परंपरागत ज्ञान के संरक्षण में लोकसाहित्य की भूमिका सबसे अहम मानी जा सकती है । इस क्षेत्र में तत्कालीन समाज की मौखिक भाषा का भी उल्लेखनीय योगदान रहता है । समग्र भारत में एसी अनेकों ज्ञान-परंपरा बिखरी पड़ी हुईं हैं, परंतु खेद की बात यह है कि अब तक उन सब का सही सरंक्षण संभव नहीं हो पाया हैं । प्रत्येक भाषा अपनी मौखिक भाषा का ही विकसित रूप है, इस दृष्टि से यह उल्लेखनीय है कि लोकसाहित्य सदैव मौखिक रूप में ही समाज में प्रचलित था, लिखित भाषा और लिपि के आने के बाद उन्हें संगृहीत एवं संरक्षित किया गया था । यदि वर्तमान का साहित्य वटवृक्ष है तो मौखिक साहित्य उसका बीज है । असमीया भाषा-साहित्य की परंपरा प्राचीन और समृद्ध है, अतः लोकसाहित्य के क्षेत्र में असम उच्च भावसम्पन्न साहित्य के भंडार से सुशोभित है । धान रोपने की विधि, कटाई की विधि, कपड़े बुनने की प्रविधि, चिकित्सा एवं खेती से संबन्धित अनेक ज्ञान तथा प्रकृति संबंधी ज्ञान जैसे असम के भूमि में पाये जाने वाले पेड़, पौधे, चिड़िया, फल, फूल आदि के नाम भी लोकसाहित्य से प्राप्त किए जा सकते हैं । इसी के साथ परंपरागत रीति-रिवाज, आहार की प्रस्तुति एवं ग्रहण संबंधी अनेक पद्धतियों का भी उल्लेख लोकसाहित्य में पाया जाता हैं । असमीया लोक-साहित्य में डाक-प्रवचन एक ऐसी विधा है, जहाँ असमिया जलवायु के अनुसार कृषि पद्धति का स्पष्ट उल्लेख मिलता है । ग्रामीण असमीया समाज-जीवन, ज्योतिष-शास्त्र से लेकर कृषि-पद्धति, अर्थ-शास्त्र, नीतिशिक्षा, लोक में प्रचलित चिकित्सा-पद्धतियों का भी यहाँ उल्लेख मिलता है । प्रस्तुत शोधालेख में डाक-प्रवचन में प्रतिफलित असमीया ग्रामीण जीवन एवं कृषि परंपरा पर विस्तार से आलोचना की जाएगी ।
भूमिका: “लोकसाहित्य लोकजीवन के इतिहास के बारें में बताता हैं, वर्तमान के परिवर्तन का आभास देते हैं और भविष्य के बारें में आगाह करता है ।”1 भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध हैं; इस ज्ञान परंपरा को संरक्षित एवं सुरक्षित रखने में भारतीय भाषाओं के लोकसाहित्य का बहुत बड़ा योगदान देखा जाता जाता है । “लोक साहित्य लोक की आत्मा है । लोक समाज का धड़कन है । वह ग्रामीण समाज का आईना है।”2 इस संदर्भ में असमीया लोकसाहित्य का भी उल्लेखनीय योगदान रहा हैं । जन-विश्वास के अनुसार डाक एक प्रवाद पुरुष है, कहते है कि पैदा होते ही डाक ने प्रसवगृह में उपस्थित स्त्रियॉं को संबोधित किया था; इसीलिए उनका नाम डाक पड़ा । डाक शब्द का अर्थ ‘उच्चारण करना’, ‘सम्बोधन करना’ आदि । प्राचीन असम में इन प्रवचनों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था । “ ‘डाक प्रवचन वेद वाणी’-भारतीय लोगों की दृष्टि में वेद-वाक्य का जो मूल्य है; असमीया जन-जीवन में भी डाक-प्रवचनों का समान मूल्य देखा जाता हैं (मूल असमीया का अनुवाद) ।3 इन प्रवचनों में असमीया जन-जीवन का प्रतिफलन देखा जाता है, इन प्रवचनों में कृषि परंपरा, ग्रामीण जीवन, खान-पान, ज्योतिष विद्या, अर्थनीति, राजनीति आदि सभी विषयों का भलीभाँति उल्लेख मिलता हैं ।
गृह निर्माण की प्रविधि: डाक-प्रवचनों में गृह-निर्माण के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश पाए जाते हैं । गृह कौन सी दिशा में होनी चाहिए, कौन सी दिशा में गृह निर्माण करने से विपत्ति की आशंका कम होती हैं; ऐसे संदर्भों में भी डाक-प्रवचनों का उल्लेख किया जाता है-
“पूबा–पश्चिमाकोइ साजिबा घर ।
अकाल मृत्युक नाहिके डर॥”4
अर्थात यदि आप पूरब और पश्चिम की दिशा में गृह निर्माण करते है, तो डाक पुरुष के अनुसार अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है ।
ग्रामीण असम के घरों के परिवेश का वर्णन: डाक-प्रवचनों में प्राचीन असम के ग्रामीण घरों का वर्णन मिलता है, प्राचीन काल में असम में एक सुंदर, सोम्य और प्राकृतिक वातावरण विराज करता था । जहाँ एक भरा-पूरा घर स्वाभाविक जीवन की आपूर्तियों को सम्पूर्ण करने में पूरी तरह समर्थ था । जीवन जीने के न्यूम्नतम साधनों में से अधिकतर वे अपने घर में ही जुगार कर लेते थे; सहज अर्थ में कहा जाये तो एक भरा-पूरा सुखी और समृद्ध घर…जिसकी सुंदर छवि डाक-प्रवचनों में प्रतिफलित होती है; यथा:
“पूबे भोराल, पश्चिमे गोराल
उत्तरे चरु, दक्षिणे गरु–
उत्तरे बाँह, दक्षिणे हाँह॥
दाँतित कंठाल, माजोत आम ।
तेबे जानिबा बारीर काम॥” 5
डाक कहते है असम के घरों की पूरब दिशा में अन्न का भंडार होता है, पश्चिम दिशा में गाय बांधने की जगह ‘गोहाली’ रहती है, उत्तर की दिशा में व्यंजनशाला, दक्षिण दिशा हंस को रखने का स्थान बनाया जाता है । घर के आँगन में ही कठहल का पेड़ होगा। मध्य में आम का पेड़; तभी वह घर समृद्धशाली माना जाता है ।
ग्रामीण जीवन में कृषि का महत्व: कृषि ही प्राचीन असम में मूल आजीविका थी, कृषि को सर्वोच्च सम्मान मिलता था । किसानों के आत्मसम्मान का सभी आदर करते थे और गाँव में उनका सम्मान होता था । खेद की बात यह है कि वर्तमान का परिदृश्य इससे बिल्कुल विपरीत परिलक्षित होता है। आज किसान ही सबसे ज्यादा शोषित और दुखी है, वे अपने यथोचित आदर-सम्मान से वंचित हैं । डाक-प्रवचनों में कृषि के महत्व पर लिखा गया है; यथा:
“जि नरे सदा कृषिक करे ।
सेवार मणि पाइबा घरे॥
हीरामणि थाके अपार ।
खुद गाल नहोले मरणेसे सार॥” 6
अर्थात जो व्यक्ति सदा कृषि पर ध्यान देता है, बड़ी मेहनत और लगन से कृषि कार्य करता हैं; उसके घर में कभी भी अकाल नहीं पड़ता है । आपके पास यदि हीरे-मोती आदि मूल्यवान रत्न हैं, परंतु खाने के लिए अन्न का दाना नहीं है तो क्या फायदा ! चूंकि पहले असम मूलतः कृषिप्रधान राज्य था और यहाँ के लोगों की मूल आजीविका खेती थी, खेती नहीं करेंगे तो उनकी जीविका पर प्रश्न आ जाएगा ।
ताम्बूल–पेड़ रोपन करने की विधि: असमीया जन-जीवन में पान-ताम्बूल का बड़ा महत्व हैं । यहाँ कोई भी मांगलिक कार्य बिना पान-ताम्बूल के सम्पूर्ण नहीं होता है । पान और ताम्बूल का पेड़ प्रत्येक ग्रामीण असमीया घरों की पहचान है । घरेलू कार्य, मांगलिक अनुष्ठान आदि के अलाबा ताम्बूल-पान की खेती असमीया ग्रामीण जीवन के अर्थनैतिक उन्नति का भी माध्यम था । ताम्बूल के पेड़ को कैसे रोपा जाना चाहिए; जिससे उससे अधिक से अधिक मुनाफ़ा हो सके, उसकी विधि का उल्लेख भी डाक-प्रवचनों में पाया गया है । यथा:
“सातोत सेरेंगा, पाँचोत घन।
चयोत तामोल नदन–बदन॥”7
अर्थात-सात हाथ की दूरी पर ताम्बूल के पेड़ों को लगाने से वह अधिक पतला होता है, वही पाँच हाथ की दूरी पर लगाने से अधिक घना होना जा जाता है; दोनों ही पद्धति ताम्बूल की व्यवसाय के लिए लाभदायक सिद्ध नहीं होता है, इसलिए डाक के अनुसार छः हाथ की दूरी पर ताम्बूल का पेड़ लगाना चाहिए’ जिससे खेती खूब जमती है और अधिक से अधिक फल पाने की संभावना रहती है ।
कृषि संबंधी उपदेश: ऊपर उल्लेखित किया जा चुका है कि असमीया ग्रामीण समाज में प्राचीन समय से ही कृषि को सर्वोपरि माना गया है । कृषि संबंधी अनेक उपदेश डाक-प्रवचनों में मिलता हैं, यथा:
“किरिषि कोरि उचर भागे ।
डाके बोले मोर मन लागे॥
किरिषि करिबा एकांत मोने ।
नोफोले किरिषि बिना जतोने॥” 8
अर्थात दूसरों को देखकर कृषि अर्थात खेती करने का मन करे तो अच्छी बात है, परंतु कृषि में मेहनत और लगन की आवश्यकता हैं, बिना यत्न के खेती कभी सफल नहीं होती । उसपर कड़ी मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होती है।
“किरिषित जदि करिबा मन।
हाल गरु राखि करिबा जतन॥”9
अर्थात कृषि यदि अच्छे से करने का मन है तो हल-गाय-बलद आदि का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उनसे ही खेती संभव होती हैं।
“धान होले हय सबे सुफल ।
धान नोहोले सकले विफल”॥ –10
अर्थात जिस घर में धान की खेती होती है, वही घर समृद्धिशाली होती हैं, बाकी सब विफल है । यहाँ असमीया ग्रामीण जीवन में कृषि की महत्वता को दर्शाया गया है । यहाँ इस बात का उल्लेख किया जा सकता है असम का जातीय उत्सव बिहु है और यह तीन प्रकार का होता हैं; जो मूलतः कृषि पर ही आधारित है ।
खेती के लिए पानी कितना जरूरी है, यह सभी को पता है, डाक-प्रवचन में किसानों को पानी का ध्यान रखने के कहा गया है-
“आहिन कातित राखिबा पानीक ।
जेनेकोई रजाइ राखे रानीक॥”11
कारण एवं अर्थ: किसी भी खेती लिए पानी अपरिहार्य है । धान खेती के लिए भी पर्याप्त पानी की आवश्यकता पड़ती है; अश्विन और कार्तिक; यह दोनों महीना धान खेती के अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता हैं, अतः इन दोनों महीनों में धान की खेती में पर्याप्त पानी का ध्यान रखना कृषकों का कर्तव्य है । कम अथवा अध्यधिक पानी से खेती को नुकसान पहुँचता है । इन संदर्भ में डाक कहते है कि इन दोनों महीनों में कृषकों को पानी का ऐसे ध्यान रखना चाहिए जैसे राजा अपनी रानी का रखता है ।
गाय–बलद संबंधी उपदेश: खेती के परम आवश्यक है बलद, क्योंकि प्राचीन समय में केवल उन्हीं से हल जोत कर खेती करना संभव होता था, किसान अपनी गायों और बलदों से बहुत स्नेह करते थे। उन्हें अपने घर के सदस्य की भांति प्यार करते थे, डाक के वचनों में इसका आभास प्राप्त होता है,
“बलधक भाई निदिबा दुख ।
तेहे देखिबा भातोर मुख॥” 12
अर्थात बलद का ध्यान रखना किसान का कर्तव्य है, क्योंकि बिना उसके अन्न उगाना असंभव है । अतः यहां कहा गया है हमेशा गाय-बलद को प्रेम के साथ रखना चाहिए, तभी खेती अच्छी होती है और घर में अन्न का अभाव नहीं होता है।
गाय- बलद आदि खरीदने में किस प्रकार उसकी परख की जानी चाहिए; उसका भी उल्लेख डक-प्रवचनों में प्राप्त होता है, यथा:
“हरिणर सदृश जार कान ।
सेइ बलदक विचारि आन ॥ 13
अर्थात जिस बलद के कान हिरण के जैसे होते है, वही अच्छा होता है, वैसा बलद अगर घर में आ जाए तो लक्ष्मी देवी की कृपा मानिए।
ऊपर उल्लेखित डाक-प्रवचनों में असम की प्राचीन कृषि पद्धति, गृह निर्माण, ग्रामीण परिवेश आदि का बहुत ही सजीव एवं सुंदर प्रतिफलन हुआ है।
उपलब्धियां:
- डाक-प्रवचन में असमीया ग्रामीण समाज-जीवन एवं कृषि परंपरा का प्रतिफलन परिलक्षित होता हैं ।
- डाक-प्रवचन में असम के पूर्वपुरुषों की ज्ञान परपंरा का सहज एवं स्पष्ट प्रतिफलन देखा जाता हैं ।
निष्कर्ष: डाक-प्रवचन लोकसाहित्य का अभिन्न अंग है । इन प्रवचनों में भिन्न ज्ञान एवं नीति उपदेश निहित हैं। खेद की बात तो यह है कि आधुनिकीकरण के चलते हम आज अपनी ही समृद्धशाली विशाल ज्ञान- परंपरा को भूलते जा रहे हैं और पाश्चात्य परंपरा के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इस क्षेत्र में विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक, साहित्यप्रेमियों का दायित्व अब बढ़ रहा हैं, लोकसंस्कृति एवं लोकसाहित्य पर केवल शोध करने से ही काम नहीं चलेगा; बल्कि हमें इसके पुनः प्रचलन पर जोर देना होगा।बहरहाल, इसकी उपयोगिता और महत्व को मद्देनजर रखते हुए इसे पुनः बोलचाल में शामिल करने की आवश्यकता है, ताकि इसकी उपयोगिता के बारे में अधिक अधिक लोग जान सके। आधुनिक युग के सभी माध्यमों के द्वारा इन्हें इस्तेमाल करने के लिए नई राह बनानी होगी। सोशल मीडिया, डिजिटल माध्यमों में भी इन्हें शामिल करना होगा, तभी नई तथा उत्तरपीढ़ी इसके बारे में जान पाएंगे। उन्हें यह बताना अत्यंत जरूरी है कि एक जमाने में कैसे हमारे पूर्वपुरुष एक स्वावलंबी, आत्मनिर्भर एवं प्राकृतिक सौहार्द में जीवन यापन करते थे। अन्यथा यह केवल शोध और इतिहास का विषय बनकर ही रह जाएगा।
संदर्भ सुंची:
- भट्टाचार्य, डॉ वसंतकुमार, असमीया लोकगीत समीक्षा, पृष्ठ. सं.-03, समन्वय ग्रंथालय, नलबारी, संस्करण 1997 ।
- बरूआ, डॉ. जोनाली, असमीया लोकसमाज में डाक–प्रवचन, पृष्ठ सं-10, नर्मदा प्रकशन, प्रथम संस्करण, 2023 ।
- गोगोई, डॉ. लीला, असमीया लोक–साहित्यतर रूपरेखा, पृष्ठ सं-26, बनलता प्रकाशन, 2017
- गोगोई, डॉ. लीला, असमीया लोक-साहित्यतर रूपरेखा, पृष्ठ सं-28, बनलता प्रकाशन, 2017
- गोगोई, डॉ. लीला, असमीया लोक–साहित्यतर रूपरेखा, पृष्ठ सं-28, बनलता प्रकाशन, 2017
- गोगोई, डॉ. लीला, असमीया लोक–साहित्यतर रूपरेखा, पृष्ठ सं-30, बनलता प्रकाशन, 2017
- गोगोई, डॉ. लीला, असमीया लोक–साहित्यतर रूपरेखा, पृष्ठ सं-26, बनलता प्रकाशन, 2017
- दत्त, दंडीराम, डाकर वचन,पृष्ठ सं-94, लायर्स बुक स्टॉल, नवीन संस्करण 2025
- दत्त, दंडीराम, डाकर वचन, पृष्ठ सं-94, लायर्स बुक स्टॉल, नवीन संस्करण, 2025
- दत्त, दंडीराम, डाकर वचन, पृष्ठ सं-94,लायर्स बुक स्टॉल, नवीन संस्करण, 2025
- दत्त, दंडीराम, डाकर वचन,पृष्ठ सं-94 लायर्स बुक स्टॉल,, नवीन संस्करण, 2025
- दत्त, दंडीराम, डाकर वचन,पृष्ठ सं-97, लायर्स बुक स्टॉल, नवीन संस्करण, 2025
- दत्त, दंडीराम, डाकर वचन,पृष्ठ सं-97, लायर्स बुक स्टॉल, नवीन संस्करण, 2025
डॉ. नंदिता दत्त
सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग
नॉर्थ लखिमपुर विश्वविद्यालय, असम ।





Views This Month : 3254
Total views : 925671