संस्कृति किसी भी राष्ट्र की आधारशिला होती है। राष्ट्र रूपी वृक्ष का निर्माण संस्कृति रूपी बीज के प्रस्फुटन से ही होता है। राष्ट्र के भीतर समाहित समाज,परिवार और व्यक्ति के मूल में संस्कृति होती है जो उन्हें सच्चे अर्थों में उचित भूमिकाएँ निर्वहन करने का मार्ग प्रशस्त करती है। अपने देश की संस्कृति को भावी पीढ़ियों के समक्ष प्रस्तुत करना ही नहीं वरन् उनको हृदय में आत्मसात करवाने का कार्य सच्चे अर्थों में एक श्रेष्ठ साहित्यकार ही अपनी कृति के माध्यम से कर सकता है। मैथिलीशरण गुप्त कृत ‘साकेत‘ की गणना भी श्रेष्ठता की कोटि में करनी चाहिए क्योकि इसमें भी गुप्त भारतीय संस्कृति के प्रत्येक आयामों को बहुत ही आत्मीय ढंग से प्रस्तुत किया है।

            ‘साकेत‘ में भारतीय संस्कृति के आयामों के दर्शन से पूर्व संस्कृति व भारतीय संस्कृति के स्वरूप पर विचार करना समीचीन प्रतीत होता है। ‘संस्कृति’ शब्द के मूल में संस्कृत व सुसंस्कारों को कुछ विद्वान स्वीकार करते है। वास्तव में संस्कृति शब्द की उत्पत्ति ‘कृ’ (करना) धातु में ‘सम्’ उपसर्ग और ‘क्तिन’ प्रत्यय जोड़कर ‘सुट्’ के आगम से होती है, जिसका अर्थ है परिष्करण, परिमार्जन अथवा अलंकृत करना। ‘हिंदी शब्द सागर’ में संस्कृति का एक अर्थ ‘सभ्यता’ भी दिया गया है। वहाँ इसके अन्य अर्थ हैं – शुद्धि, सफाई, संस्कार, सुधार, मानसिक विकास, सजावट आदि। संस्कृति शब्द अंग्रेजी के ‘कल्चर’ शब्द का हिंदी पर्याय है जिसकी उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘कोलर’ से मानी जाती है जिसका अर्थ पूजा करना है। छांदोग्योपनिषद् संस्कृति को समाज के मानवतावादी चेतना के रूप में देखने का पक्षधर है। डॉ. राधाकृष्णनन संस्कृति के संबंध में कहते है, “जीवन की विभिन्न और घनिष्ठ समस्याओं पर हुआ चितंन और उसकी अभिव्यक्ति ही संस्कृति है।”(1)  संस्कृति को मानव जीवन का भूत, वर्तमान और भविष्य घोषित करते हुए वासुदेवशरण अग्रवाल का कथन हैं- “संस्कृति मनुष्य के भूत, वर्तमान और भावी जीवन का सर्वांगपूर्ण प्रकार है। हमारे जीवन का ढंग हमारी संस्कृति है। जीवन के नानाविध रूपों का समुदाय ही संस्कृति है।” (2)  डॉ. नगेन्द्र का संस्कृति के संबंध में विचार है – “सामयिक जीवन की आंतरिक मूल प्रवृत्तियों का सम्मिलित रूप ही संस्कृति है। संस्कृति को प्राप्त करने के लिए जीवन के अंतस्थल में प्रवेश करना पड़ता है।”(3)

रामधारी सिंह दिनकर भी संस्कृति को ऐसा गुण मानते है जो मानव के भीतर इस प्रकार व्याप्त है जैसे पुष्प में सुंगध व दूध में मक्खन। पाश्चात्य विद्वान ई.वी.टाइलर के अनुसार “संस्कृति ज्ञान, विश्वास, कलाकृति, नैतिक नियम, आचार, व्यवहार तथा मनुष्य की उपलब्धियों को व्यक्त करने वाला शब्द है।”(4)

            उपर्युक्त वर्णित परिभाषाओं को समग्र रूप में देखे तो कह सकते है कि संस्कृति मानव जीवन के मूल में शामिल है, संस्कृति आचार-विचार, व्यवहार व उपलब्धियों की व्याख्याता तथा समस्या की समाधानकर्त्ता है।

            ‘भारतीय संस्कृति’ में संस्कृति की वह सभी विशेषताएँ शामिल हैं जो एक संस्कृति को महान बनाती हैं। इतिहास साक्षी रहा है कि भारत में अनेक संस्कृतियों के आक्रमण हुए परंतु भारतीय संस्कृति कही भी क्षीण नहीं हुई अपितु इसने अपने भीतर सभी संस्कृतियों को विलीन कर लिया। संस्कृति के बाहरी आवरण में खान-पान, आचार-विचार, वेश-भूषा व कला-कौशल आदि का समावेश होता है परंतु संस्कृति के अंतःस्थ में सत्य, शिव और सुदंरता की भावना का समावेशन होता है। इसका परिणाम यह है कि वर्तमान में भी भारतीय संस्कृति का रूप विराट है, जो विभिन्नता में एकता का परिचायक है।

            मैथिलीशरण गुप्त भी भारतीय संस्कृति के वाहक कवि थे। गुप्त की सभी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की झलक सरलतापूर्वक देखी जा सकती है। ‘साकेत’ में भी भारतीय संस्कृति के प्रत्येक पहलू को बोधगम्यता से आत्मसात किया जा सकता है। ‘साकेत’ जीवन, धर्म, समाज, परिवार, नीति व राजनीति आदि सभी सांस्कृतिक आयामों पर खरी उतरती है। मैथिलीशरण गुप्त व उनकी साकेत तथा भारतीय संस्कृति पर सम्यक् टिप्पणी करते हुए डॉ. नगेन्द्र कहते है -“भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृति है और कदाचित सबसे पूर्ण! गुप्त जी राष्ट्रीय कवि हैं -उनमें भारतीयता ओत-प्रोत है! राष्ट्रीयता में भी उनका क्षेत्र है-संस्कृति! वे भारतीय संस्कृति के कवि है। यह उनका सबसे बड़ा गौरव और यही उनकी प्रमुख विशेषता है।” (5)

            साकेत रामकथा का एक हिस्सा है और रामकथा तो ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता है।‘ साकेत एक प्रबंध काव्य है जिसमें रामकथा वर्णित है परंतु इसमें नवीनता यह है कि इस कथा के केंद्र में उर्मिला है। उर्मिला के चारों तरफ भारतीय संस्कृति की छटा गुप्त जी ने बिखेरी है।

            व्यक्ति ही परिवार या समाज का आधार होता है तो वहीं दूसरी तरफ परिवार या समाज ही व्यक्ति का पालन-पोषण करते हैं। अतः व्यक्ति और परिवार या समाज के बीच अन्योनयाश्रित संबंध है। ‘साकेत‘ में व्यक्त संस्कृति के दर्शन प्रत्येक चरित्र में होते है। भारतीय संस्कृति की विभूति है त्याग। यह त्याग वैराग्यमय या क्रोध में नहीं अपितु शील, सौंदर्य व कल्याण की भावना से युक्त होता है। यह भावना लगभग साकेत के प्रत्येक पात्र में दर्शनीय है। भारतीय संस्कृति के मूल तत्व आत्मसमर्पण, स्वीकृति, उपकार की भावना आदि का चित्र गुप्त ने बड़ी भावुकता से प्रस्तुत किया है –

“निश्चिन्त नारियाँ आत्मसमर्पण करके,

स्वीकृति में ही कृतकृत्य भाव है नर के।

गौरव क्या है, जन-भार वहन करना ही,

सुख क्या है, बढ़ कर दुःख सहन करना ही।” (6)

साकेत सांस्कृतिक आदर्शों से परिपूर्ण है। भारतीय संस्कृति अपने कर्त्तव्यों के सम्मुख धन का मोह नहीं करती। इन सांस्कृतिक आदर्शों की स्थापना हेतु साकेत की रचना हुई मैथिलीशरण गुप्त स्वयं इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहते हैं-

“मैं आर्यों का आदर्श बताने आया,

जन-सम्मुख धन को तुच्छ जताने आया।” (7)

आठवें सर्ग में सीता-राम, राम-रावण एवं राम-जाबालि का संवाद भी त्याग, प्रेम और सर्म्पण की ओर संकेत करता है। त्याग का साधन है-कर्म। भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा गौरव है कर्मशीलता, गुप्त के शब्दों में-

“माना, आर्यों सभी भाग्य का भोग है,

किंतु भाग्य भी पूर्व कर्म का योग है।” (8)

दुःखों पर विजय प्राप्ति कर सुख भोगना हमारी संस्कृति नहीं अपितु सुखार्जन के पश्चात उसे त्यागने में हमारी चरम परिणति है। इसी से नर को ईश्वरता प्राप्त होती है और यह भूतल स्वर्ग बनता है।

भारतीय संस्कृति की जड़ धर्म में व्याप्त है। पुरूषार्थ चतुष्टय में भी पहला चरण धर्म ही है। धर्म ही संस्कृति का मूल है। साकेत भी धर्म की स्थापना करता है। भारत में विभिन्न संस्कृतियों के आगमन से व राजनीतिक उठा-पटक के कारण भारतीय संस्कृति की धारा क्षीण अवश्य हुई परंतु समाप्त कभी नहीं। भारतीय संस्कृति का आधार वेद है। गुप्त जी साकेत के माध्यम से वेदों की वाणी को सदैव उच्चरित करना चाहते है “उच्चरित होती चले वेद की वाणी, गूंजे गिरि- कानन सिंधु पार कल्याणी।” भारतीय संस्कृति के पूजा, व्रत-उपवास, जप-तप व त्यौहार आदि आधार स्तंभ है। साकेत में उर्मिला की माता अपनी पुत्रियों को विवाह के समय गौरी पूजन के लिए भेजती हैं, व्रत-उपवास के नियम समझाती हैं। शत्रुघ्न भी राम की खर-दूषण विजय का वर्णन करते हुए कहते है कि शत्रुओं के विनाश के कारण बिना बाधा के यज्ञ हो रहे हैं, ऋषि कन्याएँ भक्ति गीत गा रही हैं और पर्वोत्सव के ठाठ हैं-

“होते हैं निर्विघ्न यज्ञ अब, जप समाधि तप पूजा पाठ,

यश गाती हैं मुनि कन्याएं, कर व्रत पर्वोत्सव के ठाठ।” (9)

हमारी संस्कृति सदैव धर्म को सर्वोपरि मानती है। राम भी कहते हैं कि मैं अपने धर्म का पालन करूगाँ, धर्म के सम्मुख धन का कोई महत्व नहीं ‘प्राप्त परम गौरव छोडूँ? धर्म बेचकर धन जोडूँ?’ (10) आगे गुप्त जी राम के माध्यम से कहते है-

“अबल तुम्हारा राम नहीं, विधि भी उस पर वाम नहीं।

वृथा क्षोभ का काम नहीं, धर्म बड़ा धन-धाम नहीं।।” (11)

            समाज और परिवार के केंद्र में व्यक्ति होता है। परिवार और समाज दोनों एक -दूसरे के पूरक हैं। परिवार व समाज से ही व्यक्ति संस्कृति को अपने भीतर संजोता है व पुनः वही संस्कृति भावी पीढ़ी को विरासत स्वरूप प्रदान करता है। साकेत में भी गुप्त ने भारतीय समाज की संस्कृति के प्रत्येक आयाम को प्रस्तुत किया है। वे सदैव सामाजिक जीवन में मर्यादा को अनिवार्य मानते हैं -‘निज मर्यादा में किंतु सदैव रहे वे!’ भारत की सामाजिक संस्कृति की विशेषता यह है कि वह केवल अपना ही नहीं दूसरे के हितों का भी ध्यान रखती है।

            भारतीय संस्कृति में परिवार को महत्वपूर्ण इकाई माना गया है। पुत्र सदा पिता को ईश्वर तुल्य मानता है व उनकी आज्ञा सर्वोपरि होती है। गुप्त जी के शब्दों में-

“मां मुझको फिर देख सके जैसे सही,

पितः,पुत्र की प्रथम याचना यही।” (12)

            मध्यकालीन समाज में भले ही भारतीय संस्कृति में कुरीतियों को समावेश हो गया था परंतु ये तो केवल सूर्य को अल्प समय के लिए बादलों द्वारा आच्छादित करने जैसा था। भारतीय संस्कृति नारी को पुरूष के बराबर का अधिकार अर्धांगिनी रूप में देता है। पुरूष का जीवन स्त्री के अभाव में असफल माना जाता है। प्रेमचंद का कथन यहाँ उल्लेखनीय है ‘बिन घरनी घर भूत का डेरा।’ वही गुप्त के अनुसार –

“मातृ-सिद्धि पितृ-सत्य सभी,

मुझ अर्द्धाग्निी बिना अभी।

हैं अर्द्धांग अधूरे ही,

सिद्ध करो तो पूरे ही॥” (13)

हमारी आर्य संस्कृति प्रारंभ से ही नारी को पूज्नीय मानती है। वह नारी का सम्मान करती है न कि उन्हें प्रताड़ित करती है। आर्य संस्कृति के अनुसार अबला का अपमान सभी बलवानों का अपमान है। भरत, शत्रुघ्न सीता की रक्षा के लिए युद्ध में तत्पर होते है व कहते हैं-

“क्या हम सब मर गए हाय! जो तुम जाती हो,

या हमको तुम आज दीन-दुर्बल पाती हो।

ग्   ग्  ग्

मारेंगे देवी नहीं तो मर जावेंगे,

अपनी लक्ष्मी लिए बिना क्या घर आवेंगे?” (14)

भारतीय संस्कृति में वही नारी देवी स्वरूप स्वीकार्य है जो पत्नी धर्म का वहन करें और वह पुरूष देव है जो अपनी पत्नी की सदैव रक्षा करे। उर्मिला भी लक्ष्मण के वनगमन पर लक्ष्मण को याद करते हुए कहती है-

“बनाती रसोई, सभी को खिलाती,

इसी काज में आज मैं  तृप्ति पाती।

रहा किंतु मेरे लिए एक रोना,

खिलाऊँ किसे मैं अलौना-सलौना?” (15)

‘रामचरितमानस’ की भाँति ‘साकेत’ भी परिवार में माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-भाई व सेव्य-सेवक का सांस्कृतिक रूप बहुत ही गरिमामय ढंग से प्रस्तुत करता है।

भारतीय संस्कृति में नीति का विशेष स्थान है। हिंदी साहित्य में भक्तिकाल व रीतिकाल में बहुतेरे ग्रंथ नीति के दृष्टांतों से परिपूर्ण है। ‘साकेत‘ में गुप्त ने भी भारतीय संस्कृति के आधार पर नीतियों का बखान किया है। संसार में कोई भी मनुष्य स्थाई नहीं है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। कबीर इस सच्चाई को कुछ इस तरह प्रस्तुत करते है-

“माली आवत देखि कै, कलिया करै पुकार।

फूलि-फूलि चुनी लई, कालहि हमार बार।।“

अब, मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में देखिए –

“पास-पास ये उभय वृक्ष देखो,अहा!

फूल रहा है एक,दूसरा झड़ रहा।

है ऐसी ही दशा प्रिये नर लोक की,

कही हर्ष की बात कही पर शोक की॥” (16)

मानव की सहज प्रवृत्तियों का नीति रूप में वर्णन करते हुए गुप्त कहते है –

“मानव मन दुर्बल और सहज चचंल है,

इस जगती-तल में लोभ अतीव प्रबल है!

वत्व कठिन, दनुजत्व सुलभ है नर को,

नीचे से उठना सहज कहाँ ऊपर को?” (17)

भारतीय संस्कृति में नीति यह कहती है कि कोई कितना भी बलवान या धनी हो यदि वह अन्याय के पक्ष में खड़ा है तो उसका सर्वनाश शीघ्र ही निश्चित है –

“नाथ, बली हो कोई कितना, यदि उसके भीतर है पाप,

तो गजभुक्तक पित्थ -तुल्य वह निष्फल होगा अपने आप॥” (18)

भारतीय संस्कृति सदैव रक्षक को सर्वोपरि मानती है व धर्म का दामन कभी न त्याग करने का ज्ञान प्रदान करती है। साकेत में गुप्त ने राम के माध्यम से वर्णित किया है –

“धैर्य न छोड़ें आप, शांत हो, भक्षक से रक्षक बलवान,

उन्हें देख ‘हा लक्ष्मण!’ कहकर सजल हुए प्रभु जलद-समान।” (19)

भारतीय संस्कृति राजनैतिक आदर्शों को भी प्रस्तुत करती है। राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण स्थान राजा का होता है। यदि राजा संबल और समर्थ है तो संपूर्ण राज्य एक सूत्र में बंधा रहता है, इसके अभाव में राज्य बिखर जाता है। ‘दोहावली‘ में तुलसी ने राजा का आदर्श रूप प्रस्तुत करते हुए कहा है कि राजा को मुख के समान होना चाहिए और उसे विवेक सहित अपनी प्रजा का पालन- पोषण करना चाहिए।

“मुखिया मुखु सो चाहिए, खान-पान कहुँ एक।

पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥” (20)

साकेत में राजनीतिक-सांस्कृतिक तत्वों को विश्लेषित करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने कहा है- “साकेत में वैसे तो साम्यवाद,लोकतंत्र,आदि विभिन्न विचार धाराओं का व्याख्यान भी बड़ा स्पष्ट मिलेगा परंतु कवि ने भारतीय संस्कृति के अनुरूप राजतंत्र में ही आस्था प्रकट की है और उसी का प्रतिपादन किया है। हमारी संस्कृति में राजा का बड़ा गौरव है। परंतु राजा की परिभाषा भी असाधारण है। राजा स्वेच्छाचारी एवं अधिकार दृप्त नहीं हो सकता। उसके लिए बल-वैभव  अथवा राजनैतिक प्रतिभा पर्याप्त नहीं है -उसकी सबसे बड़ी विशेषता है लोक- सेवा की भावना।” (21)

लोक सेवा की भावना से पूरित संस्कृति को प्रस्तुत करते हुए मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं कि राज्य राजा की सपंदा नहीं अपितु वह प्रजा का धन है-

“बड़े के लिए बड़ा ही दण्ड!

प्रजा की थाती रहे अखण्ड।।” (22)

भारतीय संस्कृति अत्यंत विराट,विशाल व महान है। यह संस्कृति सूर्य, चंद्र, पत्थर, पर्वत, भूमि व वृक्ष आदि सभी को अपना ईश्वर व सहचर स्वीकार करती है। युद्ध के समय अपनी संस्कृति का उत्तम बखान अत्यंत मनमोहक, सजीव व ऊर्जावान है-

“विंध्य-हिमालय-भाल,भला! झुक जाय न धीरो,

चन्द्र-सूर्य -कुल-कीर्ति-कला रुक जाय न वीरो!

चढ़ कर उतर न जाय,सुनों कुल-मौक्तिक मानी,

गंगा-यमुना-सिंधु और सरयू का पानी।

बढ़ कर इसी प्रसिद्ध पुरातन पुण्यस्थल से,

किये दिग्विजय बार-बार तुमने निज बल से ।।“23

‘साकेत’ में वैसे तो गंगा, यमुना, सरयू, पर्वत, पहाड़ों का विभिन्न सर्गों में चित्रण है। साकेत के नवम् सर्ग में पचंवटी पर्वत का बहुकोणीय दृष्टि से वर्णन किया गया है जिसमें से एक उदाहरण देखिए –

“घिरकर तेरे चारों ओर,

करते है घन क्या ही घोर।

नाच नाच गाते है मोर,

उठती है गहरी गुजांर,

ओ गौरव-गिरि उच्च उदार!” (24)

            उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन व श्रेष्ठ संस्कृति है। यह संस्कृति त्याग, सम्पर्ण, बंधुत्व, सहयोग व सदाचरण का पाठ पढ़ाती है और मानव को मानव कहलाने का अधिकारी बनाती है। इस भौतिकतापूर्ण व स्वार्थधर्मी युग में भारतीय संस्कृति के बीज बिंदु ही समाज को स्थायी बनाए हुए है। भारतीय संस्कृति की कसौटी पर मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ शत प्रतिशत खरी उतरती है, जिसमें भारतीय संस्कृति के प्रत्येक आयामों को बड़ी सहजता, सरलता व भावमय धारा में सराबोर कर राम कथा के सहारे उर्मिला को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

संदर्भ-सूची

  1. freedom and culture – dr.radhakrishnan saravpali,page no. 24

2.साहित्य और संस्कृति- वासुदेवशरण अग्रवाल,भूमिका, पृ.5

3.साकेत: एक अध्ययन – नगेन्द्र, पृ. 79

  1. primitive culture –e.v.tilor,vol. 1,page no. 1

5.साकेत: एक अध्ययन – नगेन्द्र,पृ. 80

  1. साकेत – मैथिलीशरण गुप्त, अष्टम सर्ग

7.वही

8.वही

  1. वही,एकादश सर्ग

10.वही,चतुर्थ सर्ग

11.वही

12.वही, पचंम सर्ग

13.वही, चतुर्थ सर्ग

14.वही, द्वादश सर्ग

15.वही, नवम सर्ग

16वही, पचंम सर्ग

17.वही, अष्टम सर्ग

18.वही, एकादश सर्ग

19. वही

20.दोहावली- तुलसीदास, दोहा संख्या 522

21.साकेत: एक अध्ययन – नगेन्द्र, पृ. 93

22साकेत, द्वितीय सर्ग

23.वही, द्वादश सर्ग

24.वही, नवम सर्ग

 

कल्याण कुमार
शोधार्थी
हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय