“ समाज में ऐसे कौन से सतोप्रधान स्वरूप में पवित्र कारक हैं जो जीवन के उत्कर्ष एवं उन्नयन के लिए निरंतर रूप से प्रेरणा प्रदान करते रहते हैं और मानव जाति उनका अनुकरण और अनुसरण करते हुए जाने – अनजाने अति महत्वपूर्ण अपने प्रयासों को प्रभावशाली गति देने में समर्पित भाव एवं विचार के साथ संलग्न हो जाया करती है । ज्ञान के स्रोत और उसका उत्सर्जन किन्हीं एकांगी स्वरूपों में विद्यमान नहीं होता है बल्कि इसकी अनेकानेक विधाएं विभिन्न स्थितियों के माध्यम से अपनी प्रेरणादाई कहानी सदा ही अभिव्यक्त किया करती हैं । ज्ञान को बोध का विषय बनाने का प्रयास और उसे समाज की व्यावहारिक स्थितियों के मध्य उपस्थित कर देने की तमन्नायें जब साहित्य के साध्य का केंद्र बिंदु बन जाएगा , तब ही मानवीय व्यवहार की सकारात्मक एवं सार्थक प्रस्तुतियां , समाज को सतोगुणी रूप से सक्षम बनाने में समर्थ सिद्ध हो सकेंगी ।

                जीवन में साधक , साधन और साध्य की पवित्रता जितनी अछुण्य है उतना ही अध्ययन और आनंद के पावन – प्रसंगों का अवबोध होना आवश्यक है जो उत्कृष्ट समाज के निर्माण का द्योतक भी है जिसकी जीवित , जीवंतता को श्रीमान सफदर हाशमी साहब ने अपनी रचना में उल्लेखित किया है – “ किताबें कुछ कहना चाहती हैं , किताबें करती हैं  बातें , बीते जमानों की , दुनिया की , इंसानों की , आज की , कल की , एक – एक पल की , खुशियों की , गमों की , फूलों की , बमों की , जीत की , हार की , प्यार की , मार की , क्या तुम नहीं सुनोगे , इन किताबों की बातें ? किताबें कुछ कहना चाहती हैं , तुम्हारे पास रहना चाहती हैं , किताबों में चिड़ियां चहचहाती हैं , किताबों में खेतियां लहलहाती हैं , किताबों में झरने गुनगुनाते हैं , परियों के किस्से सुनाते हैं , किताबों में रॉकेट का राज है , किताबों में साइंस की आवाज है , किताबों का कितना बड़ा संसार है , किताबों में ज्ञान की भरमार है , क्या तुम – इस संसार में नहीं जाना चाहोगे  ?  किताबें कुछ कहना चाहती हैं , तुम्हारे पास रहना चाहती हैं । ”

सामाजिक परिदृश्य का वास्तविक दर्पण है साहित्य :

           सृजन के आरंभिक काल का मूल्यांकन आज भले ही अतीत की स्मृतियों को जागृत करने की स्थिति तक ही सीमित दिखाई देता हो लेकिन सच्चाई का मुखरित स्वरूप मानवीय समाज को झंकृत करने के लिए स्वयं में पर्याप्त है । किसी भी व्यवस्था का बाल्यकाल सतोगुणी स्वरूप में रहता है लेकिन विस्तार का समायोजन धीरे – धीरे स्थितियों के परिवर्तित होते स्वरूप को रजोगुणी और अंततः तमोगुणी अवस्था में लाकर खड़ा कर देता है । सामाजिक परिवर्तन के ताने – बाने में स्वयं को खरा सिद्ध करने की होड़ , मानव समाज के लिए आज सबसे बड़ा मुद्दा बनकर जरूर उभरा है लेकिन अपने अस्तित्व की रक्षा करने के तरीके दिन पर दिन इतने दूषित होते जा रहे हैं कि – ‘ इंसान को इंसान समझ पाना …’  मुश्किल प्रतीत हो रहा है । सामाजिक परिदृश्य का वास्तविक दर्पण होता है – ‘ साहित्य ’ इस सच्चाई को जानने के बावजूद भी सामाजिक वर्जनाओं की निरंतर प्रस्तुतियां समाज के सम्मुख विशिष्ट कावायदों के साथ परोसने का प्रचलन – “ जो हो रहा है , वही बताने का प्रयास है  ” यह अभिव्यक्ति , निज धर्म के कर्तव्य की इति श्री ! का पर्याय बन जाए तो कुछ कहना और समझना शेष नहीं रह जाता है ।

मानव जीवन की अभिलाषा का उच्चतम पैमाना :

                हम क्या थे ? और क्या होना चाहिए ? के प्रति  संवेदनशील साहित्य और उसका सृजनात्मक स्वरुप निश्चित ही समाज को एक नई दिशा दे सकता है जिसमें वर्तमान की बर्बरता और शोषक , शोषण और शोषित को पोषित करने की स्थितियों के उभयपक्षीय परिदृश्य के लिए कोई भी स्थान नहीं होता है । मानव जीवन की अभिलाषा से संबंधित गीत एवं संगीत ,उच्चतम पैमाने पर स्थित हो जाए और वह मोक्ष के इर्द – गिर्द स्वयं को स्थापित करने के सकारात्मक प्रयास करता रहे इसकी प्रबल संभावनाएं इस बात का संकेत देती हैं कि –               “ इंसानियत के पैगाम जेहन में इस कदर समा चुके हैं कि उनकी रचनाधर्मिता से संबद्ध सृजनात्मकता का अछुण्य स्वरूप …” किसी न किसी रूप में संसार में विद्यमान रहता ही है। समाज में ऐसे कौन से सतोप्रधान स्वरूप में पवित्र कारक हैं जो जीवन के उत्कर्ष एवं उन्नयन के लिए निरंतर रूप से प्रेरणा प्रदान करते रहते हैं और मानव जाति उनका अनुकरण और अनुसरण करते हुए जाने – अनजाने अति महत्वपूर्ण अपने प्रयासों को प्रभावशाली गति देने में समर्पित भाव एवं विचार के साथ संलग्न हो जाया करती है । ज्ञान के स्रोत और उसका उत्सर्जन किन्हीं एकांगी स्वरूपों में विद्यमान नहीं होता है बल्कि इसकी अनेकानेक विधाएं विभिन्न स्थितियों के माध्यम से अपनी प्रेरणादाई कहानी सदा ही अभिव्यक्त किया करती हैं ।

सतोगुणी स्वरूप में सामाजिक सक्षमता का सामर्थ्य :

          स्वयं के लिए हम कितना और कहां तक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं ? इसका अंदाजा केवल अनुभव के माध्यम से ही लगाया जा सकता है क्योंकि इसके मूल्यांकन हेतु संसाधनों का उपयोग और उसकी उपयोगिता के आधारभूत बिंदु की खोज मनुष्य के लिए आदिकाल से ही चिंतन का विषय रहा है । ज्ञान और सूचनाओं के मध्य अंतराल स्थापित करने वाला मानव समाज अपनी समझ के विकसित स्वरूप को जानने के लिए जीवन की अनुभूतियों को आधार तो बनाता है लेकिन इसे – ‘ सत्य की कसौटी पर खरा उतारने के लिए स्वयं को साहित्य के दर्पण में देखने की कवायद …’ नहीं करता है । ज्ञान को बोध का विषय बनाने का प्रयास और उसे समाज की व्यावहारिक स्थितियों के मध्य उपस्थित कर देने की तमन्नायें जब साहित्य के साध्य का केंद्र बिंदु बन जाएगा तब ही मानवीय व्यवहार की सकारात्मक एवं सार्थक प्रस्तुतियां , समाज को सतोगुणी रूप से सक्षम बनाने में समर्थ सिद्ध हो सकेंगी । आज सूचनाओं के दृश्य और श्रब्य माध्यम का मानव मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा है जिससे पठन – पाठन की सामान्य प्रक्रिया को गहरा आघात पहुंचा है जिसके परिणाम स्वरूप अध्ययन के संदर्भों को अब जीवन के आश्चर्यजनक प्रसंगों से जोड़कर देखा जाने लगा है ।

अध्ययन के आनंदित पावन प्रसंग का अवबोध :

                मानव जीवन में साधक , साधन और साध्य की पवित्रता जितनी अछुण्य है उतना ही अध्ययन और आनंद के पावन – प्रसंगों का अवबोध होना आवश्यक है जो उत्कृष्ट समाज के निर्माण का द्योतक भी है जिसकी जीवित , जीवंतता को श्रीमान सफदर हाशमी साहब ने अपनी रचना में उल्लेखित किया है – “ किताबें कुछ कहना चाहती हैं , किताबें करती हैं बातें , बीते जमानों की , दुनिया की , इंसानों की , आज की , कल की , एक – एक पल की , खुशियों की , गमों की , फूलों की , बमों की , जीत की , हार की , प्यार की , मार की , क्या तुम नहीं सुनोगे , इन किताबों की बातें ? किताबें कुछ कहना चाहती हैं , तुम्हारे पास रहना चाहती हैं , किताबों में चिड़ियां चहचहाती हैं , किताबों में खेतियां लहलहाती हैं , किताबों में झरने गुनगुनाते हैं , परियों के किस्से सुनाते हैं , किताबों में रॉकेट का राज है , किताबों में साइंस की आवाज है , किताबों का कितना बड़ा संसार है , किताबों में ज्ञान की भरमार है , क्या तुम – इस संसार में नहीं जाना चाहोगे ? किताबें कुछ कहना चाहती हैं , तुम्हारे पास रहना चाहती हैं । ” सामाजिक यथार्थ और उससे जुड़े हुए पहलू कई बार इस बात की पहल किया करते हैं कि वास्तविकता को सामने रखते हुए समाधान की स्थितियां – ‘ साहित्य के माध्यम से उजागर हों … ’ जो कल्याणकारी समाज की संरचना करने में पूर्ण रूपेण सफल हो सकें ।

समृद्ध साहित्य में सृजनात्मकता की सशक्त बानगी :

          साहित्य केवल जीवन की विडंबनाओं और छद्म लालसाओं का स्वरूप तथा परिस्थितिजन्य , अभिव्यंजनाओं से सराबोर इतिहास की झलक को उकेरने का माध्यम नहीं है बल्कि – ‘ पुण्यों की पहल को मानव समाज द्वारा आत्मसात कर व्यवहारिक धरातल पर कुछ कर गुजरने हेतु सतत अभिप्रेरणा…’ का पर्याय है । साहित्य की समृद्धता और सृजनात्मकता अपनी सशक्त बानगी को जब विहंगम परिदृश्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत – श्रेष्ठ पंथ , पवित्र ग्रंथ और महान संत , परंपरा के सानिध्य में ऋषि – मुनियों द्वारा धर्म ग्रंथों के सृजनात्मक स्वरुप द्वारा – वेदों , पुराणों एवं उपनिषदों के रूप में संपन्न होता है और – रामायण , महाभारत , गीता , बाईबल और कुरान के साथ ही भारतीय सभ्यता , संस्कृति तथा राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना हेतु – ऐतिहासिक , भौगोलिक , सामाजिक , शैक्षणिक , आर्थिक , प्राकृतिक , ज्योतिषीय , मनोवैज्ञानिक , दार्शनिक , धार्मिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में अनेकानेक महान कृतियों के विविध , विराट स्वरूप में संजोकर समाज के  समग्र उत्कर्ष हेतु संपूर्ण समर्पित भाव के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं तब मानव समाज न केवल गौरवान्वित होता है बल्कि धन्यता से भरपूर भी हो जाता है । इस बात में कोई दो मत नहीं है कि कोई भी साहित्य विभिन्न सामाजिक सरोकारों को – ‘ देश , काल एवं परिस्थितियों अनुसार … ’ अत्यंत ही गूढता से युक्त यथार्थ को प्रस्तुत करते हैं जिसमें परिवर्तन और परिवर्धन की पर्याप्त गुंजाइश सदा ही हुआ करती है ।

सकारात्मक दृष्टि एवं सार्थक दृष्टिकोण की प्रासंगिकता :

               मानव समाज जिसके मध्य आदान – प्रदान की क्रियाएं अपनी गतिशीलता से चलती रहती हैं जिनमें मान्यताओं एवं परंपराओं का प्रचलन किन्हीं रूढ़िवादिता का पर्याय नहीं होता है तथा इस बात को अधिक महत्व दिया जाता है कि – “ संपूर्ण मानव जाति को व्यक्तिगत रूप से आज अपनी दृष्टि को सकारात्मक एवं दृष्टिकोण को व्यावहारिक स्वरूप में सार्थक … ” बनाने की आवश्यकता है । जिस समाज में यह मान्यता अपने बलवती स्वरूप में स्थापित हो जाती है और जिसमें यह सत्य समाहित रहता है कि – ‘ व्यक्तिगत स्तर पर निजी दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम पाप है … ’ तथा समतायुक्त व्यवहार तथा उसका प्रचलित स्वरूप जब यह अभिव्यक्त करने में सक्षम हो जाता है कि – ‘ मानवीय दृष्टिकोण की सर्व के प्रति समभाव से भरपूर समता ही सच्चे अर्थों में पुण्य है … ’ उस वास्तविक समाज में साहित्य के प्रति एक विशिष्ट प्रकार की आत्मीयता नैसर्गिक रूप से विकसित हो जाती है ।

मूल्यपरक साहित्य की सर्जना का सृजनात्मक समाधान :

                    साहित्य के सरोकार आज मानव को अपने केंद्र में रखने की तमाम कोशिशें करने में संलग्न हैं  किंतु प्रयास , अनुभूति और प्रेरणाओं के अंतराल को पूरी तरह से पाट , पाना आज भी साहित्य जगत के लिए चुनौती बना हुआ है । जहां तक मूल्यपरक साहित्य की सर्जना का प्रश्न है ? इसकी रचनात्मकता पर सर्वाधिक प्रश्नचिन्ह समाज ने लगाए हैं ? क्योंकि “ मूल्यों को समाज में स्थापित करने की सबसे बड़ी नैतिकता से ओत – प्रोत दायित्व के सानिध्य में जिम्मेदारी एवं जवाबदेही साहित्य … ” की ही थी । एक प्रश्न और जिसमें सामाजिक विघटन तथा अजीबोगरीब रिश्तों की बुनियाद का फलता – फूलता स्वरूप किन्हीं विश्वमयकारी स्थितियों का द्योतक बन जाता है जो इस प्रश्न को बार – बार उठाता है कि – आखिर किन कारणों से मानव समाज की वृत्ति , प्रवृत्ति एवं मनोवृति ? साधारण सोच से व्यर्थ सोच की ओर बढ़ते हुए कुछ समयावधि के पश्चात धीरे – धीरे नकारात्मक प्रवृत्तियों का गुलाम बन जाया करती है ? मानव जाति को इस भयावह पीड़ा से बाहर निकालते हुए – आत्मिक स्वतंत्रता के मार्ग को प्रशस्त करने का महत्वपूर्ण कार्य – “ मूल्यपरक साहित्य की निरंतर सर्जना के सृजनात्मक समाधान … ” में पूरी तरह से समाहित है ।

 

संकल्पित आत्मबल  से अंतःकरण द्वारा जीवन परिवर्तन :

              मानव समाज में सकारात्मक प्रवृत्तियों के विकसित स्वरूप को स्थापित करने हेतु कितनी गहराई से पड़ताल की आवश्यकता आज प्रतीत हो रही है यह यक्ष प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है ? क्योंकि नैतिक होने की मुश्किलें दिन – प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं । अंततोगत्वा साहित्य समाज को यह अभिव्यक्त करने में गौरवान्वित महसूस करता है कि – “ अनैतिक होने से अधिक उपयुक्त जीवन का पवित्र स्वरूप में नैतिक होना है … ” क्योंकि सामाजिक मनोदशाएं स्वयं को यह बात समझाने में जब सक्षम होंगी तो निश्चित ही साहित्य की उपयोगिता समाज के उत्कर्ष का आधारभूत कारण बन जाएगी । दृढ़ संकल्पों से ओत – प्रोत अंतःकरण जब स्व परिवर्तन की बागडोर , आत्मगत स्वरूप में स्वयं को नैतिक जिम्मेदारी के साथ सौंप देता है तब – “ साहित्य के दर्पण में मुखड़ा देखने की कवायद कभी भी निष्फल नहीं होती है जिसकी परिणति परिष्कृत मनोदशा के स्वरूप … ” में विहंगम यथार्थवादी चिंतनशील परिदृश्य के माध्यम से सृजनात्मक मानवता को मानवतावादी विचारधारा के द्वारा सहज ही प्राप्त हो जाती है ।

डॉ. अजय शुक्ला ( व्यवहार वैज्ञानिक )
अंतरराष्ट्रीय ध्यान एवं मानवतावादी चिंतक
मनोविज्ञान सलाहकार प्रमुख – विश्व हिंदी महासभा
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष – अखिल भारतीय हिंदी महासभा , नई दिल्ली