शर्मिन्दगी  (लधुकथा) – केदारशर्मा ’निरीह’

“अकंलजी , उठिए ,यह मेरी सीट है, यहाँ मैं रूमाल रखकर गया था । जो अब भी पड़ा है’’ । रामनाथजी  ने चौंक कर पीछे देखा जब युवा लड़के ने  […]

रंजीत कुमार त्रिपाठी की कविताएं

गाड़िया लोहार  संदर्भः- उपर्युक्त कविता के माध्यम से मेवाड़ (राजस्थान) मुग़ल युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ देने वाली एक जनजाति की वर्तमान दुःखद स्थिति का चित्रण किया गया है, […]

महेश कुमार केशरी की पाँच कविताएं

(1) एक आदिवासी की घोषणा… आदिवासी कह रहा है हमें नहीं चाहिए तुम्हारा विकास! नहीं चाहिए तुम्हारे कंक्रीट के जंगल! हमें नहीं चाहिए बोतल वाला पानी! तुम मत काटो हमारे […]

राकेशधर द्विवेदी की कविताएँ

बाल गीत – माँ तुम बताओ ना कोयल अब कूं-कूं नहीं करती, गौरेया अब फुदकती नहीं दिखती। न ही सुनाई देती है मैना की, मनमोहक बातें। बुलबुल के चुलबुलेपन की, […]

आज प्रकृति चीख रही है (कविता) – डॉ. दीपा

आज प्रकृति चीख-चीखकर करा रही, हमको एहसास, क्या मिला छेड़कर मुझको तुमको, जो भोग रहे हो ये परिणाम। पहले ज़हर हवा में घोला, सांसे अपनी रोक ली, और जल को […]

पूरे चाँद की रात (कहानी) – पूर्णिमा वत्स

हम फिरोज़शाह कोटला के क़िले पर ऑटो से उतरे ही थे कि अविशा ने सवाल पूछ दिया ‘मम्मा ये सारे क़िले एक जैसे ही क्यों होते हैं ?इतने टूटे, एक […]

लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की कविताएँ

चिंता की लकीरें  हर तरफ़ छाया हुआ है घुप अंधेरा, खौफ़नाक मंजर ने बनाया घनेरा। माथे पे मेरे खिंची चिंता की लकीरें, तम से ढका दिनमान हो न सवेरा।। राह […]

क्या फ़र्क पड़ता है ? (कविता) – राजेश्वर मिश्र

क्या फ़र्क पड़ता है, दिल पर ज़ख्म एक हो या हज़ार। उठती हैं टीसें सहती हूँ अत्याचार, बेढब स्वेच्छाचार की राजनीति पर तुम पलते हो जैसे सदाबहार क्या फ़र्क पड़ता […]

नई शुरुआत (कविता) – विनायक

चलो एक नई शुरुआत करते हैं। थोड़ी बहुत ख़ुद से ख़ुद की बात करते हैं।। देखते है क्या बह रहा है ख़ुद के अंदर। बहती हुई नदियों से मिलता समंदर। […]

चुनावी मौसम दिल्ली – मनोज शर्मा

दरवाजे पर आहट हुई मैंने एक अधखुले दरवाजे को खोलते हुए देखा दरवाजे पर केसरी रंग की साड़ी में लिपटी एक युवती जिसके ललाट पर सिंदुर था कुछ युवकों और […]