भारतीय ज्ञान परम्परा हजारों वर्ष पुराना एक जीवंत और अद्भुत खजाना है। जो वेदों, उपनिषदों और लोक साहित्य के माध्यम से विकसित हुआ है। भारत में लोक का अर्थ ‘जनमानस का अनुभवजन्य ज्ञान’ है, जबकि ‘लोक में भारत’ का अर्थ है कि किस तरह से यही ज्ञान, संस्कृति, जीवन शैली और परम्पराएँ आयुर्वेद के रूप में भारत के जन – जीवन में रची-बसी है। इसे हम एक समावेशी ज्ञान परम्परा कह सकते हैं, जो विविधतापूर्ण भौगोलिक परिवेश में भी एकता को रेखांकित करती है।
‘लोक’ शब्द को यद्यपि ‘Folk’ का पर्याय माना गया है, किन्तु सच तो यह है कि इसमें कुछ परम्परागत धारणाएँ अन्तर्भूत हैं, जिनके कारण लोक और संस्कृति को एक ही भाव माना जा सकता है। भारत में लोक (जनमानस, कला, संस्कृति) और लोक में भारत (राष्ट्र की आत्मा) का संबंध अटूट है। यह एक जीवतं परम्परा है जहाँ हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत, लोकगीत और लोक कलाएँ आधुनिक शहरीकरण के बीच भी जीवित है। यही लोक कला ही राष्ट्र की पहचान को विविधताओं के माध्यम से प्रदर्शित करती है। भारतीय दर्शन की मूल भावना ‘अनेकता’ मे एकता है, यह ज्ञान ‘स्व’ और ‘पर’ के अन्तर को मिटाकर सभी के कल्याण (सर्वजन हिताय) में विश्वास करता है। भारतीय ज्ञान नैतिकता, धर्म और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सामंजस्य स्थापित करने पर विशेष जोर देता है ।
आम नागरिक के दैनिक व्यवहार में स्पष्ट झलकता है। यह ज्ञान परम्परा सतत प्रवाहमान है और आज भी प्रासंगिक है, जो मनुष्य में पशुता को दूर कर मानवता को स्थापित करने का प्रयास करता है। भारत में लोक (जनता, संस्कृति, परम्परा) और लोक में भारत (विश्व के कोने-कोने में भारतीयता) एक दूसरे के पूरक हैं। भारत 28 राज्यों, 8 केन्द्रशासित प्रदेशों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ लोक का प्रतीक है, वहीं प्रवासी भारतीय के. रूप में भारत दुनिया भर में फैला हुआ है।
भारत विविध भाषाओं, संस्कृतियों एवं लोक मान्यताओं से परिपूर्ण देश है। यहाँ की सांस्कृतिक धरोहर का प्रमुख आधार लोक परम्पराएँ रही है, जो पीढ़ी दर पीढी मौखिक रूप से हस्तांतरित होती. रही है। इस मौखिक परम्परा में जो साहित्य संरक्षित रहा है, उसे ही लोक का साहित्य ‘लोक साहित्य’ कहा जाता है है। किसी समाज की वास्तविक अवस्था को जानने के लिए उसके लोक साहित्य का अनुसंधान वांछनीय है। लोकगीतों, गाथाओं एवं कथाओं में मनुष्यों के रहन-सहन, आचार-विचार, खान-पान, रीति-रिवाज आदि का सच्चा चित्र देखने को मिलता है। यह साहित्य न तो किसी व्यक्ति विशेष की रचना होती है और न ही इसका कोई निश्चित लेखन काल होता है। यह लोक- समूह की सामूहिक चेतना, अनुभूति और अभिव्यक्ति का स्वरूप होता है। लोक साहित्य में किसी समाज की सोच, उसके रीति-रिवाज, मूल्य, आदर्श, समस्याएँ और समाधान – सब कुछ समाहित होता है। यह साहित्य जितना सहज और सरस होता है, उतना ही शिक्षाप्रद भी।
‘किसी देश का लोक साहित्य उस देश की जनता के हृदय का उद्गार है। वह उनकी हार्दिक भावनाओं का सच्चा मार है प्रतीक है। यदि किसी देश की सभ्यता का अध्ययन करना हो तो सर्वप्रथम उसके लोक साहित्य का अध्ययन ओवश्यक होगा। लोक साहित्य जन-समाज की वस्तु है अतः उसमें जनता का हृदय लिपटा रहता है। यह साहित्य कृत्रिमता से कोसो दूर होता है।’
लोक साहित्य की उपधारा में ‘बाल साहित्य’ का भी महत्वपूर्ण स्थान है, जो विशेष रूप से बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और नैतिक विकास को ध्यान में रखते हुए रचा जाता है।
बाल साहित्य का विकास भारतीय साहित्य में अपेक्षाकृत नया है, किन्तु इसकी जड़े प्राचीन लोक साहित्य में गहराई तक मौजूद है। लोक कथायें लोक गीत, पहेलियाँ, चुटकुले, बोध कथायें कथाएँ आदि ऐसे रूप हैं, जो बच्चों को आकर्षित करते हैं और उन्हें शिक्षित भी करते हैं। इस प्रकार, बाल साहित्य और लोक साहित्य के बीच गहरा अंतसंबंध है। आज की बदलती सामाजिक संरचना, तकनीक तकनीकी प्रगति और शहरीकरण की दौड़ में पारम्परिक लोक साहित्य के स्वरूप में क्षरण आया है। बच्चों की दुनिया में अब मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने स्थान ले लिया है, जिससे वे अपने सांस्कृतिक मूल्यों से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में यह अत्यन्त आवश्यक हो गया है कि बाल साहित्य’ को लोक साहित्य’ से समृद्ध किया जाय और बच्चों को उनके मूल सांस्कृतिक बोध से पुनः जोड़ा जाय।
यह विषय इसलिए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के सर्वांगीण विकास की आवश्यकता को विशेष रूप से महसूस किया जा रहा है। शिश्ता केवल अकादमिक ज्ञान देने तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि बच्चों के चरित्र, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्माण भी उसका मुख्य उद्देश्य होना चाहिए, जो कि हमें लोक साहित्य में ही सहजता से प्राप्त हो सकता है ।
वर्तमान समय में बाल साहित्य का एक बड़ा भाग वैश्विक प्रभाव से प्रभावित है। पश्चिमी संस्कृति के साहित्यिक स्वरूप, पात्र, कथानक और भाषा हमारे बच्चों की पुस्तकों में देखने को मिलते हैं, इससे बच्चों का ध्यान स्थानीय संस्कृति और लोक परम्पराओं से हटता जा रहा है। भारत जैसे देश में, जहाँ हर क्षेत्र, हर भाषा और हर जातीय समुदाय का अपना अलग – अलग लोक साहित्य है, वहाँ यह आवश्यक हो गया है कि बाल साहित्य के निर्माण में, लोक साहित्य का समुचित संग्रह, अध्ययन और उपयोग किया जाए। जब बच्चा पाराम्भक अवस्था में लोक साहित्य के माध्यम से अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज, सामाजिक मूल्यों और पारम्परिक ज्ञान से परिचित होता है, तो वह एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनता है।
लोक कथाएं, बाल साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध मौखिक परम्परा के माध्यम से बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ नैतिक मूल्य, संस्कृति और जीवन जीने की कला सिखाती है। कहानियां कल्पना शक्ति को कबू बक्की बढ़ाती है, ज्ञान बढ़ाती है और साथ ही सही-गलत, उचित- अनुचित की समझ को विकसित करती है।
‘कथा साहित्य में भारतवर्ष संसार का गुरु रहा है। भारतीय कहानियों की द्वाप संसार के विभिन्न देशों की कथाओं पर पाई जाती है। कथा कहने की यह परम्परा चिरकाल से चली आ रही है। प्राचीन काल में बूढ़ी दादियाँ अपने बालकों को गोद में लेकर, कहानी सुनाकर उनका मनोरंजन किया करती थीं, छोटे बच्चों को पालने में सुलाकर लोरिक गा-गाकर उन्हें प्रसन्न करती थी। यह परम्परा आज भी जारी है। 22
अतः सभी देश की वृद्धाओं ने बालमनोविज्ञान के लिए कहानियाँ कही हैं। एक बीज, एक अंकुर के बिना फल-फूल या किसी वृथ्त की कल्पना कैसे की जा सकती है? गाँव से शहर तक, झोपड़ी से राजमहल तक बच्चों की लीलाओं ने लोगों को मोहित किया है। शिष्ट साहित्य में तुलसी और सूर ने राम और कृष्ण के शैशव की मधुर और मोहक आंकियों प्रस्तुत की हैं, किन्तु लोक साहित्य इससे अहुता नहीं है। लोक गीतों एवं लोक कथाओं में बाल साहित्य बिखरा पड़ा है।
भारतवर्ष के हर एक प्रान्त में, हमारी प्रत्येक प्रादेशिक बोलियों में हजारों गीत, कथा, मुहावरे, लोकोक्तियाँ और पहेलियाँ अब भी प्रचलित हैं, परन्तु हमारी यह अमूल्य सम्पत्ति प्रतिदिन दिन-प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है, और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह एक दिन विलुप्त भी हो सकती है। लोक साहित्य हमारी राष्ट्रीय निधि है, अतः इसे सुरक्षित रखना हमारा परम धर्म है।
बाल साहित्य, साहित्य से भिन्न नहीं है, किन्तु यह विशेष आयु वर्ग के लिए लिखा जाता है। जन्म के समय शिशु असीम शक्तियों से परिपूर्ण होता है। वह अपनी क्षमता के अनुसार सीखने का प्रयास करता है। बालक की वय-सीमा उसकी समझ की सीमा का निर्धारण करती है। अतः बाल साहित्यकारों का दामित्व अन्य साहित्यकारों से कहीं अधिक है। उन्हें बाल साहित्य की विभिन्न विद्याओं में सृजन करना होता है, जो बालकों के लिए हितकारी, मनोरंजक, ज्ञानवर्धक एवं उद्देश्यपरक हो। लेखन से पूर्व बच्चों की रुचि, इच्छाओं, कल्पनाओं आदि से बाबा तादात्म्य स्थापित करना आवश्यक होता है। विषय- वस्तु, शब्दावली, भाषा-शैली तथा मनोविज्ञान आदि को ध्यान में रखकर बाल-साहित्य पर लेखनी चलानी होती है। वास्तव में वही बाल साहित्यकार सफल होता है जो बाल-हृदय की गहराइयों को स्पर्श कर सके, बाल अन्र्तमन को छू सके, उनकी दृष्टि से संसार को देखे। उनकी अनोखी एवं अटपटी जिज्ञासाओं को शान्त करने के लिए नये-नये ज्ञानवर्धक एवं रोचक विषयों पर साहित्य की रचना करें।
बाल- साहित्य की रचना करते समय यह विचारणीय है कि यथार्थ निकट हो, तर्क संगत हो और मनोरंजक एवं मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि में ही विषय का चयन किया जाय जिससे बच्चों के हृदय पर सकारात्मक प्रभाव पड़े और वे इससे संस्कार ग्रहण करें।
आज की पत्र-पत्रिकाओं में लोककथा का निश्चित स्थान निर्धारित होता है, किन्तु लोककथा को उसी रूप में प्रस्तुत करना अब कठिन सा हो गया है जैसे- ‘एक राजा और रानी झूला झूल रहे थे, मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे, गीत गुनगुना रहे थे, जबकि ऐसी ही कहानियों बच्चों के मन में जिज्ञासा, कल्पना आदि को जन्म देने वाली होती हैं। बच्चों को मानव जीवन के प्रति जागरूक, आस्थावान बनाती है।
बाल साहित्य से बच्चे में सकारात्मक ऊर्जा आती है, और देश समाज के लिए कुछ करने का भाव पैदा होता है। अच्छा बाल साहित्य बच्चे की संवेदना का विस्तार करता है उसे अधिक समझदार और जिम्मेदार बनाता है साथ ही उसमें सकारात्मक संवाद की क्षमता विकसित करता है।
बर्तमान बाल साहित्य में लोक साहित्यिक तत्वों की भ्या स्थिति है। उन्हें कैसे बेहतर रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है? और किन-किन लोक विद्याओं को बाल साहित्य में समाहित किया जा सकता है, इस पर एक नजर डालने की आवश्यकता है। कई प्राचीन ग्रन्थों जैसे ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ की कहानियों पशु-पक्षियों के माध्यमरोहाच्चों को नीति, बुद्धिमत्ता, व्यावहारिक ज्ञान सिखाती है। ‘लोक कथाएँ’ और ‘दन्दकथाएँ’ मौखिक परम्परा के माध्यम से परियों की कहानियाँ, राजा-रानी के किस्से बेताल पच्चीसी और अकबर-बीरबल की कहानियों शिक्षा के साथ-साथ मनोरंजन भी प्रदान करती हैं। महाकाव्य और पौराणिक कथाएँ रामायण और महाभारत एके से उद्धत कहानियाँ जैसे प्रहलाद, कृष्ण सुदामा, लव-कुश आदि के बालक में वीरता और सौर्य के साथ-साथ चरित्र निर्माण में सहायक होती हैं। लोक कथाओं का सरल, रोचक और शिक्षाप्रद स्वरूप बच्चों की सूचि और जिज्ञासाओं को बनाये रखता है साथ ही उन्हें जीवन की जटिलताओं को सहज रूप में समझने में मदद करता है।
बाल साहित्य लोक कथाओं कहानियों के साथ-साथ बाल गीतों से भी भरा हुआ है। बालगीतों का सम्बन्ध विशेष रूप से खेलों से होता है।’ लड़के-लड़कियों के जीवन में खेल उनकी एक मुख्य प्रकृति के रूप में होते हैं। खेलों के द्वारा बालक आदिम जीबन की अनुक रणात्मक झाँक्री तो देते ही है साथ ही अपनी नैसर्गिक प्रकृति का उपयोग करके सामूहिक जीवन की कल्पना करते हैं, पारस्परिक सहयोग का पाठ पढ़ते हैं और जीवन को स्फूर्तिमय बनाते हैं23-3
माँ की ममतामयी गोद में भपकी देकर सुलाने वाले अन्यों लोरी’ को गीतों को विशेष महत्व दिया जाता है। बच्चों को तेल लगाने, दूध-भात खिलाने आदि की के गीत भी इसी श्रेणी में आते हैं। प्रत्येक माता अपने बेटे में कृष्ण की छवि देखती है, इसलिए वह स्वयं यशोदा बनकर अपने बाल कन्हैया को पालने में झुलाती है। बच्चों को सोने के लिए मीठी-मीठी लोरियों सुनाती है। भोजपुरी की एक प्रसिद्ध लोरी गीत है।-
‘चन्दामामा आरे आव, बारे आव नदिया किनारे उन आव सोने के कटोरखा में दूध-भात लेले आव बबुआ के मुँहवा में गए घुटुक 124
अवध प्रदेश में गाये जाने वाले ‘लोरी गीत’ इस प्रकार है-
‘आउ री चिरड्या, वन बसुड़ी बजाउ,
आउ री निदरिया मोरे भइया क सोवाउ ।’-5
छोटे बच्चे को बहलाने फुसलाने के लिए निम्न ब्योरी’ गीत भी गाया जाता है । कब लाल बड़ा के होइहैं बगिया कब बाबा के बानिया में जईहैं कब आम का घउभ तोरि लइहैं’ तौ आजी के आगे धरि है तौ आजी के जियरा जुड्डहै।’-6
बच्चों का प्रारम्भिक विकास खेल के माध्यम से होता है। लोक कथाओं में बच्चों के गीतमय खेलों की भी गणना की गई है। ऐसे खेल गीतों में नृत्य, अभिनय, उछलकूद, वाक्चातुर्य, बुद्धि-परीक्षा, लौकिक आचार, मनोरंजन, शिक्षा आदि का समावेश पाया जाता है। इन गीतमय खेलों से बच्चों का शारीरिक तथा बौद्धिक विकास सहज एवं स्वाभाविक रूप से होता है, इसीलिए मनोवैज्ञानिकों। ने शिक्षा की पृष्ठभूमि में खेल गीतों का महत्व स्वीकार किया है।
हमारे देश में कबड्डी का खेल प्रायः सभी प्रदेशों में प्रचलित है। इस खेल के दौरान खिलाड़ी तरह तरह के बोल बोलता है।
१. चल कबड्डी आइला, ब तबला बजाइला तबला में पइसा, लाल बंगइचा 1-7
2- आम हू आम छु अभवा बदाम छु।
3- एक कबड्डी आरा हनुमान जी ललकारा बच्चा धेरि – बेरि के मारा।”-8
बच्चों को गीतों के माध्यम से मनोरंजक कथाएँ याद कराई जाती है। एक सियार कछुवे को पकड़कर उसका मांस खाना चाहता है, किन्तु कछुवा अपने अंगों को पीठ के अन्दर समेट लेता है, वह सियार से कहता है- मुझे पानी में फुलाकर खाओ तुम्हे नरम नरम मांस मिलेगा। सियार उसे पानी में छोड़ देता है तो कहुबा कहता है-
‘अकिल के पटपट गेयान कहाँ लाइला एही अकिल पर रउवा कछुवा के खाइला 2 و
चिड़िया और चने के दाने की कथा तो लोक में बहुत प्रचलित है। एक चिड़िया को चने के चार दाने मिलते हैं। वह उन्हें तोड़ने के लिए चक्की में डालती है, दाने चक्की में फैस जाते हैं। वह बढ़ई के पास जाकर प्रार्थना करती है-
‘बढ़ई बढ़ई खूँटा फाड़ खूंटे में हैं दाने चार का खाऊँ का पीऊँ का ले परदेश जाऊँ ।’
बढ़ई खूँटा फाड़ने को तैयार नहीं होता है, तब वह राजा से फरियाद करती है, कहती है-
‘राजा राजा बढ़ई मार बढ़ई बढ़ई खूँटा फाड़ खूँटे में हैं दाने चार का खाऊँ का पीऊँ काले परदेश जाऊँ ।’
राजा भी उसे मना कर देता है तब वह क्रमशः रानी से राजा को डोटने के लिए, सौप से, रानी को इंसने के लिए, लाठी से सबके साँप को भाने मारने के लिए, आग से लाठी को जलाने के लिए, पानी से आग को बुझाने के लिए, हाथी को पानी पीने के लिए, जाल को हांथी को बांधने के लिए, चूहे को जाल काटने के लिए कहती है, पर सभी उसका काम भरोसे से इन्कार कर देते हैं। तब वह बिल्ली से कहती है तुम चूहे को मारकर खा लो। चूहे का नाम लेते ही बिल्ली के कुछ मुख में पानी आ जाता है। वहचूहे को खाने दौड़ती है तो चूहा भय से जाल काटने के लिए, जाल होथी को बाँधने के लिए, हाथी पानी पीने के लिए, पानी आग बुझाने के लिए, आग लाठी को जलाने के लिए, लाठी साँप को भारने के लिए, साँप रानी को इसने के लिए, रानी, राजा को डोटने के राजा बबो बढई को मारने के लिए और बढ़ई खेटा फाड़ने के लिए तैयार हो जाता है और चिड़िया सपने दाने पाकर हँसी-खुशी चली जाती है।
गीत चाहे बच्चों के हो अथवा बड़ों के उनमें कोई न कोई उद्देश्य, कोई न कोई रहस्य अवश्य छिपा होता है। ग्रामीण जनचेतना बच्चों को खेल गीत के माध्यम से जीवन के यथार्थ का अनुभव कराती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोक साहित्य बालकों के मनोरंजन और शिक्षा का माध्यम है। दादी-नानी की कहानियाँ गीत, त्योहारों की कहानियाँ इत्यादि बच्चों को लोक संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करती हैं, लेकिन शहरी और आधुनिक परिवेश में यह परम्परा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। इस स्थिति में शिक्षा प्रणाली और बाल साहित्य- कारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे लोक कथाओं को, जो कि बाल साहित्य की अमूल्य धरोहर है, इस विरासत को पुनजीवित करें और अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ ।
यह भी सत्य है कि भारत सरकार और कई गैरी गैर- सरकारी संस्थाएँ बाल साहित्य के थक्षेत्र में कार्य कर रही है, परन्तु अधिकांश कार्य अंग्रेजी या शहरी परिवेश में सीमित हैं, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध लोक साहित्य को बच्चों के लिए तैयार किया जाए।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1- भोजपुरी लोक साहित्य, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी । पृ.-9,
2- भोजपुरी लोक साहित्य, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय पृ० १, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।
3- बालगीत, ‘लोकगीतों के सन्दर्भ एवं आयाम, डॉ. शान्ति जैन प्र० 186
4 लोक गीतों के सन्दर्भ एवं आयाम, डॉ. शान्ति जैन ५० 488 ड वही
6- लोक साहित्य की रूपरेखा, डॉ० सत्यनारायण दुबे ‘शरतेन्दु’
7- लोक गीतों के सन्दर्भ और आयाम, खेल गीत’, डॉ० शान्ती जैन, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी पृ० 495 |
8- वही ५० 4961
9- वही पृ० 4021
10- राजस्थानी लोकगीत, किरण सिंघवी
11- हरिहर त्रिपाठी, बाल साहित्य सिद्धान्त और अभ्यास, लखनऊ, बाल साहित्य प्रकाशन 2017/
12- विजय चौहान, ‘लोक साहित्य और सांस्कृतिक पहचान जमपुर, संस्कृति संस्थान प्रकाशन, 20161
13- राकेश मिश्रा, बाल साहित्य और लोक कला लखनऊ : लोक कला अकादमी, 2015।
14- शैलेन्द्र वर्मा, लोक साहित्य की आधुनिक प्रवृतियाँ, इलाहाबाद, हिन्दी अध्ययन संस्थान, 2019 /
15- विभा सिंह, बाल साहित्य में लोकगीतों का समावेश, लखनऊ। बाल साहित्य समिति, 2017 1
डॉ० नीलू सिंह
सहायक प्राध्यापिका (हिन्दी-विभाग) गाँधी स्मारक पी० जी० कॉलेज समोधपुर, जौनपुर
उत्तर-प्रदेश






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