आरंभिक मध्यकालीन भारत में वैधीकरण के पहलू- आरंभिक कदंब राजवंश के विशेष संदर्भ में* – योगेन्द्र दायमा

हाल के दशकों में राज्यव्यवस्थाओं का वैधीकरण इतिहासकारों के मध्य विशेष रूचि का विषय बनकर उभरा है। इस रुचि की नींव इस एहसास में जमी है कि राज्यव्यवस्थाओं का अस्तित्व […]

मानवीय मूल्यों के विघटन का दस्तावेज: चीफ की दावत – दीपक जायसवाल

कहानी समृद्ध और लोकप्रिय विधा है। यह ‘छोटे मुँह बड़ी बात करती है।’ यह अपने कलेवर में पूरी दुनिया समेटने की शक्ति रखती है। मानवीय संवेदनाओं के स्वरूप और विकास […]

आधुनिक कथा-साहित्य : समय के संवाद, “समय से संवाद का साक्षी ‘परख’ उपन्यास : सामाजिक और मनोवैज्ञानिक निहितार्थ” – डॉ. माला मिश्र

उपन्यास आधुनिक हिंदी की नवीनतम एवं चर्चित विधा है। इसका प्रादुर्भाव औपनिवेशिक परिवेश में यथार्थपरक दृष्टिकोण को लेकर हुआ । उपन्यास एक विधा के रूप में रचनाकार को अपने समय […]

तुलसी साहित्य में मानवीय मूल्य – दीपक जायसवाल

भक्ति आन्दोलन का प्रादुर्भाव वर्ग, वर्ण, जाति, धर्म और सम्प्रदाय से परे जाकर मनुष्य-सत्य की उद्घोषणा के साथ हुआ था। उनकी भक्ति में सामाजिक विषमता और भेदभाव के लिए जगह […]

हर्षचरित: एक ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में – योगेन्द्र दायमा

सातवीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में बाणभट्ट द्वारा रचित ‘हर्षचरित’ को चरित साहित्य (ऐतिहासिक जीवनी) परंपरा का अग्रदूत कहा जाता है। साहित्य लेखन की यह परंपरा आरंभिक मध्यकालीन भारत में […]

घनानंद के काव्य में व्यंजित ‘प्रेम’ का आदर्श स्वरूप – रवि कृष्ण कटियार

यह मनुष्य की सीमा भी है और प्रकृति की महानता भी कि उसने सदैव ही मानव निर्मिति को आइना दिखाया है, जब हम किसी भाव को शब्दों में बयाँ नहीं […]

सम्पादकीय

‘… हर चीज मुझे तुम तक ले जाती है मनो हर मौजूद चीज खूशबू, रोशनी, धातुएं स्बकी सब नन्हीं किश्तियाँ हों जे मुझे ले जाती हों तुम तक’ – पाब्लो […]