‘सूनी घाटी का सूरज’ में रामदास सत्या का सात्विक प्रेम, ‘राग दरबारी’ में बेला-बद्री पहलवान का कामुक प्रेम, ‘सीमाएँ टूटती हैं’ में चाँद-विमल सलूजा का बेमेल और शारीरिक प्रेम, ‘आदमी का जहर’ में हरिश्चन्द्र-रूबी का दाम्पत्य प्रेम, ‘पहला पड़ाव’ में सत्ते-जसोदा का भावुक आदर्शवादी प्रेम, ‘विस्रामपुर का संत’ में विवेक-सुंदरी का युवा बौद्धिक प्रेम साथ ही कुँवर जयंती प्रसाद सिंह का जयश्री व सुंदरी के प्रति कामुक व शारीरिक आकर्षण और ‘राग-विराग’ में सुकन्या और शंकरलाल का अन्तर्जातीय प्रेम, प्रेम और आकर्षण के विविधवर्णी रूप, रस, गंध श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में देखने को मिले हैं।

      रामदास सत्या से प्रेम करता है, यह बात सत्या को भी पता है लेकिन दोनों का प्रेम फलीभूत नहीं हो पाता वह सिर्फ भावना के स्तर पर ही सिमट कर रह जाता है। अन्ततः सत्या की शादी रामानुज चटर्जी  (असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट ऑव पुलिस) से होती है। सत्या, रामदास के संस्मरण पढ़ने के बाद अनिता के बारे में रामदास को पत्र लिखती है – प्रिय रामदास,

     तुम्हारी अनिता को मैं जानती हूँ। – तुमने अनिता को जिस प्रकार के अपने संस्मरणों में याद किया है, उसको पढ़कर कोई उपन्यास-प्रेमी उसे न जाने किन कल्पनाओं की दृष्टि से देखेगा … कल रात मुझे तुम्हारी अनिता याद आती रही। यह नाम बहुत अच्छा लगता है।(1) लेकिन यह अनिता, सत्या ही है जो रामदास के संस्मरणों में आयी। रामदास की गरीबी, भविष्य की अनिश्चितता, रामानुज का विकल्प वे कारण हैं जिनके कारण रामदास का प्रेम असफल हो जाता है। सत्या, रामदास के संवाद से इसका संकेत भी मिलता है – “जो तीन दिन से भूखा हो और पेट भरने की चिंता में हो उसे प्रवंचित प्रेमी का अभिनय करना अच्छा नहीं लगता। वह बोला, ‘यह भी विचित्र बात है। प्रेम पर भी तुम भरपेट वालों की ही ‘मोनोपॉली’ रहेगी ? मुझ जैसों को न प्रेम करने का अधिकार है, न उसकी असफलता पर शोक करने का ?(2)  सत्या पवित्र आस्था-सी उसके मन में रची-बसी थी। वह हौंसला बंधाती थी। रामदास उससे प्रेम करता था, मित्र यह सोचते थे कि वे विवाह कर लेंगे।

       छात्रावास और छात्र जीवन में प्रेम के विविध रंगों के बारे में श्रीलाल शुक्ल ने रामदास के माध्यम से यथार्थ ही लिखा है: “प्रेम ! प्रेम जहाँ सफलता मिली। प्रेम जहाँ असफलता मिली। सहवर्गियों से अस्वाभाविक प्रेम। सहपाठिनी छात्राओं से स्वाभाविक प्रेम। वे घटनाएँ जहाँ प्रेम केवल इस ओर से हुआ। वे घटनाएँ जहाँ प्रेम केवल उस ओर से हुआ। जहाँ दोनों ओर से हो सकता था, पर नहीं हुआ। जहाँ दोनों ओर से हुआ, पर परिणाम कुछ न हुआ ।

त्रिभुजात्मक संघर्ष। प्लैटानिक, बुद्धिवादी प्रेम, जिसके कारण प्रेमी सदैव गौरवान्वित रहा, पर सदैव दुखी, पराजित और प्रवंचित-सा बना रहा। भौतिक प्रेम। डॉन जुआन का प्रेम। उसके अनुयायियों की कामिनी-दिग्विजय की गाथाएँ। बायरन और शेली का प्रेम। निराशा के गीत, निशा-निमंत्रण।(3) सत्या और रामदास का प्रेम बुद्धिवादी प्रेम था जिसमें दुख, पराजय, प्रवंचना ही हासिल हुआ।

      ‘राग दरबारी’ में बेला और बद्री पहलवान का शारीरिक प्रेम अन्धेरे में छत पर फलीभूत होता है। बेला का प्रेम-पत्र भी फिल्मी गानों से प्रेरित है ‘ओ सजना, बेदर्दी बालमा, तुमको मेरा मन याद करता है। पर…. चाँद को क्या मालूम, चाहता उसको कोई चकोर। वह बेचारा दूर से देखे करे न कोई शोर। तुम्हें क्या पता कि तुम्हीं मेरे मन्दिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं देवता हो। याद में तेरी जाग जाग के हम रात-भर करवटें बदलते हैं।

     अब तो मेरी यह हालत हो गयी है कि सहा भी न जाये, रहा भी न जाये। देखो न मेरा दिल मचल गया, तुम्हें देखा और बदल गया। और तुम हो कि कभी उड़ जाये, कभी मुड़ जाये, भेद जिया का खोले ना। मुझको तुमसे यही शिकायत है कि तुमको प्यार छिपाने की बुरी आदत है। कहीं दीप जले कहीं दिल, ज़रा देख तो आकर परवाने।

        इसीलिए उस दिन मैं तुमसे मिलने आयी थी। पिया मिलन को जाना। अंधेरी रात। मेरी चाँदनी बिछुड् गयी, मेरे घर में पड़ा अँधियारा था। मैं तुमसे यही कहना चाहती थी… मैं तुम्हारी छत पर पहुँची छत पर वहाँ तुम्हारे बिस्तर पर कोई दूसरा लेटा हुआ था। मैं लाज के मारे मर गयी। बेबस लौट आयी। आंधियों, मुझ पर हँसो, मेरी मुहब्बत पर हँसो।(4) अन्तर्जातीय प्रेम और अन्तर्जातीय विवाह बद्री पहलवान करने के लिए तैयार हैं, लेकिन वैद्य जी के समझाने पर भी गयादीन नहीं मानते। बद्री के भाई रुप्पन बाबू भी बेला से प्रेम करते हैं और उसकी याद में पत्र लिख-लिखकर फाड़ते रहते हैं। बद्री कहते हैं ‘इसने उसे खुद दो पन्ने की चिट्टी भेजी थी ! न जाने कैसी गोलमाल की बातें थीं। खुद फँसा था और कहता है कि मैं फँस गया हूँ।(5) कोई सन्देह नहीं कि रुप्पन बाबू भी बेला को मन से प्रेम करते हैं लेकिन बद्री पहलवान बेला से तन से भी प्रेम करते हैं। त्रिभुजात्मक संघर्ष प्रेम के लिए नहीं होता क्योंकि बद्री, पहलवान भी हैं बड़े भाई भी।

       ‘सीमाएं टूटती हैं’ प्रेम के धरातल पर बिल्कुल अभिनव प्रयोग है। चाँद अपने पिता के दोस्त से प्रेम करती है। विमल सलूजा उसको अपनी गोद में बालपन में खिला चुका है अपनी लखनऊ की कॉलगर्ल जूली से कहता है: “इसके पहले मैंने कभी प्यार नहीं किया था। पर अब मुझे जब उससे प्यार हो गया है तो मुझे डर लगने लगा है… वह मेरे एक दोस्त की लड़की है। मैं छियालीस पार कर गया हूँ।… नहीं, सच, सैंतालिस का होने वाला हूँ। वह तेइस साल की है। इतना ही नहीं बल्कि यह बात अपनी दूसरी कॉलगर्ल प्रेमिका से बताता है कि : उन दिनों तुम भी तेईस साल की थीं। पर, तुम दोनों में फर्क है। हम तुम बराबरी के दावे से मिले थे। तुमसे प्यार करते वक्त मुझे यह न लगा था कि मैं तुम्हारा नुकसान कर रहा हूँ। पर उसके साथ मुझे ऐसा ही लगता है कि उसे तोड़ रहा हूँ, उससे गलत फायदा उठा रहा हूँ.. सिनेमा हाल में धुँधलके में मैंने उसे पहली बार चूमा … इस प्रेम का अन्त शादी में नहीं हो सकता, आत्महत्या में भले ही हो जाए।(6) विमल सलूजा अपने अकेलेपन को भरने के लिए मासूम चाँद को शिकार बनाता है। मुखर्जी कहता है “आपको यह खेल बंद कर देना चाहिए। आप बूढ़े हो रहे हैं, वह आपकी लड़की की उम्र की है।(7) विमल सलूजा चाँद से शारीरिक भूख मिटाना चाहता है “वह एक हाथ उसकी पीठ के आर-पार ले जाकर उसे कसे हुए था। लगा, एक क्षण के लिए उसके हाथ में खून का बहाव थम-सा गया है। उसके बाद उसके हाथ का कसाव और मजबूत हो गया।(8) ऐसा नहीं कि यह शारीरिक प्रेम सिर्फ विमल सलूजा की तरफ से है बल्कि चाँद भी अपने अधूरेपन को भरना चाहती है “उसने मेरे अधूरेपन को खत्म कर दिया है। उसे प्यार करके सब तरह के रिश्ते मुझे एक जगह मिल गए हैं।(9)

      जब मसूरी अकेले में विमल सलूजा का इन्तजार करते हुए समाजशास्त्र के प्रोफेसर से महज पाँच दिन पुराने परिचय के बाद वह उसके साथ हमबिस्तर होती है तो यह बात स्पष्ट हो जाती है: ‘इस बार यह चाँद थी जिसकी हथेलियों में प्रोफेसर का चेहरा था। वे दोनों ही एक अजीब सी निस्संगता से एक-दूसरे को चूमने लगे थे… तुम्हारा हाथ मेरी कमर पर और पीठ पर कसता जा रहा है, तुम्हारा नाखून मेरी रीढ़ की हड्डी पर चुभ रहा है और यह विमल का नाखून नहीं है…. तुम्हें चूमते हुए भी मैं तुमको अपना आखिरी सुख नहीं समझ पाती।(10) चाँद प्रेम के पुराने, रूढ प्रतिमानों को तोड़ते हुए नये प्रतिमान स्थापित करती है, जिसमें परिवार से विद्रोह, परिवार का त्याग करते हुए अपने प्रेम को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है उसके लिए उम्र की भी कोई सीमा नहीं है, एकनिष्ठता का कोई अर्थ नहीं है। शायद इसीलिए प्रेम के नये प्रतिमानों, नयी परिभाषा को गढ़ती है। चाँद पर केन्द्रित कथा ‘सीमाएं टूटती हैं।

      “आदमी का जहर में हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी रूबी से इतना प्रेम करता है कि वह छुपकर अजीत सिंह से मिलने वाली रूबी को चरित्रहीन समझ बैठता है। उसका चोरी से पीछा करता है और होटल के एक बन्द कमरे में रूबी को अजीत सिंह के साथ देखकर अपना आपा खोकर अजीतसिंह पर गोली चला देता है। यह अलग बात है कि अजीत सिंह जो पीली पत्रकारिता करता है कि मौत जहर से होती है। रूबी को बचाने के लिए भी हरिश्चन्द्र आगे आता है।

       ‘मकान’ उपन्यास में अपनी पत्नी और बच्चों के होते हुए नारायण बनर्जी अपनी पुरानी शिष्या श्यामा और नई शिष्या सिम्मी के बीच मन का आश्रय ढूंढता है। श्यामा मर जाती है, सिम्मी तक पहुँचने में नारायण हिंसक उत्तेजना का शिकार होता है। अपनी शिष्या श्यामा का ट्यूटर बनने के बाद नारायण उसके साथ जबर्दस्ती करता है: “मैंने अपना हाथ बढ़ाकर उसे अपनी ओर खींचा और लुढ़कते तबलों के बीच अपने पूरे वजन के साथ लुढ़ककर वह मेरी छाती पर आ गयी… अपना एक हाथ उसके कन्धों पर कसते हुए अपने मुँह के असंयत अस्त्र से उसके मुँह पर प्रेमपूर्ण आक्रमण किया… पर श्यामा का प्रत्याक्रमण प्रेमपूर्ण न था।… उसने निर्दयता से ठेलते हुए कहा, “ठीक से बैठिए” … आप तीसरे ट्यूटर हैं जिन्होंने मेरे साथ ऐसी हरकत की है।”(11) शिक्षकों के नैतिक पतन की ओर यह अन्तिम कथन संकेत करता है। बाद में श्यामा से नारायण के संबंध कई तरह के बनते हैं; रमणी, सचिव, सखी, शिष्या। बाद में श्यामा इंजीनियर पत्नी बनती है। श्यामा मास्साब को कामुकता या लम्पटता से विमुख करने के लिए अपनी ओर से ही समर्पण का प्रस्ताव रखती है “मैंने अनिश्चय से उसकी पीठ परहाथ फेरा, उसने कहा, “तो ठीक है। आखिर में आपके ही मन की हो जाय !” उसने साड़ी का पल्ला नीचे गिरा दिया। तब उसकी साँवली, चिकनी देह का अपरूप फैलाव मेरी आँखों के आगे उद्घाटित हो गया।(12) और नारायण बनर्जी के भीतर करुणा और आत्मग्लानि का आवेग उसे कहीं ऊँचा उठा चुका था। वह श्यामा से क्षमा माँगता है।

      नारायण के जीवन में आत्म धिक्कार और आत्मग्लानि के क्षण कम नहीं हैं पर सिम्मी को निर्बाध भोग कर वह अपने को दलदल में फंसा पाता है। यहीं मोहभंग का क्षण भी था : ‘सिम्मी अपने उदास, भावहीन चेहरे के साथ मेरे पास लेट गयी। मैंने उसके साथ कुछ छेड़‌छाड़ शुरू की, रुका, छेड़छाड़ को कुछ आगे बढ़ाया और फिर एकदम से रुक गया। जैसे सिलिंडर से गैस का आंखिरी कतरा निकल चुका हो; मैं उसी सिलिंडर की तरह तख्त पर पड़ा रहा। मुझे कुछ हो गया था। प्रणय-प्रसंग का राजपथ मेरे खुला हुआ था, वहाँ से मुझे जो कुछ भी दीख पड़ा, वह मुझे कुण्ठित करता चला गया।(13) इसके बावजूद भी यह मोह बचा है कि दूर होते ही सिम्मी असाधारण रूप से आकर्षक हो जाती है और यह भी कि इस आकर्षण का नारायण की संगीत साधना से कोई विरोध नहीं है। यह चरम कामासक्ति और इस तरह की तटस्थता के साथ। यह काम और प्रेम का द्वन्द्व नारायण को महत्वपूर्ण अद्वित्तीय बनाता है। नारायण सोचता है: “यह भी कैसा प्रेम है जो पत्थर की तरह खोपड़ी पर लद जाय, जिसमें परिवार का हर प्राणी कर्तव्य-बोध के जीवन्त स्मारक की भाँति अंग प्रत्यंग से लटकने लगे ! माना कि हम और सिम्मी दोनों वयस्क हैं और हमने जो कुछ भी किया है वह साफ-साफ यह पहचानकर किया है कि एक दूसरे पर हमारा कोई दावा नहीं हो सकता, पर हम एक दूसरे को कोई भविष्य नहीं दे सकते। फिर भी यदि सिम्मी भविष्य की ओर छूटी हुई मेरी इस नाव को थोड़ी देर पकड़े रहती है, पकड़कर थोड़ी देर पानी में खड़ी रहना चाहती है, तो उसका हाथ मरोड़ने की निर्दयता क्यों दिखाई जाय ? उसे खुद ही समझने का अवसर क्यों न दिया जाय ? वह अपने आप इसे छोड़ देगी, रोती भले ही रहे पर यात्रा में बहुत विलम्ब न होने देगी।”(14) यह स्पष्ट है कि विमल सलूजा, नारायण बनर्जी जैसे पात्र चाँद, सिम्मी जैसे जरूरतमंदों को अपने कंधे का कुछ सहारा देकर अपनी कामासक्ति को पूरा करते हैं ऐसी नायिकाएँ अपने अधूरेपन को भरने वाले से छद्म प्रेम करके अपना समय काटती हैं।

      ‘पहला पड़ाव’ में सत्ते, परमात्मा जी की नयी बनती हुई कोठी में मुंशीगिरी करते हुए जिन दिवास्वप्नो में जीता है, उनमें जसोदा भी अनेक बार उभरती है। दिवास्वप्नो के अलावा सत्ते के जाग्रत मनोलोक में भी कहीं जसोदा की उपस्थिति है। कभी सत्ते की चेतना में वह उसकी लुंपेन मनोवृत्ति के आश्रय या उद्दीपन के रूप में उपस्थित होती है तो कभी सत्ते की बची खुची मानवीयता के संरक्षण में अपने को सुरक्षित महसूस करती हुई उसकी सहानुभूति और संवेदना की पात्र बनकर। जसोदा के रागात्मक मनोलोक में भी कहीं सत्ते मौजूद है, किन्तु सत्ते और जसोदा के रागात्मक संबंधों या रागात्मक आकर्षण को कथाकार ने एक सीमा से आगे महत्व नहीं दिया है।

      किशोर भावुकता और आकर्षण के स्तर से उठकर काम एक दीर्घकालिक स्थायी, चिरन्तन प्रेम में कैसे बदल जाता है, इसकी कथा है ‘राग विराग’। उपन्यास में सामाजिक स्तर पर दो दलितों की जीवन गाथा है। डॉ. लोहिया के शब्दों में कहें तो ‘पाँचवी जाति स्त्री है और उसके पढ़े-खिले रूप को अगर देखें तो वह सुकन्या है। यह पढ़ी-लिखी सुकन्या डॉक्टर व वैज्ञानिक है। दूसरी ओर कठिन संघर्ष के बाद पढ़ा-लिखा डॉक्टर, वैज्ञानिक शंकर है वह सुकन्या के प्रति इसलिए आकर्षित है क्योंकि वह भी उसके प्रति वही रूख रखती है। प्रेम और पारिवारिक पृष्ठभूमि को इस उपन्यास में एकदम नये ढंग से द्वन्द्व का क्षेत्र बनाया गया है। गरीबी-अमीरी, गाँव-शहर, बेसिक और ओढ़ी हुई कल्चर का फर्क नायक-नायिका में है इसके खिलाफ शंकर संघर्ष करता है। सुकन्या यह जानती है कि भारतीय समाज में विवाह दो व्यक्तियों के बीच नहीं हो, बल्कि उन दोनों से जुड़े हुए पूरे माहौल के बीच होता है जिसमें दोनों के परिवार, उनके परिवेश, उनका कल्चर और विश्वास सभी कुछ शामिल हैं। शंकर और सुकन्या के प्रेम के बीच यही सामाजिक हैसियत और मूल्य व्यवस्था आड़े आती है। निर्मला जैन ने प्रेम का यथार्थवादी पाठ: राग-विराग’ में लिखा है: ‘मौसी और सुकन्या के बीच संवाद का अंत, सुकन्या के जिस पश्चाताप- बोध से होता है।…. शंकर सफलता के जिस शिखर पर है, वहाँ तर्कहीनता के लिए कोई गुंजाइश नहीं। वह अपनी जीवन-परिधि से जिस तरह सायास सुकन्या को खारिज करने में सफलता पा लेता है, उसमें अब भावनात्मक दुर्बलता के लिए कोई जगह नहीं बची। एक पक्ष में पश्चाताप और दूसरे में हताशा – यही इस प्रेम-कथा की परिणति है सघन राग से अंतहीन विराग में, तर्कहीनता से तार्किकता में और भाव लोक से यथार्थ की ठोस जमीन पर।(15) जाति के कारण असफल प्रेम की कथा है ‘राग-विराग’ ।

          ‘विस्रामपुर का संत’ की शुरुआत ही सपने से होती है, जिस समय राजभवन के दीवानखाने में राज्य के मुख्यमंत्री महामहिम से मिलने का इंतजार कर रहे थे, सूद महामहिम अपने शयनकक्ष में एक सपना देख रहे थे।… आज के सपने में वह उनकी बाँहों में नहीं थी, वे खुद उसकी बाँहों में थे। पर तय नहीं था कि वह कौन थी। वह शायद सुंदरी थी, पर जयश्री भी हो सकती थी। जो भी हो, उसकी सुडौल चिकनी देह सिर से पाँव तक उनके अंग-अंग को पिघला रही थी। उसके पथरीले वर्तुल स्तन उनकी छाती में विस्फोटक उष्मा के साथ गड़ रहे थे। जागते में उनकी ढीली-ढाली, पस्त काया इस समय अचानक धधकते हुए कोयलों में बदल गई थी।… बहुत साल हुए उन्होंने सुंदरी के स्तनों को एक बार सिर्फ एक बार छुआ था। वे कड़े थे, साथ ही बहुत मुलायम भी। पर आज उन्हें सिर्फ कड़ेपन का एहसास हुआ,उन्हें लगा कि उनको सुनहरे शिलाखंडों से काटकर बनाया गया है।(16) जयंती प्रसाद अब अस्सी साल के हो चुके थे। उनकी गवर्नरी के ये कुछ आखिरी दिन थे। अपने युवावस्था में छात्रावास छोड़कर पिता के मित्र, रिश्तेदार और जमींदार के घर जाकर रहने लगे कुँवर जयंती प्रसाद सिंह। वहाँ उनका किशोरावस्था का प्रेम प्रसंग, काम प्रसंग में तब्दील हो गया : “उन्हें जितनी हैरत अपने ऊपर थी उतनी ही जयश्री पर। दोनों ही सुसंस्कृत थे और प्रेम की रहस्यवादी, आदर्शवादी कल्पनाओं पर – जो उन्हें कविता और कहानियों से मिली थी – पले हुए थे। पर यहाँ उन दोनों के बीच जो प्रेम पनपा वह ठेठ मांसलता और कारोबारी कामुकता का था। मिलते ही दोनों बदहवासी से एक दूसरे को अपनी बाँहों में बाँध लेते एक दूसरे के कपड़ों को अनभ्यस्त उँगलियों से हटाते हुए जल्दी से जल्दी एक दूसरे के खुले शरीरों तक पहुंचना चाहते थे। उन्हें पता था कि उनके पास सिर्फ गिने-चुने क्षण हैं… उन क्षणों को वे चरम उत्तेजना और भय की चपेट में बरबाद कर देते।”(17) लगभग बाइस साल की उम्र में किया गया यह काम और प्रेम का द्वंद्व उनकी शादी हो जाने और बेटे विवेक के बड़े हो जाने के बावजूद जारी रहता है : “ईश्वर और उसकी भक्ति में उनकी खास दिलचस्पी न थी, पर वे भक्तों की चरम व्याकुलता के साथ कई साल प्रार्थना करते रहे. “हे ईश्वर ! या अल्लाह ! ओ गॉड ! मुझे और कुछ भी न दो, सिर्फ चौबीस घंटे का एक ऐसा दिन दो जो बिल्कुल अकेले जयश्री के साथ बिता सकूँ ! सिर्फ एक दिन !”(18) पैंतालिस साल की उम्र में उन्हें एक बार यह अवसर मिला भी। तब जब पति को कोलकाता जाना पड़ा। जयश्री घर पर अकेली थी. उनके कोई संतान न थी तब दिनभर के इन्तजार के बाद रात के समय: “उन्होंने जयश्री का हाथ पकड़ा, कहा, “जै ! कैसी हो तुम !… जयश्री ने मुस्कराकर कहा, बहुत अच्छी हूँ। देख नहीं रहे हैं आप ? … यह एक बेचैन यात्रा का अंत है। पूर्ण विराम, फिर भी कितना अधूरा ! यह क्या किसी खामोश कब्रिस्तान में प्रेतों का खिलवाड़ भर था ?… पर बीतते हुए समय के साथ इस घटना में रोमांस, टीस और उदासी-भरी उत्कंठा के तत्त्व जुड़ते गये और व्यवहार-बुद्धि में कुशल एक बैरिस्टर के लिए आत्म-प्रवंचना की यह अँधेरी भूल भुलैया इतनी आकर्षक साबित हुई कि वह बाद में एक सर्वथा अपरिचित सुंदरी के लिए उसके सम्मोहन का आधार बन बैठी।(19) सुंदरी 20 वर्ष की थी जब 1952 में कुँवर जयंती प्रसाद सिंह से मिली उसके मिलने के 5 वर्ष पहले जयश्री का देहांत हो गया था। कुँवर जयंती प्रसाद तब 51 वर्ष के थे। भूदान आंदोलन में निर्मल भाई, सुशीला के साथ गुजरात से आई सुंदरी बेन के साथ कुँवर जयंती प्रसाद कामातुर होकर दुर्व्यवहार करते हैं जब वह उनके बँगले पर रुकती है : कुछ ही देर में उनकी दायीं हथेली सुंदरी के उरोजों पर थी।… कुछ पलों के बाद उनकी हथेली का दबाव बढ़ गया, उनकी उंगलियाँ भी सक्रिय हो गयीं। उसके दो महीने बाद की अश्लील हरकत देखने योग्य है। उन्होंने सुंदरी को अपनी बाँहों में ले लिया, कहो, “अब सुंदरी, मुझे देखो, नजदीक से, और नज़दीक से… जब उन्होंने उसके ओठों पर अपने ओंठ रखने चाहे, वह चौंकी और उनकी जकड़ से बाहर निकल आयी।…

      मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकता। मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।”(20) कामुकता की हदें लांघती संत’ जयंती प्रसाद सिंह की हरकतें सुंदरी और साथ ही उसके प्रेमी विवेक (संत के बेटे) की जिन्दगी बर्बाद कर देती है। संत’ इस अपराध को ‘खेल’ भर समझते हैं अन्ततः सुशीला द्वारा भेद खोलने पर विवेक सुंदरी के बौद्धिक प्रेम का सच जानकर प्रायश्चित में प्राण त्यागते हैं।

सन्दर्भ सूची-

  1. श्रीलाल शुक्ल – सूनी घाटी का सूरज, पृ. 128
  2. वही, पृ. 11
  3. वही, पृ. 112
  4. श्रीलाल शुक्ल – राग दरबारी, पृ. 209
  5. वही, पृ. 254
  6. श्रीलाल शुक्ल – सीमाएँ टूटती है… पृ 32
  7. वही, पृ. 94
  8. वही, पृ. 98
  9. वही, पृ. 70
  10. वही, पृ. 75
  11. श्रीलाल शुक्ल – मकान, पृ. 24
  12. वही, पृ. 120
  13. श्रीलाल शुक्ल – मकान, पृ. 120
  14. वही, पृ. 220
  15. सं. नामवर सिंह – जीवन ही जीवन, पृ. 103
  16. श्रीलाल शुक्ल – विस्रामपुर का संत, पृ. 7
  17. वही, पृ. 60
  18. वही, पृ. 61
  19. वही, पृ. 63
  20. वही, पृ. 120

डॉ चन्दन कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर( हिंदी विभाग)
राजकीय महाविघालय,पंचमोहिनी सिद्धार्थनगर