शोध सार –
मध्यकाल के निर्गुण कवियों में मंझन का नाम उल्लेखनीय है। मंझन कृत ‘मधुमालती’ सूफी काव्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण रचना है। यह काव्य केवल प्रेमकथा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें तत्कालीन समाज और लोकजीवन का स्थान बहुत बड़ा है । इस रचना के माध्यम से मध्यकालीन भारतीय जीवन की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। लोकजीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष प्रकृति से जुड़ाव है। जो उस समय के ग्रामीण जीवन को प्रदर्शित करता है। लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन यापन करते थे। जिसकी भावना इस काव्य में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। इसमें लोकसंस्कृति का भी सुंदर चित्रण किया गया है। विवाह, त्योहार, लोकगीत और परंपराओं का उल्लेख किया है जिसे आम जनमानस से जोड़ा गया है। प्रेम और विरह जैसे भावों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह काव्य जनसामान्य के हृदय के निकट पहुंचता है। सामाजिक दृष्टि से भी “मधुमालती” महत्वपूर्ण है। इसमें राजा, रानी, साधु, व्यापारी और सामान्य जनता सभी वर्गों का उल्लेख मिलता है, जो उस समय की सामाजिक संरचना को दर्शाता है। साथ ही, इसमें प्रेम को सामाजिक बंधनों से ऊपर स्थान दिया गया है, जो लोकमानस की भावनाओं को व्यक्त करता है।भाषा की दृष्टि से यह काव्य अत्यंत सरल और सहज है। इसमें अवधी और ब्रज जैसी लोकभाषाओं का प्रयोग किया गया है, जिससे यह जनसाधारण के लिए सुगम बन जाता है। अतः इनके यहां लोकजीवन का एक सजीव दस्तावेज है। जिसमें प्रकृति, संस्कृति, समाज और मानवीय भावनाओं का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
बीज शब्द:- लोकजीवन, संस्कृति, लोक संस्कृति, परंपरा, समाज, एकता, कविता, समन्वय
कवि मँझन मध्यकालीन भक्ति साहित्य के निर्गुण काव्यधारा के महत्वपूर्ण कवि हैं। इनकी रचना मधुमालती प्रेमाख्यान परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।मँझन अपने समकालीन कवि जायसी से बहुत भिन्न हैं। मँझन एक बड़े उत्कृष्ट कथाकार हैं जिन्हें महाकाव्यकार बनने का तनिक भी मोह नहीं था। उनकी यह रचना लोकजीवन और संस्कृति को उजागर करती है।लोकजीवन को प्राथमिकता देते हुए इस महाकाव्य की रचना करते हैं ।मँझन हिंदू थे या मुस्लिम इन दोनों धर्म को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। सूफ़ी की खास बात यह है कि इन्होंनें इस्लामिक विचारधारा में होने के बावजूद हिंदू घरानों से कथा उठाते थे और उन्हें महाकाव्य में रचते थे।
लोकजीवन और संस्कृति का आपस में गहरा संबंध है। लोकजीवन ही संस्कृति का आधार होता है, क्योंकि संस्कृति का निर्माण आम लोगों के जीवन और उनके अनुभवों से होता है। जैसा कि गाँवों में मनाए जाने वाले त्योहार होली, दीपावली, तीज केवल धार्मिक पर्व नहीं होते बल्कि लोकजीवन की खुशियों, परंपराओं और सामूहिकता का प्रतीक भी होते हैं। इन त्योहारों के साथ लोकगीत, नृत्य, मेले और पारंपरिक भोजन भी जुड़े होते हैं, जो संस्कृति को जीवंत बनाए रखते हैं।लोकजीवन में प्रकृति का विशेष महत्व होता है।आज के आधुनिक युग में तकनीक और शहरीकरण के कारण लोकजीवन में कई परिवर्तन आ रहे हैं। नई जीवनशैली के कारण कुछ पारंपरिक रीति-रिवाज और लोककलाएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। फिर भी लोकजीवन और संस्कृति का महत्व कम नहीं हुआ है। ये हमारी पहचान, इतिहास और सामाजिक एकता के आधार हैं।
भक्तिकाव्य में कवि कविता के माध्यम से समाज को गढ़ने का कार्य करता है। कवि की संलग्नता ही दर्शाती है कि वो किस प्रकार के समाज की स्थापना करना चाहता है। डॉ. प्रेमशंकर भक्ति काव्य की भूमिका को बताते हैं कि “मध्यकाल का यथार्थ भक्तिकाव्य के ऊपर ऊपर तैरता नहीं है वह कवियों की गहरी मानवीय संलग्नता से उपजता है।”(1)
भक्तिकाल की कविता रचना के स्तर पर अपने समय से टकराते हुए संस्कृति का निर्माण करती हैं। बिना समय के टकराव से कोई भी लोक और संस्कृति आगे बढ़ नहीं सकती।यदि बढ़ती भी हैं तो उनकी समय सीमा भी बहुत कम होती है।वो अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकतीं हैं।
शिव कुमार मिश्र के शब्दों में,” कोई भी महान साहित्य महज प्रतिक्रिया की उपज नहीं हुआ करता, महान रचनाशीलता अपनी खुद की ज़मीन से जुड़कर ही सामने आती है तथा अंतरात्मा की मुक्त प्रसन्न और स्वाभाविक अभिव्यक्ति हुआ करती है।”(2)
मधुमालती रचना में मनोहर और मधु की लौकिक प्रेम कथा है। इस कथा के माध्यम से मँझन ने सूफ़ी प्रेमसाधना की अभिव्यंजना का सफल प्रयास किया है। इस लोक कथा में अवसर आने पर मँझन ने मधुमालती का अलौकिक रूप की ओर संकेत करते हैं-
इहै रूप प्रगट बहु रूपा इहै रूप बहु भाव अनूपा।(3)
मधुमालती का ऐसा अनोखा सौंदर्य देखकर पद्मावत में पद्मावती का सौन्दर्य सामने आ जाता है –
जस बरनउं तैसि नहिं रानी। धनि ओहिं रूप बर्ण नहिं जानी।
ससि मुख अंग न देखिअ सांचा। ससि सो गगन, मुख इहां बिसांचा।(4)
मँझन के यहां रूप वर्णन की झलक दिखाई पड़ जाती है लेकिन जायसी के यहां ऐसा सौंदर्य जिसकी सुंदरता बताने की क्षमता कवि के पास नहीं है। राजकुमारी का वर्णन मेरी क्षमताओं के वर्णन से बाहर है। सूफ़ी कवियों के केंद्र में लोक है जो संस्कृति को बढ़ावा देते हुए बेहतर समाज की कामना करते हैं। मधुमालती में मध्यकालीन समाज का पूर्णतः दर्शन होते हैं। क्योंकि इसका कथ्य प्रेम पर आधारित है। और यह प्रेम ऐसे समाज में दिखाया है जहां केवल स्वीकृति और निषेध का प्रश्न प्रासंगिक चल रहा हो। स्वीकृति और निषेध के बीच प्रेम का एक ऐसा पुल बांधने का प्रयास किया है जो आज भी प्रासंगिक है। सूफ़ी कवियों में मँझन लोक प्रेम का जिक्र करते कहते हैं-
जेहि जिअ परै प्रेम के रेखा। जहाँ देखै तहां अदेखा।
कतहूं सिस्टी महं रहै न दंदु। जहां देखिए तहां आदि आनंदु।(5)
जायसी के यहां प्रेम को स्वर्ग माना गया है –
मानुष पेम भएउ बैकुंठी । नाहिं त काह, छार भरि मूठी ।।(6)
जायसी प्रेम को सीधे स्वर्ग से जोड़ देते हैं। इतनी बड़ी कल्पना लोक के सामने रख देना स्वप्न के बराबर जो पूर्ण होना अनिश्चित है।यह सहजता हमें मँझन के यहां दिखाई देती है।जो जन समाज तक पहुंच सकता है। जिसकी कल्पना मनुष्य कर भी सकता है। अर्थात् कवि ऐसा स्वप्न भी दिखाता है जो आसानी से पूरा हो यही बारीक अंतर इनके यहां दिखाई पड़ता है।
मधुमालती में प्रतीकात्मकता के आधार पर लोक जीवन को बहुत ही निकटता के साथ प्रस्तुत करते हैं। लोक जीवन में ईश्वर की महत्ता को बड़े प्रेम से दिखाते हैं। इसी कथा में हिंदू देवी देवताओं की शपथ दिलाते हुए दिखाई पड़ते हैं-
हम तुम सच बजा वह कीजै। रुद्र ब्रह्म हरि अंतर दीजै।
आदिहि शपथ जो हम तुम्हं किराऊं। रुद्र ब्रह्म हरि अंतर दिराऊं।(7)
मँझन मुस्लिम कवि होने के बावजूद भी इस सृष्टि का उद्गम ब्रह्मा से माना है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सूफियों का सूत्रीय जाल लोक और संस्कृति का मेल करके आगे बढ़ना।
इस रचना में मध्यमालती प्रेम पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए लोक जीवन की समस्या को प्रतीकात्मक रूप में वर्णन करते हैं-
दुखिया कर दुख जानै जेहि दुख होंही सरीर।
बिनु दुख करि पीरा का जानै दुख दाघे कै पीर।(8)
कबीर के यहां,
सुखिया सब संसार है, खावे और सोए।
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए।।(9)
इन पंक्तियों के माध्यम से कहा गया है कि इस पीड़ा का अनुभव वही कर सकता है जो इसको सहा है। वही व्यक्ति अपने जीवन को गलाने की क्षमता रखता है। और इस दुख को सहन करने की शक्ति केवल ईश्वर से मिलती है। इसी लोभ में व्यक्ति अपेक्षा रखता है कि कभी न कभी उसको अपने विपरीत समय से छुटकारा मिलेगा।
मँझन भगवान को लोक के भीतर देखते हुए उनकी आस्था का बखान करते हैं। जहां संपूर्ण समाज भाग्य के भरोसे बैठा है। उनकी स्थितियों का वर्णन करते हैं –
विधि का लिखा जानि नहि पावा
लिखा को मेटै लीलार।
इसी प्रकार हमें तुलसीदास के यहां भी दिखाई देता है –
होंहहि वही जो राम रचि राखा।(10)
बारीक अंतर को देखते हुए कहा जा सकता है कि मँझन के यहां विधि को जानने वाला कोई नहीं है। अर्थात् विधि स्वाभाविक है।लेकिन तुलसी के यहां विधि का निर्माता राम को बना दिया गया है।
लोकजीवन में अनेक संस्कृतियों का वास होता है।जो परंपरागत रूप से मनुष्यों में अपनी छाप छोड़ जाते हैं। मध्यकालीन समाज में संस्कृति का पूर्ण रूप से पालन किया गया है। अतः मधुमालती में लोकजीवन की संस्कृति का अस्तित्व रहना स्वाभाविक है। जैसा कि मधुमालती में लोक जीवन में पारंपरिक रूप से विवाह में चली आ रही संस्कृति का विस्तार से वर्णन किया है –
चलत सगुण भाल आगे आवा। काग मिरिग़ दाहिने देखरावा
नारी आऊ उर बालक लिहै। बाभन तिलक दुवादस दीहैं
दहिन खरहा बाएं बेसरा। महारि सीस लै दही पुकारा।(11)
लोक जनमानस का हृदय भी शकुन का संकेत देता है। आज भी यही परंपरा हमारे समाज के भीतर विद्यमान है। शकुन- अपशकुन की जकड़न से आज भी हमारा समाज बाहर नहीं निकल पाया है।
ग्रामीण इलाके में नज़र लगना आज भी समाज के ऊपर दाब बना कर विद्यमान है। ऐसे ही मध्यकालीन लोक जनमानस के बीच मँझन अपनी रचना माधुमलती में लोक प्रचलित नज़र लगना का जिक्र किया है –
कै सो आहि डिठयावा काहिं
लौटे परा लाई गर बाहीं।(12)
प्रायः माना जाता है कि सुंदर या गुणी व्यक्ति को अधिक नज़र लगती है। मधुमालती में केवल एक ही स्थान पर नजर लगने का वर्णन मिलता है। सहनायक ताराचंद के सहनायिका प्रेमा को देखकर मूर्छित हो जाने पर मधुमालती की सखियां इसे नज़र का प्रभाव मानती हैं।
शरीर में आंखों का फड़कना आज भी लोकमानस में शुभ- अशुभ के बीच पिस रहा है। प्रायः कहा जाता है कि शरीर के बाएं अंगों का फड़कना शुभ होता है।और दाएं आंखों का फड़कना अशुभ होने का बोध फैला हुआ है। मँझन के लोक जीवन में स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है –
फरकहुं नैन भुआ बर मोरे
परान पियर आओ कोई कोरे
शगुन भाऊ मोहि अस किछु होई
मिलही प्राण प्यारा कोई।(13)
मधुमालती की सखी प्रेमा के आगमन से पहले उसके पिता चित्रसेन इसका जिक्र करते हैं। लोक जीवन में व्याप्त अनेक रीति रिवाज़ को जीतने बारीक से मँझन के यहां मिलता है उतना किसी और के यहां नहीं।
कर्म प्रधान जैसी प्रवृत्तियां हमें कुछ कवियों के यहां दिखाई देती हैं। जिनमें से सर्वप्रथम मँझन में देखा जा सकता है-
पुबबू पुन्नि आहेऊ किछु मोरा
जेई मुख आणि दिखाएउ तोरा
कै करवत ओहीं जनम देवाए
ताहि पुन्नी ताहि दर्शन पाएउ।(14)
यथा कर्म और फल का सिद्धांत भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व है। कर्मानुसार फल की प्राप्ति में भारतीय जनमानस को अपूर्व विश्वास है। इनकी रचना मध्यमालाती में लोक की अभिव्यक्ति पूर्ण रूप से मिली है।
लोकोक्तियां लोक की पहचान होती हैं। जो कम शब्दों में बड़ी बात कहने में क्षमता रखते हैं। यही लोकोक्ति मंजन के यहां लोक की प्रवृत्तियों के रूप में नज़र आता है –
बात बुझि तौ कहै सयानी। आइसी बात उतरें त्रिय पानी
वचन तोर मोहि बिख जनू लागा। अस कोई बरै धुर कर तागा।(15)
कविताओं के माध्यम से कवि लोक को सुंदर बना देते हैं। ऐसी कला सूफ़ी कवियों में इनके यहां देखा जा सकता है।इनके यहां लोक एक परिवार की तरह दिखाई पड़ता है। जैसा कि जीवन में जितने रीति रिवाज़ होते हैं उनका अनुपालन करते हुए, उनको बड़ी लयात्मकता से ज़ाहिर करते हैं।
मध्यकालीन हिन्दी साहित्य में निर्गुण काव्य धारा की प्रमुख प्रवृत्ति गुरु का महत्व बेहद प्रासंगिक है। जो मध्यकाल में लगभग कवियों के यहां अलग- अलग शब्दों में गुरु को विशेष बनाया गया है। मँझन शेख मोहम्मद को गुरु मानते हैं। उनकी महत्ता को प्रदर्शित करते हैं –
शेख मोहम्मद पीरू आपारा। सात समुद्र नाउ कंडारा।(16)
यही महत्ता जायसी और तुलसी के यहां विशेष रूप से देखा जा सकता है –
गुरु सुआ जेहिं पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निर्गुण पांवा।
-गुरु बिनु भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।(17)
इसी प्रकार स्पष्ट होता है कि मँझन के यहां गुरु को विशेष महत्व दिया गया है। मध्यकालीन समाज में बिना गुरु के जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती। ये परंपरा केवल मध्यकाल से ही नहीं बल्कि प्राचीन काल से ही व्याप्त है जो आज भी बेहद प्रासंगिक है। इनकी सबसे बड़ी ताकत अवधी भाषा थी।जो पूरी कथा अवधी में रचते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि जैसा समाज होगा वैसे ही उनकी बोली में रचना किया जाएगा। इससे लोक के निकट पहुंचते हैं।जिसकी संस्कृति और जीवन को क़रीब से होकर परख सके। जैसा कि सूफ़ी के लगभग कवि अवधी भाषा में ही रचना करते हुए पाए जाते हैं। इन्हीं बोली या भाषा के माध्यम से बेहतर समाज बनाने की कामना करते हैं।
निष्कर्ष के आधार पर कहा जा सकता है कि मँझन मध्यकाल के महत्वपूर्ण कवि हैं। जिनका जन्म 14वीं शताब्दी के आस पास माना जाता है। सूफ़ी काव्य के केंद्र में भारतीय लोक हमेशा सर्वप्रिय रहा है लेकिन इनका उद्देश था कि प्रेम का एक ऐसा पुल बना देना है। जिससे एक दूसरे की भाषा, विचार और संस्कृति आदान- प्रदान हो किया जा सके। और हमारे समाज के बीच में धर्म, जाति और राजनीति नुमा जो खाई है उसको अनदेखा करके एक दूसरे से प्रेम के सूत्र में बंध जाएं। अर्थात् कहने का तात्पर्य यह है कि इन्होंनें सदैव समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया है। यह समन्वय भाषा, समाज और काव्य तीनों के आधार पर देखा जा सकता है। इस कार्य को करने के लिए एक ऐसे लोक को कविता का विषय बनाते थे जहां अनेक प्रकार के विषमताओं से से समाज जूझ रहा हो। जहां धर्म एवं राजनीति को आधार बना कर समाज को गुमराह किया जाता था। वहां समन्वय को स्थापित करने का प्रयास करते थे। इन्होंने अपने काव्य में ऐसे लोक का चित्रण करते हैं जहां अनेक प्रकार की रीति रिवाज और संस्कृति से भरा हुआ है। लौकिक प्रेम कथा के आधार पर सम्पूर्ण अवध लोक का दृश्य देखने को मिलता है। ग्रामीण जीवन के भाव, विचार और समझ तीनों बहुत बारीक से चित्रित किया गया है।
संदर्भ सूची –
- प्रेमशंकर, भक्तिकाल का समाजशास्त्र, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-1993 पृष्ठ संख्या 67
- मिश्र, शिवकुमार, भक्तिकाव्य और लोकजीवन, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2013, पृष्ठ संख्या 23
- बुद्धिराज, राजा, मधुमालती पुनर्मूल्यांकन, तक्षशिला प्रकाशन, संस्करण-1976, पृष्ठ संख्या 54
- सेठी, दर्शनल, मधुमालती का काव्सौंदर्य, हिन्दी साहित्य संसार, दिल्ली-1972, पृष्ठ संख्या 118
- मधुमालती, मंझन
- शुक्ल, आचार्य रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, राजकमल, दिल्ली
- सिंह, बच्चन, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण, दिल्ली
- साही, विजय देवनारायण, जायसी, लोकभारती, दिल्ली
- जायसी, मालिक मोहम्मद, पद्मावत, नागरी प्रचारणी सभा, बनारस
- द्विवेदी, हजारी प्रसाद, हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल, दिल्ली
विनय यादव
शोधार्थी,
हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय




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