समकालीन काव्य परिदृश्य में रामदरश मिश्र एक ख्यात और महत्वपूर्ण नाम हैं। वे आधुनिक काव्य के एक ऐसे कवि हैं जो अपने समय के अनेक काव्यांदोलनों से गुजरते हुए भी कभी किसी वाद से नहीं जुड़े। सन् 1951 में प्रकाशित ‘पथ के गीत’ से निरन्तर अबाध गति से उनकी लेखनी चलती रही है। साहित्य के कालक्रम के हिसाब से मिश्र जी के दो कविता संग्रहों का समय प्रयोगवादी काव्यधारा के अंतर्गत आ जाता है, परंतु इनमें प्रयोगधर्मिता की कोरी झलक दिखाई नहीं पड़ती। इस दौर की उनकी कविताओं में सामाजिक विसंगतियाँ और आर्थिक विषमताओं से उत्पन्न होने वाली निहायत अमानवीय परिस्थितियाँ साफ दिखाई पड़ती हैं। विषमताओं के अंकन के साथ साथ मिश्र जी में इन विषमताओं को दूर करने की प्रबल आकांक्षा भी विद्यमान है। इसके साथ ही एक सहज गति की आवेगमयता भी उनके यहाँ मिलती है, जो कहीं भी उन्हें वीभत्सता तक नहीं जाने देती। उनकी कविताओं में सच का पक्षधर काव्य विवेक अनुस्यूत है, जो उनकी कविता का प्राणतत्व भी है।
यद्यपि मिश्र जी प्रयोगवादी दौर में लिख रहे थे, तथापि उनकी काव्य यात्रा में अनेक विकासशील पड़ाव देखे जा सकते हैं। उनका दृष्टिकोण जैसे जैसे अधिक व्यापक होता गया है, वैसे वैसे जीवन के प्रति अधिक उदारता और सजगता अपनी प्रौढ़ता में अभिव्यक्ति पा सके हैं। मिश्र जी एक तरफ अपनी कविताओं में अपने अनुभव सत्य और अत्यंत मधुर आत्मीय अनुभूतियों को स्वर देते हैं तो दूसरी तरफ मानवीय चेतना को झकझोर कर रख देने वाले क्रूर यथार्थ तथा अमानवीय संदर्भों को भी चित्रित करने से नहीं चूकते। प्रायः ये संदर्भ कवि की सांस्कृतिक अभिरूचि, उनके सुशिष्ट संस्कारों तथा मधुर मानवीय सौंदर्यबोध को धक्का पहुँचाते दिखाई पड़ते हैं। यह सत्य है कि मिश्र जी के भीतर आत्म सजगता, आत्म परीक्षण और आत्मपीड़न की जो अनुभूति व्याप्त है, नई कविता ने उसे विशेष महत्व नहीं दिया है। किंतु नई कविता के कुछ विशिष्ट कवियों ने आत्मानुभूत सत्य के साथ रागात्मक संबंधों का विशिष्ट रूप स्वीकार किया है। इसीलिए अज्ञेय लिखते हैं कि ‘‘ काव्य की वस्तु, विषय के साथ कवि के रागात्मक संबंध का प्रतिबिम्ब होती है।’’1. इसी की व्याख्या करते हुए लक्ष्मीकांत वर्मा ने भी लिखा है कि ‘‘ रागात्मक संबंध के बिना, अज्ञेय की धारणा है कि कोई भी तथ्य एक बाह्य वास्तविकता होती है, जिसका काव्य में स्थान नहीं होता।’’2.
आलोचक आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी ने भी उपर्युक्त तथ्य को स्वीकार किया है। अपने मत को अधिक स्पष्ट करते हुए वे अज्ञेय की ही बात का समर्थन कर रहे होते हैं। वे लिखते हैं कि ‘‘ केवल भावना ही अपने में पूर्ण महत्व नहीं रखती और केवल चिंतन भी काव्य के लिए अधिक दूर तक सहायक नहीं होता। पर जब ये दोनों मिल कर एकतान हो जाते हैं, तब श्रेष्ठ कविता की सृष्टि का अवसर आता है।’’3.
मिश्र जी के काव्य में चिंतन और अनुभूति, भावना और विचारधारा का अद्भुत सामंजस्य मिलता है। उनमें न तो कोरी भावुकता है और न ही कोरा विचार, अपितु उनका विचार, उनकी भावनाओं को अनुशासित तथा अनुप्राणित करता चलता है। उन्होंने किसी काव्यांदोलन के दबाव में आ कर अपनी सहज संवेदनाओं को बाँधना स्वीकार नहीं किया, इसलिए उन्होंने अपने लिए खुले आकाश जैसा मुक्त मार्ग अपनाया। यदि मिश्र जी चाहते तो उस समय के तमाम रास्तों में से कोई चर्चित रास्ता अपने लिए चुन सकते थे, या फिर बहुत ही आसानी से उस समय तक प्रतिष्ठित नई कविता के शोरगुल में शामिल हो सकते थे अथवा अकविता आदि आंदोलनों का साथ देकर शीघ्र प्रतिष्ठा कमा लेते, परंतु किसी भी रूढ़ विचारधारा से जुड़ कर, एक बद्ध सीमा स्वीकार करना उनके लिए संभव नहीं हो सका। उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपनी विचारधारा और भावानुभूतियों को अपनी रचनाओं में चित्रित किया। यही स्वतंत्रता और मौलिकता उनके काव्य की शक्ति बनती है।
यद्यपि मिश्र जी की दृष्टि प्रगतिशीलता के साथ व्यापक जन समस्याओं, विषमताओं और परिवेश के सही यथार्थ को देखने में समर्थ रही है, किंतु डॉ.नामवर सिंह ने उनका उल्लेख एक ऐसे कवि के रूप में किया है, जिसे प्रगतिशील आन्दोलन ने ही कवि बनाया। उनके इस कथन में पूरी वास्तविकता नहीं दिखाई पड़ती है। उन्होंने ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ में संघर्षशील ग्राम्य जीवन से कवि के रचनात्मक जुड़ाव को प्रगतिशील चेतना का एक महत्वपूर्ण तत्व माना है। इस संदर्भ में उन्होंने मिश्र जी को उन कवियों के साथ याद किया है, जिन्होंने लोकगीतों की धुनों को कविता में पुनर्जीवित करने का काम किया। वस्तुतः मिश्र जी जीवनान्वेषी प्रगतिशीलता के पक्षधर हैं और यह उनकी अपनी विशेषता है। यदि इस तथ्य पर नामवर सिंह का ध्यान नहीं गया तो इसका कारण है कि वे अपनी इस मान्यता को बड़े आग्रह के साथ पकड़े रहे कि ‘‘ आवेशमूलक रूमानी दृष्टि और संवेदना अनिवार्य रूप से यथार्थ विरोधी होती है।’’4. किंतु प्रगतिशील जीवन चेतना को लेकर नामवर सिंह के साथ मुक्तिबोध के विचार एकदम अलग हो जाते हैं। मुक्तिबोध नई कविता की प्रगतिशील धारा के नए कवि होते हुए भी बाह्य आग्रहों या बाह्य जगत के यथावत चित्रण को काव्य नहीं मानते अर्थात उस रूप में चित्रित बाह्य जगत उनकी दृष्टि में काव्य तत्व या वस्तु तत्व नहीं होता। रचनाकार की अभ्यांतरिक जीवन दृष्टि के रूप में ही इसका प्रकट होना वे अनिवार्य मानते हैं।5. इसीलिए कलाकार की जीवंत संवेदनशील मानसिकता के प्रश्न को वे मुख्य प्रश्न मानते हैं।6.
मुक्तिबोध की उपर्युक्त दृष्टि का प्रभाव किसी न किसी रूप में रामदरश मिश्र में दिखता है। इस संदर्भ में रघुवीर चैधरी भी यह स्वीकार करते हैं कि ‘‘ मिश्र जी में प्रखर तथा तीव्र भावानुभूतियों के साथ ही सामाजिक चेतना का सक्रिय अंश भी है।’’7. मिश्र जी की काव्य यात्रा में लगातार उनकी सामाजिक चेतना अधिक प्रखर और प्रौढ़ होती गई है। उनमें व्यष्टि की अनुभूति अंततः समष्टि के साथ एकमेक हो जाती है। वे इन सामाजिक अनुभूतियों को मात्र चित्रित ही नहीं करते, अपितु उसमें इनके मन की छटपटाहट और मानवीय मूल्यों की पक्षधरता अधिक साफ रूप में दिखाई पड़ती है।
उनके लगभग सभी संग्रहों में मानवीय पीड़ा और सामाजिक सरोकारों के प्रति चिंतित व्यक्तित्व देखा जा सकता है। सन् 1951 में ‘पथ के गीत’ संग्रह के साथ मिश्र जी ने साहित्य की दुनिया में प्रवेश किया। यद्यपि उनके इस संग्रह में छायावादी प्रभाव दिखाई पड़ता है परंतु साथ ही कवि का जीवन के प्रति सहज व्यवहार और यथार्थ को उसके असलीपन में पहचानना तथा इस पहचान की गहरी किंतु सहज प्रतिक्रिया भी दिखाई पड़ती है। इस संग्रह में जहाँ एक तरफ परिवेश को जी कर प्राप्त किया गया अनुभव है, वहीं दूसरी तरफ व्यक्ति मन की पीड़ा और दर्द भी रचा बसा है। प्रकृति के साथ आत्मीय और सहज संबंध भी उनकी कविताओं की विशेषता है। अनेक स्थलों पर वे जीवन – जगत और प्रकृति को एक साथ समझने की कोशिश करते दिखते हैं। इसके बावजूद उनकी कविता आशोन्मुख बनी रहती है। उनकी कविता में पीड़ा विविध रूपों में बिखरी हुई है, किंतु उनकी यह पीड़ा पराजय की पीड़ा नहीं है, उनकी पीड़ा संघर्ष और जिजीविषा के बीच आकांक्षा के साथ चलती हुई पीड़ा है। वे सत्ता के जिस छद्म को बेनकाब करने की कोशिश करते हैं, वह आगे के संग्रहों में अधिक मजबूत और अधिक विश्वस्त रूप में तीखे और मारक व्यंग्य के साथ दिखाई पड़ती है।
‘पथ के गीत’ से शुरू हुई कवि के काव्यानुभूतियों की संवेदनशीलता, आत्मीयता, सहजता, सरलता तथा यथार्थ के प्रति सचेत दृष्टि, उनके आगे आने वाले संग्रहों में, अपने दायरे का अधिक विस्तार करती अभिव्यक्त होती है। मिश्र जी का दूसरा काव्य संग्रह एक लम्बे अंतराल के बाद सन् 1962 में प्रकाशित होता है। लगभग ग्यारह वर्ष का यह अंतराल कवि की दृष्टि के लगातार विकसित होने और गंभीर होते जाने की प्रक्रिया की एक कड़ी की तरह आता है। इस संग्रह में भी कवि के भीतर गंवई जीवन के प्रति आन्तरिक लगाव और सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यबोध गहरी आत्मीयता से प्रकट होता है। जहाँ ‘पथ के गीत’ में कवि यथार्थ के धरातल पर कम ही पाँव धरता है और सामाजिक समस्याओं के साथ उसका ट्रीटमेंट गहरे भावात्मक आवेग के साथ उभरता है, वहीं ‘बेरंग बेनाम चिट्ठियाँ’ में कवि यथार्थ पर पड़े सारे आवरण हटा कर उसे अनावृत्त कर देना चाहने लगता है। अपनी समकालीन परिस्थितियों को भी पहले की अपेक्षा अधिक अपनेपन के साथ चित्रित करने में सफल होता है। अत्याधुनिक कवियों की भाँति उनकी पीड़ा ओढ़ी हुई पीड़ा नहीं है, वरन् वह उनके अनुभवों की आँचमें पक कर और अधिक सघनता में व्यक्त हो उठती है-
‘‘ लगता है
अब भी मैं बच्चा हूँ
अपने गंवई मित्रों से खेल रहा
डूब रहा तीसी, सरसों के फूले वन में
धूसर सड़कों पर कुत्तों संग लोट रहा
भागता मदरसे से छिप छिप कर
भूख से तड़पते चेहरे अभी ताजे हैं
सपनो में आते हैं मरे हुए मित्र अभी।’’8.
आठ दस अपने सगे गमगीन चेहरे…..’’9.
यदि ये चेहरे हमारी संवेदना को झकझोरते हैं, तो इसका कारण यह नहीं कि कवि ने सुदूर शहर में बैठ कर एक सच सुना और लिख डाला, बल्कि यह सत्य कवि के भुक्त सत्य में शामिल है। इसीलिए यह सत्य आसानी से झटक कर दूर नहीं किया जा सकता-
‘‘ये अतन धुंधले विवश चेहरे
मुझे क्यों घेरते हैं
कह रहे जैसे कि पहचानों
मुझे लगता कि इन मासूम चेहरों को
इन असमय बुझे हँसते चिरागों को
निकट से जानता हॅू….’’10.
कवि द्वारा देखे और महसूस किए गए इन चेहरों की पीड़ा, कवि को आत्मसाक्षात्कार तक खींच ले जाती है। जगह जगह उनकी कविता में आत्मसाक्षात्कार से उपजा द्वंद्व और आत्म स्वीकृति का साहस बिखरा हुआ है –
‘‘ मैं इन सारी कुरूप छायाओं को बटोर कर
समाज पर चीखता हूँ
और कविता करता हूँ
और न जाने क्यों
खुद आइने के सामने आने से डरता हूँ ।’’ 11.
‘कंधे पर सूरज’ की कविताओं में मिश्र जी का जिंदगी के प्रति सहज और इमानदार सरोकार दिखाई पड़ता है। यद्यपि यहाँ उनका ‘मैं’ अपने अलग और खास व्यक्तित्व के साथ उभरता है, किंतु फिर भी मिश्र जी उसकी सीमाओं को जाँचते परखते हैं –
‘‘ मेरे कमरे के सामने
परछाई की तरह ठिठक गया है
एक खामोश अजनबी
पुस्तक में धॅसी ये आँखें
टकरा जाती हैं एक पल को
उसकी व्यथा से भीगी आँखों से
कहीं कुछ माँग न बैठे
फिर पुस्तक में धँस जाती हैं
शायद वह खड़ा है अभी भी
मैं कमरे का लौहद्वार बंद कर लेता हूँ ।’’12.
किंतु इस लौहद्वार को बंद कर लेने से मुक्ति संभव नहीं हो सकती। कवि भी मुक्त नहीं हो पाता। समाज से उसका गहरा सरोकार उसे चेतना के सतर पर झकझोरता है, आत्मा के स्तर पर धिक्कारता है और अंततः यह आत्मबोध उसे प्रश्नों की धार पर ला कर खड़ा कर देता है –
‘‘ उस मिट्टी को कोसता हुआ उससे भागता रहा
एक अस्वीकार में सो कर दूसरे में जागता रहा
मैंने क्यों नहीं स्वीकार किया कि
कोई मेरे लिए कपड़ा बुनता है
कोई अन्न उपजाता है
कोई कागज और कलम गढ़ता है…..
और जब जब मैं अपने से प्रश्न करता हॅू
तब लौट आता हॅू तुम्हारे पास मेरे देश।’’ 13.
यहाँ प्रकट आत्म परीक्षण का यह भाव यथार्थ को परखने के साथ साथ अपने विचारों को सही धरातल पर प्रतिष्ठित करने और अपने कर्म के विरोधाभासों में सामंजस्य बैठाने का उपक्रम बनता हुआ भी प्रतीत होने लगता है।
मिश्र जी की कविताओं में बौद्धिकता और अनुभूति का अद्भुत सामंजस्य देखा जा सकता है। उनकी अधिकांश कविताएं समकालीन परिवेश को उसकी सच्चाई के साथ उकेरने में सफल रही हैं। आज का शहरी जीवन पूँजी के वर्चस्व तले पिसती हुई संवेदना में जीने को विवश बनाया जा रहा है। मशीनी संस्कृति से घिर कर मनुष्य उसके गुलामों की तरह शोषित, उत्पीड़ित हो रहा है। यह अपसंस्कृति मनुष्य के भीतर की मनुष्यता, आत्मीयता, उत्सर्ग, उदारता जैसी भावनाओं को कुचल रही है। कवि इस टूटते, बिखरते अवसाद बोझिल मनुष्य के लिए चिंतित है। यह चिंता ही कवि को उस वर्ग की तरफ खींचती है, जो अपनी पीड़ा रोने चीखने में व्यक्त नहीं कर सकता। ‘मेज पर माथा झुकाए, थकी सी मुस्कान बेचने वाले’ इस वर्ग में इतनी शक्ति नहीं रह गई है कि ‘काँपती हुई चिंगारियों के पैरों को बाहों में जकड़ ले’ अथवा ‘ लपटों को छाती पर सह ले’। महानगरों का यह वर्ग, जो बंद ऑफिसों में काम करता है, इतना नीरस ओर यांत्रिक हो चुका है कि उसके जीवन में संभावनापूर्ण संघर्ष का कोई अनुभव ही नहीं बन पाता है। ऐसे वर्ग के प्रति चिंतित मिश्र जी लिखते हैं कि –
‘‘ चाँदनी यह
जो बिखरती थी जवानी की फसल पर डहडही हो
ढारती थी अमृत झर झर पुष्प शैशव पर
आज बंद ऑफिस में
मेज पर माथा झुकाए
थकी सी मुस्कान रह रह बेचती है
मैं नहीं हॅू।’’14.
मध्यवर्गीय जीवन की निराशा, विफलता आदि को अतिरंजना के साथ प्रस्तुत करने में मिर जी का विश्वास नहीं रहा है। वे इस वर्ग की पीड़ा, निराशा आदि को सहज हो कर, यथार्थ के सही संदर्भों में व्यक्त करते हैं। यह उनकी कविता का केन्द्रीय विषय न हो कर उनका जीया हुआ अनुभव संसार है, अतः वे इस वर्ग के चित्रण में अत्यंत आत्मीयता से पेश आते हैं और पाठक को भी आत्मीय जुड़ाव का मौका देते हैं।
दृश्य विधान पर मिश्र जी की गहरी पकड़ है। वे दृश्यों के माध्यम से अपनी बात को अधिक मर्मस्पर्शी ओर भेदक बना देते हैं। इन दृश्यों को उन्होंने अपने जीवन साक्षात्कार में पाया है, अतः उनकी ये सामयिक संदर्भों की दृश्य योजना किसी गहरे सरोकार से उपजी लगती है, न कि उपर से ओढ़ी हुई।
इसीप्रकार ‘दिन एक नदी बन गया’ संग्रह की कविताओं में यथार्थ की गहरी अनुभूति के प्रति कवि का सच्चा और ईमानदार सरोकार अधिक स्पष्टता से उभरा है। वह अपनी संघर्षशील चेतना के तहत यह घोषणा करता है कि – ‘‘ मेरे हाथ में सोने की नहीं सरकंडे की कलम है
सरकंडे की कलम
खूबसूरत नहीं, सही लिखती है।’’15.
‘जुलूस कहाँ जा रहा है’ जैसे आगे के संग्रहों की अधिकांश कविताएं अपने मौलिक स्वरूप में, पिछले संग्रहों की कविताओं से कुछ खास भिन्न नहीं हैं। मिश्र जी छोटी छोटी कविताओं में भी राजनीति के क्रूर, स्वार्थी रूप को उद्घाटित करने में काफी सफल रहे हैं। ‘जुलूस’ कविता में ऐसे ही एक सच का साक्षात्कार कराया गया है –
‘‘ जुलूस जा रहा है
रास्तों को रौंदता
फसलों को कुचलता
घरों को तोड़ता, फोड़ता
रथों पर बैठे हैं ऊँचे लोग
और लाखों फटेहाल लोग रथ खींच रहे हैं।’’ 16.
मिश्र जी की कविताओं के विविध जीवन दृश्य अनुभवात्मक स्तर पर देर तक मथने की शक्ति रखते हैं। ये कविताएं जिंदगी की तमाम जटिलताओं, विविधताओं की उस जमीन पर खड़ी हैं, जो आम आदमी की अपनी जमीन है। इन कविताओं को मिश्र जी के संस्कारित व्यक्तित्व का शुभ रूप एक खास व्यक्तित्व प्रदान करता है। परिवेश से कटी हुई क्रांतिकारिता पर मिश्र जी को रत्तीभर भी विश्वास नहीं है। वे परिवेश को जी कर, उसे रूपाकार देने के विश्वासी हैं और यही उनकी कविता का प्राणधर्म है। उनमें जो व्यैक्तिकता है, वह भी अपने नैतिक मूल्यबोध के साथ अंततः सामाजिक सरोकारों को ही समर्पित हो गई है। वे स्वयं कहते हैं कि ‘‘ मैं मानता हॅू कि वृहत्तर समाज, राष्ट्र और उनके जीवन प्रश्नों, मानवीय यातनाओं, सामूहिक हित- अहित की समस्याओं, मूल्यबोधों के रूप में हमारे आस पास के परिवेश में होते हैं और जिसे हम रोज जीते हैं। वे ही हमारे अनुभव के अंग बन जाते हैं।….. अपने आस पास के परिवेश से कटा हुआ, जीवंत चरित्रों और अनुभव बिम्बों से अपरिचित कलाकार विश्व या समाज का चित्र एक अवधारणा के स्तर पर ही उभारता है, जो बेअसर और निष्प्राण होता है।’’17.
मिश्र जी की कविताओं में अभिव्यक्त हुई सामाजिक चेतना, उनके अपने परिवेश से जुड़ी हुई सामाजिक चेतना का मानवीय अथवा अमानवीय रूप ही है। उनके विस्तृत अनुभव संसार को समेटता ग्यारहवां काव्य संग्रह ‘ आम के पत्ते’ उनकी यात्रा के एक पड़ाव की भाँति ही दिखाई पड़ता है। गहरे मानवीय सरोकारों, चिंताओं और सद्भावनाओं का पाथेय लिए सहज ही वे अपनी अगली यात्रा की तरफ बढ़ जाते हैं। अलग से कोई झंडा उठाने की आवश्यकता उन्हें नहीं पड़ती। उनकी सामाजिक चेतना पिछले संग्रहों की भाँति यहाँ भी अत्यंत प्रखर एवं प्रबल है। वे सामाजिक जीवनानुभवों को व्यैक्तिक स्तर पर महसूस करने वाले ऐसे कवि हैं, जिनकी अभिव्यक्ति जनता की अभिव्यक्ति बन जाती है। वे अपने सामाजिक अनुभवों को मात्र चित्रित ही नहीं करते, अपितु इसके भीतर उनके मन की छटपटाहट और मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़ा मन साफ दिखाई पड़ता है।
‘आम के पत्ते’ की पहली कविता ही स्त्री के मातृरूप का चित्र उकेरती है, जो समय के साथ कभी धुंधधलाता नहीं। संबंधों की आत्मीय उर्जा, विश्वसनीयता और समझ उनकी अनेकानेक कविताओं में मुखरित होती है। ‘कलम’, ‘मेज’, ‘दूब’,‘सूई’, ‘पंखा’, ‘कुर्सी’, ‘झाड़ू’, ‘चाकू’ आदि बेहद सामान्य वस्तुओं पर लिखी ऐसी कविताएं हैं, जहाँ मानव जीवन के सुख दुख को महसूस करती ये निर्जीव वस्तुएं, निर्जीव न हो कर, मानव संवेदनाओं से जुड़ी उसकी सहयात्री हो जाती हैं। ‘माइक’ कविता आज की बदली परिस्थितियों का चित्र सामने रखती है –
‘‘ मैं रात से भाग कर सुबह में समाना चाहता हॅू
किंतु मेरे पहॅुचने से पहले ही
मुँह में माइक दबाए हुए फिर जाग जाते हैं इनके,
उनके और जाने किन किन के देवालय……. ’’ 18.
एक तरफ गाँव की सुंदर सुखद स्मृतियाँ कवि के साथ हैं तो दूसरी तरफ ‘आम के पत्ते’ जैसी कविताएं, जो हमारे अपने ही परिवेश से अजनबी होते जाने और अपनी संस्कृति को जड़ धार्मिक प्रतीकों में बदल देने के सामयिक युग की विसंगतियों का बयान है।
मिश्र जी के पास व्यंग्य का खास अंदाज है। उनके व्यंग्य के नुकीलेपन में व्याप्त अहिंसक स्वर उसे अद्भुत बना देता है। इस अंदाज को ‘हाथ- आठ कविताएं’ में बखूबी देखा जा सकता है। ‘फाइल’, ‘अपढ़’, ‘साहित्य पुराण’, ‘खोज’, ‘आपसी बॅटवारा’ आदि कविताएं व्यंग्य के इसी लहजे में आज की फासीवादी ताकतों और धार्मिक व्यवसाय के चेहरे को बेनकाब करने का प्रयत्न करती है।
मध्यवर्गीय आम आदमी के जीवन और उसकी सोच पर कवि की पकड़ गहरी है। यथार्थ की संपूर्ण भयावहता के बावजूद जीवन की गति, लय, ताल उनसे नहीं छूटता, अपितु उनकी भावाकुलता यथार्थ की गहरी समझ से ही उपजती है। ‘नदी’ में कवि इसे स्वर भी दे देता है –
‘‘ हाँ आज मैं नदी के साथ नहीं हॅू
लेकिन वह मेरे साथ है- भीतर, गहरे भीतर
मुझे भिगोता हुई।’’ 19.
मिश्र जी की कविताओं का अनुभूति पक्ष अत्यंत सबल है। ‘दिनभर’ कविता में वे स्वीकार करते हैं कि दिन भर के बाद जो हाथ लगता है, वह और कुछ नहीं सिर्फ अनुभव होता है और इसी अनुभूति के खजाने को ले कर कवि लौटता है। अनुभूति की आवेगमय तीव्रता में कुछ आत्मीय गीत भी सृजित हुए हैं। ‘अक्सर वह काई’, ‘एक दीवार थी ढह गई’, ‘फूल हरसिंगार के’, ‘आओ बात करें’, ‘थकी थकी सी शाम’ आदि गीतों में जीवन का सकारात्मक रूप और भविष्य के प्रति कवि की आशा प्रच्छन्न रूप से झलकती है। लम्बी कविताएं हों या गीत, बुद्धि और हृदय का सामंजस्य उन्हें अनूठापन प्रदान करता है। सरस, सरल अभिव्यक्ति का एक उदाहरण देखा जा सकता है-
‘‘ अपनी अपनी गठरी ले कर क्या अलग अलग चलना
खोल कहीं दो पल हॅस लेना, फिर घंटों जलना
खुशियाँ थोड़ी, ढेरों गम हैं, आओ बात करें।’’ 20.
मिश्र जी के गीत सामाजिक जीवन की पीड़ामय अनुभूतियों के साथ साथ आर्थिक सामाजिक विसंगतियों, पीड़ा, शोषण, दमन आदि के स्वर को भी पूरी प्रखरता से उभारते हैं। उनके प्रथम कविता संग्रह ‘पथ के गीत’ में भी इस तीव्र अनुभूति के प्रमाण मिलते हैं। जैसे-
‘‘ दीवाली रोज आती है अटारी पर
नहीं आती कभी इक वर्ष में
इक बार भी इनके मजारों पर
कभी उजड़ी हुई इस आँख के सूने कगारों पर।’’21.
कवि की सहज अभिव्यक्ति, सहज शिल्प का सृजन करती है। उनका शिल्प स्वाभाविक चेतना का परिणाम है, अतिरिक्त सजगता का नहीं। इसी करण अनावश्यक दुर्बोधता या जटिलता उनके काव्य से बहुत दूर है। यह कवि की अद्भुत भाषायी क्षमता का परिचायक भी है और उनके काव्य की शक्ति भी। यह महत्वपूर्ण है कि उनके काव्य का प्राण भाव सदैव सकारात्मक रहा है।—————————–
संदर्भ –
1. आत्मनेपद, अज्ञेय, पृ. 167
2. नये प्रतिमान: पुराने निकष, लक्ष्मीकांत वर्मा, पृ. 158
3. नया साहित्य: नए प्रश्न, आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी, पृ. 102
4. आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ , नामवर सिंह, पृ.
5. नये साहित्य का सौंदर्य शास्त्र, मुक्तिबोध, पृ. 09
6. वही, पृ. 09
7. कवि रामदरश मिश्र, रघुवीर चैधरी, सं. – महावीर सिंह चैहान, नवनीत गोस्वामी, पृ. 93
8. बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ , रामदरश मिश्र, पृ. 16
9. वही, पृ. 33
10. वही, पृ. 31
11. कंधे पर सूरज, रामदरश मिश्र, पृ. 61
12. बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ , रामदरश मिश्र, पृ. 56
13. कंधे पर सूरज, रामदरश मिश्र, पृ. 31-32
14. बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ, रामदरश मिश्र, पृ. 06
15. दिन एक नदी बन गया, रामदरश मिश्र, पृ. 34
16. जुलूस कहाँ जा रहा है, रामदरश मिश्र, पृ. 63
17. पक गई है धूप, भूमिका, रामदरश मिश्र
18. आम के पत्ते, रामदरश मिश्र, पृ. 114
19. आम के पत्ते, रामदरश मिश्र, पृ. 30
20. वही, पृ. 68
21. पथ के गीत, रामदरश मिश्र, पृ. 63
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