शोध सार

कृष्ण भक्ति की परंपरा प्राचीन काल से देखने को मिलती है। कृष्ण के चरित्र की प्रतिष्ठा में सर्वाधिक योगदान श्रीमद्भागवतपुराण का रहा है। इसमें कृष्ण के बहुमुखी प्रतिभा का दिग्दर्शन होता है। हिंदी साहित्य में कृष्ण भक्ति की परंपरा आदिकाल से लेकर आधुनिककाल तक सतत रूप में प्रदर्शित है। इनमें स्त्री की छवि अवस्था एवं काल के अनुसार विभिन्न रूप में दृष्टिगोचर होती है। जहाँ आदिकाल में विद्यापति ने कृष्ण के भावमय व रागात्मक स्वरूप को मैथिल भाषा के गीतों से संजोया है तो भक्तिकाल के अंतर्गत अष्टछाप के कवियों में विशेषतया सूरदास ने कृष्ण व गोपियों के माध्यम से स्त्री जीवन की मुखरता एवं स्वच्छंदता को अपने काव्य में प्रस्तुत किया है। सूर के उपरांत नंददास ने संयोग और वियोग श्रृंगार के माध्यम से स्त्रियों की कलात्मकता एवं मनःस्थिति के साथ-साथ कृष्ण भक्ति संबंधी मधुर व मर्मस्पर्शी गीतों का वर्णन किया है। इसके साथ ही इस काल में मीराबाई ने भी स्त्रियों की पराधीनता व पीड़ा को प्रस्तुत किया है।

तदनन्तर कृष्ण-काव्य-धारा के अंतर्गत रीतिकाल के कवियों में क्रमशः बिहारी, देव, मतिराम, पद्माकर और घनानंद आदि अनेक कवियों के काव्यों में स्त्रियों की श्रृंगारिक प्रवृत्तियों के साथ-साथ भक्ति भावना का भी समावेश मिलता है। आधुनिककाल में भारतेंदु, सत्यनारायण कविरत्न, जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, वियोगी हरि, हरिऔध और मैथिलीशरण गुप्त आदि कवियों ने कृष्ण भक्ति में लीन होकर अपने काव्य में राधा-कृष्ण-गोपियों हृदयग्राही वर्णन किया। विशेषतः हरिऔध कृत प्रियप्रवास में राधा के माध्यम से समाज में स्त्री के लोक सेवी रूप को निर्मित किया गया है। इस प्रकार कृष्ण भक्त कवियों ने अपने विचारों, भावनाओं एवं सामाजिक स्थितियों के अनुसार स्त्री के वैविध्यमयी रूप को दर्शाने का सफल कार्य किया है।

बीज शब्द: मर्मस्पर्शी, कुरीतियों, कालांतर, उपादेयता, सामंती, मुखरता

शोध आलेख

कृष्ण भक्ति की परंपरा भारतीय मानस में अत्यंत प्राचीन काल से व्याप्त रही है। भक्ति आंदोलन के पूर्व अनेक स्थानों पर कृष्ण की लीलाओं एवं उनके लोक रंजनकारी स्वरूप का मार्मिक चित्रण मिलता है। आरंभिक रूप से सर्वप्रथम वैदिक साहित्य में कृष्ण का उल्लेख प्राप्त होता है। इसके उपरांत उपनिषद एवं बौद्धों की जातक कथाओं तथा जैनियों के यहां कृष्ण उनके तीर्थकरों के समय विद्यमान रहे हैं। कालांतर में कृष्ण के स्वरुप का सर्वाधिक विस्तार भागवत कथाओं एवं महाभारत के अनेक प्रसंगों के माध्यम से प्रदर्शित हुआ है। जिसमें उन्हें राजनीतिज्ञ से लेकर लीला पुरुष, योगी, दार्शनिक, चिंतक, लोक रक्षक आदि नामों से संबोधित किया गया है।

भक्तिकालीन कृष्ण काव्य धारा में सूरदास का विशेष महत्त्व है। सूर ने कृष्ण के वात्सल्य प्रेम को जितनी निर्मलता और पवित्रता से स्थापित किया है, उतनी ही गोपियों की तीक्ष्ण व कुशाग्र बुद्धि को भी निरुपित किया है। कबीर, तुलसी एवं जायसी की तुलना में सूरदास अधिक सजगता से तत्कालीन युग की वर्जनाओं एवं मान्यताओं से मुक्त दिखाई पड़ते हैं. उनके काव्य में स्त्री जीवन की आकांक्षाओं के प्रति अधिक लोकतांत्रिक दृष्टि का बोध होता है. इस संबंध में मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं कि “कबीर, जायसी और तुलसी के काव्य में स्त्री सामंती रूढ़ियों में जकड़ी हुई है। लेकिन सूरदास के काव्य में स्त्री का सहज, स्वतंत्र और तेजस्वी रूप मिलता है, जो प्रेम के अलावा लोक और वेद के किसी बंधन को नहीं मानती।”1 सूर की स्त्री विषयक मुखरता को एक प्रसंग के माध्यम से देखा जा सकता है। कृष्ण जब मथुरा से विदा होते हैं तो गोपियों की विरह वेदना को शांत करने तथा उन्हें योग का पाठ पढ़ाने उद्धव आते हैं। किन्तु गोपियों के तीखे व्यंग्यों, उपालम्भों, उक्ति वैचित्र्य एवं तर्क बौद्धिकता से उद्धव असफल हो जाते हैं। गोपियाँ कहती हैं-

“आयौ घोष बड़ौ व्यौपारी।

लादि खेप गुन-ज्ञान-जोग की ब्रज में आनि उतारी ।।

फाटक दे कै हाटक माँगत, भोरी निपट सुधारी।”2

जिस समाज में पुरुषों का वर्चस्व रहा हो वहाँ सूर की गोपियाँ ‘स्व’ के प्रति अधिक सजग एवं मुखर दिखाई पड़ती हैं। स्पष्ट है कि सूर के काव्य में स्त्रियों का विशेष महत्त्व परिलक्षित हुआ है। उन्हें पुरुषों के समकक्ष खड़ा कर वैचारिक दृष्टि से तर्क करने योग्य सशक्त बनाया है। वे वहाँ दासी न होकर सखी हैं तथा अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सचेत हैं।

मध्यकाल में जाति प्रथा के बंधनों एवं पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्रियों की दशा व दिशा को और अधिक दयनीय एवं हीन बनाया। जिसके कारण उन्हें अनेक तरह के बंधनों में बाँध दिया गया. इन वर्जनाओं को तोड़ने एवं बाधाओं को चुनौती देने में भक्तिकालीन कृष्ण भक्त कवयित्री मीरा भूमिका विशेष रूप से है। मीरा का व्यक्तित्व त्याग व बलिदान से युक्त विपत्तियों एवं चुनौतियों भरा रहा है। जिस स्त्री ने अपने जीवन में जन्म से लेकर युवावस्था तक पारिवारिक संबंधों से जूझते एवं संघर्ष करते हुए देखा हो, उस स्त्री का विद्रोहिणी होना स्वाभाविक है। पति की मृत्यु के पश्चात पारिवारिक सदस्यों द्वारा उन्हें अनेक प्रकार की पीड़ा व यातना पहुंचाई गयी। जिसके परिणामस्वरूप उनके जीवन में भावनात्मक परिवर्तन आया।

            स्पष्ट है कि जब स्त्री नितांत असहाय व अकेले होकर जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो जाती है तो वह अपने अस्तित्त्व व अस्मिता को बचाने का प्रयास करती है। इस प्रकार मीरा का संकट और निश्छल प्रेम की प्रतीति आधुनिक काल में भी प्रासंगिक है। कृष्ण के प्रेम की दीवानी मीरा का साथ सामाजिक जीवन में परिवार, समाज और संप्रदाय आदि किसी ने नहीं दिया। यही कारण है कि उनकी रुचि ईश्वर की आराधना की ओर बढ़ने लगी। मीरा ने कृष्ण के प्रेम को पाने के लिए प्रत्येक चुनौतियों का सामना स्वतंत्र होकर किया। सामाजिक जीवन के अंर्तगत अनेक रूढ़ियाँ के होने पर भी मीरा ने सती प्रथा की अवधारणा का खंडन करके भक्ति के मार्ग का चुनाव किया। अतएव उन्होंने कृष्ण को प्राणप्रिय के रूप में स्वीकृत करके कुल की मर्यादा का त्याग कर दिया। जिसके कारण उनको सामंती समाज के अनेक क्रूर व अमानवीय कष्टों को सहना पड़ता है। मीरा भारतीय सामाजिक पद्धति के अनुसार कृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर लेती हैं। वे कहती हैं-

“मीरां के प्रभु दरसण दीजौ,

  वेग पधारो बिलम न कीज्यौ।

  पतिव्रता कै एक पति होई,

  विभचारण जुग सुंणी न कोई।”3

मीरा का काव्य मध्ययुगीन परिवेश की संकीर्ण मानसिकता, कुरीतियों तथा शास्त्र के विरुद्ध लड़कर मुक्ति, साहस व सजगता को प्रदर्शित करता है। मीरा के काव्य की प्रमुख विशेषता यह है कि मीरा अपने संघर्षों व परिस्थितियों की स्वयं ही सारथी थी। जिसका चित्रण उनके काव्य में स्वाभाविक रूप से देखा जा सकता है. इस संदर्भ में सुमन राजे मीरा के संघर्षमय जीवन के बारे में लिखती हैं कि “हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में जिस तरह कबीर अकेले हैं उसी तरह मीरा भी हैं।”4 वस्तुतः मीरा की सामाजिक व राजनीतिक सक्रियता का उद्देश्य सामंती समाज में स्त्री-पुरुष भेदभाव को समाप्त करके उनके अंर्तमन में उदात्तता को स्थापित करना है। अंततः मीरा के काव्य में स्त्री विषयक आत्मानुभूति की गहराई विद्यमान है।

सगुण काव्यधारा की कृष्ण भक्त कवि मीरा के समकक्ष ही रसखान के काव्य में गोपियाँ कृष्ण से अनन्य प्रेम एवं विद्रोह करती हैं। इसके साथ ही इनके काव्य में कृष्ण की सौंदर्य अनुभूति के लौकिक, हृदयग्राही, शांत, माधुर्य तथा मंगलकारी रूप के दर्शन मिलते हैं। मीरा और रसखान के काव्य में स्त्रियों के  सामाजिक बंधन, लोक-लज्जा तथा जाति- पांति को त्यागने की अभिव्यक्ति मिलती है।

“लोक की लाज तज्यौ तबहीं जब देख्यों सखी ब्रजचन्द सलोनो।”5

स्पष्ट है कि मीरा और रसखान के काव्य में तत्कालीन समाज में प्रचलित सामाजिक बुराईयों को त्याग कर प्रेमव्यंजित जीवन जीने के प्रति संदेश प्राप्त होता है।

रहीम मध्यकालीन साहित्य में भारतीय समाज, संस्कृति एवं भाषायी बहुलता का प्रतिनिधित्व करने वाले महत्त्वपूर्ण कवि हैं। इनके काव्य में स्त्रियों की सर्जनात्मक प्रतिभा को उजागर करने के साथ-साथ जीवन के प्रति समरसता के भाव अभिव्यंजित किया गया है। आचार्य शुक्ल लिखते हैं कि “जीवन की सच्ची परिस्थितियों के मार्मिक रूप को ग्रहण करने की क्षमता जिस कवि में होगी वही जनता का प्यारा कवि होगा। रहीम का हदय, द्रवीभूत होने के लिए, कल्पना की उड़ान की अपेक्षा नहीं रखता…’बरवै नायिकाभेद’ में भी जो मनोहर और छलकते हुए चित्र हैं वे भी सच्चे हैं, कल्पना के झूठे खेल नहीं हैं। उनमें भारतीय प्रेमजीवन की सच्ची झलक है।”6 रहीम के काव्य में नायिका के श्रृंगारिक रूप का अनूठा वर्णन मिलता है। उन्होंने अपने काव्य में नायिकाओं के गुणों के साथ दोषों का भी सशक्त व यथार्थ चित्रण किया है। ’बरवै नायिकाभेद’ में एक ओर स्त्रियों की विभिन्न अवस्थाओं के अत्यंत कोमल स्वभाव व्यंजित है तो दूसरी ओर ‘नगर शोभा’ में विभिन्न व्यवसाय में कार्य करने वाली कामकाजी स्त्रियों का चित्रण मिलता है। ‘नगर शोभा’ काव्य के माध्यम से रहीम ने स्त्रियों को घर की चारदीवारी से मुक्त करके पुरुषों की तरह बाज़ार में विभिन्न कार्यो को करते हुए प्रस्तुत किया है। इनके काव्य में स्त्रियाँ अपने भाग्य के सहारे रोती नहीं है, बल्कि स्वाभिमानी, निर्भीक, आत्मनिर्भर तथा वाक्चातुर्य से युक्त जीवन व्यतीत करने में सक्षम होती हैं।

“चतुर चितेरिन चित हरै चख खंजन के भाइ।

द्वै आधौ करि डारई, आधौ मुख दिखराइ।।”7

इस दृष्टि से रहीम ने स्त्रियों के उन्मुक्त और कर्मशील रुप को उजागर किया है। स्त्रियाँ अपनी सूझ-बुझ व कुशाग्र बुद्धि से विपरीत परिस्थितियों का सामना अत्यंत चतुराई से करती हैं। स्त्रियों के विवेक व कर्मठ स्वभाव से सिद्ध होता है कि कि आर्थिक रूप से स्वावलंबन पुरुषों की गुलामी से मुक्त होने की दिशा है।

रीतिकालीन काव्यधारा में स्त्रियों के ऐश्वर्य, श्रृंगारिक एवं कामातुरता की स्पष्ट झलक मिलती है। देव, बिहारी, पद्माकर व मतिराम आदि कवियों ने स्त्रियों के उन्मुक्त रूप को प्रतिपादित किया है। देव कृत ‘रसविलास’ में श्रमशील स्त्रियों के आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से परिपूर्ण जीवनशैली का परिचय मिलता है। इनके काव्य में स्त्रियाँ दमित समाज व्यवस्था को त्यागकर प्रियतम से मिलने के लिए आतुर रहती है। देव ने स्त्री सौंदर्य निरूपण की प्रवृत्ति को गंभीर एवं सजीव रूप से विश्लेषित किया है। वे लिखते हैं-

                  “लेह लला उठि लाई हौ बालहि लोक की लाजाहि सो लरि राखौ।”8

रीतिकाल में कवियों ने नायिकाओं का पैर के नाख़ून से लेकर चोटी तक के अंग-प्रत्यंग का चित्रण किया है। मूलतः इन कवियों के काव्य का उद्देश्य स्वान्तः सुखाय न होकर, आश्रयदाताओं की कामुक मनोवृत्तियों को प्रस्तुत करना था। इस धारा के कवियों ने भक्तिकाल के राधा-कृष्ण विषयक अलौकिक प्रेम की प्रेरणा को प्राप्त करके लौकिक आधार पर सौंदर्य वर्णन, रूप वर्णन तथा रस निरूपण में परिणत किया। परिणामस्वरूप इस काल के कवियों का मानना था कि राधा-कृष्ण के श्रृंगारिक काव्यों को जनता निस्संदेह स्वीकार कर लेगी तथा राधा-कृष्ण के चित्रांकन से सामाजिक कवच भी बना रहेगा।

          “आगे के सुकवि रीझि है तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन कौ बहानौ है।”9

बिहारी कृत ‘बिहारी सतसई’ में नायक-नायिका के संयोग व वियोग श्रृंगार और भक्ति व नैतिकता संबंधी मौलिक तथ्यों के अनेक छंद प्राप्त होते हैं। राधा-कृष्ण की भक्तिपरक दोहों में आलम्बन, उपास्य की महत्ता, आत्मदैन्य का परिचय मिलता है। बिहारी राधा-कृष्ण के माध्यम से प्रेम विषयक पवित्रता को उजागर करते हैं-

“तजि तीरथ हरि राधिका तन दुति करि अनुराग”10

बिहारी के काव्य में सामंती प्रेम का मूलाधार रूपासक्ति व शारीरिक आकर्षण है। जहां एक ओर स्वकीया स्त्री का संस्कारित, मर्यादित और माधुर्य रूप प्रदर्शित होता है तो वहीं दूसरी ओर परकीया स्त्री में प्रेम की आतुरता और उद्दंडता के महत्त्व को अभिव्यक्ति मिलती है।

रीतिकालीन काव्य में नायिकाओं के संयोग-वियोग पक्ष के अंतर्गत दरबारी संस्कृति की झलक मिलती है। इनके काव्य में नायिकाओं के भाव व्यंजना के साथ रूप व्यंजना सहज रूप में दृष्टिगोचर होती है। नायिका कृष्ण की मुरली छिपाकर रख लेती है। जब श्रीकृष्ण मुरली देने का आग्रह करते हैं तो नायिकाएं सौगंध खाकर मुरली देने से मना कर देती हैं। इसके साथ ही अपनी भाव भंगिमाओं द्वारा मुरली के होने की सूचना भी प्रकट करती हैं –

“बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाइ।

  सौंह करै भौ़ंहनि हँसे, दैन कहै, नटि जाइ।।”11

स्पष्ट है कि बिहारी के काव्य में नायिकाओं के रूप सौंदर्य के सहज गुण दृष्टिगोचर होते हैं। जैसे तीक्ष्ण कटाक्षपूर्ण नयनों से घायल, भौहों को चढ़ाना इत्यादि। काव्य में नायिकाओं के स्वच्छंद रूप को इस प्रकार से देखा जा सकता है कि स्त्रियाँ सामंती व्यवस्था में भी पुरुषों से एकनिष्ठ प्रेम कर उन्मुक्त भाव से अपने प्रेमी के साथ विचरण करती हैं। बिहारी के काव्य स्त्रियों के श्रृंगार पक्ष के साथ-साथ भक्त द्वारा राधा से जीवन के कष्टों को दूर करने की विनम्र याचना का भी रूप प्राप्त होता है-

“मेरी भव बाधा हरो, राधा नागर सोय।

 जा तन की झाई परे, स्याम हरित द्युति होय।।”12

            पद्माकर के काव्य में भी गोपियां का स्वतंत्र, बेधड़क व मनमाना रूप मिलता है। फाग के एक पद में गोपियाँ कृष्ण को इस प्रकार रंगों से सराबोर कर देती हैं कि कृष्ण इस स्थिति से असहज हो जाते हैं-

“फाग के भीर अभीरिन में गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी।

 भाई करी मन की पद्माकर, ऊपर नाई अबीर की झोरी।।”13

वस्तुतः पद्माकर का काव्य स्त्री-पुरुष के सहज प्रेम सौंदर्य एवं सामाजिक स्वतंत्रता का काव्य है. जहाँ न कोई बंधन है और न ही कोई रोक टोक अपितु जीवन की स्वच्छंदता है।

आधुनिक साहित्य के कृष्ण भक्त कवियों में हरिऔध कृत ‘प्रियप्रवास’ महाकाव्य में राधा एक सशक्त भारतीय स्त्री रूप का चित्रण मिलता है। इन्होंने अपने काव्य में राधा-कृष्ण के माध्यम से प्रेम की सीमाओं को परिवर्तित करके विश्व प्रेम का रूप दिया है। राधा व अन्य स्त्रियों का स्वरूप बदलकर धैर्यशील, त्यागमय, सात्विक और लोककल्याणी सेविका का प्रतीक बन गया। इस महाकाव्य में उद्धव कृष्ण की सहगामिनी राधा को संदेश देते हुए कहते हैं कि प्रिय राधा भोग विलास में लिप्त न होकर दीन-दुखियों की जनसेवा में जीवन व्यतीत करो। अंततः राधा लोक सेवा में लीन होकर आत्मोत्सर्ग कर देती है। कृष्ण द्वारा उद्धव को भेजे गए संदेश को सुनकर राधा कहती हैं-

“जो इच्छा है परम प्रिय की जो अनुज्ञा हुई है।

   मैं प्राणों के अछत उसको भूल कैसे सकूँगी।।

                                            यों भी मेरे परम व्रत के तुल्य बातें यही थीं।

          हो जाऊँगी अधिक अब मैं दत्तचित्ता इन्हीं में।।”14

अतएव राधा में भारतीय स्त्री का लोक-रंजन, लोक-रक्षक, लोक-हितैषी और स्वाभिमानी रूप प्रमुखता से दिखाया गया है। राधा में साधारण स्त्री के लोकसेविका, प्रणयिनी तथा विरहिणी के तीनों गुण विद्यमान हैं।

उपयुक्त विश्लेषण के पश्चात कह सकते हैं कि कृष्ण भक्त कवियों में पेशेवर स्त्रियाँ निम्न कार्यों को करने में लज्जा का अनुभव नहीं करती हैं। वे पारिवारिक और व्यासायिक जीवन में दुख, यातनाओं एवं समस्याओं का समाधान स्वयं करती हैं। इतना ही नहीं, सामंती मानसिकता वाले पुरुषों द्वारा दमन होने पर खुलकर प्रतिरोध करती हैं। तद्युगीन समाज व्यवस्था में स्त्रियों का सशक्त व आत्मनिर्भर रूप वर्तमान में भी प्रासंगिक है। कृष्ण भक्त कवियों की स्त्रियों ने नए आयामों को स्थापित करके अपनी मौलिकता को अभिव्यंजित किया है। श्रृंगारिक प्रवृत्तियों के अंतर्गत इस धारा के कवियों ने विभिन्न कलाओं में स्त्रियों की निपुणता को व्यक्त किया है। भले ही रीतिकाव्य में स्त्रियों के सौंदर्य का चित्रण हुआ हो परंतु स्त्री के स्वच्छंद, अल्हड़, प्रेम विह्वल तथा बौद्धिक रूप के अद्धुत दर्शन सहज ही प्राप्त होते हैं। मध्यकालीन समाज में अभिजात्य वर्ग की स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण कर समाज में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त कर रही थी। इसके अतिरिक्त इस धारा के कवियों ने भी राधा-कृष्ण के भावों, विचारों के माध्यम से स्त्रियों की भिन्न-भिन्न कार्य प्रणालियों को रेखांकित किया है। वस्तुतः व्यापक दृष्टि से कृष्ण भक्त कवियों ने स्त्री की शक्ति, बुद्धि, कौशल के प्रति पूर्ण आस्था व्यक्त की है।

संदर्भ ग्रंथ सूची 

  1. पांडेय, मेनेजर, भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य, नयी दिल्ली:वाणी प्रकाशन, संस्करण 2003, पृष्ठ 26
  2. लाल, डॉ. किशोरी, सूर और उनका भ्रमरगीत, इलाहाबाद:अभिव्यक्ति प्रकाशन, संस्करण 2014, पृष्ठ 30
  3. तेजावत, अरविंद सिंह, मीरां का जीवन, नई दिल्ली: लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2015, पृष्ठ 45
  4. राजे, सुमन, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, नयी दिल्ली:भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, संस्करण 2017, पृष्ठ 150
  5. मिश्र, विश्वनाथ प्रसाद, सुजान रसखानि, बनारस:वाणी वितान प्रकाशन, संस्करण 2010, पृष्ठ 72
  6. शुक्ल, रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, दिल्ली:लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2018, पृष्ठ 147
  7. (संपा.) मिश्र, विद्यानिवास, रहीम ग्रंथावली, नयी दिल्ली:वाणी प्रकाशन, संस्करण 2004, पृष्ठ 104
  8. डॉ. दीनदयाल, देव और उनका रसविलास, नयी दिल्ली:नवलोक प्रकाशन, संस्करण 2004, पृष्ठ 121
  9. (सं.) चतुर्वेदी, जवाहरलाल, काव्यनिर्णय, वाराणसी:कल्याणदास एंड ब्रदर्स, संस्करण 1956, पृष्ठ 3
  10. रत्नाकर, जगन्नाथ, बिहारी रत्नाकर, दिल्ली:लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2019, पृष्ठ 108
  11. वही, पृष्ठ 218
  12. वही, पृष्ठ 21
  13. (सं.) मिश्र, विश्वनाथ प्रसाद, पद्माकर कृत जगद्विनोद, काशी:श्रीरामरत्न-पुस्तक-भवन, संस्करण 1934, पृष्ठ 87
  14. हरिऔध, अयोध्यासिंह, प्रियप्रवास, नयी दिल्ली:वाणी प्रकाशन, संस्करण 2014, पृष्ठ 248

 

शालू
शोधार्थी, हिंदी विभाग
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला,
जिला-काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश- 176215