इस पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य माना जाता है। प्रकृति की संरचना में स्त्री-पुरुष में भेद का भाव नहीं है। दोनों अपनी मूल संरचना में स्वतंत्र होते हुए एक-दूसरे के पूरक हैं और समान रूप से सहभागी भी। लेकिन मानव जैसे-जैसे विकास करते गया उसने एक शक्ति को बढ़ावा दिया और इसी प्रक्रिया में पुरुषवादी शक्ति(सत्ता) का उदय होता है तथा स्त्री को सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि स्तरों पर विभेदित कर दिया जाता है। प्रकृति की संरचना से पुरुषवादी छेड़छाड़ यहीं से आरम्भ होता है और मानव द्वारा निर्मित समाज व्यवस्था में स्त्री के सम्मान, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार जैसे प्राकृतिक अधिकारों पर अंकुश लग जाता है। यहीं से स्त्री को उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को पाने में पुरुषवादी समाज तमाम बाधाएँ उत्पन्न करना आरम्भ कर देता है।

                     शुरू करते हैं वैदिक कालीन संस्कृति से; वैदिक काल स्त्रियों के लिए कुछ अच्छा माना जाता है जहाँ मातृसत्ता के रूप में स्त्रियों को महत्ता प्राप्त थी। लेकिन ऋग्वेद में ही स्त्रियों पर नियंत्रण की बात कही गई है; “जहाँ एक ओर ‘जायेदस्तम्’(ऋग्वेद III.53.4) अर्थात् जाया ही घर है, ऐसा कहा गया है, वहीं ऋग्वेद के आठवें मण्डल में ‘स्त्रिया अशास्यम् मनः’(33.17) कहकर स्त्रियों के मन को अनियंत्रित बताया है।”[i] माता के तौर पर सामाजिक व धार्मिक अनुष्ठानों में ‘मातृ देवो भवः’[ii] का सम्मान प्राप्त था। वहीं सूत्रकालीन समाज में  ‘पतितः पिता परित्याज्यो माता तु पुत्रे न पतितः’(वसिष्ठ धर्मसूत्र:13/47)[iii] कहकर स्त्री को सामाजिक सम्मान एक हद तक दिया गया था। लेकिन यह तो समाज में उनका माता के रूप में स्थान है, जब बात आती है व्यक्तित्व की तो स्त्रियों को वैदिककालीन व्यवस्था ‘स्त्रिया अशास्यम् मनः’ कहकर उन्हें मित्रता के लिए अयोग्य घोषित कर देती है (‘न वै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सलावृकाणां  हृदयान्येताः’[iv]), तो वहीं उत्तरवैदिककालीन समाज उनके हृदय को भेड़ियों के समान घोषित करता है। आगे बढ़ते हुए समाज अर्थात् उपनिषद्काल और सूत्रकाल में स्त्रियों की स्थिति और ज्यादा सीमित कर दी जाती है लेकिन ‘मैत्रेयी और गार्गी’ जैसी विदुषियां निकलकर आती हैं जो स्त्री के मजबूत व्यक्तित्व की वकालत करती हैं। इसके बाद मनुवादी व्यवस्था में उन्हें सैद्धांतिक रूप से समाज में सम्मान का स्थान दिया जाता है (‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’[v] मनुस्मृति III.56) और उसकी विभिन्न अवस्थाओं में सुरक्षा की दृष्टि से पुरुष समाज के अधीन (‘मनुस्मृति’ में) कर दिया जाता है-

  ‘पिता रक्षति कौमारे भर्त्ता रक्षति यौवने।

 रक्षन्ति स्थविरे पुत्राः न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति॥’[vi]

            यहाँ मनुस्मृति का प्रथम उद्देश्य स्त्री सुरक्षा है। जीवन के अलग-अलग पड़ाव के दौरान स्त्री को जिस सहयोग और  सुरक्षा की जरूरत होती है मनुस्मृति की ये पंक्तियाँ उसी तरफ़ संकेत कर रही हैं। दरअसल भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है ऐसे में शक्ति और सुरक्षा के प्रतिनिधि पुरुष ही माने गए, यही कारण है कि यहाँ जीवन के अलग-अलग अवस्थाओं में स्त्री सुरक्षा का दायित्त्व पुरुषों को दिया गया है। ऋग्वेद से लेकर मनुस्मृति तक के तत्कालीन नियंताओं से जो गलती हुई वह यह कि स्त्री को ज्ञान और शक्ति का प्रतीक न तो माना गया और न ही बनाने के प्रयास किया गया। इसलिए वे हमेशा पुरुष व्यवस्था के अधीन रही हैं। आगे चलकर यही व्यवस्था कायम रही और मध्यकालीन समाज तक और उसके बाद भी बनी रही। इस प्रक्रिया में यह समाज मनोविज्ञान की सहजवृत्ति बन गई और भारतीय समाज की मानसिकता में रच बस गई।

यहाँ स्पष्ट है कि सुरक्षा की दृष्टि से स्त्रियों की स्वतंत्रता हड़पी जा रही है। तत्कालीन मनुवादी व्यवस्था और स्वातंत्र्योत्तर भारत के लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कुछ खास अंतर नहीं आया है, आज भी जब औरतों पर अत्याचार(शारीरिक एवं मानसिक) होता है तो स्त्रियों के स्वतंत्र विचरण और स्वतंत्र मानसिकता पर ही दोष मढ़ा जाता है। यह हमारे समाज की बहुत बड़ी विडम्बना है कि हमेशा शोषित को ही दोषी नज़रों के साथ देखा जाता है क्योंकि यह समाज व्यवस्था एक अधिनायकवादी शक्ति के द्वारा निर्मित है। खैर यह व्यवस्था आज बदलकर तथाकथित धर्म और संस्कृति के संरक्षण के नाम पर स्त्रियों को घर के चाहरदिवारियों में कैद करके रखना चाहती है, चाहे वो खाब पंचायतें हों या फिर यह समाज!

ऐसे समाज में स्त्रियों को तमाम सामाजिक बन्धनों और कुरीतियों में जकड़ दिया जाता है और उनका अस्तित्व लगभग नगण्य हो जाता है तथा शोषण का स्तर बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में स्त्री के स्वतन्त्र व्यक्तित्व का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन समय एक जैसा नहीं होता वह करवट जरुर बदलता है, आधुनिकता के आगमन के साथ स्त्री खुलकर अपने अधिकार और व्यक्तित्व के लिए उठ खड़ी होती है, उसके लिए अब इस पुरुष समाज में दबकर रहना सहज स्वीकार्य नहीं।

         ऐसा नहीं है कि स्त्रियों ने पुरुषवादी समाज से अपनी जंग जीत ली है, लड़ाई अभी भी बाकी है और यह तब तक जारी रहेगी जब तक कि वे पूरी तरह से अपने को पुरुष की अधीनस्थता से मुक्त नहीं कर लेती हैं। एक लोकतान्त्रिक समाज में हर किसी का अपना निजी व्यक्तित्त्व होता है जो कि अधीनता नहीं स्वीकार करता। आज के समाज ने उन्हें जो आज़ादी दी है उसमें भी इस पुरुषवादी समाज ने सेंध लगाने की कोशिश की है; यह समाज स्त्रियों को खुले आसमान में उड़ने की आज़ादी तो देता है लेकिन शर्त रख देता है कि पंख कटे होने चाहिए, उन्हें इस धरा पर कहीं भी घूमने की आज़ादी तो देता है लेकिन एक निश्चित दूरी की बेड़ियाँ उनके पैरों में डाल देता है जिससे अफनायी स्त्री कह उठती है-

‘जरा सी ताजी हवा पाने को

मैंने तोड़ दी दीवारें और छत’ (‘कठघरे में’ काव्य संग्रह से)  ~मणिका मोहिनी

                 हमारे समाज की व्यवस्था ऐसी है कि स्त्री को हमेशा से उसके सामाजिक और शारीरिक संरचना के आधार पर ही देखा गया है, उसने स्त्री को कभी भी एक व्यक्ति के तौर पर महत्ता नहीं दी है। समाज की रूढ़िगत व्यवस्था ने स्त्री की जो भूमिका तय कर दी है उसके बाहर स्त्री को देखने की कोशिश भी नहीं की जाती है। दरअसल जब बात व्यक्ति मात्र के अस्मिता की होती है तो वहाँ स्वतंत्रता अपने आप समाहित हो जाती है और उसके अस्तित्व को सहर्ष स्वीकार किया जाता है, इसीलिए पुरुष समाज स्त्री को व्यक्ति के तौर पर नहीं देखता क्योंकि इससे उसके अधीन रहने वाली स्त्री स्वतंत्र हो जाएगी। इसके पीछे दो मूल कारण हैं; एक-अशिक्षा और दूसरा-अर्थ की पराधीनता। जैसे ही स्त्री ने शिक्षा का अधिकार पाया खुद के अधिकारों के लिए लड़ाईयाँ लड़ी और अपने को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की तरफ कदम बढ़ा दिए। लेकिन पुरुष स्त्री के हाथ से अर्थ को छीनकर प्रत्यक्षतः आर्थिक रूप से सक्षम दिख रही स्त्री को अक्षम बनाकर उसकी आत्मनिर्भरता को अपने अधीन कर लेता है।

        स्त्री-विमर्श के तमाम आंदोलनों व स्वयं स्त्री के संघर्षों के फलस्वरूप आज स्त्री ने संवैधानिक तौर पर स्वतंत्रता और समानता का अधिकार पाते हुए व्यक्ति की अस्मिता की तरफ मजबूती से कदम बढ़ाए हैं। लेकिन कागजी अधिकारों को व्यावहारिक रूप देने में सामंतवादी व्यवस्था की जड़ें बाधा बन रही हैं, जहाँ इन अधिकारों को वह अपने हाथ में लेकर एक अंश ही स्त्री को देना चाहता है। लेकिन 21वीं सदी की स्त्री अब समझौता करना नहीं चाहती, वह ‘शैक्षिक और आर्थिक स्वतन्त्रता’ को अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्माण की राह में मूलभूत आवश्यकता मानती है, जो क्रांतिकारी कदमों से कहीं ज़्यादा जरूरी है। ममता कालिया इसे बहुत सुंदर तरीके से अभिव्यक्त करती हैं-

“जैसे-जैसे लड़की बड़ी होती है

उसके सामने दीवार खड़ी होती है

 क्रांतिकारी कहते हैं

दीवार तोड़ देनी चाहिए।

 पर लड़की है समझदार और संवेदनशील,

 वह दीवार पर लगाती है खूँटियाँ

 पढ़ाई लिखाई और रोज़गार की।

 और एक दिन

 धीरे से उन पर पाँव धरती

 दीवार की दूसरी तरफ़ पहुँच जाती है।”[vii]

  अभी हमारे समाज में जो पीढ़ी है, कम से कम उससे तो हम व्यक्ति की अस्मिता को पूर्णतः स्वीकार करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं; चाहे वे शिक्षित ही क्यों न हों, क्योंकि उनकी वर्षों पुरानी मानसिकता को नहीं बदला जा सकता है जो कि पुरुषसत्तात्मक समाज में गढ़ी गयी है। उदाहरण के तौर पर निर्भया कांड के वकील(दोषियों के) ए.पी.सिंह को हम रख सकते हैं जो कि उच्चतर शिक्षा पाने के बाद भी लड़कियों को सूरज ढलते ही घर की चाहरदिवारियों में कैद करना चाहते हैं और हॉनर किलिंग की वकालत करते हैं!

        आधुनिक युग में भी स्त्री को किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है इससे हम अंजान नहीं हैं। देश के कर्त्ता-धर्त्ताओं के स्त्री जाति पर रह-रहकर विवादित बयान आते रहते हैं जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था में प्राप्त स्त्री के सम्मान के साथ खिलवाड़ को स्पष्टतः उजागर करती हैं। हम अपनी सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों को कौन-सा स्थान, सम्मान, अधिकार और स्वतंत्रता देने की बात कर रहे हैं या देना भी चाहते हैं या नहीं? क्या इसके लिए हम और हमारा समाज मानसिक रूप से तैयार है? क्या हम स्त्रियों का मानसिक और शारीरिक शोषण ख़त्म करने को तैयार हैं? क्या उनके मस्तिष्क में बोए गए सामंतवादी मानसिकता के बीज को नष्ट करने को तैयार हैं? या फिर हम उसे व्यक्ति की स्वतंत्रता देने को तैयार हैं? ये सारे सवाल वर्तमान समाज में स्त्री के अस्तित्व से जुड़े हैं जिस पर सवालिया निशान हमारे समाज ने ही लगाए हैं।

              स्त्री को व्यक्ति के रूप में स्वीकृति नयी पीढ़ी ही दे सकती है, यह भी तब संभव है जब हम उस पीढ़ी के मानसिक विकास में पुरुषवादी बीज न पड़ने दें और स्त्री-पुरुष की समानता का बीज व्यक्ति मात्र के तौर पर पनपने दें! भारतीय साहित्य और समाज निर्मिति में ‘पंचतंत्र’ और दादा-दादी, नाना-नानी आदि की कहानियों की विशेष महत्ता है। ये कहानियाँ भावी पीढ़ी के नैतिक और सुदृढ़ चरित्र के निर्मिति में महीन भूमिकाएँ अदा करती हैं। जिससे भावी पीढ़ी स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका अदा कर सके। और वर्तमान समय में हमें भावी पीढ़ी की एक स्वस्थ और सकारात्मक मानसिकता के साथ परवरिश की जरूरत है जो आगे चलकर एक संतुलित और समन्वित समाज के निर्माण में महती भूमिका अदा करेगी।

     वास्तव में अब इसकी जरूरत है कि स्त्री को पूरकता के नजरिए से अलग हटकर उसे व्यक्ति के तौर पर सम्मान दें तभी हमारे समाज का वास्तविक विकास हो सकेगा और एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकेगा; क्योंकि आधी आबादी को नकार कर यह समाज आगे नहीं बढ़ सकता है।

 

संदर्भ ग्रंथ – 

[i] कुमार, डॉ.दीपक( 2011), भारतीय संस्कृति(प्रथम संस्करण), वाराणसी-221001, चौखम्भा सुरभराती प्रकाशन: 38 यू.ए. बंग्लो रोड, जवाहर नगर, पृष्ठ- 129

[ii]  वही, पृष्ठ-135

[iii]  वही, पृष्ठ-138-39

[iv]  वही, पृष्ठ-129-30

[v]  वही, पृष्ठ-142

[vi]  वही, पृष्ठ-143

[vii]http://www.argalaa.org/issue.phpissue=april2009&category=Shikhar&author=Mamta%20Kaliya

 

शैलेन्द्र कुमार सिंह
शोधार्थी (दिल्ली विश्वविद्यालय)