‘कितने पाकिस्तान’ इतिहास का पुनराख्यान – डॉ. चन्दन कुमार

कमलेश्वर ने ‘ कितने पाकिस्तान ‘ के विराट कथ्य में जहाँ एक ओर पौराणिक या पुराकथाओं का प्रयोग कर साहित्य और लोक प्रचलित इतिहास में मिथकों की परम्परा और प्रयोग […]

मुंशी प्रेमचंद जी के उपन्यासों में वर्णित विषम दाम्पत्य जीवन (गोदान, निर्मला, वरदान, सेवा सदन और प्रतिज्ञा उपन्यासों के आधार पर – डॉ. हरिन्दर कुमार

भारतीय चिंतन में विवाह को एक पवित्र एवं पुण्य संस्कार के रूप में स्वीकार किया गया है। यह मानव को दायित्ववान और परिपक्व बनाने के लिए आवश्यक है। सरल शब्दों […]

प्रेमचंद की कहानी ‘लांछन’ में अभिव्यक्त जेंडर परफॉर्मेटिविटी और नैतिक पुलिसिंग – जयकृष्णन एम.

शोध सारांश मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘लांछन’ एक महिला आश्रम की पृष्ठभूमि में रची गई एक ऐसी कहानी है, जो जेंडर भूमिकाओं, सामाजिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत शक्ति की जटिलताओं को […]

‘गोदान उपन्यास ग्राम-जीवन और कृषि-संस्कृति का सशक्त महाकाव्य है’ – डॉ. शेख शहनाज अहमद

‘गोदान’ मुंशी प्रेमचंद का अंतिम पूर्ण उपन्यास है, जिसमें ग्राम जीवन और कृषि संस्कृति का चित्रण किया गया है। ‘होरी’ कृषक जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। होरी का जीवन आर्थिक […]

मानवता के पुजारी तथा कलम के जादूगर: मुंशी प्रेमचंद – डॉ. जितेंद्र पीतांबर पाटिल

हिंदी साहित्य अनेक विधाओं से समृद्ध साहित्य माना जाता है। विशेष रूप से हिंदी कथा साहित्य की चर्चा सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्वभर में जिनके कारण होती है […]

आधुनिक हिंदी कविताओं में रामकथा के नए आयाम

शोध-सारांश रामकथा भारतीय साहित्य और संस्कृति की जड़ों में इस प्रकार रची-बसी है कि प्रत्येक युग में उसने नई अर्थ-छवियाँ और नई व्याख्याएँ प्राप्त की हैं। आधुनिक हिंदी कविता में […]

मनोविश्लेषण सिद्धांतों के आलोक में होरी : एक अध्ययन – डॉ. सुनील बसवाराजा मलगी

शोध सार: मुंशी प्रेमचंद का गोदान हिंदी साहित्य की कालजयी कृति मानी जाती है| यह एक सामाजिक दर्पण है, जो औपनिवेशिक भारत के किसानों के शोषण, वर्ग संघर्ष और परंपरागत […]

प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री : परंपरा, विद्रोह और संवेदना का त्रिकोण – डॉ. आशीष कुमार ‘दीपांकर’ और डॉ. निशि राघव

हिंदी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद ऐसे अद्वितीय साहित्यकार हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए किसी विशेष विषय या पृष्ठभूमि की आवश्यकता नहीं होती। वे जनमानस के लेखक हैं, जिनकी रचनाओं में […]

मुंशी प्रेमचंद और स्त्री विमर्श – डॉ. आरती ‘लोकेश’

प्रेमचंद के विपुल साहित्य में से किसी एक बिंदु पर बात करना समुद्र-मंथन जैसी ही क्रिया है। उसमें से एक बूँद भी निकाल लेना बहुत महत्त्व की बात है। प्रेमचंद […]

प्रेमचंद के उपन्यासों में मानवतावादी दृष्टिकोण (विशेष संदर्भ-  निर्मला और गोदान) – डॉ. प्रकाश भगवानराव शिंदे

प्रेमचंद जनवादी चेतना तथा मानवतावादी दृष्टि के प्रतिनिधि साहित्यकार हैं। हिंदी कथा-साहित्य में मुंशी प्रेमचंद कथा सम्राट नाम से अभिहित है। हिंदी कथा-साहित्य अर्थात साहित्य की कहानी और उपन्यास इन […]