सारांश
प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय ग्रामीण जीवन शैली में कहावतों की भूमिका और महत्त्व को रेखांकित करता है। भारत की मूल संस्कृति उसके गाँवों में निहित है यह किसी लिखित विधान की उपज ना होकर पीढ़ियों के जीवनानुभवों, संघर्षो और परम्पराओं से स्वत: निर्मित होती हैं। घाघ और भडुरी जैसे लोक कवियों ने कृषि, मौसम, स्वास्थ्य और नैतिकता से सम्बंधित कहावतों को अमर कर दिया। ये कहावतें अनौपचारिक शिक्षा का माध्यम बनकर ईमानदारी, परिश्रम, सहयोग और प्रकृति-प्रेम जैसे मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती हैं। आधुनिकता के प्रभाव में ये कहावतें भले ही धीरे-धीरे विलुप्त हो रही हों, किंतु परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाए रखने पर ये भविष्य में भी जीवित और प्रासंगिक रह सकती हैं।
प्रस्तावना
हमारा भारत विविध सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध है। लोक संस्कृति की आधारशिला ग्रामीण संस्कृति ही है। मुख्य रूप से सामाजिक परंपराएँ, और लोक कला, लोक गीत, लोक कथाएँ, लोक नृत्य के साथ कहावतें ग्रामीण जीवन से उत्पन्न होती हैं। लोक संस्कृति का सबसे जीवंत और प्रमाणिक रूप हमें गाँवों में देखने को मिलता है। इस संस्कृति की उत्पत्ति समान्य जनजीवन के अनुभवों से हुई है। जिसके अन्तर्गत सामूहिक जीवन, परंपराएँ, प्रकृति, नैतिक मूल्य और लोक व्यवहार से, जुड़ा हुआ विचार शामिल होता है। और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित हो कर आगे बढ़ती है।
लोक ऐसा समूहवाची शब्द है जहां ग्रामीण निवासी प्राचीन परंपराओं से बंधे से रहते हैं। और ग्रामीणों का प्रकृति को निकट होने के कारण आधुनिकता से दूर सीधी सरल जीवनशैली उनके जीवन का आधार होती है। लोक का तात्पर्य सर्वसाधारण जनता से है परन्तु हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के मतानुसार “‘लोक’ शब्द का अर्थ ‘ग्राम्य’ या जनपद नहीं है बल्कि नगरों और, गाँवों में रहने वाली सम्पूर्ण जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है। ये लोग नगरों में रहने वाले रूचि सम्पन्न तथा सुसंस्कृत लोगों की अपेक्षा सीधे-सादे तथा अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते है और परिषकृत रुचि रखने वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएँ आवश्यक होती हैं, उनको उत्पन्न करते हैं ” (1)
समय के साथ-साथ ‘लोक’ का अर्थ भी परिवर्तित होता रहता हैं।
संस्कृति न किसी संस्था ने बनाई है और न ही यह कोई लिखित संविधान की कोई व्यवस्था है बल्कि यह सामान्य मनुष्य जीवन को यापन करते-करते अपने आप ही विश्वास, पीढ़ियों के अनुभवों, रिश्तों, संघर्षो का आकार ले लेती है। भारत का ग्रामीण जीवन सामान्य तौर पर शहरों में फैली अराजकता से मुक्त है। ग्रामीण जगह से मिली शान्ति हमे मंत्रमुग्ध कर देती है।
संस्कृति का अर्थ आत्मिक शक्तियों का सर्वांगीण विकास करने वाली प्रक्रिया को कहते हैं। लोक संस्कृति की परिभाषा विद्या चौहान ने इस प्रकार दी है
“ लोक संस्कृति का सबंध हमारे ह्रदय,मस्तिष्क, मन के संस्कारो में रहता है और इसका सबंध जन-समुदाय से है। जन-जन के मन, एवं आचरण में सन्निहित तत्वों से संस्कृति का सुमन अपनी पंखुडियों का निर्माण करता है। सम्पूर्ण लोक की सौन्दर्यानुभूति उसमें सौरभ का संचार करती है।” (2)
अपने गाँवो के प्रति ग्रामीण समुदाय के लोग गहरी निष्ठा रखते हैं। जिससे गांव हमारे ह्रदय में जीवंत रूप में रहते है । प्रकृति ही ग्रामीणों की सुख-दुख की सहभागी होती हैं। भारतीय संस्कृति के पालक-पोषक और रक्षक गाँव होते हैं। ग्रामीणों के मूल तत्व में ईमानदारी, मेहनत, सच्चाई ,निःस्वार्थ भावना, लगन आदि समाहित होती है। जिससे सम्पूर्ण मानव समाज को कुछ न कुछ सीख देने की चेष्टा होती है।
कहावतें ग्रामीण और लोक संस्कृति की गहरी छाप लिए कई पीढ़ियों से चली आ रही है। इसके माध्यम से हम जीवन सत्यों से साक्षात्कार करते है। कहावतों का आज भी उतना ही महत्व है जितना पहले था। कहावतों के छोटे-छोटे वाक्य जीवन के अनुभवों के साथ-साथ समाज को मनोरंजन के साथ शिक्षित करने का कार्य भी करती हैं। कहावतें जीवन के अनमोल सबक भी सिखाने का कार्य करती है। अपने विचारों की पुष्टि करने,शिक्षा देने और किसी को अपनी गलती का एहसास कराने में कहावतें प्रभावशाली सिद्ध हुई हैं। जिसके कारण सामने वाला आदमी एकदम अवाक् रह जाता हैं।
कहावतों का स्थान ग्रामीण क्षेत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है। ग्रामीण जीवन शैली में कहावतें सामाजिक व्यवहार, ग्रामीण जीवन, खेती, प्रकृति, मेहनत और नैतिकता से प्रेरित होती है। इसी के माध्यम से ग्रामीण लोग अपने विचारों को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। कहावते मंनोरजन के साथ साथ सामान्य लोगों के लिए दिशा निर्देश और सिख देने का कार्य भी करती है। ये शास्त्रों और वेद की तरह कार्य करती हैं। जिसके प्रति ग्रामीण लोगों की गहरी आस्था और विश्वास का प्रतीक साबित हुई । भारतीय लोक साहित्य कोश के अनुसार “लोकोक्तियां स्वनिर्मित नीतिशास्त्र हैं। यह लोकमानस के दीर्घ अनुभवों का संचित कोष है जिसमें इतिहास, परम्परा और संस्कृति निरंतर कुछ न कुछ जोड़ती रहती हैं। दैनिक जीवन के अनुभवों का निचोड़ जब कम से कम शब्द और सार्थक कथन का रूप ले लेता है तब लोकोक्तियों और कहावतों का जन्म होता है।” (3)
लोक संस्कृति लोकगीत, कृषिजीवन, नृत्य, कथाओं, पर्व-उत्सव पर आधारित ग्रामीण लोगों की सामूहिक चेतना को दर्शाती है। यह ग्रामीण समाज के लोगों को एकजुटता के साथ सरल जीवन और सादगी के साथ जीने वाली ग्रामीण जीवन शैली की शक्ति को दर्शाती है। लोक संस्कृति एक ऐसी धरोहर का प्रतीक है जो आदिकाल से अब तक चली आ रही है। यह मनुष्य द्वारा अर्जित और अपरिवर्तनशील होती हैं। जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने और समाज के प्रति गहरा संदेश छुपे होने के कारण कहावतें भारतीय सांस्कृतिक ग्रामीण परिवेश में एक विशेष स्थान दर्ज कराती है।
भाग-दौड़ वाले नगरीय जीवन की तुलना में गाँव की जीवन शैली सुकून भरे माहौल में बेहद धीमी गति से आगे बढ़ती है। शांत और ठाठ के साथ गावों के लोग अपना जीवन यापन करते है। इसी ग्रामीण जीवन शैली की कहावतें ज्ञान भरी होने के कारण संस्कृति की पहचान कराती है।
मेहनकश समाज के लोग भोले-भाले और अनपढ़ तो होते है। किन्तु कहावतों में छिपे गूढ अर्थ से अपने कार्य को सम्पन्न कराते हैं।
जो एक प्रकार से भविष्यवाणी की तरह काम करने के साथ ही मार्गदर्शन का भी कार्य करती है। जिससे उनकी समस्त समस्याओं का हल इन कहावतों के माध्यम से मिल जाता है। ग्रामीण कहावतें क़ृषि और मौसम जीवन दर्शन, स्वास्थ्य, नैतिक मार्गदर्शन, व्यावहारिक मार्गदर्शन के साथ संस्कृति से जुडी रहती है।
अरबी भाषा की एक कहावत के अनुसार ‘कहावतों या मुहावरों और उक्तियों की उतनी ही जरूरत है जितनी खाने में नमक की’ ये कहावतें पुश्त -दर-पुश्त और परंपरागत रूप से बिना लिपिबद्ध के आज भी चली आ रही है। गांवों के बड़े -बुजुर्ग के मुहं में यह रटी होती है। कई लोक कवियों (लोककवि गिरधर लोक रसिक, लोक कवि बुझ – बुझक्कड़ , कवि ईसुरी -संत मलूक दास, घाघ भडूरी आदि)ने कहावतों को अजर -अमर कर दिया हैं
रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार “ देहात में कहावतों का बड़ा प्रचार है। ऐसा मालूम होता है कि किसानों के जीवन का महल कहावतों ही की ईंटों पर बना हुआ है। घाघ और भडुरी ही की नहीं, बीसों अन्य ग्रामीण अनुभवियों की कहावतें गाँव-गाँव में प्रचलित है। सब का संग्रह करना एक व्यक्ति का काम नहींं, पर संग्रह होना अत्यंत आवश्यक हैं मैं तो यहां तक कहूँगा कि वर्तमान हिन्दू जाति का सच्चा रूप देखना हो तो गाँवों में प्रचलित कहावतें पढ़नी चाहिए । ऐसा मालूम होता हैं कि ग्रामीण जनता ने अपना जीवन ही कहावतों के सुपुर्द कर रखा हैं। गांवो में अब मनु,याज्ञवल्क्य या पराशर का भारतवर्ष नहीं हैं अब तो वहाँ कहावतों का भारतवर्ष मिलेगा। अतएव जो देश कि दशा जानना चाहे और देशवासियों के मनोभावों का ठीक ठीक अध्ययन करना चाहे , उन्हें कहावतों का अध्ययन सबसे पहले करना चाहिए।” (4)
ग्रामीण जीवन शैली की कहावतें जीवन के हर पहलू को सरल शब्दों में समेटे हुए हैं जो एक प्रकार से संस्कृति,बुद्धि और जीवन दर्शन के खजाने का भंडार है
खेतीबाड़ी ग्रामीण जीवन का मूल आधार है। घाघ और भडुरी की कहावतों का भारतीय कृषि विज्ञान में विशिष्ट स्थान हैं बुआई, जुताई, गुड़ाई, निराई, सिंचाई , मेंड बांधना, बीज की मात्रा, खाद के विभिन्न रूपों के साथ-साथ अवसर, मात्रा, समय आदि का ज्ञान इन कहावतों में प्रचुर मात्रा में हैं। इन कहावतों में किसानों के संघर्ष का उल्लेख भी मिलता है कि किस प्रकार किसान प्रतिकूल परिस्थितियों में सूखे , धूप, वर्षा से जूझकर मेहनत करता है।
“उत्तम खेती आप सेती। मध्यम खेती भाई सेती ।
निकृष्ट खेती नौकर सेती । बिगड़ गई तो बलाये सेती ॥”(5)
इस कहावत के माध्यम से किसानों को यह संदेश दिया जाता है। कि स्वयं की मेहनत से की गई खेती के द्वारा किसान तृप्त रहता है और अगर वह खेती अपने भाइयों द्वारा कराई गई तो वह साधारण अवस्था में रहता है। मजदूरों और नौकरों के भरोसे की गई खेती घटिया किस्म की होती है। इस प्रकार किसी दूसरों के सहारे की गई खेती हमेशा बिगड़ती हैं । ऐसे में किसानों को अपने बल पर निर्भर होने की सीख देकर यह प्रोत्साहन करती हैं की मेहनत ही सफलता का मंत्र हैं।
‘खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत ।
गोबर राखी पाती सडै, फिर खेती में दाना पड़ै।
सन के डंठल खेत छिटावै, तिनके लाभ चौगुनों पावै ।
गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।
वही किसानों में है पूरा, जो छोडै हड्डी का चुरा।’
जर्मनी के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक लिबिग ने सन् 1840 ई. के आसपास क़ृत्रिम खाद के पोषक तत्वों का काबिले तारीफ प्रयास यूरोप में किया था। वैसा ही कृषि का कृत्रिम खाद, से संबंधी ज्ञान इन कहावतों में व्याप्त हैं। जिससे लोगों को काफी लाभान्वित का पाएगा। कृषि – विज्ञान का ज्ञान कराती अनेकों कहावते हैं।
” नित्तै खेती दूसरे गाय । नाहीं दैखे तेकर जाय ।।
घर बैठल जो बनवै बात । देह में वस्त्र न पेट में भात।।” (6)
इस कहावत के माध्यम से किसानों को इस बात से जागरूक किया गया हैं कि जो कृषक रोज स्वयं के खेतों में नहीं जाते है और जो अपनी गाय को हर दूसरे दिन नहीं देखते केवल घर में बैठकर बातें बनाते रहते है उन्हें कामचोर जैसे कृत्यों पर बाद में पछताना पड़ता हैं और वह पहनने के वस्त्रों से और पेट भरने के खाने से वंचित रह जाता है। इस प्रकार कहावतों के जरिये गहरी जुताई, खेतों में बांध या मेंड बांधने पर जोर, भादवा की शुल्क पक्ष की छट को अनुराधा नक्षत्र में अच्छी पैदावार, किस फसल से नुकसान और मुनाफा आदि का लेखा-जोखा बताया जाता है। इसी प्रकार हिन्दी की एक लोकप्रिय कहावत है ‘अगिला खेती आगे-आगे, पाछिला खेती भागे जागे’ इसमें कृषि संबंधी कार्यों में नियोजन, मेहनत का महत्व और समयबद्धता के महत्व को दर्शाया गया है। संसाधनों की कमी, आलस और नियोजन के अभाव में किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। मौसम के पुर्वानुमान और कृषि विषयक तकनीके जब तक हमारे भारत में नहीं थी तब तक ग्रामीण किसानों की जीवन शैली इन्ही कहावतों पर निर्भर थी।
व्यक्तिगत गुणों की परख कर उनका सही सदुपयोग करके हम समृद्धि और सफलता की और बढ़ कर लक्ष्यों को प्राप्त कर अपने जीवन को उत्तम और कामयाब बना सकते हैं। इस संबंध में भदावरी ग्रामीण कहावतें बहुत प्रसिद्ध है।
‘सौ में सूर सहस में काना, सवा लाख में ऐचकताना,
ऐंचकताना करे पुकार, कंजा से रहियो होशियार ,
जाके हिये न एकहु बार ताको कंजा ताबेदार,
छोट गर्दना करे पुकार, कहा करे छाती को बार,
इस कहावत का अर्थ है। सौ नेत्र वाले के बराबर एक अंधा होता है और हजार के बराबर एक काना होता है स्वाभाविक रूप से हम अंधे के प्रति दया का भाव रखते है किन्तु अंधा सौ लोगों को छ्लना चाहे तो छल सकता हैं अर्थात् अपने अनुरूप चला सकता है। यही स्थिति काने व्यक्ति की भी होती है। ऐचकताना उस व्यक्ति को कहते है जो बात को काट देता हैं। ये अनुभव के साथ साथ सभी क्षेत्रों का ज्ञान रखता है। यह एक लाख लोगों को अपना अनुसरण करा सकता है कजां (अर्थात् भूरी आखों वाला) व्यक्ति ऐचकताना से ज्यादा घातक साबित होता है। जिस व्यक्ति की छाती पर बाल नहीं होते उनकी बात पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए और छोटी गर्दन वाला सबसे खतरनाक व्यक्ति होता है। चुगली से दूसरो का सफाया करने का हुनर ऐसे लोगों में कूट-कूट कर भरा होता है।
बघेली कहावतों को व्यंग कसने में निपूर्णता हासिल हैं।
‘भइस के आगे वीन वाजय, भइस खड़ी पगुराये ‘
अर्थात् भैंस के आगे कितना ही बीन बजा लिया जाए किन्तु भैंस को कोई फर्क नहीं पड़ता उसी प्रकार किसी व्यक्ति को कितना हो समझाओं उस पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होती।
‘सहजय गुड़ पकय ता सब लपकय ।’
अर्थात् यदि कोई काम सरल, सहज होता है तो उसे सब कर लेते है
‘गोड़े मा कादव न लागय, अउ बढ़कवा चिनगा हमाराय आय ।’
अर्थात् मेहनत करें बिना बड़ी कामना रखना
‘जईसन घर तइसन आगन’
अर्थात् जैसा होगा काम वैसा होगा परिणाम
आदि अनेक बघेली कहावतें है जो विभिन्न अर्थों के लिए व्यवहार में लाई जाती हैं। स्वास्थ्य विषयक कहावतों में साफ-सफाई, खान-पान, रहन-सहन इत्यादि से स्वास्थ्य की किस प्रकार रक्षा की जाए और किस मौसम में क्या, कितना, कब खाना स्थास्यवर्धक है।
उदहारण के लिये :-
“चैते गुड़ बैसाखे तेल । जेठ में पेठा असाढ़े बेल ॥
सावन साग न भादो मही । कार करेला कातिक दही ॥
अगहन जीरा पुसेधना । माहे मिश्री फागुन चना ॥
इन बारह से बचे जो भाई। ता घर सपनेहुँ बैद न जाई ॥ ” (7)
मनुष्यों के साथ साथ पशु-पक्षियों की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति इन्ही कहावतों के भीतर छिपी होती हैं।
राजस्थान की कहावतें एक प्रकार से गागर में सागर हैं।
‘सांभर मे लूण रौ टोटौ’
जब व्यक्ति के पास किसी वस्तु का बड़ा खजाना होने के बाद भी उस वस्तु के प्रति कमी अनुभव करना। यह स्थिति एक प्रकार से विडम्बना पूर्ण होती है।
‘सौ सोनार री एक लुवार री’
एक मजबूत और समर्थ व्यक्ति को बार-बार कोशिश करने की आवश्यकता नहीं होती, उसकी एक ही कोशिश काफी होती है।
‘देस जिस्यो भेस’
व्यक्ति को समय और स्थान के अनुकूल स्वयं को ढाल लेना चाहिए।
‘ढोल में पोल’
जो व्याक्ती ज्यादा बोलता है उसकी बातों में झूठापन दिखाई देने लगता है।
‘आंधा रा तंदूरा रामदेवजी बजावै’
यह कहावत ईश्वर के प्रति उम्मीद, विश्वास और आस्था को दर्शाती हैं। मुश्किल समय में भी उम्मीद न छोड़ने की सिख देती है। भारत में स्थित राजस्थान की लोक सांस्कृति के लोकदेवता के प्रति अपार आस्था व्यक्त करती है। छोटे-छोटे वाक्यों की कहावतों से धैर्य, मेहनत और अनुरूपता जैसे गुणों से हमें परिचित कराती है।
हिमाचल की सांस्कृतिक परम्परा में भी कहावतों का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।
‘ जैसे माए वैसे जाए ‘
अर्थात माता-पिता के व्यक्तित्व का प्रभाव स्वाभाविक रूप से बच्चों पर अवश्य पड़ता है।
‘पहले बेटड़ा फिर पेटडा’
प्रसव के बाद माँ जो खाती है उसका प्रभाव बच्चे पर अवश्य पड़ता है। जायका के स्थान पर मां को स्वास्थ्य वर्द्धक पदार्थ खाना चाहिए।
निष्कर्ष
इस प्रकार ग्रामीण जीवन शैली की कहावतें केवल मंनोरंजन का साधन न होकर सदियों के सामूहिक अनुभव, ज्ञान और जीवन -दर्शन का संचित कोष हैं। कृषि विज्ञान से लेकर स्वास्थ्य, नैतिकता, सामाजिक व्यवहार और जीवन के प्रत्येक पक्ष को सरल और सटीक शब्दों में अभिव्यक्त किया हैं। विभिन्न आँचलिक क्षेत्रों की कहावतें विविधता में एकता स्थापित करती हैं।अत:आधुनिकता की आंधी में इस अमूल्य धरोहर को सँजोकर रखने से हमारी सांस्कृतिक जड़े मजबूत होगी और भावी पीढ़ी भी इससे लाभान्वित होगी।
सन्दर्भ सूची :
- भारतीय लोक साहित्य कोश, खण्ड-1 सं. सुरेश गौतम (दिल्लीः संजय प्रकाशन 2003).
- द्विवेदी हजारी प्रसाद, जनपद (त्रैमासिक पत्रिका ), अंक -1 (काशी : हिन्दू विश्वविघालय, अक्टूबर, 1952 ) पृष्ठ =65.
- चौहान विद्या, लोकगीतों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, भोजपुरी और अवधी के संदर्भो में (आगरा: प्रगति प्रकाशन, 1972) प्रस्तावना पृ. = ख .
- रामनरेश त्रिपाठी, घाघ और भडुरी, हिन्दुस्तानी ऐकेडेमी यू.पी., इलाहाबाद, (1931), पृष्ठ = 12.
- रमेश प्रताप सिंह, घाघ और भडुरी की कहावतें , उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ, (2019), पृष्ठ- 62.
- वही पृष्ठ = 63.
- हरिहरप्रसाद त्रिपाठी, घाघ और भडुरी की कहावतें, बिन्देश्वरी प्रसाद, बक्सेलर, आसभैरो चौक, बनारस, पृष्ठ 3-4).
रजनी साहू
श्री जगदीशप्रसाद झाबरमल टिबड़ेवाला युनिवर्सिटी
झुंझुनू (राजस्थान)






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