लोक साहित्य एक जीवंत सामूहिक चेतना का विश्लेषण है जिसमें किसी समाज की संस्कृति, रीति रिवाज़ें, पहनावे और खान पान का प्रामाणिक दसतावेज होता है। लोक साहित्य का अध्ययन केवल अतीत की स्मृतियों का संचयन नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृतियों का पहचान है। यह हमारे संस्कृति का वास्तविक दर्पण है जो समाज की जड़ों में निरंतर प्रवाहित हो रही है। लोक साहित्य किसी लिखित भाषा का साहित्य नहीं है बल्कि यह मौखिक रूप से प्रचलित जन मानस की सामूहिक अभिव्यक्ति है। अपनी क्षेत्रीय बोलियों में रचे गए लोक साहित्य के माध्यम से हमारी संस्कृति एक पीढी से दूसरी पीढी तक पहूंचती है। जहां संस्कृति लोक साहित्य को जन्म देती है और लोक साहित्य संस्कृति को समृद्ध बनाती है। लोक साहित्य का सामान्य अर्थ इस प्रकार है, जो साहित्य सामान्य लोक द्वारा, लोक के लिए लोक की भाषा में रचा गया है। जिसमें लोकगीत, लोककथाएं, कहावतें और पहेलियां शामिल होता है।

                  लोक शब्द का व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘लोकृ दर्शने’ से संबंधित है, जिसका का अर्थ है ‘देखने वाला’ । ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग कई बार देख सक्ता है, जो लोक साहित्य के प्राचीन और मौलिक आधार को दर्शाता है । व्यावहारिक स्तर पर ‘लोक’  उस जन-समूह को कहते हैं जो शास्त्रीयता, पांडित्य और अभिजात्य संस्कारों के अहंकार से शून्य है। और वह कृत्रिम नागरी सभ्यता और शास्त्रीय जटिलताओं से मुक्त होकर अपनी सहज संस्कृति से युक्त होकर सहज स्वाभाविक जीवन जीते है। लोक साहित्य की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते है कि, “जो चीजें लोक चित्त से सीधे उत्पन्न हों साधारण जन को आन्दोलित करती हैं वे ही लोक साहित्य नाम से पुकारी जाती हैं”1। लोक साहिय के बारे में डॉ धीरेद्र वर्मा का विचार है-“ऐसी मौलिक अभिव्यक्ति जो लोक की युग-युगीन वाली साधना में समाहित रहते हुए जिसमें लोक मानस प्रतिबिंबित रहता है, लोक साहित्य है। वह मौखिक अभिव्यक्ति है। और सामान्य जन समूह उसे अपना मानता है”2

                  लोक साहित्य किसी एक व्यक्ति की बौद्धिक संपत्ति नहीं ,यह किसी ‘अज्ञात रचनाकार’  की अत्भुत स्रुष्टी का पहचान है, जो हमारे समुदाय की सामूहिक विरासत पर निर्भर रहती है। यह शास्त्रीय सिद्धांतों, छंदों और व्याकरणिक कठोरताओं के बंधनों से मुक्त होकर जनसामान्य का सहज एवं अनुभूतीपरक साहित्य होता है। सामान्य जनजीवन के सांस्कृतिक परंपरा को मौखिक रूप से प्रचलित करने वाले लोक साहित्य को जनता का ज्ञान के रूप में माना जाता है। अकृत्रिम एवं सहज सरल भाषा में प्रचलित लोक साहित्य अपने विभिन्न रूपों से लोक संस्कृति का झलक देता है। लोक साहित्य का प्रभाव हमारे शिष्ट समाज पर बहुत गहराई से पड़ता है। लोक साहित्य लोक संस्कृति का ही प्रतीक है। किसी देश की लोक जीवन वहां की संस्कृति से जुड़ते है। लोक जीवन को समझाने के लिए लोक साहित्य एवं संस्कृति का अध्ययन महत्वपूर्ण है। लोक साहित्य के अध्ययन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए डॉ सत्या गुप्त कहते है की, “वस्तुता :किसी भी देश के लोक साहित्य का अध्ययन उनकी सभ्यता ,संस्कृति, धर्म , रीति रिवास, कला एवं साहित्य ,सामाजिक जागरण  एवं आकांक्षाओं का सूक्ष्म अवलोकन करने में सहायक होता है”3। लोक साहित्य की असली पहचान में अनेक तत्व शामिल होता है जो ऐतिहासिक, भौगोलिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और पौराणिक विषयों के साथ भाषा, कला, संगीत एवं व्याकरणिक स्तर पर निर्भर रहती है।

              लोक साहित्य किसी भी देश की अस्मिता का प्रतीक होता है। लोक साहित्य सामान्य जनता के रहन-सहन, वेशभूषा, खान-पान और उनके सूक्ष्म सुख-दुखों का प्रामाणिक विवरण को प्रस्तुत करता है समकालीन साहित्य भी लोक साहित्य से समृद्ध है, जो लोक बोलियों से ऊर्जा प्राप्त करते हुए लोक बोलियां, शब्दावली और मुहावरे युक्त भाषा से आधुनिक साहित्य को जीवंतता प्रदान करते हैं । इसके अतिरिक्त, लोक साहित्य सामाजिक न्याय, सहिष्णुता और नैतिकता पर बल  देता है । लोक साहित्य अभिव्यंजक संस्कृति का एक हिस्सा है जो  एक विशिष्ट समूह, संस्कृति या उपसंस्कृति द्वारा साझा की जाती है । समकालीन भारतीय साहित्य, प्राचीन मिथकों और लोक कथाओं को आधुनिक दृष्टिकोण से पुनः लिखने की प्रयास  करती है। क्योंकि समकालीन साहित्य में लोक संस्कृति का अभिव्यक्ति केवल पुरानी यादों का संकलन के रूप में नहीं , बल्कि आधुनिकता की अंधी दौड़ के खिलाफ एक प्रतिरोध के रूप में चित्रित करती है। समकालीन हिन्दि साहित्य में लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति का झलक अत्यंत महत्वपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करती है। जिस प्रकार लोक जीवन एवं सांस्कृतिक चेतना को उजागर करने वाले समकालीन रचनाकारों में गिरिराज किशोर का नाम अग्रिम पंक्ति का है।

                   समकालीन हिन्दी कथा साहित्य में गिरिराज किशोर का स्थान उन मूर्धन्य कथाकारों में से हैं जिन्होंने अपने उपन्यासों में समाज के सूक्ष्म पहलुओं, जैसे  लोक जीवन और लोक संस्कृति को गहराई से अंकित किया गया है। उनके उपन्यासों में लोक साहित्य केवल रचना के सजावट के लिए नहीं, बल्कि पात्रों के मनोविज्ञान और सामाजिक परिवेश को जीवंत करने के लिए प्रयुक्त करती है। गिरिराज किशोर जी ने ऐसे कथाशिल्पी के रूप में अंकित किया गया  है, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से भारतीय लोक जीवन की धड़कनों को आधुनिक संवेदना के साथ जोड़ने का भगीरथ प्रयास किया है। मुज़फ़्फ़रनगर की मिट्टी में जन्मे और पले-बढ़े गिरिराज किशोर ने सामंती जीवन की परिवेश और संस्कृति को ही नहीं मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियों को ही देखा। उनके उपन्यासों में लोक साहित्य का चित्रण केवल लोकगीतों या मुहावरों के सतही प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक गहरी सांस्कृतिक दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता का परिणाम के रूप में अंकित किया गया है। उनके औपन्यासिक फलक पर ‘लोग’ से लेकर ‘पहला गिरमिटिया’ तक की यात्रा वास्तव में भारतीय लोक-चेतना के क्रमिक विकास और उसके संघर्षों की सफल यात्रा का चित्रण है । गिरीरराज जी ने समाज के विविध वर्गों, विशेषकर दलितों, वंचितों और मज़दूरों के जीवन को अत्यंत निकटता से देखने के कारण उनके उपन्यासों में अभिव्यक्त लोक तत्व केवल सजावट के लिए नहीं हैं, बल्कि वे पात्रों की नियति और उनके सामाजिक परिवेश को गहराई से प्रस्तुत करने के लिए प्रयुक्त किया है।

                  लोक साहित्य केवल मौखिक कथाओं तक सीमित नहीं है, इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक स्तर पर फैल गया है। लोक गीत, लोक कथा, लोक गाथा , लोकनाट्य, मुहावरे और कहावतें, पहेलियां आदि का प्रयोग आधुनिक साहित्यिक सौन्दर्य को आगे बढ़ते है। लोक गीत जनमत द्वारा विशेष परिस्थितिवश स्थल काल, कर्म, संस्कारों से युक्त अनुभूतियों की सामूहिक अभिव्यक्ति है। जिसमें लोक संस्कृति का चित्र अवश्य मिल जाते हैं। “लोकसाहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. कुन्दनलाल ने बड़े सहज रूप में लोकगीत की व्याख्या करते हुए कहा है कि- ‘लोकगीत लोक की सहजानुभूति की सरल वाणीगत अभिव्यक्ति है। इसकी सर्जना में वैयक्तिक अनुभूतियाँ ही उभर कर नहीं आती वरन् उसकी लोकानुभूति की प्रधानता रहती है, और अनुभूति का यही रूप साकार होकर लोकमानस की अनुभूति बन जाता है”4। किशोर जी के उपन्यासों में विशेषकर ‘ढाई घर’ और ‘पहला गिरमिटिया’ में लोक गीतों का प्रयोग केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि अवसरों की पहचान एवं पात्रों की भावनाओं की सफल अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त करती है। उन्होंने भारतीय समाज के जन्म, विवाह, मुंडन जैसे संस्कारों में गाए जाने वाले गीतों को कथानक का हिस्सा बनाया है जो भारतीय लोक मानस की खुशी और वंश वृद्धि की आकांक्षा को दर्शाता है। ‘ढाई घर’ में विवाह के दृश्यों के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक गीतों का वर्णन है, ये गीत केवल रस्म नहीं, बल्कि परिवारों के बीच के मधुर संबंधों और हंसी-मजाक की लोक परंपरा को जीवित करते हैं। ‘पहला गिरमिटिया’ उपन्यास में जब भारतीय मजदूर दक्षिण अफ्रीका के खेतों में काम करते हैं, तो वे अपनी मातृभूमि की याद में मुक्तानंद की ‘भजन’ गाते हैं।जैसे-

     “जब तू मेरे जीवन के, हर साँस और काम में आ बसेगा।

तभी मैं अपने को, तेरी कृपा का अंग समझेंगा”5

उपनिवेश की भूमि में पीढ़ित लोगों की भूख और विवशता को चित्रित करते हुए एक लोग गीत का उल्लेख करती है –         “ मूंड उडाएँ तो डणडे मारें

खड़ें हों तो धरती पर डालें,

गोरी- काली गाली देंवें

साला कहें ,ससुरा कहें,

बाकी समझ न पावें”6

                गिरिराज जी ने अपने उपन्यासों में विचारों की बौद्धिक उच्चता के लिए उद्धरण शैली का प्रयोग किया है और जिसके द्वारा परिवेश को जीवन्त बनाया। और उन्होंने  वातावरण को समृद्ध बनने के लिए कहीं कुछ कविता या गीतों की पंक्तियों को उद्धरणी के रूप में ले लेती हैं जिसका उदाहरण है तीसरी सत्ता की मिसेज शर्मा। वह अपने पति से त्रस्त होकर अपने हृदय की पीड़ा को रामेसर के सामने ऐसे प्रस्तुत करते है कि,“रहिमन आप ठगाइये और न ठगिये कोय, आप ठगे सुख होत है और ठगे दुख होय”7। यहां वह अपनी जीवन की उद्विगनता को निराला की जीवन की उल्लेख से प्रस्तुत करती है। पहला गिरमिटिया में किशोर जी ने कहीं कविता और गीत से कई सारे संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। उदाहरणतः

“सुन-सुन रे भारतवासी, सुन

हम अपनी धरती से उखड़े जन

हम अपनी किस्मत पर आंसु बहावें”8

कविता और लोगगीतों के अतिरिक्त लोककथा और कीस्सागोई की शैली को भी उन्होंने आपनाया है। जहाँ भाव या विचार को प्रभावक बनाना होता है वहाँ उन्होंने इतिहास या पुराण से संदर्भ लेता है। लोककथाएं मनोरंजन के साथ-साथ नैतिक और सामाजिक शिक्षा का माध्यम से लोक-विश्वास, चमत्कार और जीवन के यथार्थ का अद्भुत समन्वय करता है। जिसमें जीवन के सुख दुख,रीति रिवास, विश्वास, आस्थाएं और परंपराओं का अभिव्यक्ति भी होती है। किशोर जी ने पात्रों के मानसिकता को ज्यादा बल देने के लिए कुछ पौराणिक कथा को उद्धरणियों के रूप में स्वीकार करते हुए पात्रानुकूल भाषा बनाया। ढाई घर उपन्यास में बड़े राय का कहना है- “राघव तुम यह नहीं जानते यह दर्द उस दर्द से भी ज्यादा असहनीय है। अश्वमेघ का घोड़ा पकड़े जाने पर राम को कैसा लगा होगा, और जब वे छुड़ा नहीं पाये होंगे तो और भी कैसा लगा होगा?”9, दूसरे संदर्भ में उन्होंने पात्रों की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति के लिए पौराणिक कथा की उल्लेख किया- “अहिल्या राम के पाँव छूकर पत्थर से मानुष वनी थी। मैं भी पत्थर ही हूँ। क्या पता इन चरणों को छूते-छूते ही कभी मानुष वन जाऊँ”10। इस प्रकार गिरिराज किशोर ने पुराण कथाओं के संदर्भ देकर पात्र के भावों की उच्चता को सिद्ध करते हुए उपन्यासों की कलात्मकता को बढ़ाया है।

            गिरिराज किशोर जी के उपन्यासों में प्रकीर्ण साहित्य को देख सकता है, जिसमें लोकोक्तियाँ या कहावतें, मुहावरे और पहेलियाँ आती हैं। किशोर जी ने पात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुसार क्षेत्रीय भाषा, विश्वास लोक चेतना और संस्कृति का प्रयोग किया है जो लोक-अनुभवों का सार होती हैं । उन्होंने अपने उपन्यासों में मुहावरे और लोकोक्तियों का सुन्दर समन्वय से भाषा सैष्ठव पर वृद्धि बढाया। उदाहरण के लिए उपन्यासों में प्रयुक्त कुछ उदाहरण है- ‘गूंगे के गुड की तरह’, ‘चौके- छक्के  लगाना’, ‘फाइट एण्ड फिक्स’, ‘लकड़ी के शेर’, ‘गीदड शेर का नकली चेहरा लगाना’,11 चेहरा पीला पड जाना चेहरा-पीला पड़ जाना, सब्जबाग दिखाना, नाक कटना, ढाक के तीन पात, डींग मारना, टस से मस न होना।’12”बिल्ली पर बिल्ली ज्यादा गुर्राती है’, ‘हरियाली की बातें हरियाली न होना ‘मुँह में तिनका दबा कर नंगे पाँव चलना’, जितने मुँह उतनी बातें’, ‘कान पर जूं न रेगंना’ अमानव में खयानत होना, ऊँट किस करवट बैठेगा, तूती बोलना, नींद हराम हो जाना, लोहा लेना, तिल का ताड़ बनाना”13। उक्त सभी मुहावरों से उपन्यास की भाषा का सौंदर्य ही नहीं बढ़ा, अपितु भाषा को अर्थवता भी प्राप्त हुई है।

               गिरिराज किशोर ने अपनी भाषा में मुहावरे और लोकाक्तियों का सुन्दर समन्वय से उनकी भाषा में लालित्य, चमत्कार तथा प्रौढ़ता लाई है। लेखक के उपन्यासों में निम्नलिखित कहावतें और लोकाक्तियों के प्रयोग से भाषा-सौष्ठव में वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए – “’रेल चढ़ा मरद और देहली लाँघी औरत की कौन परतीत’ आँख ओट तो पहाड़ ओट, ‘दाई से क्या पेट छिपाना’14, बिल्ली द्वारा खंभा नोचना’ ‘जो भी तुमसे झगड़गा वह मिट्टी में मिल जाऐगा” 15, मुर्गी को तकुए का दाग भी बहुत होता है।. ‘जिस थाली में खाए उसी में कुल्ला करना’ ‘टोपी खोओ तो पहाड़ को ऊपर तक देखो’ ‘जब घर पिछवाड़े दायी हो तो ऊँन गाँव क्यों कोई मारा फिरे” 16 गिरिराज किशोर का मानना था कि शब्द ही लेखक की असली शक्ति हैं । उनके उपन्यासों में प्रयुक्त भाषा पात्रों के सामाजिक स्तर के अनुरूप बदलती रहती है, जिसमें स्थानीयता, लोक भाषा , मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग और आंचलिकता की यथार्थ भी मौजूद है।

            हमारी संस्कृति के महत्व उजागर करते हुए उन्होंने ‘पहला गिरमिटिया’ में ‘पगड़ी’ को भारतीय लोक मर्यादा और राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है । लोक विश्वास और परंपरा को उजागर करते हुए उन्होंने अपने उपन्यासों में ‘कर्म-फल’ ‘भाग्य’ और अंधविश्वास जैसी लोक मान्यताओं का मनोवैज्ञानिक चित्रण करती है। ‘जुगलबन्दी’ के कुंवर शिवचरण अपने बेटे अपाहिज होने के कारण को अपने पुराने कर्मों का दुषपरिणाम मानते हैं । सवर्ण संस्कृति द्वारा निर्मित “भाग्य और पूर्वजन्म” की मान्यताओं ने दलित लोक-मानसिकता पर प्रहार डालता है। गिरिराज किशोर ने दलित समाज में व्याप्त भाग्य और अंधविश्वास की मान्यता को उजागर करते हुए उनकी लोक संस्कृति को उकेरता है। सवर्ण संस्कृति ने अपनी श्रेष्ठता को और बढ़ाने के लिए ऐसी सांस्कृतिक जड़ताएँ निर्माण कर देती है, जिससे पिछड़ों और दलितों को “स्वाभिमान-विहीन” और सवर्ण को उच्चतम लोग भी बना दिया गया है ।उन्होंने परिशिष्ट और यथाप्रस्तावित के पात्रों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि वे हर जुल्म को “भाग्य की देन” मानते हैं । इस लोक मानसिकता और सामाजिक लोक-लाज के भय को लेखक कई संदरभों में व्यक्त करता है। लेकिन गिरिराज जी ने समाज में व्याप्त लोक मान्यताओं पर बदलाव डालने का कोशिश करते हुए ‘परिशिष्ट’ में बावनराम द्वारा कहत है कि “बच्चा इसलिए नहीं पैदा हुआ कि बाप की तरह लोहा लंगड़ ढोये”16 यहां  दलित समाज की लोक संवेदना में आ रहे क्रांतिकारी बदलाव का स्वर सामने आते है। उन्होंने  बावनराम और अनुकूल जैसे पात्रों के माध्यम से उस आधुनिक लोक-चेतना को स्वर देते हैं जो अपनी पहचान के लिए पुरानी सांस्कृतिक जड़ताओं और भेदभावपूर्ण व्यवस्था को हटाकर एक नवीन लोक चेतना को अपनाना है। इन आयामों के माध्यम से गिरिराज किशोर ने लोक साहित्य को केवल सजावटी तत्व के रूप में नहीं, बल्कि समाज की जटिलताओं को समझने की माध्यम के तरह प्रस्तुत किया है। गिरिराज किशोर के उपन्यासों में चित्रित लोक साहित्य और सांस्कृतिक चेतना केवल अतीत का आविषकार नहीं है ,बल्कि वह वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा है।

             लोक साहित्य केवल अतीत की वस्तु नहीं है बल्कि यह एक गतिशील ऊर्जा है जो आधुनिक साहित्य को प्राणवायु प्रदान करती है ।  गिरिराज किशोर ने अपने साहित्य के माध्यम से ‘लोक’ का प्रयोग को एक नई और व्यापक परिभाषा दी है जो पुरानी मान्यताओं से युक्त दृष्टि से नहीं, अपितु आधुनिकता के नवीन दृष्टिकोण से है। उन्होंने लोकगीतों, मुहावरों और परंपराओं के प्रयोग से आधुनिक जीवन की जटिलताओं को सरलता से व्यक्त करने की प्रयास करती है। आज समकालीन समाज में बाजारीकरण और तकनीकी संक्रमण के कारण लोक-परंपराएं लुप्त हो रही हैं, तब गिरिराज किशोर जैसा साहित्यकार हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है । लोक साहित्य का संकलन और संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है क्योंकि लोक साहित्य मानव हृदय की वह धड़कन है जो कभी बंद नहीं हो सकती। गिरिराज किशोर जी के औपन्यासिक रचनाएं लोक संस्कृति को इतिहास के साथ जोड़कर उसे एक वैश्विक पहचान देने की सफल प्रयास है। उनकेलिए संस्कृति एक स्थिर वस्तु नहीं बल्कि निरंतर परिवर्तनशील प्रणाली है। उन्होंने अपने उपन्यासों में प्रयुक्त लोक जीवन एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के माध्यम से यह व्यक्त करना चाहती है कि, जब तक समाज अपनी लोक जडों से जुड़ा रहेगा, तब तक उसकी संस्कृति जीवित रहेंगी।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. लोक साहित्य -प्रो. डॉ. बापूराव देसाई -विनय प्रकाशन,कानपूर- 1996, पृ-20
  2. वही -पृ- 20
  3. वही पृ – 29
  4. वही पृ- 75
  5. पहला गिरमिटिया-गिरिराज किशोर- राजपाल एण्ड सन्स् प्रकाशन, 2011,पृ-195
  6. वही , पृ- 263
  7. तीसरी सत्ता , गिरिराज किशोर, अमन प्रकाशन कानपुर,2,020, पृ- 94
  8. पहला गिरमिटिया- पृ-262
  9. ढाई घर- गिरिराज किशोर- राजपाल एण्ड सन्स् प्रकाशन ,2022, पृ-106
  10. ढाई घर- 210
  11. यातनाघर- गिरिराज किशोर- राजपाल एण्ड सन्स् प्रकाशन,2018, पृ-69,24,75,99
  12. ढाई घर- 123,199, 285, 79
  13. पहला गिरमिटिया, पृ-75,244,720,206,399,303,233,187, 531
  14. परिशिष्ट, पृ० 20, 37, 69
  15. यातनाघर, पृ० 15, 63
  16. पहला गिरमिटिया- पृ-72

 

अंजु जॉय 

शोधार्थी 

सेंट थामस कॉलेज, केरल 

ajskaduppil@gmail.Com