छत्तीसगढ़ के समृद्ध आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति में लोक नृत्य एक जीवंत अभिव्यक्ति हैं।  “छत्तीसगढ़” के नाम से मशहूर यह हिस्सा, भारत के मध्य में स्थित है और यहां की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आदिवासी (ट्राइबल) समुदायों से आता है, जैसे गोंड, बैगा, उरांव, मुरिया, मारिया, हल्बा, भुंजिया, कमार, अबूझमाड़िया आदि। ये समुदाय अपनी प्राकृतिक जीवनशैली, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था, प्रकृति पूजा और सामुदायिक उत्सवों के माध्यम से अपनी संस्कृति को जीवित रखते हैं। लोक नृत्य यहां केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, धार्मिक अनुष्ठान, फसल की खुशी, विवाह, जन्म, देवता की पूजा और मौसमी परिवर्तनों का माध्यम हैं। ये नृत्य ग्रामीण और आदिवासी जीवन की सादगी, ऊर्जा और सामूहिकता को दर्शाते हैं। वाद्य यंत्रों में मांदर (ढोलक जैसा), झांझ, मंजीरा, डंडा, बांसुरी, थाली आदि प्रमुख हैं। नृत्यकार अक्सर मयूर पंख, सुअर के सिर के बाल, शेर के नाखून, कौड़ी, गूंज और फूलों की मालाएं धारण करते हैं। महिलाएं रंग-बिरंगे घाघरा-चोली और पुरुष धोती-कुर्ता या विशेष वेशभूषा में सजते हैं।

 

 

छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक नृत्यों का विस्तृत विवरण

1.पंथी नृत्य

पंथी नृत्य छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध और आध्यात्मिक नृत्य शैली है, जो मुख्य रूप से सतनामी समुदाय द्वारा किया जाता है। यह गुरु घासीदास (सतनाम पंथ के संस्थापक) की स्मृति में माघ पूर्णिमा पर किया जाता है।

विशेषताएं: नृत्यकार एक खंभे (जैतखंब) के चारों ओर घूमते हुए नृत्य करते हैं। गीतों में निर्गुण भक्ति, मानव जीवन की महत्ता और आध्यात्मिक संदेश होते हैं। यह द्रुतगामी (तेज गति वाला) नृत्य है, जिसमें एक्रोबेटिक मूवमेंट्स जैसे उछलना, घूमना और हाथों की मुद्राएं शामिल हैं।

समुदाय: सतनामी (मुख्यतः ग्रामीण और पूर्व में दलित समुदाय से जुड़े)।

उदाहरण: बस्तर और रायपुर क्षेत्रों में यह नृत्य धार्मिक उत्सवों में देखा जाता है। एक गीत का अंश: “गुरु घासीदास के चरणन में…” – जो भक्ति भाव से भरा होता है। यह नृत्य सामाजिक समानता और भक्ति का प्रतीक है।

  1. पंडवानी (या पंडवाणी)

छत्तीसगढ़ की एक प्रसिद्ध और जीवंत लोक कला है। इसका अर्थ है “पांडवों की वाणी” या “पांडव कथा”, यानी महाभारत के पांडवों की कहानियाँ। यह महाकाव्य महाभारत की घटनाओं को गीत, कथा-वाचन, अभिनय और संगीत के माध्यम से प्रस्तुत करने की एक अनोखी परंपरा है।मुख्य कलाकार (रागी या गायक/गायिका) एकल रूप से खड़े होकर या बैठकर महाभारत के प्रसंग (एपिसोड) गाते हैं। वे कहानी सुनाते, पात्रों का अभिनय करते, आवाज़ बदलते, चेहरे के भाव दिखाते और कभी-कभी नृत्य जैसी हाव-भाव भी करते हैं।वाद्य यंत्र: हाथ में एकतारा (या तंबूरा, जिसे मोरपंख और घंटियों से सजाया जाता है) और कभी कट्टल (झांझ) रखते हैं। साथ में हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, तबला आदि बजते हैं।

दो मुख्य शैलियाँ –

वेदमती शैली – इसमें कलाकार केवल गायन करता है, अभिनय कम करता है।

कपालिक शैली – इसमें कलाकार पात्रों का अभिनय करते हुए पूरी नाटकीयता से कथा प्रस्तुत करता है।

3.राउत नाचा

यह यादव (ग्वाला) समुदाय का प्रमुख नृत्य है, जो दीपावली या देव उठनी एकादशी पर किया जाता है।

विशेषताएं: नृत्यकार विशेष वेशभूषा (रंगीन पगड़ी, धोती, लाठी) में सजते हैं। हाथ में सजी हुई लाठी लेकर टोलियां बनाकर घर-घर जाकर नृत्य करते हैं। यह कृष्ण-लीला से प्रेरित है, जहां ग्वालों की जीवनशैली और कृष्ण की बाल-लीलाओं का चित्रण होता है।समुदाय: यादव (ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन करने वाले)।

समुदाय: यादव (ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन करने वाले)।

उदाहरण: बिलासपुर और जशपुर में राउत नाचा महोत्सव आयोजित होता है। नृत्य में लाठी घुमाना, कूदना और सामूहिक ताल शामिल होती है।

 

  1. कर्मा नृत्य

यह छत्तीसगढ़ के आदिवासी संस्कृति का सबसे व्यापक नृत्य है, जो कुंवार मास में कर्मा वृक्ष की पूजा के बाद किया जाता है।

विशेषताएं: पुरुष और महिलाएं हाथ पकड़कर वृत्त में घूमते हैं। वाद्य: मांदर और झांझ। गीत प्रकृति, फसल और प्रेम पर आधारित होते हैं। विभिन्न प्रकार जैसे गोंडी कर्मा, बैगा कर्मा, भुंइयां कर्मा, माड़ी कर्मा आदि।

समुदाय: गोंड, बैगा, उरांव, भुंजिया, ओरांव आदि।

उदाहरण: बस्तर के अबूझमाड़ में माड़ी कर्मा, जहां दंडामी माड़िया जनजाति वृक्ष पूजा के बाद नृत्य करती है। यह नृत्य फसल की खुशी और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।

  1. सुआ नृत्य या सुवा नृत्य

महिलाओं का प्रमुख नृत्य है, जिसे तोता नृत्य भी कहते हैं।

विशेषताएं: महिलाएं मिट्टी के बने तोते (सुआ) को टोकरी में रखकर उसके चारों ओर गोल घूमकर नृत्य करती हैं। गीत सुआ गीत कहलाते हैं। हाथ से ताली बजाई जाती है। अंत में शिव-गौरी विवाह का अनुष्ठान होता है।

समुदाय: गोंड, बैगा और अन्य ग्रामीण महिलाएं।

उदाहरण: गौरा विवाह या अन्य उत्सवों में किया जाता है। यह धन की देवी को प्रसन्न करने और वैवाहिक सुख के लिए होता है।

 

  1. सैला नृत्य (Saila Nritya)

यह डंडा नृत्य है, जो फसल कटाई के बाद अगहन मास में किया जाता है।

विशेषताएं: युवा लड़के डंडों से ताल मिलाकर विभिन्न शैलियों में नृत्य करते हैं। समूह घर-घर जाकर प्रदर्शन करता है।

समुदाय: ग्रामीण क्षेत्रों के युवा, बैगा आदि।

उदाहरण: सरगुजा, रायगढ़ में लोकप्रिय। यह उत्साह और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।

  1. ककसार नृत्य

बस्तर की अबूझमाड़िया जनजाति का धार्मिक नृत्य।

विशेषताएं: फसल और वर्षा के लिए देवता को प्रसन्न करने हेतु।

उदाहरण: ककसार उत्सव में युवा लड़के-लड़कियां भाग लेते हैं।

8. गेंडी नृत्य

यह स्विंग जैसा नृत्य है, जहां झूले पर नृत्य किया जाता है।

उदाहरण: ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों और युवाओं द्वारा।अन्य उल्लेखनीय नृत्य: गौर मारिया (बाइसन हॉर्न मारिया जनजाति का विवाह नृत्य), पंडवानी (महाभारत आधारित नृत्य-नाटक), छेरछेरा, खड़ा नाचा आदि।

सांस्कृतिक महत्व और संरक्षण

छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य आदिवासी और ग्रामीण जीवन की आत्मा हैं। ये नृत्य प्रकृति से जुड़ाव, सामुदायिक एकता, लिंग समानता (कई नृत्यों में महिलाओं की प्रमुख भूमिका) और धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाते हैं। आधुनिकता के दौर में ये नृत्य पर्यटन, महोत्सवों (जैसे बस्तर दशहरा, राउत नाचा महोत्सव) और सरकारी प्रयासों से जीवित हैं।

ये नृत्य छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो रही हैं।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची – 

1.ध्रुव, डुमनलाल. लोकजीवन के बदलते संदर्भ. इलाहाबाद: आशु प्रकाशन, 2002.

2.छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य: परंपरा, लय और जीवन का उत्सव. 2025.

3.छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य. 2025.

4.यदु हेमू, छत्तीसगढ़ के लोकगीत, नृत्य एवं संगीत, बी . आर . पब्लिकेशन, दिल्ली, 2003.

डॉ. आरती पाठक

कालिंदी महाविद्यालय,

दिल्ली विश्वविद्यालय,

artipathak@kalindi.du.ac.in