भूमिका:

          असम पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों में से एक है । यह पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है ।  यहाँ अनेक जाति – जनजाति के लोग निवास करते हैं  और सबकी भाषा – संस्कृति अलग अलग है । अतः इस आधार पर कहा जा सकता है कि असम की संस्कृति एक मिली – जुली संस्कृति है । असम में मुख्यतः असमिया भाषा बोली जाती है ।  मोटे तौर पर असमिया समाज में विभिन्न समय असम आये हुए विभिन्न जनगोष्ठियों का प्रभाव परिलक्षित होता है । 

        साहित्य की दृष्टि से असमिया साहित्य भंडार काफ़ी सम्पन्न है । असमिया साहित्य भंडार  में लिखित साहित्य के साथ – साथ लोक साहित्य की भी कोई कमी नहीं है । यू कह सकते है कि असम लोकसाहित्य का भंडार है । लोक साहित्य का निर्माता असम  के जातीय समाज है । लोक साहित्य के द्वारा लोक समाज अपने मन की भावनाओं को अपने तरीके से व्यक्त करते हैं । लोक साहित्य असमिया समाज के हर वर्ग के लोगों के जीवन को दर्शाता है । 

        ‘लोकगीत’ असमिया लोकसाहित्य का एक अविच्छिन्न अंग है । इन गीतों में असमिया लोकसमाज के जनमानस के सुख – दुख ,अनुभूति ,परंपरा ,विश्वास तथा संस्कृति के अनेक पक्ष मुखर हो उठा है । अन्य गीतों की तरह लोक गीतों में कोई विशिष्ट संगीत पैमाना नहीं होता ।यह सरल,स्वच्छन्द एवं मधुर होता है ।  ये गीत विभिन्न उत्सव ,पर्व ,त्योहार आदि पर गाये जाते हैं । उनमें से कुछ इस प्रकार है – विवाह गीत , बिहु गीत , श्रम गीत ,आई नाम (शीतला माता  पूजन के गीत ), निचुकनि गीत (लोरी ), बाल गीत , बारह महीनों के गीत , देव – देवी पूजन के गीत आदि । 

विवाहगीत का स्वरुप:

       असमिया समाज जीवन में विवाह को एक अलग ही मर्यादा प्राप्त है । विवाह संस्कार असमिया समाज में सबसे प्रसिद्ध और प्रधान है ।  विवाह समारोह में ‘आयती’ कहे जाने वाली बुजुर्ग महिला अक्सर एक गीत गाती है जिसे ‘विवाह गीत’ कहा जाता है । ये विवाह गीत असमिया लोकसाहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है जो असमिया समाज जीवन तथा संस्कृति से लोगों को परिचित कराता है ।यद्यपि ये गीत स्वत: स्फूर्त है फिर भी इन गीतों के माध्यम से नारी मन की अनुभूति, दूल्हा – दुल्हन के रूप – सौन्दर्य ,वैवाहिक जीवन में एक नारी की कर्तव्य तथा दायित्व  आदि विषयों का वर्णन किया गया है । असमिया समाज में विवाह संस्कार में जोरोण (चढ़ावा),पानी तोला , नोवनी गीत (स्नान गीत), दूल्हे का स्वागत, पंडाल सजावट ,बेटी विदाई आदि कई सारी विधियों का पालन किया जाता है और प्रत्येक विधि में अलग – अलग  गीत गाये जाते हैं । 

        असमिया लोकसंस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और समाज का सांस्कृतिक उत्सव होता है। इस उत्सव में गाए जाने वाले विवाह गीत असमिया लोकजीवन, परंपराओं और सामूहिक ज्ञान के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ये गीत पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से संप्रेषित होते रहे हैं और इनमें समाज की जीवन-दृष्टि, नैतिक मूल्य, पारिवारिक संबंधों की समझ तथा सांस्कृतिक आस्थाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

असमिया विवाह गीतों में प्रतिफलित परंपरागत ज्ञान:

        असमिया विवाह गीत (बिया-नाम) असमिया समाज जीवन और असमिया संस्कृति की पहचान है।  ये गीत केवल मनोरंजन या रस्मों का हिस्सा नहीं होते, बल्कि इनमें समाज का गहरा परंपरागत ज्ञान (Traditional Knowledge) निहित होता है। विवाह गीतों में परिवार के महत्व, रिश्तों की मर्यादा और कर्तव्यों का ज्ञान मिलता है। इन गीतों में नैतिक मूल्यों जैसे विनम्रता, सहनशीलता, प्रेम, और त्याग का संदेश दिया जाता है। देवी-देवताओं का स्मरण, शुभ-अशुभ की मान्यताएँ और धार्मिक रीति-रिवाजों का वर्णन होता है। पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा से चले आ रहे हैं ये गीत जीवन के विभिन्न पहलुओं की शिक्षा देते हैं।

1.सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों का ज्ञान :  

         असमिया लोकसंस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और अनेक रिश्तों के जुड़ने का पवित्र अवसर होता है। इस अवसर पर गाए जाने वाले विवाह गीत (बिया नाम) केवल मनोरंजन के लिए नहीं होते, बल्कि उनमें पारिवारिक संबंधों, भावनाओं और सामाजिक मूल्यों का सुंदर चित्रण मिलता है। असमिया विवाह गीतों में माता-पिता, भाई-बहन, सास-बहू, देवर-भाभी आदि अनेक रिश्तों की झलक दिखाई देती है।

      सबसे पहले, इन गीतों में माता-पिता और बेटी के संबंध का मार्मिक चित्रण मिलता है। विवाह के समय जब बेटी अपने घर से विदा होती है, तब गीतों में माता-पिता के स्नेह, चिंता और भावनात्मक लगाव को व्यक्त किया जाता है। गीतों में यह भावना दिखाई देती है कि बेटी घर की शान और माता-पिता की प्यारी होती है, इसलिए उसकी विदाई का क्षण अत्यंत भावुक होता है।

‘हातत पान बटा ले देउतारक माता गे

मरमर देउता ए जाबले उलालो

जाबे समयत सेवाहे जनाइछो।’1

(विदाई के वक्त हाथ में ताम्बूल और पान लेकर अपने माता-पिता को सेवा करके दुल्हन विदा ले रहे हैं।) यह दुल्हन के विदाई के वक्त गाया जाता है। इसमें दुल्हन माता-पिता से आशीर्वाद लेकर विदा ले रही है।

       दूसरा महत्वपूर्ण संबंध भाई-बहन का रिश्ता है। विवाह गीतों में भाई का अपनी बहन के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का भाव दिखाई देता है। कई गीतों में भाई अपनी बहन की खुशी और सुरक्षा की कामना करता है। इसी प्रकार बहन भी अपने भाई के प्रति स्नेह और कृतज्ञता प्रकट करती है।

“पाहरि नाजाबा बाईदेउ

भनी आरु भाई

मरमो नेरिबा बाईदेउ

रामचंद्रक पाइ।”2

      अर्थात प्यारी दीदी भाई बहन को भूल न जाना। रामचंद्र स्वरुप पति को पाकर हमारे लिए तुम्हारा प्यार कम न करना।

     दुल्हन की विदाई के समय गाए जाने वाले गीतों में माता-पिता के प्रति सम्मान, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और नए घर में समायोजन की शिक्षा निहित होती है। इस प्रकार ये गीत सामाजिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बनते हैं।

2.नैतिक ज्ञान: 

     विवाह के बाद एक लड़की अपनी माँ का घर, परिवार तथा समाज को छोड़कर एक नए घर, परिवार तथा समाज में चली जाती है। उस नए घर  में  जाकर वह अपनी नारी सुलभ स्नेहमयी ममतामयी रूप से, त्याग और सहनशील होकर स्वामी गृह में सबके साथ मिलकर रह सके तथा सबका प्रिय बन सके इसके लिए भी विवाह गीतों के माध्यम से कई सारे नैतिक ज्ञान दिया जाता है, जैसे:

“शहुरक मानिबा देउतारर दरे,

शाहू आइक देखिबा मारर दरे।

देउरक जाचिबा भाइटिर मरम,

ननदक करिबा भनीटिर मरम।

आलही अतिथिक खुदिबा सदाय,

चेनेहर मात येन आताये पाय।

यतने करिबा बुवारी वन,

सेयेहे जानिबा नारीर धरम।”3

      अर्थात ससुर जी को अपने पिता की तरह मानना और सासु माँ को अपनी माँ की तरह। देवर को अपने भाई की तरह प्यार देना और ननद को अपनी बहन की तरह। अगर घर में कोई मेहमान आये तो उन्हें स्नेह से सेवा करना। सबके साथ प्यार से बातें करना यही एक बहु का सच्चा धर्म है।

  1. विवाह के अनुष्ठान और संस्कार :

         यद्यपि ये गीत स्वत: स्फूर्त है फिर भी इन गीतों के माध्यम से नारी मन की अनुभूति, दूल्हा – दुल्हन के रूप – सौन्दर्य ,वैवाहिक जीवन में एक नारी की कर्तव्य तथा दायित्व  आदि विषयों का वर्णन किया गया है । असमिया समाज में विवाह संस्कार में जोरोण (चढ़ावा),पानी तोला , नोवनी गीत (स्नान गीत), दूल्हे का स्वागत, पंडाल सजावट ,बेटी विदाई आदि कई सारी विधियों का पालन किया जाता है और प्रत्येक विधि में अलग – अलग  गीत गाये जाते हैं । इन विवाह गीतों में दूल्हा और दुल्हन की तुलना राम – सीता से की गई है ।यहाँ तक कि ‘आयति’ इन विवाह गीतों के माध्यम से कल्पना करते हैं कि दूल्हा और दुल्हन के घर अयोध्या और मिथिला में है। 

        असमिया विवाह का पहला खंड ‘जोरोण’ है । असमिया विवाह संस्कार में एक रस्म है जहाँ दूल्हे के घर से दुल्हन के लिए शादी का जोड़ा, गहने आदि भेजा जाता है । जिसे पहनकर दुखन विदा होती है । इस रस्म को ‘तेल दिया’ए  रस्म भी कहा जाता है । इस अवसर पर जो गीत गाये जाते है उन गीतों को ‘जोरोण गीत’ कहा जाता हैं । इन गीतों में दूल्हा – दुल्हन के रूप में राम – सीता तथा दूल्हा –दुल्हन के माता – पिता के रूप में राजा जनक, दशरथ, कैकयी, सुमित्रा आदि का भी जिक्र मिलता है । एक उदाहरण इस प्रकार है – 

मारार अलंकार थोवा काति करि

राम देउतारार अलंकार थोवा है।

रामे दि पठाइछे विचित्र अलंकार

राम हाते योरे करि लोवा है।

कैकयी आहिछे सुमित्रा आहिछे

आहिछे रामरे माउ।

जनकर जियरी जानकी सुंदरी

जोरोन पिन्धाये आजि चाउ।। “4

(कामरूपी लोकगीत, पृ.87)

      अर्थात यहाँ दुल्हन को कहा गया है कि अब तुम अपनी माँ तथा पिताजी का दिया हुआ अलंकार खोल दो। रामचंद्र जैसे तुम्हारे स्वामी ने विचित्र अलंकार भेजा है दोनों हाथ जोड़ कर उसे ग्रहण करो।  कैकयी, सुमित्रा और राम की माता भी आयी है राजा जनक की बेटी जानकी सुंदरी को आज अलंकार पहनाकर देखते है।  

         असमिया समाज में विवाह संस्कार में एक महत्वपूर्ण रस्म हैपानी तोला इसमें गाँव की महिलाएं पास की नदी या तालाब से कलस में पानी लाते है और बाद में उसी पानी से दूल्हा  – दुल्हन को नहाया जाता है। पानी लाने जाते समय सभी महिलाएं हर्षोल्लास के साथसाथ नृत्यगीत भी करते है। इस अवसर पर जो गीत गाये जाते है उसे ‘पानी – तोला’ गीत कहा जाता है। एक उदाहरण इस प्रकार है

जोन बेलि छकुरि गोपीनी

जोन बेलि जोने चिकेमिकाय

तरा मइ बोलो किबा फूल फुले।

जोन बेलि रामचंद्रर पदुलित

जोन बेलि छकुरि गोपीनी

तरा पारे बुले येन बुले।।5

(बार माहर तेर गीत, पृ.21)

3.प्रकृति और जीवन का ज्ञान:

              दूसरा महत्वपूर्ण पहलू प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध का है। असमिया लोकगीतों में नदियों, पेड़ों, फूलों और पक्षियों का उल्लेख बार-बार मिलता है। विवाह गीतों में भी प्रकृति की सुंदरता और उसके प्रतीकों के माध्यम से जीवन के विभिन्न भावों को व्यक्त किया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि असमिया समाज का पारंपरिक ज्ञान प्रकृति के साथ गहरे संबंध पर आधारित है।

“आग फालर शुवनी काकनी तामोल ऐ,

पिछफालर शुवनी पान,

बर घररे शुवनी जीयरी छोवाली,

उलियाई दिबलै टान।”6

    अर्थात जिसप्रकार आंगन की शोभा ताबोल है और बाढ़ी की शोभा पान से है, उसी प्रकार घर की शोभा जवान बेटियों से बढ़ती है, जिन्हें विदा कर देना बहुत मुश्किल है।

एक और उदाहरण इस प्रकार है:

पदुली मुखते बकुल फूल फुलिले

अइ राम तार माझे बेलरे शारीहे ।

चोवा मूर दाङि आमार रामचन्द्र

अइराम देखिया शहूरर बारिहे ।”7

(कामरूपी लोकगीत ,पृ॰ 8 9)

    अर्थात आँगन के सामने बबूल के फूल खिल रहे है और उसके बीच में बेल का पेड़ है । हे रामचंद्र चेहरा उठाकर अपने शशुर  के घर को देख लो । 

       असमिया ग्रामीण समाज में प्रचलित है कि  घर के दहलीज में बबुल और बेल के पेड़ लगाने से औषधीय  लाभ होता है। घर के चारों तरफ शुद्ध वायु प्रवाहित होता है। जिसे इस विवाह गीत के माध्यम से कहा गया है।

        असमिया समाज जीवन ताम्बोल और पान का विशेष महत्व है। हर शुभ काम में इसका प्रयोग होता है। ग्रामीण असम बुजुर्ग लोगों का मानना है कि ताम्बोल का पेड़ हमेशा घर के सामने लगाना चाहिए और पान को हमेशा घर के पीछे तभी इसका फल अच्छा होता है।

       इसके अतिरिक्त, इन गीतों में स्त्री जीवन के अनुभवों और भावनाओं का भी सजीव चित्रण मिलता है। विवाह के अवसर पर महिलाएँ सामूहिक रूप से गीत गाती हैं, जिनमें हास्य, व्यंग्य, स्नेह और भावुकता का मिश्रण होता है। इन गीतों के माध्यम से स्त्रियाँ अपने अनुभवों, सलाह और जीवन की सीख को साझा करती हैं। इस प्रकार विवाह गीत स्त्री-केंद्रित ज्ञान परंपरा को भी संरक्षित रखते हैं।

  1. धार्मिक विश्वास और पौराणिक कथाएँ:

        असमिया विवाह गीतों में धार्मिक और सांस्कृतिक आस्थाओं का भी प्रतिबिंब दिखाई देता है। इनमें देवी-देवताओं का स्मरण, शुभकामनाएँ और मंगल कामनाएँ व्यक्त की जाती हैं। इससे यह पता चलता है कि विवाह केवल सामाजिक संस्था ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विश्वासों से भी जुड़ा हुआ है।

          जब इन विवाह-गीतों में विवाह के विभिन्न दिशाओं और प्रक्रियाओं को  प्रस्तुत किया जाता है। इनमें कल्पना का सहारा लेकर मनुष्य के मन को एक कल्पनात्मक संसार में ले जाने का प्रयास किया जाता है। इन गीतों में पौराणिक कथाओं के पात्रों को आधार बनाकर  विवाह संस्कार की सामाजिक  की मर्यादा को बढ़ाया जाता है।

      कृष्ण-रुक्मिणी, हर-गौरी, अर्जुन-सुभद्रा, राम-सीता, उषा-अनिरुद्ध, बेउला-लखिंदर आदि पात्रों को आदर्श दंपति के रूप में प्रस्तुत करके वर और वधु को आशीर्वाद तथा उपदेश दिया जाता है। विवाह कार्य समाप्त होने के बाद जब दूल्हा दुल्हन को लेकर घर चले जाते है तब इस प्रकार गाया जाता है :

“सीताक लौ रामचंद्र अयोध्यालै याय।

नगरर प्रजासवे बेड़ी बेड़ी चाय।

धनु भांगी रामचंद्रे सीताक लेया याय।”8

        अर्थात सीता को लेकर राम अयोध्या नगरी चले जाते है, नगर के लोग उनको देखने के लिए चारों तरफ घेर लेते है। राम ने धनुष तोड़ कर सीता को लेकर जाते है।

      आदर्श पुरुष और नारी के रूप में प्रतिष्ठित ये पात्र विवाह के आचार-अनुष्ठानों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। ग्रामीण समाज की अशिक्षित महिलाएँ भी अपनी अनुभवों के आधार पर दूल्हा और दुल्हन को  जगत और जीवन के बारे में अनेक प्रकार की सीख देने का प्रयास करते है।

 निष्कर्ष :     

       अंततः कहा जा सकता है कि असमिया विवाह गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे परंपरागत ज्ञान, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहर के महत्वपूर्ण वाहक हैं। इन गीतों के माध्यम से असमिया समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक परंपराओं और जीवन के अनुभवों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुरक्षित रूप से पहुँचाता रहा है। इसलिए असमिया विवाह गीतों का संरक्षण और अध्ययन असम की समृद्ध लोकसंस्कृति को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है। 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची – 

1.बाबुल दास: ‘कामरूपी लोकगीत’, असमिया लोकगीत का परिचय (संपादक :बाबुल दास ), स्टूडेंटच स्टोरच, गुवाहाटी, प्रथम संस्करण,2011,पृष्ठ87

  1.  प्रफुल्लदत्त गोस्वामी : बार माहर तेर गीत, कलकत्ता, प्रथम संस्करण , गीता प्रकाशन, 2012, पृष्ठ 22
  2. वही , पृष्ठ – 21 । 
  3. बाबुल दास :’कामरूपी लोकगीत’, असमिया लोकगीत का परिचय (संपादक : बाबुल दास) स्टूडेंटच स्टोरच, गुवाहाटी,प्रथम संस्करण, 2011, पृष्ठ89 । 
  4. केशदा महंत :आसमिया रामायणी साहित्य : कथावस्तुर आँतीगुरि,  महंत प्रकाशन, जोरहाट, प्रथम संस्करण, 1990,पृष्ठ – 707 । 
  5.  प्रफुल्लदत्त गोस्वामी : बार माहर तेर गीत, कलकत्ता, प्रथम संस्करण , गीता प्रकशन 2012, पृष्ठ 24
  6. वही ,पृष्ठ – 31 । 
  7. वही, पृष्ठ-32।
  8. वही, पृष्ठ-62।
डॉ. अर्चना हज़ारीका
सहायक प्राध्यापिका
हिंदी विभाग
नॉर्थ लखीमपुर विश्वविद्यालय, असम
ईमेल- archana.h.ghy@gmail.com