भारतीय इतिहास में 19वीं सदी को पुनर्जागरण, पुनरुत्थान, नवजागरण आदि नामों से अभिहित किया गया। डॉ॰ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय और रामधारी सिंह दिनकर ने क्रमश: ‘नवोत्थान’ व ‘पुनरुत्थान’ नामकरण किया है। डॉ॰ रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ (1976) में ‘हिंदी नवजागरण’ का विचार दिया । इस नवजागरण काल में सामंतवाद का ह्रास, पूंजीवाद का आना, मध्यवर्ग का उदय ,धर्म की जगह दर्शन ,सन्यासियों की जगह बुद्धिजीवियों को महत्व दिया जाने लगा । व्यक्ति  स्वातंत्र , मनुष्य को महत्व ,धर्मनिरपेक्षता, मानवतावाद, वैज्ञानिक आविष्कारों ,राष्ट्रीय भावना आदि को मान्यता मिली।

        19वीं सदी में भारतीय संस्कृति पश्चिमी संस्कृति,शिक्षा से प्रभावित हुई । डॉ॰ रामस्वरूप चतुर्वेदी का मानना है कि नवजागरण दो संस्कृतियों के टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा है। इस उर्जा के प्रभावस्वरूप दोनों संस्कृतियाँ एक दूसरे की अच्छाइयाँ ग्रहण करना चाहती हैं और अपनी बुराईयाँ त्यागना चाहती हैं । यही सांस्कृतिक प्रक्रिया समाज के इतिहास में नवजागरण मानी जाती है।

        भारतीय इतिहास में प्रथम नवजागरण बौद्ध धर्म के समय में आया जब महात्मा बुद्ध ने वर्णव्यवस्था और गलत परंपराओं का विरोध करते हुए मानव मात्र को महत्व दिया। संस्कृत भाषा की श्रेष्ठतावादी मानसिकता के विरोध में जनभाषा  पालि में उपदेश दिया। दूसरा नवजागरण भक्ति काल में हुआ जब सगुण-निर्गुण भक्ति धारा के लोक चेतना को जगाने वाले कवियों ने जाति, धर्म के पाखंड ,बाहयाडंबर, अंधविश्वासों पर सवाल खड़े किए। तीसरा नवजागरण ब्रिटिश राज में 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में आया जब पश्चिमी शिक्षा के माध्यम से भारतीय यूरोप के ज्ञान -विज्ञान से परिचित हुए । रेलवे व सड़कों के नए निर्माण से आवागमन व व्यापार में वृद्धि हुई। प्रिंटिंग प्रेस ,पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन से विचारों की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ । राजा राम मोहन राय को रविंद्रनाथ टैगोर ने पहला आधुनिक व्यक्ति माना है। उनके द्वारा स्थापित ‘ब्रह्मसमाज’ द्वारा धर्माडंबरो की आलोचना की गई। ‘सती प्रथा’ पर रोक लगवाई। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने पश्चिमी शिक्षा का समर्थन करते हुए बाहयाडंबरो का विरोध किया। प्रार्थना सभा, रामकृष्णमिशन,थियोसोफिकल सोसायटी आदि द्वारा भी जनजागरण किया गया।

        डॉ शंभुनाथ ने लिखा है: “पिछले लगभग पचास सालों के नवजागरण विवाद में मुख्यत: उभर कर यह आया है कि बांग्ला नवजागरण का सारतत्व बुद्धिवाद है (राजा राममोहन राय), जबकि हिंदी नवजागरण का सारतत्व राष्ट्रवाद है (1857 का पहला स्वाधीनता-संग्राम )।महाराष्ट्र नवजागरण का सारतत्व दलित-चेतना (ज्योतिबा फुले) और सुधारवाद (रानाडे) हैं। तमिल नवजागरण का सारतत्व ब्राह्मणवाद-विरोध और द्रविड़ चेतना है (पेरियार) इसी तरह केरल नवजागरण का सारतत्व दलित चेतना है (नारायण गुरु) ।भारतीय नवजागरण के इन परंपराओं के स्थानीय ‘थ्रस्ट’ को पहचानते हुए नवजागरण के राष्ट्रीय सारतत्व की अनदेखी एक भूल होगी ।” 1 19वीं सदी के भारतीय नवजागरण की बहुभाषिकता, और सामाजिक ढांचे में विविधता के कारण नवजागरण के कई आदर्श लोकप्रिय रहे एक दूसरे के विरोधी बनकर नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक बनकर। डॉ॰ रामविलास शर्मा ने बहुभाषी, बहु जातीय राष्ट्र में बांग्ला ,तमिल ,मराठी आदि जातियों की तरह हिंदी भाषियों को एक जाति माना। उनका मानना है कि हिंदी का जातीय विकास 13वीं-14वीं सदी में खुसरो की ‘खालिस खड़ी बोली’ की रचनाओं से शुरू हो जाता है। उन्होंने हिंदी नवजागरण या आधुनिक काल के दो हिस्से किए। एक को लोकजागरण नाम दिया दूसरे को नवजागरण कहा। उन्होंने भक्तिकाल को लोकजागरण का काव्य कहा जो व्यापारिक पूँजीवाद के दौर में विकसित विस्तृत हुआ। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र कालीन नवजागरण को भक्तिकाल के लोगजागरण का विकास माना। वे 19वीं सदी के हिंदी नवजागरण को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जोड़कर देखते हैं और बताते हैं कि भारत में कोई भी जागरण साम्राज्यवाद का विरोध किए बगैर संभव नहीं था। 1857 की क्रांति मुख्यत: हिंदी प्रदेश में हिंदुओं और मुसलमानों द्वारा मिलकर लड़ी गई इसलिए इसे हिंदी नवजागरण कहा गया। धीरे-धीरे नवजागरण सामंतवाद,  उपनिवेशवाद के विरोध में हिंदी साहित्य में उठ खड़ा हुआ जिसका प्रारंभिक स्वर भारतेंदु हरिश्चंद्र के साहित्य में प्रस्फुटित हुआ। इसलिए भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी साहित्य का अग्रदूत कहा गया। हिंदी में यह नवजागरण बंगाल से होते हुए आया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है’ के संबंध में चिंतित थे। उन्होंने लिखा है- “भाई हिंदुओं! तुम भी मत-मतांतर का आग्रह छोड़ो । आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जप करो । जो हिंदुस्तान में रहे ,चाहे किसी रंग ,किसी जाति का क्यों ना हो , वह हिंदू है । हिंदू की सहायता करो । बंगाली मराठा, पंजाबी, मद्रासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मण ,मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिससे तुम्हारे यहां बढ़े, तुम्हारा रूपया तुम्हारे ही देश में रहे ,वह करो। देखो ,जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिलती है ,वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार  तरह से इंग्लैंड, फरांसीस,जर्मनी अमेरिका को जाती है ।”2 भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी पत्रिकाओं (हरिश्चंद्र मैगजीन ,कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका), नाटको और मुकरियों में ब्रिटिश राज का विरोध किया है ।उनकी चिंता है कि अंग्रेजों के राज में भारत का सारा धन इंग्लैंड चला जा रहा है और देश में अकाल , दुर्भिक्ष और दैन्य का राज फैला हुआ है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रमुख नाटकों में भारत की गुलामी ही मूलभूत और केंद्रीय समस्या है। हिंदी प्रदेश के होते हुए भी भारतेंदु की चिंता और चिंतन के केंद्र में भारत है ।उनके नाटकों का शीर्षक भी इसी चिंता का प्रतिबिंब खींचता है। ‘भारत जननी’, ‘भारत दुर्दशा’ । भारत दुर्दशा का भारत दुर्देव अंग्रेजी राज का प्रतीक है। रामविलास शर्मा ने लिखा है “कौओ, कुत्तों और सियारो की चहल-पहल के बीच मसान में फटेहाल भारत का प्रवेश होता है। ‘अंग्रेज राज सुख-साज सजे सब भारी’ पर भारत का यह वेश व्यंगपूर्ण टिप्पणी है। उसे सहारा अब निर्लज्जता का है जो उसे भीख माँगना सिखाती है। भारत दुर्दशा ,सत्यानाश, फौजदार, रोग, आलस्य ,मदिरा ,अंधकार आदि भारत का नाश करने पर तुले हुए हैं । अंतिम दृश्य मे बहुत देर तक विलाप करने के बाद भारत का मुँह चूमकर भारत-भाग्य आत्महत्या कर लेता है । ‘भारत दुर्दशा’ अंग्रेजी राज्य की अप्रत्यक्ष रूप से कटु और सच्ची आलोचना है।“3 दरअसल भारत दुर्दशा भारतेंदु की देशभक्ति को सामने लाता है जिसमें देश की चिंता में वे व्यथित  हैं।

“अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी।

पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी।।“ (4)

        भारतेंदु ने व्यंग्य और प्रहसन पर आधारित नाटक भी रचे हैं जिसमें उनका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना नहीं है बल्कि व्यंग्य बाणों से कुरीतियों, व्यभिचारो, कुनीतियों का विरोध करना भी है। वे अनाचार के प्रति घृणा और बलि प्रथा के विरोध में वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति लिखा जिसमें चित्रगुप्त यम से कहते हैं- “महाराज , ये गुरु लोग हैं, इनके चरित्र कुछ न पूछिए केवल दंभार्थ इनका तिलकमुद्रा और केवल ठगने के अर्थ इनकी पूजा, कभी भक्ति से मूर्ति को दंडवत न किया होगा पर मंदिर में जो स्त्रियाँ आईं उनको सर्वदा तकते रहे; महाराज उन्होंने अनेकों को कृतार्थ किया है और इस समय तो मैं भी श्री रामचंद्र जी का, ‘श्री कृष्ण का दास हूँ’ पर जब स्त्री सामने आवे तो उससे कहेंगे ‘मैं राम तुम जानकी, मैं कृष्ण तुम गोपी’ और स्त्रियाँ भी ऐसी मूर्ख कि फिर इन लोगों के पास जाती हैं ।“ 5

        भारतेंदु ने इस नाटक में गुरु घंटालो और पुरोहितों की अच्छी खबर ली है जो भोली- भाली जनता को बेवकूफ बनाकर परलोक भेजने के बहाने से अपना हित साधते हैं । रामविलास शर्मा ने लिखा है कि- “पहले अंक में रक्त से रंगा हुआ राजभवन’ दिखाई देता है। राजा और पुरोहित दोनों जनता को ठगकर अपनी इच्छाएँ पूरी करते हैं। बलिदान के साथ जुआ, मदिरा और मैथुन को भी न्यायपूर्ण ठहराकर ठगों का वर्ग धर्म साधना करता हैं ।दूसरे अंक में विदूषक के मुँह से भारतेंदु ने धूर्त वैष्णवों की आलोचना कराई है ।“ 6 भारतेंदु ने धार्मिक अंधविश्वासों का विरोध किया है उनका ये विरोध भक्तिकाल के संत कवियों की बाहयाडंबरो की आलोचना को आगे बढ़ाता है। आज के लेखकों को धर्माडंबरो का विरोध और आलोचना करने की प्रेरणा देता है।

          अंधेर नगरी अंग्रेजी राज्य का ही दूसरा नाम है। यही हिंदुस्तान का मेवा-फूट और बैर’– टके सेर बिकता है ।अंधेर नगरी मैं वेद धर्म, कुल-मर्यादा, सच्चाई, बड़ाई सब टके सेर मिलती है। अंग्रेजों के हाकिम घासीराम के चने खाकर लोगों पर दूना टैक्स लगाते हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है कि- “अंधेर नगरी का वातावरण यथार्थ जीवन का ही प्रतिबिंब है।…..’अंधेर नगरी चौपट राजा’ अंग्रेजी राज्य की अंधेरगर्दी की आलोचना ही नहीं ,वह इस अंधेरगर्दी को खत्म करने के लिए भारतीय जनता की प्रबल इच्छा भी प्रकट करता है ।इस तरह भारतेंदु ने नाटकों को जनता का मनोरंजन करने के साथ उसका राजनीतिक शिक्षण करने का शक्तिशाली साधन भी बनाया।”7 जनजागरण से नवजागरण की इस यात्रा में भारतेंदु हरिश्चंद्र के साहित्य व पत्रिकाओं के लेखों के साथ पूरा भारतेंदु मंडल भी योगदान दे रहा था।बालकृष्ण भट्ट (हिंदी प्रदीप), प्रतापनारायण मिश्र (ब्राह्मण), चौधरी बद्रीनारायण प्रेमघन (आनंद कांदबिनी), लाला श्रीनिवास दास राधाचरण गोस्वामी, राधाकृष्ण दास ने भी नवजागरण संबंधित साहित्य लिखकर जन जागरण का शंखनाद किया।

        रामविलास शर्मा ग़दर,1857 के स्वाधीनता संग्राम को हिंदी प्रदेश के नवजागरण की पहली मंजिल मानते हैं। दूसरी मंजिल भारतेंदु हरिश्चंद्र के युग को। हिंदी नवजागरण का तीसरा चरण महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके सहयोगियों के कार्यकाल को मानते हैं। इसी नवजागरण को आचार्य रामचंद्र शुक्ल प्रथम, द्वितीय, तृतीय उत्थान की श्रेणी में विभाजित कर समझाते हैं। उन्होंने लिखा है : द्वितीय उत्थान में स्वदेश-गौरव और स्वदेश-प्रेम की जो भावना प्रथम उत्थान में जगाई गई थी उसका अधिक प्रसार द्वितीय उत्थान में हुआ और भारत भारती ऐसी पुस्तक निकली।….तृतीय उत्थान में आकर परिस्थिति बहुत बदल गई। आंदोलनों ने सक्रिय रूप धारण किया और गाँव-गाँव राजनीतिक और आर्थिक परतंत्रता के विरोध की भावना जगाई गई सरकार से कुछ मांगने के स्थान पर अब कवियों की वाणी देशवासियों को ही ‘स्वतंत्रता देवी की वेदी पर बलिदान’ होने को प्रोत्साहित करने में लगी।“ 8 आचार्य रामचंद्र शुक्ल रामविलास शर्मा द्विवेदी युगीन और छायावादी लोक जागरण/नवजगरण  की  वृहद और महत्वपूर्ण भूमिका को कवियों और लेखकों के साहित्य के संदर्भ में सामने लाते हैं। रामविलास शर्मा महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी पुस्तक ‘संपत्तिशास्त्र’ (1908) को विश्लेषण कर उनकी नवजागरण कालीन महत्ता को पहचानते हैं । महावीर प्रसाद द्विवेदी उपर्युक्त पुस्तक में दिखाते हैं कि- “देश के साथ-साथ देश का व्यापार भी किस तरह पराधीन है, इस पराधीनता में देश की जनता का शोषण कितनी तरह से हो रहा है, अंग्रेज भारत की ज़मीन पर अपना इज़ारा कायम करके कर की जगह लगान कैसे वसूलने लगे, जमीदारी व्यवस्था कायम हुई, अंग्रेज भारत में अपनी ब्रिटिश नौकरशाही , फौज और रेल आदि के खर्च हिंदुस्तान की जनता से वसूलते है, दुर्भिक्ष और अत्याचार से  किसान नष्ट हो रहे हैं। देश का व्यापार और कला-कौशल मारे गए, इंग्लैंड की बनी चीजें भारत के बाजार में भरी हुई है।”9 दरअसल द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से भारतेंदु युग की चिंता और अपने युग की समस्याओं  को विस्तार दे रहे थे । उनके लेखन के केंद्र मे वैश्विक संदर्भ में दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी का संघर्ष ,रंगभेद और मजदूरों की दुर्दशा भी है।

        महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ पत्रिका द्वारा प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, रामचंद्र शुक्ल के शुरुआती लेखन को प्रेरणा व दिशा मिली। गुप्तजी ने हिंदी नवजागरण को पूरी  तन्मयता  से अपनी कविताओं मे वाणी दी है विशेषत: ‘भारत-भारती’ में। अंग्रेजी साम्राज्यवाद की दासता  से लड़ने में गुप्तजी ने अपने तरीके से भारतीय जनता को जगाया है:

“पानी बनाकर रक्त का,कृषि कृषक करते हैं यहाँ,

फिर भी अभागे भूख से दिन-रात मरते हैं यहाँ,

………….

आती विदेशों से यहाँ सब वस्तुएं व्यवहार की,

धन-धान्य जाता है यहाँ से, यह दशा व्यापार की।”10

अतीत का गौरव गान ,वर्तमान की देश- दुर्दशा, प्लेग,महाजन-शोषण ,गरीबी कुपोषण, भुखमरी अकाल का वर्णन ,भविष्य में भारत-निर्माण की तैयारी से युक्त ‘भारत भारती’ जनजागरण की गाथा बन जाता है । दिवेदी जी के लेख ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ से प्रेरित काव्य साकेत की नारी पात्र सीता, उर्मिला, कैकेयी हो या ‘यशोधरा’, विष्णुप्रिया। गुप्त जी नारी के प्रति एकांगी दृष्टिकोण को कठघरे में खड़ा करते हैं, पुरुष-प्रधान समाज व संस्कृति में नारी-शोषण की तस्वीर खींचते हैं , नारी के संघर्ष और प्रतिरोध को उभारते हैं ।उनकी नारी पात्र स्वाभिमानी और श्रमजीवी हैं रानी होने के बावजूद। उनकी नारी मुक्ति की भावना मर्यादावाद और आदर्शवाद से अनुशासित है।

        रामविलास शर्मा ने नवजागरण के संदर्भ में ‘प्रेमचंद और उनका युग’ पुस्तक में प्रेमचंद के साहित्य का मूल्यांकन किया है। वे लिखते हैं : “जिस समय देश में बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आंदोलन चल रहा था, प्रेमचंद ने रंगभूमि में दिखलाया कि  जनता अब भी लड़ रही है ,वह हारी नहीं है, वह जीतेगी। गोदान में उन्होंने पढ़े-लिखे नौजवानों और किसानों की एकता की तरफ़ संकेत किया। किसानों के महाजनी शोषण का चित्र खींचा , जिसे किसान आंदोलन में तब जगह नहीं दी गई थी। उन दिनों जब मंदिर प्रवेश को अछूत समस्या हल करने का सबसे बड़ा साधन माना जाता था, उन्होंने कर्मभूमि में अछूत किसानों और खेत मजदूरों की भूमि समस्या पर दृष्टि केंद्रित की। उसमें लगानबंदी की लड़ाई को मुख्य लड़ाई बताया। यह इस बात का सबूत है कि वह देशभक्ति और राजनीति के आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई थे । …प्रेमचंद भविष्यद्रष्टा थे। उन्होंने गबन, कर्मभूमि, कायाकल्प, रंगभूमि तथा गोदान में ऐसी देशभक्तों का रूप दिखाया जो वक्त आने पर जनता से विश्वासघात कर जाते थे, जिनके लिए अपना हित, अपने मालिकों का हित, जनता के हितों से बढ़कर था ।”11 प्रेमचंद के लेखन के  समानांतर गांधी के आंदोलन हो रहे थे ।निर्धन किसान शोषण की तीहरी चक्की में पिस रहे थे जमींदार, महाजन और ब्रिटिश साम्राज्यवाद । इस तीहरे शोषणचक्र का जीवंत दस्तावेज है प्रेमचंद का साहित्य ।

        प्रेमचंद के समानांतर स्वाधीनता आंदोलन के दौरे में निराला और रामचंद्र शुक्ल ने परंपरागत रूढ़ियों और सामंती साहित्य का विरोध किया और देशभक्ति और लोकतंत्र की साहित्यिक परंपरा का समर्थन किया । शुक्ल जी ने तुलसीदास, सूरदास की समीक्षा करते हुए लोक-संग्रह , लोक-धर्म , लोक-हित, लोक-मंगल की बात करते हैं।

        20वीं सदी के पूर्वार्द्ध के नवजागरण में निराला, प्रसाद, पंत महादेवी वर्मा का योगदान रहा। माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की रचनाओं ने स्वाधीनता आंदोलन को दिशा और प्रेरणा दिया । साहित्यकारों ने सिर्फ स्वाधीन मानवीय मूल्यों की स्थापना ही नहीं की वरन आजादी की लड़ाई का दस्तावेजीकरण भी किया।

संदर्भ सूची

  1. रामविलास शर्मा- शंभुनाथ-पृष्ठ 86-साहित्य अकादमी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2011
  2. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास- डॉ॰ बच्चन सिंह- पृष्ठ 286, राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2000
  3. भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएं- रामविलास शर्मा पृष्ठ-130- राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, संस्करण 2012
  4. वही पृष्ठ 45
  5. वही पृष्ठ 131
  6. वही पृष्ठ 131
  7. वही पृष्ठ 133
  8. लोक जागरण और हिंदी साहित्य- आचार्य रामचंद्र शुक्ल- संपादक रामविलास शर्मा- पृष्ठ 187, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली,संस्करण 1985
  9. रामविलास शर्मा- शंभुनाथ- पृष्ठ 95, साहित्य अकादमी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2011
  • मैथिलीशरण- नंदकिशोर नवल- पृष्ठ 380 राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2011
  • रामविलास शर्मा शंभुनाथ पृष्ठ 102,साहित्य अकादमी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011

 

 

डॉ. चन्दन कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर( हिंदी विभाग)
राजकीय महाविघालय,बाराखाल संतकबीर नगर