
प्रेम
छुई -मुई सी होती है पत्तियां
कभी छू के देखी नहीं
डर था कहीं प्रेम की प्रीत
बंद न हो जाए पत्तियों सी ।
घर -आँगन में बिखेरे दानों को
चुगती है चिड़ियाएँ
चाहता हूँ आहट न हो जाए
खनक चूड़ियों की
कर देती उनको फुर्र।
प्रेम की तहों में
ढूँढता हूँ यादों की कशिश
डर है मुझे किताब में
रखे गुलाब की सूखी पंखुड़ियों का
कही टूट कर बिखर न जाए।





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