छात्र-पॉलिटिक्स – भूपेंद्र भावुक

वर्ग, क्षेत्र,समूह-विशेष आदि के सामाजिक-प्रतिनिधित्व के लिए, उनके हितों की रक्षा के लिए, उनकी मांगों, उनकी समस्याओं आदि को उठाने के लिए उस वर्ग, क्षेत्र, समूह-विशेष से संबंधित संगठनों, आयोगों , समितियों […]

गुजराती कहानी ‘सगी माँ’ का हिंदी अनुवाद- अनुवादक : डॉ.रजनीकांत एस.शाह

नन्हा सा कुसुमायुध आज चिंतामिश्रित आनंद का अनुभव कर रहा अच्छे वस्त्रों में सज्जित था। अच्छी लगे ऐसी मुस्कराहट बिखेर रही कोई युवती घर में घूम रही थी। कुसुमायुध अपने […]

गुलाम मंडी: किन्नर संवेदना, अस्मिता और अधिकार – पार्वती कुमारी

हिजड़ा शब्द फारसी के ‘हीज‘ तथा हिंदी के स्वर्थिक प्रत्यय ‘ड़ा‘ से मिलकर बना है, जो पुल्लिंग संज्ञा है। इसे न तो स्त्री और न पुरुष के अर्थ में प्रयोग […]

कोरजा (मेहरून्निसा परवेज) : स्त्री जीवन की त्रासदी का आख्यान – आरती

मेहरून्निसा परवेज हिंदी की चर्चित कथाकार है। सातवें दशक से ही वह निरंतर साहित्य-सृजन की प्रक्रिया से जुड़ी हुई है। हाशिये का समाज उनकी रचनाओं के केंद्र में रहा है। […]

निराला का रचना संसार(लेखिका–डॉ. कुलविन्दर कौर) : डॉ. हरदीप कौर

डाॅ कुलविन्दर कौर की यह पुस्तक ‘निराला का रचना संसार’ निराला साहित्य में सांस्कृतिक बोध को उजागर करती है। इसमें लेखिका ने सांस्कृतिक बोध में अध्यात्म दर्शन, लोक-संस्कृति के उपकरण […]

परंपरा का पुनर्मूल्यांकन (नामवर सिंह)- डॉ. प्रकाशचंद भट्ट

नामवर सिंह हिंदी की लिखित-वाचिक परंपरा के बड़े आलोचक रचनाकार हैं। आलोचक और रचनाकार का काम निर्भयता के साथ प्रचलित, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देना कहा जा सकता है। तमाम […]

अप्रवासी सिनेमाः रचनात्मक प्रयोगधर्मिता – राकेश दूबे

आधुनिक समय में सिनेमा जीवन का एक ऐसा अंग बन चुका है जिसे उससे अलग कर पाना संभव नहीं है। सिनेमा ही ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा समाज के विभिन्न […]

साहित्य और सिनेमा में किसान  – तेजस पुनिया

प्रेमचंद कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है किंतु फिल्म निर्माता और निर्देशक अनुराग कश्यप का कहना है कि सिनेमा भी समाज का दर्पण है। भारतीय सिनेमा अपने सौ वर्ष पूर्ण […]