से उनका विशेष सम्बन्ध नही रहता । कबीर, जायसी, सूर, आदि की जीवनी आज भी अपूर्ण ज्ञात हैं। यही दशा गोस्वामी तुलसीदास जी के सम्बन्ध में भी है । उनका जीवनवृत विवादों से घिरा हुआ है । उनके जन्म, माता-पिता, परिवार, गुरु आदि के सम्बन्ध में विभिन्न मत और जनश्रुतियॉ प्रचलित हैं । डा0 माता प्रसाद गुप्त ने समस्त बाह्य और अन्तः साक्ष्यों का परीक्षण करके तुलसी की जन्मतिथि सुदी।। मंगलवार संवत् 1589 निश्चित की है । डा0 भागीरथ मिश्र मूल गोसाई चरित् की तिथि सावन शुक्ल सप्तमी संवत् 1554 को अधिक प्रमाणित मानतें है । ग्रियर्सन आदि अधिकांश विद्वान संवत् 1589 को तुलसी की जन्मतिथि मानने पर सहमत हैं । तुलसी के जन्म-स्थान के सन्दर्भ में “सोरो” तथा “राजापुर” नामक स्थानों को लेकर विद्वानो में मतभेद रहा है, किन्तु दोनों में किसी भी स्थान को जन्म-स्थान का गौरव नही मिल सका । राजापुर से तुलसी का सम्बन्ध दीर्घकालीन रहा हैं ।
तुलसीदास के जीवन से सम्बन्ध रखने वाले संकेत हमें उनके ग्रन्थों-“रामचरित मानस,”“कवितावली, विनयपत्रिका,” बरैवरामायण, “दोहावली” में मिलते हैं और ये संकेत उनकी आत्मकथा-सम्बन्धी झलक ही नही उपस्थित करते, वरन् उनके व्यक्तित्व पर भी प्रकाश डालते हैं । तुलसी-साहित्य के अर्न्तगत पारिवारिक व्यक्तियों में माता के अतिरिक्त और किसी के नाम का उल्लेख नही मिलता-
“रामहिं प्रिय पावन तुलसी सी । तुलसीदास हित हियॅं हुलसी सी”। अनेक बाह्य साक्ष्यों में भी तुलसी की माता का नाम हुलसी मिलता है और यह जनश्रुति और परम्परापुष्ट भी है । जनश्रुतिनुसार ही इनके पिता आत्माराम दूबे थे । इनकेा बचपन का नाम तुलसी नही राम बोला था । इसका कारण था कि ये राम नाम अधिक लिया करते थे-
राम को गुलाम नाम रामबोला राख्यों राम ।
काम यहै नाम द्वै हौ कबहूॅ कहत हौं ।।
कहा जाता है इनका जन्म अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ था जो अशुभ माना जाता है अतः इसीलिए माता-पिता ने इनका परित्याग कर दिया था । बाल्यावस्था में तुलसी को अत्यन्त कष्ट उठाना पड़ा । सौभाग्य से इधर-उधर भटकते हुए इस अनाथ बालक की भेंट बाबा नरहरिदास से हो गयी । तुलसी ने अपने गुरु के प्रति विशेष सम्मान दिखाया है, किन्तु उनके नाम का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नही मिलता-
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“बंदौं गुरुपद कंज कृपा सिन्धु नर रुप हरि”
गोस्वामी जी की योग्यता, नम्रता, शिष्ट व्यवहार से प्रभावित होकर दीनबन्धु पाठक ने अपनी पुत्री रत्नावली का विवाह इनके साथ कर दिया । तुलसी वैराग्य से पूर्व अपनी परणिता पत्नी से बुरी तरह आसक्त थे, कारण भी था कि माता-पिता के प्रेम से वंचित होने पर तुलसी अपना सारा प्रेम पत्नी पर ही उड़ेल दिये थे । इसलिए पत्नी वियोग सहने में असमर्थ थे । वैराग्य एवं भक्ति की प्रेरणा इन्हें पत्नी से ही मिली ।
“अस्थि चर्ममय देह मम, तामें जैसी प्रीति ।
तैसी जो श्रीराम में, होति न तौ भवभीति”।।
इससे तुलसी के दिव्य चक्षु खुल गये । वे संसार को छोड़कर राम-भक्ति में लीन हो गये और काशी चले गये । भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा कर विद्वानों से, सन्त पुरुषों से भेंट की । संवत् 1680 में (सन् 1623 ई0) में इनका स्वर्गवास हो गया । इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है-
“संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर ।
श्रावण कृष्णा तीज शनि, तुलसी तज्यों शरीर ।।”
कवि, परिस्थिति विशेष में उत्पन्न होता है, बढ़ता है, संस्कार ग्रहण करता है, प्रेरणा प्राप्त करता है, स्वयं बनता है और उस परिस्थिति को अपनी रचनाओं में प्रतिबिम्बित करता है, यह ठीक है, परन्तु साथ ही यह भी ठीक है कि वह अपनी समसामयिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया-स्वरुप बहुत कुछ इन्हें परिष्कृत करने और बनाने का भी काम करता है । वह कवि, कवि कहलाने का अधिकारी नही है जो अपनी स्थिति से जन्म और जीवन ग्रहण करके अपने भावों और विचारों एवं आदर्शो के द्वारा पूरे वायुमण्डल को सुरभित, विकसित और प्रफुल्लित न कर सके । यदि कवि युग का प्रतिनिधित्व करता है तो वह युग का निर्माण भी करता है।
“काव्य की लोकप्रियता के दो पक्ष है, कवि पक्ष और लोक पक्ष । कवि काव्य स्रष्टा होता है और लोक अर्थात् सहृदय समाज रस ग्रहीता, इस प्रकार काव्य, कवि और लोक के बीच का सेतु है । जिससे दोनों के मध्य भावों और विचारों का यातायात होता रहता है । कवि का जीवन लोक या समाज के जीवन से विछिन्न नहीं होता, वह भी लोक का ही एक अंग होता है ।
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अतः उसकी अनुभूतियाॅंभी उसी परिवेश और सांस्कृतिक, ऐतिहासिक पर्यावरण की देन होती हैं, जिसमें उससे सम्बन्धित समाज अर्थात् लोक की अनुभूतियॉं निर्मित होती हैं। परिणामतः कवि और लोक दोनों ही एक ही परिस्थित और पर्यावरण में उत्पन्न समान अनुभूतियों के सहभागी और सहभोक्ता होते हैं। दोनों के बीच जो काव्यात्मक संवाद होता रहता है, उसका कारण कवि और लोक का यह सहअस्तित्व और सह भ्रातृत्व ही है।”
अतः किसी कवि के विषय में अध्ययन करने में उसके दोनों पक्ष देखना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है । पहले तो हमें यह देखना होता है कि कहॉं तक समसामयिक परिस्थितियों ने
किसी कवि को बनाने में योग दिया है और फिर यह भी जानना होगा की उसने युग तथा आगामी युगो को कहॉ तक प्रभावित किया है ।
तुलसी की महानता का आधार उनकी समन्वयशीलता है । उनका सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है । उन्होंने “रामचरितमानस” लोक और शास्त्र का गृहस्थ और वैराग्य का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण और काव्य का, भावावेग और अनासक्त का समन्वय प्रस्तुत किया है । इनके चिन्तन का फलक विराट है । उनके साहित्य पर अद्वैतवाद, विशिष्टा द्वैतवाद , वेदान्त, शंकर के अद्वैतवाद का प्रभाव लक्ष्य किया जा सकता है ।
राम की ईश्वर के रुप में उपासना करने की परम्परा का समुन्नत रुप दृष्टिगोचर होता है । वाल्मीकि कृत “रामायण” कालीदासकृत “रघुवंशम्” भवभूति रचित “उत्तररामचरित” आदि संस्कृत ग्रन्थ राम के चरित्र को भली-भांति प्रतिपादित करते हैं। हिन्दी में आचार्य रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद की आधार भूमि पर रामानन्द ने श्री वैष्णव सम्प्रदाय की स्थापना की। इन्ही की शिष्य परम्परा में रामभक्ति का विपुल स्रोत महाकवि तुलसीदास के राम काव्यो से प्रवाहित हुआ ।
तुलसीदास के राम परम्ब्रह्म हैं वे समस्त प्राणियों में व्याप्त हैंं। उनके व्यक्तित्व में सगुण निर्गुण दोनों का पर्यवसान है। राम सच्चिदानन्द-स्वरुप परमेश्वर तथा परासरनाथ हैं। जिनका वेद, ज्ञानी, मुनि ध्यान करते हैं। यही भगवान भक्तों के लिए सगुण रुप धारण करते हैं। जैसे जल के विविध रुप बर्फ आदि होते हैं तथा वे सब जल होते हैं । उसी प्रकार निर्गुण-ब्रह्म सगुण रुप में बदल जाता है। राम विष्णु के अवतार हैं –
“हिय निरगुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम । ।”
“मनहु पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम ।।”
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तुलसी जी की भक्ति-भावना लोक मंगल की प्रबल भावना है । उनके आराध्य राम शील, सौन्दर्य और शक्ति तीनों के गुण सागर हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं। तुलसी ने अपने महाकाव्य में राम के विभिन्न रूप जैसे कि – आदर्श मानव, आदर्श राजा , आदर्श पति, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श वीर, आदर्श पिता, का चित्रित किया है । राम कथा की पावन गंगा का अवतरण तुलसी के “मानस” में होता है ।जाति-पांति के बन्धन से ऊपर उठे हुए तुलसी अपनी मानस कथा में व्यापकता का परिचय देते हैं । “रामचरितमानस” तुलसीदास जी की कीर्ति का आधार स्तम्भ है । यह एक सुप्रसिद्ध महाकाव्य है । जिसमें राम कथा सात काण्डों में विभक्त है । वि0 सं0 1631 में रामनवमी के दिन तुलसीदास जी ने “रामचरितमानस” की रचना प्रारम्भ की थी । दो वर्ष सात महीने, छब्बीस दिनों में ग्रन्थ की श्री इति हुई । वि0 सं0 1633 में मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गए । “रामचरितमानस” भारतीय संस्कृति(हिन्दी संस्कृति) का ऐसा कोष है जिसमें अन्य संस्कृतियों का भी विवेचन है।
कबीर के “राम” और तुलसी के “राम” में अन्तर है । कबीर के “राम” निर्गुंण निराकार ब्रह्म है । वे दृष्टिगोचर नही है (दिखाई नही देते है ), न रुप, न रंग, न आकार सम्पन्न है, वे न तो मूर्ति में विद्यमान हैं और न ही अवतार धारण करते हैं । वे तो सर्वव्यापी हैं। अणु-अणु में बसे हुए निर्गुण, निराकार परब्रह्म हैं , जिन्हें कबीर राम कहकर पुकारते हैं।
“दशरथ सुत तिहुॅं लोक बखाना,
राम नाम का मरम है आना।”
तुलसी के “राम” सगुण ब्रह्म हैं, साकार ईश्वर हैं,
जिन्होनें रघुकुल के राजा दशरथ के यहॉं अवतार धारण किया है। शील, सौन्दर्य और शक्ति से सम्पन्न राम तुलसी के आराध्य हैं। विष्णु के अवतार और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।
तुलसी के समय तक कबीर की प्रतिभा क्षीण हो चुकी थी और अनेक ग्रन्थों में उनकी वाणी का सार विभिन्न सम्प्रदायों में प्रवाहित हो रहा था, परन्तु उसमें वह ओज न था, जो अनेक पंथ, भ्रम और विद्वेष को उत्पन्न कराने वाले थे । इसी कारण कबीर का व्यक्तिगत विरोध न करते हुए भी इस बहु सम्प्रदायवाद का विरोध तुलसी ने किया-
“कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सद्ग्रन्थ ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट कीन्ह बहु पंथ ।।”
यहाँ प्रश्न उठता है कि निर्गुणोंपासना के स्थान पर सगुणोपासना या साकारोपासना की आवश्यकता थी । इसी प्रश्न के विश्लेषण में तुलसी का महत्व है । तुलसी काव्य की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है – राम की भक्ति-भावना। उनके राम ऐसे केन्द्र बिन्दु है, जहा सगुण-निर्गुण, शैव-वैष्णव तथा लोक धर्म की रेखायें परस्पर मिलती है-3
अतः उसकी अनुभूतियाॅंभी उसी परिवेश और सांस्कृतिक, ऐतिहासिक पर्यावरण की देन होती हैं, जिसमें उससे सम्बन्धित समाज अर्थात् लोक की अनुभूतियॉं निर्मित होती हैं। परिणामतः कवि और लोक दोनों ही एक ही परिस्थित और पर्यावरण में उत्पन्न समान अनुभूतियों के सहभागी और सहभोक्ता होते हैं। दोनों के बीच जो काव्यात्मक संवाद होता रहता है, उसका कारण कवि और लोक का यह सहअस्तित्व और सह भ्रातृत्व ही है।”
अतः किसी कवि के विषय में अध्ययन करने में उसके दोनों पक्ष देखना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है । पहले तो हमें यह देखना होता है कि कहॉं तक समसामयिक परिस्थितियों ने
किसी कवि को बनाने में योग दिया है और फिर यह भी जानना होगा की उसने युग तथा आगामी युगो को कहॉ तक प्रभावित किया है ।
तुलसी की महानता का आधार उनकी समन्वयशीलता है । उनका सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है । उन्होंने “रामचरितमानस” लोक और शास्त्र का गृहस्थ और वैराग्य का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण और काव्य का, भावावेग और अनासक्त का समन्वय प्रस्तुत किया है । इनके चिन्तन का फलक विराट है । उनके साहित्य पर अद्वैतवाद, विशिष्टा द्वैतवाद , वेदान्त, शंकर के अद्वैतवाद का प्रभाव लक्ष्य किया जा सकता है ।
राम की ईश्वर के रुप में उपासना करने की परम्परा का समुन्नत रुप दृष्टिगोचर होता है । वाल्मीकि कृत “रामायण” कालीदासकृत “रघुवंशम्” भवभूति रचित “उत्तररामचरित” आदि संस्कृत ग्रन्थ राम के चरित्र को भली-भांति प्रतिपादित करते हैं। हिन्दी में आचार्य रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद की आधार भूमि पर रामानन्द ने श्री वैष्णव सम्प्रदाय की स्थापना की। इन्ही की शिष्य परम्परा में रामभक्ति का विपुल स्रोत महाकवि तुलसीदास के राम काव्यो से प्रवाहित हुआ ।
तुलसीदास के राम परम्ब्रह्म हैं वे समस्त प्राणियों में व्याप्त हैंं। उनके व्यक्तित्व में सगुण निर्गुण दोनों का पर्यवसान है। राम सच्चिदानन्द-स्वरुप परमेश्वर तथा परासरनाथ हैं। जिनका वेद, ज्ञानी, मुनि ध्यान करते हैं। यही भगवान भक्तों के लिए सगुण रुप धारण करते हैं। जैसे जल के विविध रुप बर्फ आदि होते हैं तथा वे सब जल होते हैं । उसी प्रकार निर्गुण-ब्रह्म सगुण रुप में बदल जाता है। राम विष्णु के अवतार हैं –
“हिय निरगुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम । ।”
“मनहु पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम ।।”
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तुलसी जी की भक्ति-भावना लोक मंगल की प्रबल भावना है । उनके आराध्य राम शील, सौन्दर्य और शक्ति तीनों के गुण सागर हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं। तुलसी ने अपने महाकाव्य में राम के विभिन्न रूप जैसे कि – आदर्श मानव, आदर्श राजा , आदर्श पति, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श वीर, आदर्श पिता, का चित्रित किया है । राम कथा की पावन गंगा का अवतरण तुलसी के “मानस” में होता है ।जाति-पांति के बन्धन से ऊपर उठे हुए तुलसी अपनी मानस कथा में व्यापकता का परिचय देते हैं । “रामचरितमानस” तुलसीदास जी की कीर्ति का आधार स्तम्भ है । यह एक सुप्रसिद्ध महाकाव्य है । जिसमें राम कथा सात काण्डों में विभक्त है । वि0 सं0 1631 में रामनवमी के दिन तुलसीदास जी ने “रामचरितमानस” की रचना प्रारम्भ की थी । दो वर्ष सात महीने, छब्बीस दिनों में ग्रन्थ की श्री इति हुई । वि0 सं0 1633 में मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गए । “रामचरितमानस” भारतीय संस्कृति(हिन्दी संस्कृति) का ऐसा कोष है जिसमें अन्य संस्कृतियों का भी विवेचन है।
कबीर के “राम” और तुलसी के “राम” में अन्तर है । कबीर के “राम” निर्गुंण निराकार ब्रह्म है । वे दृष्टिगोचर नही है (दिखाई नही देते है ), न रुप, न रंग, न आकार सम्पन्न है, वे न तो मूर्ति में विद्यमान हैं और न ही अवतार धारण करते हैं । वे तो सर्वव्यापी हैं। अणु-अणु में बसे हुए निर्गुण, निराकार परब्रह्म हैं , जिन्हें कबीर राम कहकर पुकारते हैं।
“दशरथ सुत तिहुॅं लोक बखाना,
राम नाम का मरम है आना।”
तुलसी के “राम” सगुण ब्रह्म हैं, साकार ईश्वर हैं,
जिन्होनें रघुकुल के राजा दशरथ के यहॉं अवतार धारण किया है। शील, सौन्दर्य और शक्ति से सम्पन्न राम तुलसी के आराध्य हैं। विष्णु के अवतार और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।
तुलसी के समय तक कबीर की प्रतिभा क्षीण हो चुकी थी और अनेक ग्रन्थों में उनकी वाणी का सार विभिन्न सम्प्रदायों में प्रवाहित हो रहा था, परन्तु उसमें वह ओज न था, जो अनेक पंथ, भ्रम और विद्वेष को उत्पन्न कराने वाले थे । इसी कारण कबीर का व्यक्तिगत विरोध न करते हुए भी इस बहु सम्प्रदायवाद का विरोध तुलसी ने किया-
“कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सद्ग्रन्थ ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट कीन्ह बहु पंथ ।।”
यहाँ प्रश्न उठता है कि निर्गुणोंपासना के स्थान पर सगुणोपासना या साकारोपासना की आवश्यकता थी । इसी प्रश्न के विश्लेषण में तुलसी का महत्व है । तुलसी काव्य की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है – राम की भक्ति-भावना। उनके राम ऐसे केन्द्र बिन्दु है, जहा सगुण-निर्गुण, शैव-वैष्णव तथा लोक धर्म की रेखायें परस्पर मिलती है-
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“सिया राम मय सब जग जानी । करौं प्रनाम जोरि जुग पानी ।।”
तुलसी जीवन की सम्पूर्णता में विश्वास करने वाले व्यक्ति थें और उसी के अनुरुप पूर्ण लोक धर्म की प्रतिष्ठा उन्होंने अपने ग्रन्थों में की हैं।
“राचरितमानस” में तुलसीदास ने अपने युग के प्रमुख प्रश्न (क्या दशरथ के पुत्र राम ही परम्ब्रह्म हैं ?) जिसका उत्तर कबीर आदि ने निषेधात्मक दिया था) का विश्लेषण करके, युग-युग व्यापी सामाजिक मर्यादा और आस्था को ध्यान में रखते हुए उसके वास्तविक हित के अनुकूल उत्तर दिया है । इसी में उनकी युग-युग व्यापी महत्ता छिपी हुई है ।
यहाँ एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या तुलसी ने चमत्कार प्रदर्शन के लिए विभिन्न शैलियों में राम का चरित्रांकन किया है अथवा रामचरित उन्हें इतना प्यारा था कि उसकी बराबर पुनरूक्ति वे करते हैं या उसकी भी कोई सामाजिक आवश्यकता थी ? तुलसी का प्रमुख ध्येय (विविध रचनाओ में रामचरित लिखने का) सामाजिक ही जान पड़ता है। उन्होने प्रत्येक वर्ग को अपनी रूचि के अनुकुल रामचरित सुलभ कराना चाहा। तुलसी की सभी प्रामाणिक रचनाओं में केवल “श्री कृष्ण गीतावली ” को छोड़कर सभी में राम का ही चरित्राकंन है। श्री कृष्ण गीतावली भी इससे इतर नही है क्योकि इसमें भी राम का दूसरा रूप कृष्ण का ही है।
तुलसी की रचनाओं को पढ़ने समझने वाला बहुत बडा़ वर्ग भारतीय परिवेश में वह है जो भक्ति रस में आकंठ निमग्न हो उनकी चौपाइयों को हृदय की गहराइयों तक आत्मसात् करने के लिए व्याकुल रहता है। सदियों से रामकथा वाचन की लोकश्रुत शैली ने रामकथा की लोकप्रसिद्धि के नये आयाम प्रदान किये हैं। राम कथा को कहनेे सुनने की बहुविध प्रणालियों ने नित्य नये नये प्रयोग के द्वारा राम कथा की जनमानस के लिए अधिक रूचिकर बनाये जाने के प्रयास किये और राम की महिमा राम नाम सुमिरन को जन साधारण के बीच लोकप्रिय बनाने पर जोर दिया ।
तुलसी की भक्ति भावना में समस्त सचराचर जगत राममय है-
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि
बंदेउ सबके पद कमल, सदा जोरि जुग पानि।।
यदि समाज के सभी लोग इस प्रकार की भक्ति की साधना में लीन हो जाये तो समाज साम्यमूलक और न्याय पर आधृत हो जायेगा। इसी बात को रामराज्य के प्रसंग ने इस प्रकार व्यक्त किया है-
राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गये सब सोका ।
बयरू न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहिं व्यापा।।
तुलसीदास की रचनाओं में अखिल मानव जाति के लिए महान सन्देश दिया गया है। उन्होने रामराज्य का आदर्श प्रस्तुत करके भारतीय समाज को एक अमर सन्देश प्रदान किया है।
तुलसी भक्ति-भावना का ऐसा अमृत जनता के समक्ष परोसते हैं कि जनता उसे पाकर सब कुछ भूल जाती है। उनके राम सगुण, निर्गुण के साथ साथ लोक आत्मा भी हैं। ’’रामचरितमानस’’ महाकाव्यों का शिरोमणि होने के साथ हिन्दु संस्कृति का ऐसा पिटारा है जिसे हिन्दु जाति युगों-युगो तक अपने धार्मिक समस्याओं के लिए अपना मार्गदर्शक मानती रहेगी।
राम के लोक रंजक मर्यादा पुरूषोत्तम रूप को प्रस्तुत करने में तुलसी का कोई सानी नही हैं।
रामभक्ति से सराबोर तुलसी के लिए –
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।
किए चरित पावन परम, प्राकृत नर अनुरूप।।
राम का चरित्र संसार को सुख देने वाला है। कलयुग के समस्त दोषो में मुक्ति प्रदान करने वाला है। स्नेह आत्मीयता, भक्त वत्सलता, सद्भाव और प्रेम की अद्भुत मिसाल है ’राम’ प्रेम और उनसे जुड़ने का साधन है। राममय बनने के लिए आवश्यक है-
रामहि केवल राम पियारा
जानि लेउ जो जान निहारा।
राम मंगल भवन अमंगलहारी कहे गये है। राम नाम का गायन पाप का नाशक और शौर्य एवं शक्ति को प्रदान करने वाला है। प्रकृति और जीवन के सामंजस्य को स्थापित करने का आधार है। रामकथा को सम्पूर्ण जन-मानस के लिए सुलभ एंव सुबोध बनाकर तुलसी अमर हो गये । लोक चेतना को जाग्रत करने में तुलसी का कोई सानी नही है। आगे आने वाली पीढियो में यदि हम राम कथा के महत्व का प्रतिपादन कर सके तो युगीन सन्दर्भो से जुडकर यह (रामकथा) सदियों तक अमर रह सकती है।
तुलसीदास की रचनाओं में अखिल मानव जाति के लिए महान सन्देश दिया गया है। उन्होने रामराज्य का आदर्श प्रस्तुत करके भारतीय समाज को अमिट सन्देश प्रदान किया है। आगामी पीढियाँ जिस प्रकार से राम, रामकथा के पात्रों ,राम चरित्र का अनुशीलन आधे अधूरे ढंग से कर रही है और सुविधा सम्पन्न पीढ़ी, भावी पीढ़ी से संवादहीनता व सम्वेदनहीनता का सम्बन्ध विकसित कर रही हैं, तो रामकथा व रामचरित का विस्तार कैसे होगा, कब तक होगा यह प्रश्न गम्भीर और विचारणीय है।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची –
१- गीतावली पृ०१, गीता प्रेस गोरखपुर।
२- विनयपत्रिका, गीता प्रेस गोरखपुर।
३- रामचरितमानस की लोकप्रियता का विवेचनात्मक अध्ययन, रामचरित्र सिंह।
४- तुलसी, उदयभानु सिंह।
५- गोस्वामी तुलसीदास, आ० रामचंद्र शुक्ल
६- तुलसी साहित्य के सर्वोत्तम अंश, डॉ राम प्रसाद मिश्र।
७- “रामचरितमानस”।