शोध-सारांश

रामकथा भारतीय साहित्य और संस्कृति की जड़ों में इस प्रकार रची-बसी है कि प्रत्येक युग में उसने नई अर्थ-छवियाँ और नई व्याख्याएँ प्राप्त की हैं। आधुनिक हिंदी कविता में रामकथा के तत्त्व न केवल पुरातन परंपरा की पुनरावृत्ति के रूप में आए हैं, अपितु उन्होंने आधुनिक बोध, सामाजिक चेतना और वैचारिक द्वंद्व को अभिव्यक्त करने का नया माध्यम ग्रहण किया है। यह शोध-पत्र आधुनिक हिंदी कवियों-मैथिलीशरण गुप्त, निराला, धर्मवीर भारती, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह और दलित-नारीवादी कवियों-की रचनाओं में रामकथा के नए आयामों का विश्लेषण करता है। शोध में यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि आधुनिक कविता ने रामकथा को एक जीवंत सांस्कृतिक-राजनीतिक संवाद में रूपांतरित किया है।

मुख्य शब्द: रामकथा, आधुनिक हिंदी कविता, पुनर्लेखन, दलित विमर्श, नारीवादी दृष्टि, सांस्कृतिक पुनर्निर्माण

प्रस्तावना

रामकथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, वह भारतीय मानस की अनंत यात्रा है। वाल्मीकि की आदि-कविता से लेकर तुलसीदास की रामचरितमानस तक, और वहाँ से आधुनिक काल के प्रयोगशील कवियों तक-रामकथा एक सतत प्रवाहमान नदी की भाँति अपना रूप बदलती और विस्तार पाती रही है। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘रामकथा भारतीय जनता की सामूहिक स्मृति और सामूहिक कल्पना का सबसे बड़ा भंडार है।’ [1]

यदि हम आधुनिक हिंदी कविता की दृष्टि से रामकथा को देखें, तो हम पाते हैं कि इस परंपरा ने अनेक रूपांतरण ग्रहण किए। राष्ट्रवादी उत्साह के काल में राम राष्ट्र-निर्माण के प्रतीक बने; प्रगतिवाद और मार्क्सवाद के प्रभाव में शबरी, एकलव्य और शूर्पणखा जैसे हाशिए के पात्र केंद्र में आए; स्त्री-विमर्श ने सीता को नई आवाज़ दी; और दलित चेतना ने रामकथा की वर्चस्ववादी संरचनाओं को चुनौती दी। इस प्रकार आधुनिक हिंदी काव्य में रामकथा का पुनर्पाठ एक जटिल, बहुस्तरीय और अत्यंत सृजनशील प्रक्रिया रही है।

यह शोध-पत्र उन्हीं नए आयामों को रेखांकित करने का प्रयास है जो आधुनिक हिंदी कवियों ने रामकथा में खोजे-और जिनके माध्यम से उन्होंने अपने समकालीन समाज से संवाद स्थापित किया।

2. रामकथा की काव्य-परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व

भारतीय साहित्य में रामकथा का पुनर्लेखन कोई नवीन परिघटना नहीं है। संस्कृत, अपभ्रंश, तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी और हिंदी-सभी भाषाओं में रामकथा अपने-अपने युगीन संदर्भों के अनुरूप ढलती रही है। कम्बन की ‘कंबरामायण’, कृत्तिवास की बांग्ला रामायण, और एकनाथ की ‘भावार्थ रामायण’ इसी परंपरा के उदाहरण हैं। आ.ए.के. रामानुजन ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘Three Hundred Ramayanas’ में यह सिद्ध किया है कि रामकथा में कोई एकल, प्रामाणिक ‘मूल’ नहीं है-‘प्रत्येक पुनर्कथन अपने आप में एक मूल रचना है।’[2]

आधुनिकता के आगमन के साथ हिंदी काव्य ने जहाँ एक ओर पश्चिमी साहित्यिक मूल्यों को आत्मसात किया, वहीं दूसरी ओर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी गहरा संबंध बनाए रखा। आधुनिक हिंदी कवियों के सामने यह चुनौती थी कि वे रामकथा को एक जड़ धार्मिक परंपरा के रूप में न स्वीकार करके उसे नए प्रश्नों का उत्तर देने योग्य कैसे बनाएँ। इस दृष्टि से आधुनिक काव्य में रामकथा का पुनर्पाठ एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संघर्ष का भी प्रतिफलन है।

3. राष्ट्रवादी काव्य-धारा में राम: मैथिलीशरण गुप्त

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘साकेत’ (1931) आधुनिक हिंदी काव्य में रामकथा के नए आयाम की पहली सशक्त अभिव्यक्ति है। गुप्त जी ने रामकथा को राष्ट्रीय नवजागरण की भावना से जोड़कर उसे एक नई प्रासंगिकता प्रदान की। ‘साकेत’ में उर्मिला का चरित्र-चित्रण इस नवीनता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। वाल्मीकि और तुलसी में उर्मिला लगभग अनुपस्थित है, किंतु गुप्त जी ने उसे ‘साकेत’ के नवम सर्ग में केंद्रीय आवाज़ प्रदान की।

उर्मिला की पीड़ा और प्रतीक्षा को गुप्त जी ने राष्ट्र की उस नारी-शक्ति का प्रतीक बनाया जो त्याग और धैर्य से राष्ट्र-निर्माण में योगदान देती है। ‘साकेत’ में उर्मिला की उक्ति-‘सखि! वे मुझसे कहकर जाते’-हाशिए के पात्र को केंद्र में लाने की काव्यात्मक रणनीति है। डॉ. नामवर सिंह के अनुसार, ‘मैथिलीशरण गुप्त ने रामकथा को भारतीय नवजागरण की भावनात्मक आवश्यकता के अनुरूप पुनर्संरचित किया।’[3]

गुप्त जी की ‘पंचवटी’ और ‘विष्णुप्रिया’ में भी रामकथा के पात्रों और स्थितियों को राष्ट्रवादी दृष्टि से देखा गया है। वे राम को एक आदर्श राजा और मर्यादा-पुरुष के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो औपनिवेशिक दासता में पीड़ित भारतीय जनता के लिए एक प्रेरणा-स्रोत बन सके।

4. छायावाद में रामकथा: निराला का क्रांतिकारी पुनर्लेखन

यदि गुप्त जी ने रामकथा को राष्ट्रवादी आदर्शों से जोड़ा, तो सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने उसे सामाजिक क्रांति की चेतना से जोड़ा। निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ (1936) आधुनिक हिंदी काव्य में रामकथा की सबसे अधिक चर्चित और प्रशंसित रचना है। इस कविता में निराला ने वाल्मीकि के आख्यान को ग्रहण करते हुए उसे एक सर्वथा नई दार्शनिक ऊँचाई प्रदान की।

‘राम की शक्तिपूजा’ में राम का संशय, उनकी थकान और अंततः शक्ति की आराधना का जो चित्र निराला ने खींचा है, वह मनुष्य की उस अस्तित्ववादी दशा का प्रतीक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष जारी रखता है। डॉ. रामविलास शर्मा ने इस कविता को ‘हिंदी साहित्य की एक विलक्षण उपलब्धि’ कहा है और यह मत व्यक्त किया है कि ‘निराला ने यहाँ राम को एक मानवीय संघर्ष के प्रतीक में रूपांतरित किया।’[4] (शर्मा, 1999, पृ. 153)

इसी प्रकार निराला की ‘तुलसीदास’ (1938) कविता में रामकथा और तुलसी की काव्य-परंपरा को मध्ययुगीन पराभव और आधुनिक जागरण के संदर्भ में देखा गया है। निराला के राम आदर्श नहीं, संघर्षशील मानव हैं-यह एक मूलभूत परिवर्तन है जो आधुनिक हिंदी काव्य में रामकथा की दिशा को बदल देता है।

5. स्त्री-विमर्श और रामकथा: सीता की नई आवाज़

आधुनिक हिंदी कविता में रामकथा के पुनर्लेखन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयाम स्त्री-विमर्श है। सीता, जो परंपरागत रूप से पातिव्रत्य और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में चित्रित की जाती थीं, आधुनिक नारीवादी दृष्टि में एक स्वायत्त, प्रश्नकर्त्री और विद्रोहिणी नारी के रूप में उभरती हैं।

महादेवी वर्मा की गद्य-काव्य कृतियों में सीता की पीड़ा को एक सार्वभौमिक नारी-वेदना के रूप में देखा गया है। आगे चलकर उषा प्रियंवदा, मृदुला गर्ग और मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी रचनाओं में सीता को प्रश्न पूछने का अधिकार दिया। किंतु काव्य-क्षेत्र में सीता की नई आवाज़ को सबसे तीव्रता से अभिव्यक्त किया कात्यायनी और अनामिका जैसी कवयित्रियों ने।

अनामिका की कविता ‘सीता’ में वह परित्यक्त नारी के रूप में नहीं, बल्कि पृथ्वी की पुत्री के रूप में पृथ्वी में समाने की क्रिया को एक सचेत विद्रोह के रूप में व्याख्यायित करती हैं-‘धरती में समाना / कोई मृत्यु नहीं थी / एक प्रत्यावर्तन था।’ [5] यह व्याख्या परंपरागत सीता-कथा को उलट देती है और उसे नारी-मुक्ति का प्रतीक बना देती है।

कात्यायनी की कविताओं में सीता का चरित्र सामंतवाद और पितृसत्ता की व्यवस्था के विरुद्ध एक राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनता है। वे सीता की अग्निपरीक्षा को स्त्री-देह पर पुरुषसत्तात्मक समाज के नियंत्रण के प्रतीक के रूप में देखती हैं और उससे मुक्ति की कामना करती हैं। डॉ. सुमन राजे ने लिखा है, ‘आधुनिक हिंदी कवयित्रियों ने सीता को उसकी प्रतीक्षा से बाहर निकालकर उसे एक प्रश्नकर्त्री चेतना दी।’ [6]

6. दलित विमर्श और रामकथा: शंबूक का पुनर्पाठ

आधुनिक हिंदी काव्य में रामकथा के पुनर्लेखन का सर्वाधिक तीखा और वैचारिक रूप से चुनौतीपूर्ण आयाम दलित विमर्श है। दलित कवियों ने रामकथा में उन पात्रों और प्रसंगों को केंद्र में रखा जिन्हें परंपरागत रामकथा ने हाशिए पर रखा था-शंबूक-वध, शबरी का चरित्र, और राम की उस कर्तव्यपरायणता की आलोचना जो जाति-व्यवस्था को उचित ठहराती है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘शंबूक’ रामकथा के इस आयाम की सबसे मार्मिक अभिव्यक्ति है। इस कविता में शंबूक का वध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही जातिगत हिंसा का प्रतीक है। ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं-‘शंबूक की गर्दन पर पड़ी तलवार / हर दलित के गले पर थी।’ यह काव्य-पंक्तियाँ रामकथा को एक वर्गीय और जातिगत विश्लेषण के उपकरण में बदल देती हैं।’ [7]

इसी परंपरा में जयप्रकाश कर्दम और मोहन नेगी जैसे कवियों ने भी रामकथा के उन प्रसंगों को उठाया जो दलित-बहुजन पात्रों की पीड़ा और संघर्ष को सामने लाते हैं। शबरी का पात्र दलित काव्य में एक विशेष महत्त्व रखता है-वह भक्ति और समर्पण की मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि उस निम्नवर्गीय स्त्री के प्रतीक के रूप में आती है जिसे समाज ने कभी मान्यता नहीं दी किंतु जिसकी उपेक्षा राम-कथा के भीतर ही दर्ज है।

डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने लिखा है कि ‘दलित कवियों ने रामकथा से उसका ब्राह्मणवादी आवरण उठाकर उसके भीतर छिपे प्रतिरोध के स्वर को सामने रखा।’ [8] यह एक सांस्कृतिक पुनर्विनियोग (cultural re-appropriation) की प्रक्रिया है जिसमें दलित कवि रामकथा को अपनी मुक्ति की कथा में रूपांतरित करते हैं।

7. समकालीन हिंदी कविता में रामकथा: कुँवर नारायण और केदारनाथ सिंह

समकालीन हिंदी कविता में रामकथा का प्रयोग और भी सूक्ष्म एवं बहुस्तरीय हो गया है। कुँवर नारायण और केदारनाथ सिंह जैसे कवियों ने रामकथा के प्रतीकों को एक नई काव्य-संवेदना से जोड़ा है जो न तो शुद्ध राष्ट्रवादी है और न ही प्रत्यक्ष राजनीतिक।

कुँवर नारायण अपनी लंबी कविता ‘अयोध्या, 1992’ में राम-जन्मभूमि विवाद के संदर्भ में रामकथा के राजनीतिकरण पर एक गहरी और विचारोत्तेजक टिप्पणी करते हैं। वे लिखते हैं-‘जहाँ कहीं सत्य था / वहाँ एक मंदिर टूटा।’ [9] इन काव्य-पंक्तियों में राम और रामकथा एक जटिल सांस्कृतिक-राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन जाते हैं।

भारत भूषण अग्रवाल की कविता राम की जलसमाधि कविता राम के एक अत्यंत मानवीय, करुण और आत्मसंघर्षपूर्ण रूप को उभारती है, जो परंपरागत “मर्यादा पुरुषोत्तम” की छवि से भिन्न है। यहाँ राम एक ऐसे व्यक्ति हैं जो गहरे अस्तित्वगत संकट से गुजर रहे हैं— “किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे” [10]जैसी पंक्तियाँ उनके जीवन की निरर्थकता और आंतरिक शून्यता को प्रकट करती हैं। सीता के वियोग में उनका विलाप— “तू कहाँ खो गई वैदेही”— उन्हें एक साधारण विरही मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करता है।

राजसत्ता, वैभव और आदर्श भी उनके लिए अर्थहीन हो उठते हैं— “ये राजमुकुट, ये सिंहासन… ये प्रियाहीन जीवन मेरा”— जिससे स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत पीड़ा के सामने सामाजिक प्रतिष्ठा नगण्य है। सरयू में अवगाहन की प्रक्रिया— “पानी छाती-छाती आया”[11]— उनके आंतरिक द्वंद्व, आत्मविसर्जन और मुक्ति की आकांक्षा का प्रतीक बनती है। इस प्रकार कविता राम को देवत्व से हटाकर गहन संवेदनशील और त्रासद मानवीय धरातल पर पुनर्स्थापित करती है।

8. पूर्वोत्तर, आदिवासी और क्षेत्रीय संवेदनाएँ

आधुनिक हिंदी काव्य में रामकथा का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम वह है जो आदिवासी और लोक-परंपराओं से जुड़ता है। हिंदी पट्टी के कई आदिवासी समाजों में रामकथा के वे पाठ प्रचलित हैं जिनमें रावण खलनायक नहीं, एक नायक है। इन लोक-परंपराओं ने आधुनिक हिंदी काव्य को भी प्रभावित किया है।

महाश्वेता देवी जैसी लेखिकाओं के प्रभाव में हिंदी के कुछ कवियों ने रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण जैसे पात्रों को नायक की दृष्टि से देखना शुरू किया। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ के बाद महेंद्र भटनागर जैसे कवियों ने ‘लंका’ और ‘रावण’ को केंद्र में रखकर कविताएँ लिखीं जिनमें विजेता के नहीं, पराजित के दृष्टिकोण से रामकथा को देखा गया।

यह ‘counter-narrative’ की काव्य-परंपरा भारतीय लोकतांत्रिक चेतना का ही विस्तार है जो प्रत्येक एकपक्षीय आख्यान को प्रश्नांकित करती है। डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल ने इस प्रवृत्ति को ‘रामकथा का जनतंत्रीकरण’ कहा है।[12]

9. निष्कर्ष: रामकथा का नया काव्यशास्त्र

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि आधुनिक हिंदी कविता में रामकथा के कई नए आयाम उभरकर सामने आए हैं। सबसे पहले, राष्ट्रवादी पुनर्निर्माण के संदर्भ में रामकथा को राष्ट्रीय नवजागरण की चेतना से जोड़ा गया। मैथिलीशरण गुप्त की परंपरा में राम और रामराज्य को एक आदर्श राष्ट्र-राज्य के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया, जहाँ नैतिकता, न्याय और लोककल्याण की परिकल्पना प्रमुख रही।

इसके साथ ही, मानवीकरण और अस्तित्ववादी दृष्टि के अंतर्गत राम के चरित्र को एक मानवीय धरातल पर पुनर्स्थापित किया गया। निराला की परंपरा में राम का संघर्ष, उनका संशय और आंतरिक द्वंद्व मानवीय अस्तित्व की सार्वभौमिक पीड़ा का प्रतीक बन गया। इस प्रकार रामकथा का पारंपरिक दिव्यत्व उसकी मानवीयता में रूपांतरित होता दिखाई देता है।

नारीवादी पुनर्पाठ के माध्यम से रामकथा के स्त्री पात्रों को एक नई दृष्टि और स्वर मिला। सीता, उर्मिला और मंथरा जैसे पात्र अब केवल सहायक या अनुगामी नहीं रहे, बल्कि वे प्रश्न करने वाली, स्वायत्त और आत्मचेतस स्त्रियों के रूप में उभरकर सामने आए। इससे स्त्री की पारंपरिक छवि को चुनौती मिली और एक नई नारी-चेतना का विकास हुआ।

दलित दृष्टिकोण ने रामकथा के उन प्रसंगों को केंद्र में लाया जिन्हें पहले हाशिए पर रखा गया था। शंबूक-वध और जातिगत उत्पीड़न जैसे प्रसंगों के माध्यम से दलित कवियों ने रामकथा को एक सशक्त राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में रूपायित किया। इस दृष्टि ने सामाजिक न्याय और समानता के प्रश्नों को प्रमुखता दी।

राजनीतिक आलोचना के स्तर पर भी रामकथा का पुनर्पाठ हुआ। कुँवर नारायण जैसे कवियों ने रामकथा के राजनीतिकरण का विरोध करते हुए यह प्रश्न उठाया कि साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग सत्ता के उपकरण के रूप में क्यों और कैसे किया जा रहा है। इस प्रकार रामकथा को एक आलोचनात्मक विमर्श के रूप में भी देखा गया।

लोक और आदिवासी दृष्टि ने रामकथा को एक वैकल्पिक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया। इस दृष्टि में रावण और लंका के पात्रों को नायकत्व प्रदान करते हुए परंपरागत आख्यानों के विरुद्ध एक ‘काउंटर-नैरेटिव’ विकसित किया गया, जिससे कथा के बहुलार्थी स्वरूप को बल मिला।

इन सभी आयामों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि आधुनिक हिंदी काव्य ने रामकथा को एक स्थिर धार्मिक पाठ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक संसाधन के रूप में ग्रहण किया है। प्रत्येक युग ने अपने प्रश्नों, सरोकारों और संवेदनाओं के अनुरूप इसे नए अर्थों में पुनर्गठित किया है, जिससे रामकथा की प्रासंगिकता निरंतर बनी रही है।

10. उपसंहार

रामकथा भारतीय साहित्य की वह अक्षय निधि है जो कभी रूढ़ नहीं हुई। आधुनिक हिंदी कविता ने इस परंपरा को सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण और सर्जनात्मक तरीके से आत्मसात किया है। मैथिलीशरण गुप्त से लेकर ओमप्रकाश वाल्मीकि तक, और निराला से लेकर अनामिका तक-रामकथा हर बार नए रूप में प्रकट हुई और हर बार उसने अपने समय की आत्मा को अभिव्यक्त किया।

यह पुनर्लेखन की परंपरा केवल साहित्यिक नहीं, सामाजिक और राजनीतिक भी है। यह भारतीय समाज की उस प्रवृत्ति का प्रतिफलन है जो अपनी सांस्कृतिक विरासत को जड़ नहीं होने देती-उसे संवाद, प्रश्न और पुनर्सृजन की प्रक्रिया में सजीव रखती है। जैसा कि डॉ. हरिशंकर परसाई ने व्यंग्यात्मक किंतु गहरे अर्थ में कहा था, ‘राम केवल एक चरित्र नहीं हैं, वे हर युग की ज़रूरत हैं।’[13]

आधुनिक हिंदी काव्य ने रामकथा को जो नई आयाम दिए हैं, वे न केवल साहित्यिक विकास के साक्ष्य हैं, बल्कि एक जीवंत, बहुस्तरीय और लोकतांत्रिक संस्कृति की पहचान भी हैं। यह परंपरा आगे भी जारी रहेगी-क्योंकि जब तक मनुष्य के भीतर प्रश्न उठते रहेंगे, रामकथा उनके उत्तर की तलाश में पुनर्जीवित होती रहेगी।

 

 

आधार ग्रंथ-

[1] शर्मा, रामविलास; भारतीय साहित्य और हिंदी जाति, पृ. 47, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, 2001

[2] रामानुजन, ए.के. (1991). ‘Three Hundred Ramayanas’, in Many Ramayanas: The Diversity of a Narrative Tradition in South Asia. Ed. Paula Richman. Berkeley : University of California Press. (पृ. 24)

[3] सिंह, नामवर; कविता के नए प्रतिमान, पृ. 89, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994

[4] शर्मा, रामविलास;  निराला की साहित्य साधना : खण्ड 2, पृ. 153, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

[5] अनामिका;  दूब-धान, पृ. 67, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008

[6] राजे, सुमन;  हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, पृ. 112, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2006

[7] वाल्मीकि, ओमप्रकाश ; शलभ, पृ. 38, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003

[8] तिवारी, बजरंग बिहारी;  दलित साहित्य : एक अंतर्यात्रा, पृ. 74, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011

[9] नारायण, कुँवर; कोई दूसरा नहीं, पृ. 43, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995

[10]https://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9C%E0%A4%B2_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BF_/_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%B7%E0%A4%A3

[11] वही

[12] पालीवाल, कृष्णदत्त; आधुनिक हिंदी काव्य की सांस्कृतिक चेतना, पृ. 201, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009

[13] परसाई, हरिशंकर;  तुलसीदास चंदन घिसें, पृ. 203,  राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1985

 

विजेता लक्ष्मी
शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय