लोकगीत लोक साहित्य की अनमोल धरोहर है। लोक साहित्य कंठ-परंपराओं का स्त्रोत है । जिसमें लोककथा, लोकगीत, कहावतें, लोकोक्तियाँ आदि स्थान प्राप्त करते हैं। जिसके कोई निश्चित रचयिता नहीं होता है । कंठ-परंपरा के लोक में ही उसका स्वरूप बँधा हुआ है। उस प्रकार उसका स्वरूप भी समय के परिवर्तन के साथ, समाज परिवर्तन, जाति ज्ञाति परिवर्तन आदि के साथ थोडा बहुत परिवर्तन होता रहता है । पर उसके हार्द में प्रमाणभूत ऐसा लोक तत्व है जो परंपरा से चमत्कारिक रूप से आगे बढ़ रहा है ।“एतयोनिषद में परमेश्वर द्वारा समस्त लोकों के सृजन का उल्लेख है। परमेश्वर ने अम्भ, मरीचि,मर और जल की रचना की। मरीचि के अंतर्गत सूर्य, चंद्र,तारे आदि हैं। मर से मर्त्य लोक या पृथ्वीलोक का बोध होता है। पृथ्वी के नीचे पाताल लोक का।“2
“डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है –“ लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम नहीं है, बल्कि नगरों और ग्रामों में फैली समस्त जनता है, जो विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने वाली आवश्यक वस्तुएँ उत्पन्न करते हैं।“3
लोक साहित्य लिपिबद्ध नहीं होता है । लोक साहित्य में अन्तर्भूत मानव की सुख दुःख की मधुर भावनाएँ दीर्धकाल से मौलिक धरातल पर ठुमक ठुमक कर विचरण करती हुई चली आ रही है । लोक-साहित्य, लोकगीत वस्तुत: लोक की मौलिक अभिव्यक्ति है। यह साहित्य आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना से शून्य होता है। यह एक व्यक्ति की कृति नहीं हैती है। परंपरागत मौखिक क्रम से यह अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य में गमन करता है ।
लोकगीत भारत की प्राचीन लोककंठ की परंपरा है। उसके कोई निश्चित रचयिता नहीं है । यह परंपरा युग-युग से लेकर आज भी मौखिक रूप से लोककंठ में बरकरार है। जिसमें भारत के क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक परंपरा का दर्शन होता है। यदि किसी भी युग के क्षेत्र विशेष के इतिहास को जानना है तो उस युग के लोकगीतों का अध्ययन करना आवश्यक है । उसमें समग्र मानव जीवन की गतिविधियों का, उसके समाज का सहज दर्शन होता है।
लोकगीतों में मानव की आत्मा बसती है लोकगीत जन सामान्य के सुख दुःख के भावात्मक उद्गार है। लोकगीतों में मानव और समाज की आत्मा, चेतना, संस्कृति और अस्मिता बसती है। लोकगीत मन से उद्वेलित सहज, सरल, कोमल, मधुर भाव शब्द और पदबद्ध होकर , स्वरों के आरोह -अवरोह नर्तन करके प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर लय राग, ताल का रूप धारण करता है तब वह गीत बन जाता है। वह सहज राग, ताल, यति ,गति के बंधन से मुक्त लोकगीत है। लोकगीत में कहीं रागानुराग भावों की सुमधुर अभिव्यक्ति, कोमल स्पंदनों की अनुभूति, मिलन की आह्लादिक और बिछोह की मार्मिक अभिव्यंजना, कहीं आनंद उत्सवों का परिमल है।
लोकगीतों में वतन और प्रांत की मिट्टी की चंदन-सी महक, संस्कार-संस्कृति की झलक, जन-हृदय के भावों के उतार-चढ़ाव, समाज के आत्मा का विस्तार, लोक के शाश्वत स्वरों की चेतना आदि में लोक-संस्कृति का अजस्र स्रोत बहता है। जनपदीय लोकगीतों में – जन्म से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न संस्कारों के गीत , देवी-देवताओं की आराधना, पूजा ,आरती के गीत, पर्व, व्रत, त्योहार, उत्सवों के गीत, विभिन्न ऋतुओं के गीत, शूरवीरों के गीत,विवाह के गीत, श्रृंगार गीत, सोलह साल की नवयौवना के मनोभावों के गीत, आतिथ्य सत्कारों के गीत आदि परंपरा से लोककंठों में जीवंत है और रहेंगे। यह लोकगीतों की परंपरा लोक-संस्कृति को उजागर करके नूतन पीढ़ी को पारंपरिक समाज और संस्कृति से अवगत कराते हैं।
लोकगीत का स्वरूप व्यापक है। पूर्व पश्चिम, उत्तर दक्षिण तक फैला हुआ है। उसको कोई निश्चित ढाँचे और रूप में बाँधना मुश्किल होता है। जैसे –
ऋतूनामागमं पर्व गृहमङ्गलमुत्सवम्।
धर्मः संस्कृतिः रीतिः वा लोकगीतें समञ्चति।।1
लोकगीत (प्रायः) नवीन ऋतुओं के आगमन, पर्व, त्योहार, गृह में किसी मांगलिक कार्य तथा उत्सव, धर्म-संस्कृति और परंपराओं के उपलक्ष्य में गाए जाते हैं। वर्षागम(वर्षा ऋतु), वसन्तागम पर लोकगीत अति उत्साह से गाए जाते हैं। ऋतु सम्बन्धी गीतों में आनंदभावों की प्रतिस्थापना रहती है। इसमें ऋतु का परिचय, उसका स्वरूप और उस ऋतु में होनेवाले प्राकृतिक परिवर्तनों की चर्चा और तद्जनित प्रभाव भी वर्णित होते हैं। ऋतु गीत मानव मानस में उत्साह और आनंद की सृष्टि करते हैं।“
वेद काल से ही ऋतुएँ भारतवासियों के लिए दैवी वरदान समान है। भारतवासी वर्षा, शरद, हेमन्त, शीत, बसन्त और ग्रीष्म इन छः ऋतुओं के अनुसार जीवन जीता है । वर्षा और बसन्त ऋतु मानव जीवन में आह्लाद जगाती हैं।
लोक साहित्य लोक संस्कृति का पोषक और निर्माता है। इसमें समाज की अभिव्यक्ति होती है। लोकगीत में जन सामान्य के हृदय की सहज अभिव्यक्ति होती है ।
* गुजरात के लोकगीतों में समाज दर्शन :
भारत का पश्चिम क्षेत्र गौरवान्वित गुजरात के नाम से सुविख्यात है। गुजरात के जनपद, बोली भाषा, पर्व-त्योहार, संस्कार,लोक नृत्य में रास गरबा आदि देश-विदेश में सुविख्यात है । जहाँ गुजराती बसता है वहाँ गुजरात का लोक और संस्कृति सहज रूप से बस जाते हैहैं । अब गुजरात के लोकगीतों में समाज दर्शन का अध्ययन करते हैं।
*नव यौवना के मनोभाव के लोकगीत :
गुजरात की नव यौवना अपने भावि पति के कल्पना करके आँखों में आँसु लिए उदास बैठी है। उस समय उसके दादा जी उसकी उदासी का कारण जानने के लिए प्रश्न पूछते हैं कि – बेटी तेरा दिल क्यूँ उदास है और आँखों में आँसु क्यूँ है? तब बेटी अपने कोमल मनोभावों को व्यक्त करती हुई कहती है कि ‘ दादाजी एक ऊँचा वर नहीं ढूँढना, जो नित्य तोरण तोड़ेगा, नीचा भी नहीं ढूँढना जो नीचे को नित्य ठेस लगेगी, काला कुटुंब को लज्जित करेगा, गोरे को नित्य नजरें लगेंगी, ऐसे वर के लिए यौवना दादाजी को मना करती है । तो फिर कैसा वर चाहती हैं? देखिए “
केडे पातलियो ने मुखे शामलियो, जे मारी सहियरे वखाणियो।
एक भर लें जोबनियामा बेठा बेनीबा , दादाजी हँसीने बोलाविया,
केम दीकरी तारा दलडा दुभाया, केम आँखोंमां आँसू आविया।।
यहाँ पर नायिका पतली कमरवाला, श्याम वर्ण का मुख वाला युवक चाहती है, ऐसे वर की उसकी सखी ने तारीफ की है। यहाँ भावि पति की उर्जावान कामना की गई है। इतना ही नहीं नायिका के जीवन में सखी का महत्व बताया गया है।
विरही भाव के लोकगीत : संयुक्त कुटुंब उत्तम समाज रचना की उदात्त धरोहर है। संयुक्त कुटुंब में सुख दुःख में सब लोग एक-दूसरे का साथ निभाता है। ऐसा ही कुछ उज्जवल चित्रण किया गया है। नायक किसी कारण से परदेश गया है। उस समय भाभी की उदासी दूर करने के लिए लाडला छोटा दियर मेहँदी का पौधा लाकर उसे पीसकर कटोरा भरता है और बड़े आदर के साथ भाभी को अपना हाथ रंगने के लिए कहता है । उस समय भाभी की मार्मिक वेदना देखिए –
वाटी घूंटीने भर्यो वाटको ने भाभी रंगो तमारा हाथ रे मेहंदी रंग लाग्यो।
“हाथ रंगीने वीरा शुरे करूँ, एनो जोनारो परदेश रे मेहंदी रंग लाग्यो।“
अर्थात् नारी अपने पति के लिए ही सब श्रृंगार करती है। पति तो परदेश है इसलिए कहती है कि मेहंदी लगाकर मैं क्या करूँ? मेहद को देखनेवाला तो प्रदेश में है। इस प्रकार यहाँ पर भारतीय आदर्श नारी के वियोग का चित्रण किया गया है।
लोकमेले के गीत : गुजरात में लोकमेले का अनूठा महत्व है। मेले का मनोरम्य दृश्य सबका मन जीत लेता है। मेले में जब नायक-नायिका की चार आँखें होती हैं तब नायिका की प्रेम संवेदना नर्तन करने लगती है। पग की पायल पागल होकर झनकार करती है। जैसे –
हुं तो गईती मेळे, मन मळी गयु एनी मेळे मेळामा, जोबनना रेलामा मेळामा ।
मेळामा आँखना उलाळा, मेळामा झांझर झनकार।
मनडु हणाइने गयु तणाई, जोबनना रेलामां मेळामां, मेळामा।
इस प्रकार गुजरात के लोक मेले में मनमोहक हु-ब-हु दर्शन होता है।
लग्न विधि के लोकगीत: गुजराती लोकगीतों में लग्न गीत का महत्वपूर्ण स्थान है। लग्न महत्वपूर्ण भारतीय संस्कार है। विवाह के लोकगीतों में भारतीय पारिवारिक भावना, उत्साह, उमंग और लोक व्यवहार का दर्शन होता है। विवाह की विधि के प्रारंभ में भगवान गणेश जी को कंकोत्री लिखी जाती है। माणेक स्तंभ का गीत, मंडप का गीत, गोतीडे का गीत (इसमें स्त्रियाँ कुम्हार के यहाँ से मिट्टी का बड़ा मंगल कलश गोत्र के वर वधू द्वारा गोतीड़ा उठाकर लाना होता है) पीठी के गीत, साँझी के गीत, भोजन के गीत, स्वागत के गीत, प्रस्थान के गीत, हस्त मिलाप के गीत, कंसार के गीत, सप्तपदी के गीत, बिदाई के गीत आदि उत्साह और आनंद के साथ गाए जाते हैं।
कुछ विवाह के गीतों के उदाहरण देखते हैं। कंकोत्री के गीत –
केसर छाँटी ने लखजो कंकोतरी, तेमा लखजो मारे अच्युत भाई ना नाम अखंड सौभाग्यवती।
यानी बेटे के लगन की आमंत्रण पत्रिका पर पहले केसर का मंगल छँटकाव करके लिखने को कहा गया है। इसके बाद इसमें दुल्हा अच्युत भाई कां नाम लिखने की बात है।
पहले के समय में वाहन की इतनी अधिक सुविधा नहीं थी । उस समय जान बैल गाड़ी में जाती थी। दूर जाना होता था तो दो-तीन दिन लगते थे। उस समय सोने की चाँच और रूपे की पाँखवाले मनोहर मोर को संदेश वाहक के रूप में गीत के माध्यम से भेजते थे। इतना ही नहीं समधी के गाँव और घर तक पहुंच ने का दिशा निर्देश करते थे कि मोर पूर्व और पश्चिम के देश होकर, समधी के घर जाना। वहाँ जाकर सोए हुए समधी को जगाकर बोलना कि अच्युतभाई वरराजा आ गया है और आपकी सीमा को घेर लिया है। वरराजे का स्वागत करने के लिए वरराजे की पसंद की चीजें की व्यवस्था अलग-अलग स्थानों पर करने के लिए कहता है। सीमा पर चंवर घूमाना, गाँव के दरवाजे पर शीतल पदार्थ छिटकना, गलियों में फूल बिखेरना, मंडप में लाडी यानी दुल्हन को तैयार रखना आदि विविध माँग के साथ दुल्हा का स्वागत करने के लिए मयूर समधी को जगाकर सावधान करता है।
जैसे –
मोर तारे सोनानी चाँच मोर तारे रूपानी पाँख,
सोनानी चाँचे रे मोरलो मोती चणवा जाय।
मोर जाजे उममणे देश, मोर जाजे आथमणे देश,
वळता जाजे रे वेवायु ने माडवे हो राज।
चंपक वेवाय सूता छो के जागो (2)
अच्युतभाई वरराजे सीमडी घेरी माणाराज।
सीमडिये काइ चमर ढोळाव(2),
चमरनो होशी वीरो मारो आव्यो माणाराज।
मांडवडे काइ लाडकडी पधरावो(2)
लाडकीनो परणनारो वीरो मारो आव्यो माणाराज।
इस प्रकार समधी के द्वारा शानदार व्यवस्था के जरिए दुल्हा का महत्व और उसकी गरिमा स्थापित की गई है।
देवर भाभी के लोकगीत :
गुजरात की लोक संस्कृति अमृत जैसे प्रेम से भरी हुई है। इसमें भी देवर-भाभी के आदर्श और मधुर मस्करी युक्त संबंध के दर्शन होते हैं।
प्रातः काल मथानी से देवर-भाभी आमने-सामने रस्सी खींचकर मही को बिलौते हैं उस समय का कर्णप्रिय संवाद देखिए –
“सोना–सोना गोळीओ रूपला रवैया…
दियोर भोजाई बे मंई घूमता
अवळ–अवळ तोंण दियरो! गोळीओ नंदाशी,
गोळीओ नंदाशी मारां मइ छलकाए,
एटलु कीधु न दियोर रिसाई गया सं।“4
गुजरात के पाटीदार समाज की अखंड चेतना, अस्मिता और अद्भुत प्रांतीय शैली, लय, ताल, भाव से युक्त यह लोकगीत है। कौटुंबिक जीवन की सहज, सरल मीठाश की संगम को जीवन में परोसता हुआ देवर-भाभी के आदर्श संबंध को व्यक्त किया गया है। मथानी फिराने में साथ देने वाला लाडला देवर तूफान करने लगता है तब भाभी उसे समझाते हुए धीमी मथानी फिराने को कहती है कि – मटकी फूट जाएगी, गोरस छलकेंगे, कपड़े गिले होंगे – इन तीनों बातें व्यक्त की गई हैं । तब देवर रूठ जाता है । इसमें ध्वनित भाव देवर का भाभी के प्रति आदर्श अनुराग का है। इसमें मटकी, गोरस और मथानी समग्रतया प्रतीकात्मक क्रिया है।
इसके अलावा गुजरात के लोकगीतों में ननद-भाभी के गीत, सास-बहू के गीत, दादा-दादी के गीत, माता-पिता के गीत, भाई-बहन के गीत, दाम्पत्य और श्रृंगार के गीत वहेम और अंधश्रद्धा के , विनोद और ठठ्ठा-मस्करी के गीत आदि लोकगीतों में अद्वितीय समाज दर्शन होता है।
ननद–भाभी के लोकगीत:
हम देखते हैं कि ननद की भूमिका समग्र समाज में सुविख्यात है। ननद भाभी के लिए कष्टदायक होती है। ननद भाभी पर सास की तरह अपना वर्चस्व जमाती है। उसका ध्यान रखती है। भाभी को ननद की सीमाओं में रहना पड़ता है। ननद के असहाय ताने, चुगली का भोग बनना आदि लोकगाथा सुनकर कन्या अपने दादाजी को ससुराल में ननद न हो ऐसा ससुराल ढूँढने को कहती है। क्योंकि ननद तो झगड़े की काबर है। उसके तानें उससे सहा नहीं जाएगा। इसलिए वह ननद नहीं चाहती है। जिससे वह ससुराल में सुख-शांति से रह सके। जैसे
“दादा मार नणदलडी मत जोजो रे।
नणदलडीना ओहामोह नहीं खमुं!!”5
सभी नववधू को ननद से नफ़रत नहीं है। कभी-कभी ननद का अभाव भी अखरता है। अकेले रहने में जीवन में आनंद नहीं आता है। यहाँ कुटुंब वत्सलता का भाव के साथ ननद-भाभी के बीच मधुर संबंध दृष्टिगोचर होता है। जैसे – “ मारी नणंदी पनोपन वेगळां रे
मारा माथा गुंथ्याना रह्या कोड रे … लीली ऊंढाणी हीरनी रे।“6
सास बहू के लोकगीत :
संयुक्त कुटुंब भारतीय समाज में मानव जीवन के सुखद संबंधों की अनमोल धरोहर है। संयुक्त कुटुंब में सास की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सास के हाथ में सत्ता का दौर होता है। बहू के लिए सास तानें, कष्ट देने वाली, दिनभर काम करवानेवाली और बीच-बीच में काम को लेकर बदनाम करने वाली होती है। ऐसा ही चित्र गुजरात के लोकगीतों में दृगपात होता है। कुछ लोकगीतों में सांस बहू को बेटी की तरह प्रेम से रखती हैं और उसके साथ मधुर व्यवहार करती है।ऐसे लोकगीत समाज जीवन का प्रतिबिंब है। क्योंकि लोकगीत समाज जीवन से ही आते हैं जो लोक-संस्कृति की चेतना का रक्षक है।
एक लोकगीत में सास बातों-बातों में बहू को ताने मरती हैं, बहू पर अविश्वास रखती है, सख्त काम करवाती है, खाना कम देती है। जब अनाज पीस लेने के बाद आटा तोला जाता है और आटा थोड़ा भी कम होता है तब सास और ननद दोनों मिलकर बहू को ताने मारती हैं। उसे बदनाम करती है कि भूखे पीहर की बहू अनाज पीसते-पीसते आटा खा जाती है। ऐसे लोकगीत की झलक मिलती है। जैसे
“तमारी भूखो एवी भूडी रे,
दळत फाकशं लोट, दळत फाकशं लोट,
जोखत न जोखत ओछो पड्यो रे ,
नणदी बोलशंबोल सासु बोलशंबोल,
भूख्या पियोरनी भूखावली रे
दळत फाकशं लोट, दळत फाकशं लोट।“ 7
दाम्पत्य जीवन के लोकगीत:
कमरे के पास अशोक वृक्ष की शीतल। छाँव है। अशोक वृक्ष की शाखा पर झूला बंधा हुआ है। इस झूले पर राम-सीता झूल रहे हैं। जैसे –
“ओरडे आसोपालवनुं झाडक, शीतल छांयलो रे लोल।
त्यां रमे सीता ने सरी रोंम, हेंचोंळा बाध्या हीरना रे लोल।।“
यहाँ राम-सीता के माध्यम से उदात्त दाम्पत्य जीवन का चित्रण किया गया है।
अंधश्रद्धा और चमत्कार के लोकगीत:
मानव जीवन में परंपरा से रूढ़ियाँ, मान्यताएँ, भाव-भंगिमा, आवेग-संवेग, आशा -निराशा, सुख-दु:ख, वहेम, अंधश्रद्धा, चमत्कार आदि के तत्व संस्कार के रूप में बसे हुए हैं। गुजरात के लोकगीतों में अंधश्रद्धा और चमत्कार के लोकगीत मिलते हैं। मंगल काम के लिए जब बाहर जाते हैं तब रास्ते में साँप, बिल्ली का आना, गधे का बोलना, रोते बच्चों का सामने मिलना, लकड़ी की गठरी, विधवा स्त्री, बाँझ स्त्री, कपड़े धोकर आती हुई स्त्री,, छाश या दूध लेकर आनेवाला कोई व्यक्ति आदि अपशुकन माने गए हैं। लोक और समाज आज भी थोड़े-बहुत वही संस्कारों को जीता है। लोकगीतों में यह संस्कार प्रतिबिंबित हुए हैं। जैसे
“सीता सरखा सती रे , तमे रथडामां बेबो,
आघेरो रथ खेलीओ न, सांमी एंधणोनी भारी !
दीयोर मारा लखमण रे, आवा शकने नां जोइए!
आवा शकने नां जइए रे, रूडा राम नो मळीए,
आघेरो रथ खेलीओ रे, सामे छाशनी दूणी।
प्रस्तुत गीत में शुकन-अपशुकन को लेकर सीता जी के ख्यालों को प्रस्तुत किए गए हैं।
चमत्कार से अंधश्रद्धा उत्पन्न होती है, चमत्कार से भय, भय से श्रद्धा, श्रद्धा से भक्ति उत्पन्न होती है। जैसे
बार बार गउनी छांय मोरी माता,
तेर तेर गउनो पंथ मोरी माता,
पांदे पांदे दीवा बळेली माता,
डाळे डाळे देवी रमेली माता।
यानी अंबे माँ ने जो बीज दिया था, वही बरगद को पाल-पोस कर बड़ा किया है। वह बरगद बारह कोस तक फैला हुआ है। पथिकों के लिए तेरह-तेरह कोस तक राह में उसकी छाँव पथराई हुई है। उसके पत्ते-पत्ते पर दीप जलते हैं। उसकी डाल-डाल पर देवियाँ रास खेलती हैं। ऐसा चमत्कार यहाँ दृष्टिगोचर होता है कि ऐसा बरगद काटने से खून के छींटें उड़ते हैं और काटनेवाले सिद्धराज जयसिंह को अंबे माँ बाँझ होने का शाप देती हैं और जयसिंह नि: संतान होता है। ऐसे चमत्कारी गीतों से इतिहास और समाज का यथार्थ दर्शन होता है। इससे पर्यावरण के रक्षण की ओर संकेत भी किया गया है।
ऋतुओं के लोकगीत:
संपूर्ण सृष्टि ऋतुचक्र पर निर्भर है। वैसे भी भारत ऋतु प्रधान देश है। सभी प्राणी मात्र में ऋतुओं के आगमन से नव चेतना का संचार होता है। मानव जीवन में फाग, वसंत, वर्षा आदि ऋतुओं का अद्भुत महत्व है। बसंत में प्रकृति सोलह श्रृंगार करती है तब उसका सौन्दर्य सबका मन मोह लेता है। पूरी धरती नव यौवना की तरह मदमाती है और मानव मन को भी जवान बना देती है। फागुन का एक मनोरम्य गीत देखिए। ऋतुओं का राजा फागुन आँगन में आकर अलबेला लहराता है। लाल रंग के पलाश के फूल तरुवर पर खिल गए हैं। उसकी सुंदरता में प्रकृति, अबाल, जवान, वृद्ध सब रस मग्न हो गए हैं। सब लोग रंगों की पिचकारी लिए एक दूसरे पर रंग डालकर होली खेल रहे हैं। होली का हुड़दंग मचा हुआ है। फागुन सुख का संदेश लेकर आया है, उसके रंग में सारा जग रंग हुआ है। वह मन का मीत है, उसके प्राण पुलकित है, वह यौवन के प्रीत का गीत लेकर आया हैं। उसके आने से सब लोगों के अंग-अंग से हर्ष छलकता है। जैसे –
लाल लाल लाल लाल रंग पेला केसूडानो तरुवर पर पथरायो!
ऋतुओनो राजा पेलो, फागण आंगण आयो, अलबेलो लहरायो,
चारेकोर घूमताने, रंग लई पिचकारी होळीनो गुलाल घूँटायो,
सरररर रंग छूटे , लाडकलाया लाड लूटे उरमा उमंग छवायो।
छोरी–छोरा गोरी–गोरा करता ज जोरी जोरा फागण लेता वधायो।
होळी केरा रस घेला, उरमा हरख घेला, लूटे लाड लुटायो, लुटायो
फागण फोरमतो आयो आयो रे आयो फागण फोरमतो आयो,
एने रंगे मलक रंगायो रंगायो, फागण फोरमतो आयो।
एतो सुखनो संदेशो लायो लायो रे फागण फोरमतो आयो।
इस प्रकार सावन ऋतु भी सबके दिल में आह्लाद जगाती है। उसके लोकगीत भी मिलते हैं। जैसे –
आभमां झीणी झबूके वीजळी रे,
झीणा झरमर वरसे मेघ गुलाबी
केम करी जाशो चाकरी रे।
नभ में बीजली चमक रही है, रिमझिम रिमझिम बारिश हो रही है । उस समय प्रियतमा अपने प्रीतम को नौकरी पर जाने के लिए रोक रही है। उसे अपने प्रीतम की चिंता हो रही है।यहाँ पर प्रियतमा का अगाढ प्रेम को व्यक्त किया गया है।
उपसंहार :
लोकगीत मानव जीवन के संस्कार, परंपराएँ, रीत रिवाज, पर्व त्योहार, आनंद उत्सवों, पारिवारिक संबंध, सामाजिक व्यवहारों आदि परंपरा से चली आई लोककंठ की विरासत है। यदि किसी युग और प्रांत के संस्कार और परिस्थितियों को जानना है तो हमें उस युग और प्रांत के लोकगीतों का अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है। गुजरात के लोकगीतों में गुजरात के लोगों की आत्मा बसती है। गुजरात के लोगों की चेतना नर्तन करती है। संयुक्त कुटुंब में पारिवारिक भावना, मधुरिम संबंध और व्यवहार की सुंदर अभिव्यक्ति दिखाई देती है। हँसी मजाक जीवन में ग़म भुलाकर खुशियाँ भर देती है। विभिन्न ऋतुओं का आगमन प्राणी मात्र के हृदय में आह्लाद का संचार करके मन में उमंगें भर देती हैं। आज के आपाधापी के युग में स्वार्थ की अँधी दौड़ में, जीवन में खुशियों का संचार करने वाले लोकगीतों को हाशिए पर कर दिए हैं। सही, वास्तविक और सहज सरल जीवन के लिए लोक-संस्कृति को, लोकगीतों को कंठस्थ रखना चाहिए, उसको सुरक्षित रखना चाहिए उसकी परंपरा का विस्तार करते रहना चाहिए। लोक परंपरा हमारी संस्कृति की बेमिसाल धरोहर है। आनेवाली पीढ़ी को भारतीय लोक संस्कृति का परिचय कराने के लिए यह लोक विरासत की रक्षा करना हम सबके लिए एक चुनौती है।
संदर्भ सूची :
- मिश्र डॉ. आदित्य कुमार, मिश्र डॉ. प्रमोद कुमार, लोकगीत कजरी, संस्करण प्रथम, प्रकाशन वर्ष -2012,प्रकाशक : जे.पी. ग्राम्य विकास संस्थान, इलाहाबाद -211003,पृ.सं. 14
- लता डॉ. कुसुम, ब्रज लोकसाहित्य और संस्कृति, संस्करण प्रथम, प्रकाशन वर्ष -2009,प्रकाशक : अर्पिता प्रकाशन, दिल्ली -110053, पृ. सं. 11/12
- लता डॉ. कुसुम, ब्रज लोकसाहित्य और संस्कृति, संस्करण प्रथम, प्रकाशन वर्ष -2009,प्रकाशक : अर्पिता प्रकाशन, दिल्ली -110053, पृ. सं. 12
- पटेल अमृत, लोकगीत एक अध्ययन,प्रथम आवृत्ति – प्रकाशन वर्ष 2001, प्रकाशक – रन्नादे प्रकाशन, अहमदाबाद ,पृ.सं. 53 (गुजराती कृति है)
- पटेल अमृत, लोकगीत एक अध्ययन,प्रथम आवृत्ति – प्रकाशन वर्ष 2001, प्रकाशक – रन्नादे प्रकाशन, अहमदाबाद पृ.सं. 57(गुजराती कृति है)
- पटेल अमृत, लोकगीत एक अध्ययन,प्रथम आवृत्ति – प्रकाशन वर्ष 2001, प्रकाशक – रन्नादे प्रकाशन, अहमदाबाद पृ.सं. 60 (गुजराती कृति है)
डॉ.भावना एन. सावलिया
हिन्दी विभाग,
आर्ट्स कॉलेज मोडासा






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