लव कुमार की कविताएँ

भूख के साये में दुनिया के सांसारिक सत्यों में एक और अटल सत्य जुड़ना चाहिए जिसके बिना, इन सब सच्चाईयों का कोई औचित्य नहीं भूख भी सच का रूप है […]

धर्म आसक्ति और ध्यान – बहन कुसुम

हर दिन कुछ मिनट बड़ा बदलाव ला सकते हैं। सामान्यतः लोगों के लिए अपने दिन से समय निकालना मुश्किल होता है लेकिन हमें इस तरह की अनावश्यक बहानों से बचना […]

डायरी लेखन और हिन्दी साहित्य – मनोज शर्मा

हिंदी साहित्य और डायरी लेखन का आरंभ भामह नाम के आचार्य ने ‘सहित’ शब्द का प्रयोग 6 वीं शताब्दी में पहली बार किया था,उनके अनुसार जो कुछ भी रचनाएं कविता,पद्य,गद्य […]

अटक गई नींद ( लेखक : राकेश मिश्र ) – ललिता शर्मा

प्रेम एक अहसास है। युग चाहे कोई भी हो प्रेम अपने शाश्वत मूल्यों के साथ प्रत्येक युग में विद्यमान रहा है। प्रेम का जुड़ाव हृदय की अन्तःस्थल की गहराइयों से […]

अनुक्रमणिका

संपादकीय  डॉ. आलोक रंजन पाण्डेय शोधार्थी क्रांतिकारी निराला साहित्य में स्त्री विमर्श – सुमन कुमारी पर्यावरण और कवि पंत – गुप्ता अशोक कुमार कृपानाथ छायावादी रचनाकारों की दृष्टि में नारी […]

संपादकीय

हिन्दी साहित्य के इतिहास में जब कविताओं के बेहतरीन दौर की बातें की जाती हैं तो सबसे पहले याद आता समाज को आंदोलित करने भक्ति काल,जिसके प्रभाव को आज भी […]

क्रांतिकारी निराला साहित्य में स्त्री विमर्श – सुमन 

प्रत्येक मानवतावादी व्यक्ति सकारात्मक शक्ति के संपर्क में शीघ्र ही आ जाता है। जिसकी अमर झलक उसके संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व में स्पष्ट दिखती है। ऐसे ही मानवीय मूल्यों एवं […]

पर्यावरण और कवि पंत – गुप्ता अशोक कुमार कृपानाथ

२१वीं सदी के कई महत्वपूर्ण विमर्शों में एक विमर्श पर्यावरण भी है। अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता चला जा रहा है जिससे खाद्यान की पैदावार में […]

बाजारवाद से निर्मित उपभोक्तावाद में उलझा स्री जीवन ( ‘एक जमीन अपनी’ उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में ) – डॉ.सुनील डहाळे

भारत में 1990 के बाद भूमंडलीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण जैसी नई संकल्पनाओं का जन्म हुआ. भूमंडलीकरण की प्रकिया के चलते अर्थकेंद्री समाज में उपभोक्तावाद तथा बाजारवाद का प्रचलन बढ़ा. ‘भारत […]

छायावादी रचनाकारों की दृष्टि में नारी – डाॅ0 बलजीत श्रीवास्तव

नारी आदिम संस्कृति का उद्गम स्थल है, नारी पुरुष की प्रेरणा है और पुरुष संघर्ष का प्रतीक है। ‘‘दोनों की भिन्न प्रकृति से ही परस्पर पूरकता और जीवन की पूर्णता संभव है।’’ याज्ञवल्क्य […]