विरह पदावली : विरह का मनोवैज्ञानिक चित्रण – डॉ. तेजनारायण ओझा

सारांश : सूरदास कृष्‍णकाव्‍यधारा के अप्रति‍म कवि‍ हैं। उनके पदों की वि‍रहानुभूति मार्मि‍क, सहज और प्रभावी हैं। ‍यह प्रेम का दर्पण है। प्रेम ऐसा भाव है जिससे कोई भी अछूता […]

कविताओं से गायब होता देश का अन्नदाता – मोनिका मीना

भारत की जनंसख्या का अधिकांश प्रतिशत कृषि पर निर्भर करता है। देश की अर्थव्यवस्था में सदैव कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। साहित्य में भी किसान एक जमाने से केन्द्र […]

तुलसीदास के ग्रंथों में भारतीय जनसंस्कृति का स्वरूप – कल्याण कुमार

हिंदी के मध्यकालीन युग से लेकर नवीनतम युग में महाकवि तुलसी एक ऐसे सूर्य है,जिनका तेज वर्तमान में छटाक मात्र भी मलीन नहीं हुआ है। भारतीय साहित्य की विभूतियों में […]

अमृतलाल नागर और कथा संसार – अतुल वैभव

अमृतलाल नागर हिंदी गद्य साहित्य के उन शिखर पुरुषों में गिने जाते हैं जिनके गद्य से हिंदी साहित्य ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य भी समृद्ध हुआ है। […]

द्विभाषिकता एवं बहुभाषिकताः संदर्भ एवं प्रकृति – श्वेतांशु शेखर

भाषा का आविष्कार मनुष्य की महानतम उपलब्धियों में से एक है। मनुष्य ने इसके महत्त्व को हजारों-लाखों वर्ष पूर्व पहचान लिया था, इसलिए इसके विकास के लिए प्रयत्नशील रहा। भाषा […]

प्रेमचंद की कहानी-कला : डॉ. साधना शर्मा

‘कथा सम्राट’ प्रेमचंद का आविर्भाव हिंदी साहित्य में एक ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। समकालीन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आन्दोलनों का उन्होंने अपने कथा साहित्य द्वारा नेतृत्व भी प्रदान किया और […]

वैश्वीकरण, बाजारवाद और हिंदी भाषा : डॉ. साधना शर्मा

प्रगति चाहे देश की हो या समुदाय की उसमें भाषा की अहम् भूमिका होती है । भाषा न सिर्फ ज्ञान की संवाहक है वरन् देश की उन्नति एवं प्रगति की […]

फिल्मी आइने में ‘दिव्यांग’ – अर्चना उपाध्याय

समाज में जो कुछ भी घटित होता है फिल्में उन सभी घटनाओं को दिखाने का एक सशक्त माध्यम हैं। वास्तविक जीवन तथा फिल्मी परदे पर दिखाए जा रहे बनावटी जीवन […]

फीचर लेखन कला और सिद्धान्त – डॉ. पंढरीनाथ शिवदास पाटिल

‘फीचर’ (फीचर) समाचार पत्रों का एक अत्यावश्यक व अभिन्न भाग है। इस कारण सभी समाचार पत्रों में ‘फीचर’ देखने और पढ़ने मिल जाते हैं। ‘फीचर’ शब्द लैटिन भाषा के फैक्चर […]