अभी पिछ्ले दिनों हमारा समाज अंकित सक्सेना और चंदन गुप्ता की हत्या का गवाह बना । हमने सभ्यताओं के इतिहास में क्रूर से लेकर क्रूरतम समयों को देखा है जहाँ साम्राज्य-विस्तार, धन,लालच, जाति व धर्म आदि के नाम पर लाखों लोगों की ह्त्याएं की गई। हमारे समाज में आज भी यह क्रूरता अपने अस्तित्व की रक्षा कर पाने में सक्षम है जो किसी भी समाज के लिए भयावह है। अंकित सक्सेना की हत्या में धार्मिक वैमनस्य क वीभत्स रूप देखने को मिला जो इस बात की गवाही देता है कि आज भी यह समाज प्रेम का शत्रु बना हुआ है। वैश्विक स्तर की घटनाएं हमें सदैव चिंतित करने वाली होती हैं। अमेरिकी,यूरोपीय,अफ्रीकी व एशियाई देशों के प्रधानों के सम्मेलनों में धर्म के नाम पर होने वाली आतंकी घटनाओं को मानवीयता के लिए एक बड़ा खतरा बता कर उससे निपटने की तैयारियां की जाती हैं । जिस चीज से बचकर जिकलने की बात कबीर कर रहें थे ,हमने उसे आज भी ग्रहण नहीं किया जिसका फल हम भुगत रहें हैं ।

             छह शताब्दी बाद भी कबीर के दोहे और पद आज सबसे ज्यादा गाए जाने वाले दोहे व पद हैं । लोगों को कबीर के बहुत से पद कंठस्थ हैं पंरतु हमने उससे महज गाए जाने वाली  सामग्री के रूप में कंठस्थ किया, कभी अपने जीवन में उतारने की कोशिश नहीं की। अगर जीवन में उतारने का प्रयास किया होता तो यह समाज शायद ऐसा नहीं होता आज समाज मे ऐसे लोग नहीं मिलते तो जो हाथ में लुकाठी लेकर अपना घर तक जलाने तो तैयार हों, दूसरों के घर में आग जलाना आज भी आसान है ।

     आज भी हमनें समाज में जाति व धर्म के भेद को पालकर विष बोने का काम किया है जिसके सामने प्रेम जैसे पवित्र चीज भी बौने लगती है । प्रेम को इस दुनिया का सबसे पवित्र भाव है उस भाव का भी जला घोंट दिया जाता हैं। मानव होना आज भी किसी जाति व धर्म के होने से बहुत पीछे की चीज है। समाज में व्याप्त इसी बंटवारे को कबीर समाप्त कर देना चाहते थे। आज के इस आधुनिक समाज में कबीर जैसे विचारकों को बहुत उम्मीद रही होंगी लेकिन आधुनिक का चोला ओढ़े हुए हम आज भी उसी पीढ़ी में जी रहें हैं जब कबीर जी रहे थे ।

    आज हम कबीर को पढ़ते हैं । उन्हें याद करते हैं परंतु उससे भी बड़ी आवश्यकता है उनके कहे को समझकर अपने जीवन में धारण करना । उनके मृत्यु को 500 वर्षों के उपरांत भी उन्हें याद करने का हमारी पत्रिका के माध्यम से यह एक छोटा-सा प्रयास था, उन्हें श्रद्धांजलि थी। हम आशा करते हैं कि हम उन्हें अपने जीवन मे उतार कर जाति, धर्म से मुक्त, सामाजिक कुरीतियों से मुक्त, प्रेम मे लबरेज एक सुंदर दुनिया की रचना करेंगे जहाँ सबके लिए, सबके मन से खुले ह्रदय से बिना किसी शर्त अपनाने की सहूलियत होगी …….

 

डॉ. आलोक रंजन पांडेय

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