सिलहट पूर्वोत्तर बांग्लादेश में एक महानगरीय शहर है । बंगाल के पूर्वी सिरे पर सूरमा नदी के दाहिने किनारे पर स्थित एक उष्णकटिबंधीय जलवायु और हरे-भरे ऊंचे इलाके वाला शहर है । शहर की आबादी एक करोड़ से अधिक है । यह खुलना, चटगांव और ढाका के बाद बांग्लादेश के सबसे बड़े शहरों में से एक है । सिलहट बांग्लादेश में सबसे महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक है । इसके अलावा यह ढाका और चटगांव के बाद देश के सबसे आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शहरों में से एक है । यह शहर देश में सबसे अधिक मात्रा में चाय और गैस का उत्पादन करता है ।

1303 में लखनौती के सुल्तान शम्सुद्दीन फिरोज शाह ने गौर गोविंदा को हराकर सिलहट पर विजय प्राप्त की । सिलहट बंगाल सल्तनत का एक क्षेत्र था । 16वीं शताब्दी में सिलहट को बारो-भुयान जमींदारों द्वारा नियंत्रित किया गया था और बाद में मुगल साम्राज्य का एक सरकार (जिला) बना दिया गया । सिलहट पूर्व में मुगलों की सबसे महत्त्वपूर्ण शाही चौकी के रूप में उभरा और इसका महत्त्व सत्रहवीं शताब्दी तक बना रहा । ब्रिटिश शासन की शुरुआत 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन के तहत हुई । अपनी प्राचीन समुद्री-यात्रा परंपरा के साथ सिलहट ब्रिटिश साम्राज्य में लश्करों के लिए एक प्रमुख स्रोत बन गया । सिलहट नगरपालिका बोर्ड की स्थापना 1867  में हुई थी । मूल रूप से बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा और बाद में पूर्वी बंगाल का हिस्सा बना । यह शहर 1874 और 1947 के बीच औपनिवेशिक असम का हिस्सा रहा । 1947 के बाद यह शहर पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बना और वर्तमान में बांग्लादेश का एक प्रमुख शहर है ।

सिलहट अपने आप में एक अनूठा शहर है । इसकी तमाम उपलब्धियों में यहां का रामायण भी है । जिसको ‘सिलहटी रामायण’ के नाम से जाना जाता है । यह रामायण दुनिया के तमाम राम कथाओं में अनूठा है क्योंकि केवल 40 पंक्तियों में राम की पूरी कथा समाहित कर इसे आम जन में प्रस्तुत किया गया है ।  इन 40 पंक्तियों में रामकथा के विशेष स्वरुप को समाहित करने का सफल प्रयास किया गया है । यह बात आज सबके लिए आश्चर्य का विषय बनी हुई है कि आखिर वह कौन सी परिस्थितियां रही हैं जिसके कारण केवल 40 पंक्तियों में राम की कथा को प्रस्तुत किया गया ? अनुमान किया जा सकता है कि इसकी संक्षिप्तता की वजह उस दौर की भयाक्रांत परिस्थितियां रही होंगी । यह संक्षिप्त इसलिए भी है कि इसे आसानी से कंठस्थ किया जा सकता है । सिलहटी रामायण की संक्षिप्तता की वजह क्या रही होगी? यह आज भी विचारणीय बिन्दु है, क्योंकि तमाम भाषाओं में राम की कथा को प्रस्तुत करने के तरीके, भाव और आकार की भिन्नता देखने को मिलती है । सिलहटी रामायण की संक्षिप्तता का एक प्रमुख कारण इसे रखने की सुगमता का भी दिखाई देता है । सिलहटी रामायण में राम जन्म से लेकर रावण पर विजय प्राप्त करने तक की कथा है । इसमें परंपरा, पात्रों के नाम, घटनाएं, तनाव, संघर्ष आदि राम कथा के सभी तत्त्व मौजूद हैं । परंतु क्या इस छोटे रूप वाले राम कथा में अपने समय की राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रतिरोध को निरूपित करने का प्रयास किया गया है? वानरों के द्वारा बड़े-बड़े गाछ (वृक्ष) से समुद्र पर पुल बना देना, उनका सागर पार कर राक्षसों से भीषण-मारक युद्ध करते हुए रावण की लंका जला देना, राक्षस वंश का समूल नाश करके वानर वृंद का जीत के उल्लास में मुंह से हर्ष ध्वनि निकालते हुए नाचना और अंत में वानर सेना की मदद से राम-रावण के भीषण युद्ध में रावण का अंत करना/होना । बांग्लादेश की आंतरिक परिस्थिति में यह कथा आम जन की अभिव्यक्ति लगती है । जिसमें राम को आधार बनाकर अपने समय की दुर्धर्ष परिस्थियों से संघर्ष करने की प्रेरणा मिलती है ।

सांवरमल सांगानेरिया का यात्रा वृतांत ‘फेनी के इस पार’ (त्रिपुरा की यात्रा कथा) में एक अध्याय- ‘श्रीभूमि श्रीहट्ट’ है । सांवरमल सांगनेरिया अगरतला के नजदीक सीमांत अखोरा गेट पहुंचते हैं । यह सड़क ढाका तक जाती है । सीमा पर बी.एस.एफ. के जवान हैं और लोहे के कटीले तारों की ऊंची बाड़ लगी है । कमल सरकार नाम का बुजुर्ग व्यक्ति सिलहट से 8 दिनों बाद त्रिपुरा लौट था  । उनसे बातचीत से पता चला कि उनका जन्म सिलहट में हुआ था । देश विभाजन के समय 7 साल की उम्र में वह त्रिपुरा चला आया और अब वहीं रह रहे हैं । विभाजन के दौरान वहां की जमींदारी और हजार बीघा जमीन को छोड़कर यहां आना पड़ा । कमल सरकार द्वारा दिए गए ब्रोशर/विवरणिका से लेखक को सिलहटी रामायण का पता चलता है । इस यात्रा वृतांत में  इसका हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों के लिए  लिप्यंतरण किया गया है । जिसे डॉ. सुन्दरीमोहन दास द्वारा लिखा गया है-

सिलहटी रामायण

औ जे देख सूर्य उठइन बियानिया बेला । (सुबह के उगते सूर्य की ओर देखो)

हौ गुष्ठिर दशरथ राजा भाला ।।  (उगते सूर्य के वंश का राजा दशरथ था)

तिन बिया कइरला राजार पुड़ा कपाल लैया ।  (दुर्भाग्य से राजा ने तीन विवाह किए)

एक रानिरओ ना अइल एकगुओ पुया ।।   (पर किसी भी रानी ने राजकुमार/संतान को जन्म न दे सकी)

कुबाइ थने आइला मुनि राजार अन्दर ।    (एक बार एक ऋषि राजा के पास कहीं से आया)

गाट्टा-गाट्टा चाइर पुया अइल राजार घर ।।  (उसके बाद राजा को चार स्वस्थ पुत्र प्राप्त हुए)

बड़ रानिर पुया राम माइजर भरत सुजन ।   (बड़ी रानी के बेटे का नाम राम था)

हुरू रानिर दुइ पुया लक्ष्मण शत्रुघइन ।।   (छोटी रानी के दो पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघन थे)

दशरथ आइग्या दिला राम अइता राजा ।।  (दशरथ ने अगले राजा के रूप में राम के नाम की घोषणा की)

हुनिया बड़ सुखी हइला राजार जत प्रजा । (यह सुनकर प्रजा हर्ष से भर उठी)

केकइर एक बापर बाड़ीर बान्दि कपाल पुड़ा । (कैकेयी के पिता के घर की दासी का दुर्भाग्य था)

पिठे जेलान मन हेलान धनुर लाखान तेड़ा ।।  (उसके शरीर व धनुष की तरह टेढ़े-मेढ़े थे)

केकइरे कैल गिया राम राजा अइत ।  (कैकेयी को भरा गया )

तोर छाबाल भरत बुझि खुदर जाउ खाइत ।।  (राम के राजा होने से तुम्हारे पुत्र को परेशानी उठानी होगी)

बड़र पुया राजा अइले तुइ अइबे बान्दि । (बड़ा बेटा ही राजा होना चाहिए राजा ने ऐसा प्रण किया है)

भरत राजा अइबार लागि पड़ गिया कान्दि ।। (तुम जाओ और विलाप करो ताकि भरत को राजा बनाया जाय)

हुनिया केकइर माथा चौरग्डिं  दिलाइल । (यह सुनकर कैकेयी की मति मारी गयी )

गुसा करि उपास थाकि माटीर उपर हुइल ।। (वह क्रोधित होकर भूखे पेट जमीन पर लेट गयी)

दशरथ देखि कइन इता कर किता । (दशरथ ने यह समाचार सुना तो पूछा)

औ दण्डत दिताम पारि तुमि चाओ जेता ।। ( मैं तुम्हारे लिए वही करूंगा जो भी तुम मांगों)

केकइ उठिया कैला रामरे पाठाओ वने । (कैकेयी ने कहा राम को भेजों वन) 

आमार भरतरे बयाओ राज-सिंहासने ।। (भरत को राजा घोषित करो)

सुया रानिर कथा हुनि राजा गलि गेला । (अपनी सुन्दर रानी के मुख से यह सुनकर)

कइला कांदिओना सुना तुमार कथाओ भाला ।। (राजा ने कहा कि तुम रो ओ नहीं मैं तुम्हारी मांग मानूँगा)

राम गेला वनवास भरत बड़ बुका । (राम वन गमन कर गए )

सिंहासने आनि राइखला रामर पादुका ।। (सीधा-सरल भरत राम की खड़ाऊ को राजसिंहासन पर रख  राज-काज करने लगे)

बाउग पाइया बउ चुरि करिला रावण । (मौका देखकर रावण सीता का अपहरण कर लेता है)

वानर लइया करइन राम युद्धर आयोजन ।। (वानर सेना की मदद से राम युद्ध की तैयारी करते हैं)

बुद्धिमान जाम्बुमाने कइन लओ ठेला । (बुद्धिमान जामवंत ने प्रश्न किया कि अब क्या करना है?)

लंकात अखन कओ जाइताय कोन हाला ।। (कौन है जो लंका जाकर हालत का जायजा ले सकता है ?)

हनुमाने डाकि कय जाम्बुमान पुति । (जामवंत की शंका पर हनुमान उठे)

कोनो कामर भाग नाइ कर युक्ति गुतागुति ।। (किसी भी तरीके से जल्द से जल्द हालत का जायजा लेने को तैयार हो गये)

फाल मारि हनुमान सागर अइल पार । (शक्तिशाली/बलशाली हनुमान एक छलांग से सागर पार कर गए)

लेइञजर आगुन दिया कइरला लंका छारखार ।। (अपनी पूंछ में लगी आग से लंका दहन कर आए)

बड़ बड़ गाछ दिया बानाइला एक पुल । (दूसरी तरफ बड़े-बड़े गाछ (पेड़) की मदद से एक पुल बनाया)

बान्दरे राइक्षसे युद्ध लागिल तुमुल ।। (उसके बाद दोनों ओर की सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ)

राइक्षस वंश हकल उजार करिया । (राक्षसों के वंश का संहार करने के बाद)

हुक्कु हुक्कु करे बान्दर लेंगुड़ नाचाइया ।।  (प्रफुल्लित बानर सेना गाने-नाचने लगी)

बान्दर गुष्ठि लइया रामे युद्ध करिला भीषण ।(वानर सेना की मदद से राम-रावण के बीच भीषण युद्ध हुआ)

रावण मारि आइनला सीता औत रामायण ।। (रावण को मार कर सीता को बचाया गया)                                                                                  

सांवरमल इस यात्रा-वृतांत में बताते हैं कि सिलहट में जन्में लोगों ने वहां के साहित्य, शिल्प, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान आदि को सभ्यता के दीपक की तरह प्रज्वलित किए रखा हुआ है । इसी मिट्टी के बीज-संतान निमाइ ने चैतन्य बनकर जगत को आलोकित किया । सूफी साधक हजरत शाहजलाल ने संकीर्ण धर्मांधता में फंसे लोगों को उदार सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ाया । डॉ. राधाकृष्णन ने सिलहट को लैंड ऑफ फिलॉसफर (दार्शनिकों की भूमि) कहा । श्रीभूमि ने ही अद्वैताचार्य, चैतन्य, माता-शचीरानी, चैतन्य देव की पत्नी विष्णुप्रिया को जन्म दिया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख बिपिन चंद्र पाल का जन्म भी यहीं हुआ था । असम में ‘कला गुरु’ के नाम से प्रसिद्ध साहित्यकार, नाटककार विष्णु राभा का जन्म सिलहट में ही हुआ था । यहाँ 1892 तक मुरारीचंद कॉलेज में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई । 5 साल बाद मदन मोहन कॉलेज की स्थापना हुई  । यह दोनों  कॉलेज आज बांग्लादेश के उच्च शिक्षा के प्रमुख स्तम्भ बने हुए हैं ।

सिलहट जिले में ‘ढाका दक्षिण’ नामक एक जगह है, जो चैतन्य महाप्रभु का ननिहाल था । इस कारण यहाँ के हिंदुओं पर वैष्णव धर्म का प्रभाव देखने को मिलता है । गांव और शहर में अखाड़ा (मंदिर) है । जहां नाम कीर्तन होते हैं इसी कारण यहाँ छात्रावास का प्रबंध भी है । आज सिलहट के हिंदुओं की स्थिति खराब नहीं लगती परंतु मानसिक रूप से वह हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं, क्योंकि कई ऐसी शक्तियां हैं जो बांग्लादेश को धर्मनिरपेक्ष से ‘इस्लामिक देश’ बनाने पर तुली हुई हैं । सिलहट कभी हिंदू बहुल असम का एक जिला था । आजादी के समय उसे पाकिस्तान में मिलाने के लिए मतगणना कराई गई थी । मुस्लिम बहुमत साबित करने के लिए मैमन सिंह के मुसलमानों को रातों-रात सिलहट लाकर उनसे वोट डलवाए गए और यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश)  का हिस्सा बन गया । वहीं दूसरी ओर सौ सालों से बसें चाय बागान के श्रमिक जो बिहार व उड़ीसा के थे, उनको वोट डालने नहीं दिया गया था । अब तक देश-विभाजन के इतिहास में भारत-बांग्लादेश के विभाजन पर अकादमिक व सामाजिक तौर पर एक सुनिश्चित चुप्पी देखी गयी है । विभाजन की त्रासदी को भोगते हुए कितनी पीढ़िया दफ्न हो गयी, इसका आकलन करना होगा ।

आज सिलहटी लोग बांग्लादेशी डायस्पोरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं । अमेरिका, इंग्लैंड, व मध्यपूर्व में सिलहटी लोग मिल जाएंगे । पलायन का सिलसिला अंग्रेजों के समय से ही शुरू हुआ था । सिलहटी मूलवंशी का वहां से पलायन होना एक संस्कृति और सभ्यता का पलायन है । इतिहास के अलग-अलग समय में भिन्न राजनीतिक परिदृश्य में विस्थापित मन अपनी भाषा व भाव की धरोहर को अपनी स्मृतियों में संरक्षित किए हुए है । भिन्न सांस्कृतिक भूमि व पराये देश में अपनी अस्मिता और आजीविका सुनिश्चित करने की दिशा में क्या ‘सिलहटी  रामायण’ उनको दुर्घर्ष समय से उबारने की सीख देती है? यह एक विचारणीय पहलू है । आज के बांग्लादेशी युवा सिलहटी भाषा और साहित्य को विकसित करने का श्रेय सूफी संत शाह जलाल को मानते हैं, लेकिन सिलहटी भाषा और साहित्य बांग्ला भाषा से भी प्राचीन है । ऐसा कुछ विद्वानों का मानना है । वर्तमान समय मे सिलहटी भाषा और साहित्य से जुड़ने के लिए वहाँ की जनता में व्यापक समझ विकसित हो रही है । अलग-अलग देशों में बसने और अपनी पीढ़ी को ‘सिलहटी अस्मिता’ से परिचित कराते हुए जो ललक पैदा हुई उसी ललक का ही परिणाम ‘सिलहटी रामायण’ का उद्घाटित होना है । सिलहट के विभाजन पर अब वहाँ के कुछ पत्रकार व अकादमिक जगत के लोग इस चर्चा/ संवाद पर निष्कर्ष रूप में कहने का प्रयास यू-ट्यूब के माध्यम से कर रहें हैं । ‘सिलहटी अस्मिता’ अभी भी भारतीय डायस्पोरा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, इसकी बात विद्वान करते हैं। हाल के वर्षों में इंटरनेट ने जब दुनिया को एक प्लेटफार्म पर लाने की स्थितियां पैदा की तब अब खुलकर सिलहटी भाषा व उसकी लिपि को पुनर्जीवित करने के प्रयास में नई और पुरानी पीढ़ी संलग्न होती दिखाई दे रही है । कई वीडियो यू-ट्यूब पर इस संबंध में देखें जा सकते हैं ।

सिलहटी भाषा अपने अवसान होने और सिलहटी लिपि के विलुप्तिकरण के खतरे से निजात पाती हुई नजर आ रही है । आज तकनीक और नई पीढ़ी के हौसलों से सिलहटी भाषा अपनी पहचान को पुनर्स्थापित करती हुई आगे बढ़ रही है । सुखद आश्चर्य इन इंटरनेटी पहल से होता है कि सिलहटी अस्मिता में आज के मुस्लिम (बांग्लादेशी) व विस्थापित हिन्दू सिलहटी (भाषा व लिपि) के नाम पर एक हो रहे हैं । एक अस्मिता के साथ उठ खड़े नजर आ रहे  हैं । दिलों की दूरी मातृभूमि की याद में घुलने लगी है । जाहिर सी बात है कि इस साहित्य की विधागत धरोहरों को पढ़ने व परिचय से एक नई सिलहटी जातीयता आज के वैश्विक वैमनस्य भाव को तिरोहित करने का प्रयास करेगी । तब इन भाषा में रचित साहित्य से गंगा-यमुना तहजीब के संदेशों की खुशबू से दुनिया सराबोर होगी । वर्तमान समय में सिलहटी बराक घाटी, हो जाई (असम), उत्तर त्रिपुरा और उनाकोटि में बोली जाती है ।

आज इस साझी संस्कृति की जरूरत को हम सभी महसूस कर रहे हैं, ताकि संस्कृति को मजबूती से  सामने लाने में मददगार साबित हो ।  मैंने कई सिलहटी मूल वंशियों से बात करने का प्रयास किया । उनके पुरखे अपने सिलहट और अपने सिलहटी होने को बड़ी शिद्दत से याद करते हुए गुजर गए । उनकी नई पीढ़ी के पास उन पुरखों की बस यादें हैं । आज के सिलहट/ सिलहटी होने के भाव से महरूम एक नई अस्मिता को गढ़ते लोग गुजर- बसर कर रहे हैं, भारत के भीतर और सुदूर देश दुनिया में भी । आशा करता हूँ कि ‘सिलहटी रामायण’ के साथ-साथ सूफी साधक हज़रत शाह जलाल की वाणियों का संगम एशियाई अस्मिता का आधार बनें ।

संदर्भ-

  1. https://www.hmoob.in/wiki/Sylhet
  2. सांगानेरिया, संवारमल. (2016). फेनी के इस पार : जयपुर- बोधि प्रकाशन.
  3. Bhattacharjee, Nabanipa. (2014) Thesis. Communities Culture and Identities a Sociological Studyof the syllhati Community in Contemporary India. New Delhi. JNU.
  4. Automatic speech Recognition for Sylheti language. (Thesis) By Gautam Chakraborty Gauhati University 2021.
  5. History of Sylhet by Rabbani Chaudhary (A division in Bangladesh) Publication- Independently Published 2018.
  6. Sylhet Partition: History of Harrow and Unacceptance – Ayan Bhattacharjee (A Physics Professor, write a book- Partition of Sylhet.)
  7. Sylhet lost to Muslim Pakistan (Journalist guru video) by Saurabh Kaushik YouTube video.

अभय रंजन
एसोसिएट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग, हिन्दू कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय